बुधवार, 22 जुलाई 2020

व्यवसाय, डर व भय का

अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है, जिसमें मृत्यु की अवधारणा सबसे बड़ा डर होता  है  ..................! 
 
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डर ! एक भावना है। किसी संभावित खतरे की उपस्थिति या आभास की वजह से दिलो-दिमाग व शरीर पर भी असर डालने वाले ख्यालों या विचारों की श्रृंखला को डर कहा जा सकता है। जो अन्य भावनाओं की तरह जन्म के साथ प्राणियों को नहीं मिलती, उसका रोपण समय के साथ-साथ होता या करवाया जाता है ! जो जन्म भर किसी संभावित खतरे की आशंका के रूप में सभी प्राणियों में स्थाई रूप से दिलो-दिमाग में स्थापित हो जाता है और अधिकतर जीवन इस पर पार पाने में ही गुजर जाता है। इंसान डरता ही रहता है कभी अनहोनी से, कभी परिवार के अनिष्ट से, कभी आर्थिक संकट से पर मृत्यु की अवधारणा उसका सबसे बड़ा डर होता है।

इंसान को जब किसी चीज से जोखिम महसूस होता है तो डर की भावना बढ़ जाती है ! जोखिम की आशंका किसी भी रूप में हो सकती है, चाहे वह स्वास्थ्य हो, धन हो या अपनी या परिवार की सुरक्षा हो ! वैसे अलग-अलग समय या आयु में डर भी तरह-तरह का होता है। बचपन में शरारत, हठ या कहना ना मानने पर ''आने दो पापा को'' कह कर अनजाने में पहली बार रोपित किया गया ! किशोरावस्था में कुछ खो जाने, पिछड़ जाने, माँ-बाप से बिछुड़ने का या अवचेतन में दफ़न किसी बात का ! युवावस्था में अनिश्चितता का, रोज़गार का, परिवार की खुशहाली का, माँ-बाप की सेहत का, अंधविश्वासों का ! और फिर प्रौढ़ा या वृद्धावस्था में तो जैसे भय, खौफ, आशंकाओं की बाढ़ सी ही आ जाती है ! 

दुनिया में शायद ही कोई ऐसा शूरवीर हो जो किसी भी चीज से ना डरता हो। पर ऐसे लोग बेशुमार हैं जो अपने डर को दरकिनार कर दूसरों की इस कमजोरी का भरपूर लाभ उठाते हैं। आज के समय में समाज के हर तबके में भोले-भाले लोगों को बेवकूफ बना ऐसे लोग अपना उल्लू सीधा करने में जुटे हुए हैं। बच्चों को फेल होने का भय दिखला, कोचिंग जैसे व्यापार में लगे ''गुरु'' ! मौत का डर दिखा अपनी जिंदगी संवारते ''डॉक्टर'' ! भगवान का, काल्पनिक सुख का या यंत्रणाओं का खौफ दिखा भोले-भाले लोगों को बरगलाते, धार्मिकता का चोला पहने, अपने को ऊपरवाले का प्रतिनिधि बताते ''ढोंगी'' ! मानव की कमजोरियों का फ़ायदा उठा उल्टे-सीधे-गैर जरुरी उत्पाद बेचते मौकापरस्त-अवसरवादी व्यापारी ! सभी तो लगे हुए हैं डरे हुओं को और डराने में ! मनुष्य की एक छोटी सी कमजोरी ''डर'' दुनिया में अरबों-खरबों का व्यवसाय बन चुकी है ! आम इंसान डर-डर के इतना डर गया है कि अपने को लूटने वालों की असलियत जानने में भी डरने लगा है ! उसके डर को भुना चंट लोग उसे ही डराने में लगे हुए हैं। डरना एक आम इंसान की फितरत बन चुकी है ! अभी तो राजनीती और न्याय व्यवस्था वाला डर अलग ही खड़ा हुआ है, उसकी तो बात ही नहीं की गई !

ज्यादातर किसी भय का कारण बीते समय में हुई किसी अप्रिय घटना का ही परिणाम होता है, इसी लिए बच्चों में इसका अभाव रहता है। पर डर सिर्फ अप्रिय या नकारात्मक भावना ही नहीं है। इसकी अच्छाई भी है। इसी के कारण व्यक्ति या अन्य प्राणी समय-समय पर अपनी रक्षा भी कर पाते हैं।इसीलिए जीवन के बहुमुखी विकास के लिए व्यक्तित्व में आटे में नमक बराबर डर का होना भी जरूरी है। पर समस्या तब शुरू हो जाती है जब इंसान बिना किसी वजह के डरने लगता है। तब उसकी इस कमजोरी से उसका सारा परिवेश ही प्रभावित हो जाता है। अति तो हर चीज की खराब ही होती है ! फिर चाहे वह आक्सीजन ही क्यूँ ना हो !

डर से छुटकारा पाने या बचने के उपाय तो अनुभवी चिकित्सक, योगगुरु या चिंतक बताते ही रहते हैं। उन्हीं में से किसी एक की सलाह मान अपने ''अतिरिक्त भय'' से छुटकारा पाया जा सकता है। पर सबसे अच्छा उपाय इससे भागना नहीं बल्कि सामना करना ही है। क्योंकि अधिकतर डर बेबुनियाद ही होते हैं। 

10 टिप्‍पणियां:

Alaknanda Singh ने कहा…

मानस‍िकता पर आधार‍ित अपने आप में पूरा ग्रंथ है ''डर'', और अब तो ये बाजार भी बन गया है बहुत अच्छा ल‍िखा शर्मा जी

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

अलकनंदा जी
बहुत-बहुत आभार

Ravindra Singh Yadav ने कहा…

नमस्ते,

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में गुरुवार 23 जुलाई 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!


Meena Bhardwaj ने कहा…

सादर नमस्कार,
आपकी प्रविष्टि् की चर्चा शुक्रवार( 24-07-2020) को "घन गरजे चपला चमके" (चर्चा अंक-3772) पर भी होगी। आप भी सादर आमंत्रित है ।

"मीना भारद्वाज"

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

रवीन्द्र जी
लड़ी में जुडने का सम्मान देने हेतु हार्दिक आभार

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मीना जी
सम्मिलित करने हेतु अनेकानेक धन्यवाद

Kamini Sinha ने कहा…

"मनुष्य की एक छोटी सी कमजोरी ''डर'' दुनिया में अरबों-खरबों का व्यवसाय बन चुकी है "
बिलकुल सही कहा आपने,डर का मनोविज्ञान समझाता सुंदर लेख,सादर नमन

Kadam Sharma ने कहा…

Bilkul sahi baat

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कामिनी जी
अनेकानेक धन्यवाद

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

कदम जी
हार्दिक धन्यवाद

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