इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
बुधवार, 24 जून 2009
वृक्ष सिखाता जीवन-दर्शन
मंगलवार, 23 जून 2009
एक बार फिर बेचारे संता की खिंचाई (-:
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संता रात में सड़क किनारे लैंप-पोस्ट के नीचे कुछ खोज रहा था। तभी उनका पड़ोसी उधर से निकला। वहां संता को देख उसने पूछा, संता साहब क्या ढूंढ रहे हो ?संता, मेरा पांच का सिक्का गिर गया है।पड़ोसी ने पूछा, कहां गिरा था ?संता ने एक तरफ हाथ से इशारा कर कहा, उधर।अरे जब गिरा उधर है तो आप यहां क्यों खोज रहे हैं ?संता, यार उधर अंधेरा है।
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संता के बचपन का एक किस्सा :-
संता और उसके दो दोस्त जंगल में घूमते-घूमते भटक कर रास्ता भूल गये। रात होने वाली हो गयी। डर के मारे तीनों की हालत पतली होती जा रही थी। तभी उनमें से एक ने अपने इष्ट को याद किया। आकाशवानी हुई बोलो क्या चाहते हो? बच्चे ने कहा प्रभू मन घबड़ा रहा है, मुझे घर पहुंचा दीजिये। पलक झपकते ही वह वहां से गायब हो घर पहुंच गया। ऐसा देख दूसरे ने भी अपने आराध्य को याद किया। उसके साथ भी वैसा ही हुआ, वह भी घर पहुंच गया। अब जंगल में संता अकेला। अंधेरा घिर आया था। ड़र के मारे इसके हाथ-पैर फूल रहे थे। पर थोड़ी हिम्मत कर इसने भी अपने इष्ट को याद किया। आकाशवाणी हुई, बोल बालक क्या चाहता है? संता बोला, प्रभू अकेले अंधेरे में बहुत ड़र लग रहा है। मेरे दोनों साथियों को मेरे पास ला दो। अगले ही क्षण दोनों (: (: (:
सोमवार, 22 जून 2009
इसका कोई जवाब है क्या ?
कोरिया की कोयम नदी के किनारे एक उंचा टीला है। जिसे नाक्वाहा नाम से जाना जाता है। इस पर हर साल इकहत्तर पौधे उगते हैं और उन पर इकहत्तर ही फूल खिलते हैं और सारे के सारे फूल एक साथ ही नदी में गिर जाते हैं। आज तक इसका रहस्य या कोई भी वैज्ञानिक कारण किसी की समझ में नहीं आ पाया है। पर इतिहास इसका कुछ-कुछ खुलासा करता है। उसके अनुसार सन ६६० में चीन ने यहाँ के राजा को हमला कर बंदी बना लिया था। युद्ध के बाद जब राजा और उसकी इकहत्तर रानियों को गिरफ्तार कर चीन ले जाया जा रहा था तो उन सब ने इसी टीले से नदी में छलांग लगा कर आत्महत्या कर ली थी। यहाँ के निवासियों का विश्वास है की ये इकहत्तर फूल उन्हीं रानियों के प्रतीक हैं।
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संता, बंता से चींटी और हाथी के बच्चे में कौन बड़ा होता है ?
बंता, नैचुरली हाथी का बच्चा।
संता, रहा न खोते का खोता। अरे पागल जो पहले पैदा हुआ होगा वही बड़ा होगा। (-:
रविवार, 21 जून 2009
ये कैसे डाक्टर हैं भाई ?
शनिवार, 20 जून 2009
एक पुरस्कार, जिसे वर्षों से अपने लिए जाने का इन्तजार है.
एक लाख की राशि अपने ले जाने वाले के इंतजार में है। कोशिश करेंगे ?
मंगलवार, 16 जून 2009
क्या बोतलबंद पानी बेचनेवाली कंपनियां पीने के पानी की कमी बनाए रखना चाहती हैं ?
पानी की बात करें तो पृथ्वी पर पीने के पानी की जरूर कमी है, पर पानी का भंड़ार असीमित है। थल को जल ने चारों ओर से घेर रखा है। जरूरत है उसी पानी को पीने के योग्य बनाने की। जब टायलेट का दुषित जल साफ कर दोबारा काम में लाया जा सकता है तो इस अथाह राशी को क्यों नहीं। ऐसा नहीं है कि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया पर इस विधि के मंहगी होने के कारण इस पर उतना ध्यान नहीं दिया गया शायद। पर जब आप इस विधि पर होने वाले खर्च और बोतल बंद पानी पर लुटाये गये पैसों की तुलना करेंगे तो चौंक उठेंगे। कितनी अजीब बात है कि नल से मिलने वाले पानी से बोतलबंद पानी करीब 1500 गुना मंहगा होता है। जिसके शुद्ध होने पर भी संदेह है। संसार में अरबों रुपये का बोतल का पानी बिकता है। जिसे रखने के लिये करोड़ों बोतलों की जरूरत पड़ती है। जिनके बनाने के दौरान लाखों टन जहरीली गैसों का उत्सर्जन होता है। एक करोड़ से ज्यादा बोतलें रोज कूड़े में तब्दील हो जाती हैं। यकीन मानिए अरबों रुपये खर्च होते हैं इस बोतलबंद पानी को बनाने तथा हम तक पहुंचाने में। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाने में होने वाला खर्च भविष्य को देखते हुए जरा सी भी फिजुलखर्ची नहीं होगी। यह भी तो हो सकता है कि पानी को दूध से भी मंहगा बेचने वाली कंपनियां इस राह में रोड़ा अटकाती हों।
कुछ दिनों पहले कहीं पढा था कि मद्रास में वैज्ञानिकों ने समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने में सफलता पा ली है वह भी एक रुपये प्रति लीटर के खर्च पर (खेद है मैं उस खबर को संभाल कर रख नहीं पाया)। पर कयी रेगिस्तानों से घिरे देशों में इस तरह का पानी काम में लाया जाता है।
मेरा तात्पर्य यह है कि मुसीबत तो अपना डरावना चेहरा लिये सामने खड़ी है। उससे मुकाबला करने का आवाहन होना चाहिये नकि उससे लोगों को भयभीत करने का। दुनिया में यदि दसियों हजार लोग विनाश लीला पर तुले हैं तो उनकी बजाय उन सैंकड़ों लोगों के परिश्रम को सामने लाने की मुहिम छेड़ी जानी चाहिये जो पृथ्वी तथा पृथ्वीवासियों को बचाने के लिये दिन-रात एक किये हुए हैं।
रविवार, 14 जून 2009
क्या जुड़वाओं में ऐसा संभव है ?
वैसे भी दोनों बहनों में इतनी समानता है कि दोनों को पहचानना बहुत मुश्किल है। रिश्तेदारों की बात जाने दें, जिनसे रोज मिलना नहीं होता है, परन्तु उन्हें रोज पढानेवाली शिक्षिकाएं भी भ्रम में पड़ जाती हैं। बचपन से उनका इलाज करने वाले डा. माहेश्वरी भी बताते हैं कि जब भी इलाज करवाना होता है तो दोनों साथ ही आती हैं। वे बताते हैं कि मैं इन्हें बचपन से देखता आ रहा हूं, दोनों को एक जैसी ही बिमारी या तकलीफ होती है। यह पूछने पर कि दोनों के शरीर में इतना ताल-मेल क्यूं और कैसे है, वे भी इसे विचित्र संयोग कह कर चुप हो जाते हैं। मेडीकल सांईस के अनुसार जुड़वां बच्चों का स्वभाव, बिमारियां, बनावट एक जैसी हो सकती हैं, पर एक को चोट लगने पर दूसरे को भी चोट लगना, वह भी उसी अंग और जगह पर, समझ से परे की बात है।
केरल का एक गांव, कोड़िन्ही, जो अपने 250 से भी ज्यादा जुड़वों के कारण जगत प्रसिद्ध है, जिसका जिक्र कुछ दिनों पहले मैंने अपनी एक पोस्ट किया था, वहां भी ऐसी कोई बात कभी नहीं सुनी गयी कभी। वैसे आज के युग में जब नाम व शोहरत की चाहत में मां-बाप अपने नौनीहालों से कहीं भी कुछ भी ऐंड़-बैंड करवाने से गुरेज नहीं करते तो चोट वाली बातें क्या शक पैदा नहीं करतीं ?
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