गुरुवार, 3 अप्रैल 2025

मच्छरदानी, इंसान की एक छुद्र कीट से मात खाने की निशानी

एक तरफ दुनिया भर में जंगली, खतरनाक, दुर्लभ, मासूम, हर तरह के जानवरों को पिंजरों में बंद कर विश्व के सबसे खतरनाक जानवर इंसान के दीदार के लिए रखा जाता है ! दूसरी तरफ वही इंसान एक अदने से कीड़े से बचने के लिए खुद को मसहरी नुमा पिंजरे में बंद कर अपनी जान की हिफाजत करने पर मजबूर हो जाता है ! वह भले ही ग्रहों के पार जाने की जुगत भिड़ा चुका हो, पर मच्छर भाऊ ने उसके ग्रहों की दशा अभी भी दिशाहीन ही कर के रखी हुई है.................!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 

कुछ सालों पहले तक बंगाल के भद्र-लोक के व्यक्तित्व का, रहन-सहन का जिक्र होते ही धोती-कुर्ता, छाता, सिगरेट, चाय, घर का अपना पोखर जैसी चीजों का उल्लेख भी प्रमुख रूप से हो ही जाता था ! परंतु ऐसी चर्चा करने वाले पता नहीं क्यों उस एक चीज को भुला देते थे जो वहां के तकरीबन हर घर में पाई जाती थी, जिसका नाम है मसहरी ! हो सकता है कि एक छुद्र कोटि के निम्न कीट से अपनी हार की निशानी को ज्यादा मशहूरी दे कर हम अपनी बची-खुची नाक की और बेइज्जती नहीं होने देना चाहते हों ! इसलिए उसका जिक्र ना करते हों !

मसहरी 

म सहरी, मच्छरदानी, मशारी, मॉस्किटो नेट ! एक अति छुद्र-कीट, मच्छर से बचने का एकमात्र साधन ! मच्छर जो तकरीबन हर साल करीब 20-25 करोड़ लोगों को अपने खूनी पंजे में फंसा, उनमें से अधिकतर को जहन्नुम रसीद कर देता है ! और अब तो यह बात जग-जाहिर सी हो चुकी है कि इंसान मच्छर से हार मान चुका है ! इंसानी ईजाद की कोई भी चीज धुंआ, स्प्रे, केमिकल कुछ भी उस अस्थि विहीन, तकरीबन भार हीन कीट से पार नहीं पा सकी है ! उलटे यह अभी भी जमीनी आत्माओं का मिलन परमात्मा से बेहिचक करवाए जा रहा है ! इसने इतने लोगों को ऊपर पहुंचा दिया है, जितने मनुष्य के आपसी युद्ध भी नहीं कर पाए हैं ! इस खतरनाक बला के खौफ का आलम तो यह है कि इससे मुक्ति की परिकल्पना को साकार करने के लिए हमें वैश्विक स्तर पर हर साल 25 अप्रैल को विश्व मलेरिया दिवस मनाना पड़ता है !

 खतरनाक कीट 
ऐसे में यह मसहरी ही है जो हमें इस दुर्दांत शत्रु से किसी हद तक बचाती आ रही है ! मनुष्य जाति को तो इसके आविष्कारक के नाम कोई नोबल पुरुस्कार जैसा कुछ घोषित कर देना चाहिए ! वैसे इसका इतिहास सैकड़ों साल पुराना है ! कहते हैं कि क्लियोपेट्रा के शयन कक्ष में भी इसका उपयोग होता था ! भारत तथा ग्रीस के पुराने दस्तावेजों में भी इसका उल्लेख मिलता है ! समय के साथ-साथ इसके रूप-रंग-आकार-प्रकार में भी तरह-तरह के बदलाव आए हैं ! फैशन के अनुसार इसने भी अपने को ढाल लिया है !

डिजायनर 
एक तरफ दुनिया भर में जंगली, खतरनाक, दुर्लभ, मासूम, हर तरह के जानवरों को पिंजरों में बंद कर विश्व के सबसे खतरनाक जानवर इंसान के दीदार के लिए रखा जाता है ! दूसरी तरफ वही इंसान एक अदने से कीड़े से बचने के लिए खुद को मसहरी नुमा पिंजरे में बंद कर अपनी जान की हिफाजत करने पर मजबूर हो जाता है ! कहते हैं ना कि भगवान सभी को ठिकाने से लगाए रखता है !

बिना भेदभाव सुरक्षा 
जो भी हो मसहरी का तो हमें सदा अहसानमंद रहना होगा ! जो बिना भेदभाव अमीर-गरीब, आबालवृद्ध, स्त्री-पुरुष सभी को बीमार पड़ने से बचाती है ! एक बार घर आ जाए तो वर्षों साथ निभाती है। सोने के पहले इसको लगाने की जरा सी जहमत जरूर होती है पर उसके बाद इसके अंदर परिवार ऐसे निश्चिंत हो सोता है, जैसे किसी किले में सुरक्षा प्राप्त हो

बेफिक्री की नींद 
सो चता हूँ, इंसान को मसहरी में सुरक्षित सोता देख मच्छर क्या सोचता होगा ? जाल की दीवारों पर सर पटक-पटक कर भिनभिनाता होगा, अरे मेरे पेट पर लात मार चैन से सो रहा है ! अच्छा बेटा अभी तो सो ले ! सुबह तो बाहर आएगा ! बहुत शौक है ना शाम को टहल कर सेहत बनाने का, तब देखूंगा तुझे ! देखता हूँ उस बराबर की जंग में कौन जीतता है !

कुछ भी हो इंसान भले ही ग्रहों के पार जाने की जुगत भिड़ा चुका हो, पर मच्छर भाऊ ने उसके ग्रहों की दशा अभी भी दिशाहीन ही कर के रखी हुई है !  

रविवार, 30 मार्च 2025

शिव, मेरा मैन फ्राइडे

बालकगणों के लिए मील के फैक्ट्री एरिया के अलावा हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी, पर जब भी मुझे दिखता, उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मैं छोटा था और वह मुझसे भी छोटा था ! पता नहीं कहां से आया था, कौन लाया था ! यादाश्त में उसका घरों में काम करते सहायक का रूप ही दर्ज है। शिव उसका नाम  था, ना आगे कुछ ना ही पीछे ! कभी पूछा भी नहीं ! भले ही नाम के आगे-पीछे कुछ न हो पर मेरे साथ शायद उसके किसी पिछले जन्म का कोई संबंध जरूर था !

शिव, पचास साल पहले 

बात साठ के उत्तरार्द्ध की है। बंगाल के नार्थ परगना जिले के भाटपारा इलाके में स्थित रिलायंस जूट मील में  बचपन का वह बेफिक्र, सुखद, अवर्चनीय समय था ! स्कूल से कॉलेज और फिर कार्यक्षेत्र तक का सफर वहीं रहते पूरा हुआ ! उस जगह से मेरे परिवार का पच्चीस साल से भी ज्यादा का नाता रहा !

लॉन 

मील के स्टाफ परिसर में देश के तकरीबन हर प्रांत के लोगों के होने के बावजूद वहां एक परिवार का माहौल था ! तीज-त्यौहार, सुख-दुःख सबके साझा होते थे ! बच्चों को खेल-कूद या किसी भी घर में आने-जाने की पूरी छूट तो थी पर लाड-प्यार-डांट-डपट का हक भी सभी बड़ों को था ! उन दिनों वहां के सर्वेसर्वा डागा जी थे ! जो सिर्फ मील के ही नहीं, उसके स्टाफ के परिवारों के भी संरक्षक थे ! हर कोई उन्हें परिवार के मुखिया के रूप में आदर सहित देखता था ! 

परिसर 

बात हो रही थी शिव की ! जैसा कि मैंने बताया बालकगणों के लिए वहां की हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी पर जब भी मुझे दिखता उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे। 

कैसे भुलाएं इस जगह को 

स मय ने अपनी यात्रा के दौरान मुझे रिलायंस से करीब बीस किमी दूर सोदपुर में स्थित कमरहट्टी जूट मील पहुंचा दिया ! काम मैं वहां जरूर करता था, पर सप्ताहंत या मौका मिलते या बना कर ''घर'' पहुँच जाया करता था। ऐसे ही साल भर बीत गया ! एक दिन रिलायंस आया हुआ था कि अचानक शिव मेरे पास आया और मेरे साथ चलने की इच्छा जाहिर की ! उन दिनों मेरे खाने-पीने का इंतजाम मील के मेस में ही था ! उसके रहने-खाने के इंतजाम के बारे में सोच-विचार कर, कुछ समय पश्चात मेस में उसे सहायक के रूप में रखवा उसके रहने खाने का प्रबंध करवा कर मैंने उसकी इच्छा पूरी कर दी।    

वृक्षों के पीछे हुगली यानी गंगा नदी 

यहां से शुरू होती है शिव के मेरे मैन फ्राइडे बनने की यात्रा ! पता नहीं उस किशोर को मेरे से क्या लगाव था, काम तो उसको रिलांयस में भी मिल सकता था ! खैर ! यहां वह मेरी छोटी से छोटी जरुरत का ध्यान और ख्याल रखने लगा ! कभी-कभी मेरे साथ रिलायंस भी चला जाता था। हालांकि मेस का खाना साफ-सुथरे परिवेश में सफाई पसंद महाराज द्वारा बहुत अच्छी क्वालिटी का बना होता था, पर माँ को उस बारे में सदा चिंता लगी रहती थी ! ऐसे ही एक दिन इस समस्या के निदान हेतु शिव ने माँ को कह दिया आप दोपहर का खाना तैयार रखा करें,  मैं भैया के लिए ले जाया करूँगा !

मुझे इस सांठ-गाँठ के बारे में कुछ पता नहीं था। एक दिन ग्यारह बजे काम से लौटने पर देखता हूँ कि मेरे कमरे में टेबल पर एक टिफिन रखा हुआ है ! पूछताछ पर शिव ने बताया मैं घर से लाया हूँ ! घर से.......! मैं भौचक्क ! यहां यह बताना जरुरी है कि सिमित समय में दोनों जगहों पर आना-जाना आसान नहीं था ! सीधा सड़क मार्ग नहीं था, बस बदलनी पड़ती थी ! वैसे भी सड़क मार्ग से बहुत समय लगता था ! इसलिए यात्रा कई चरणों में पूरी करनी पड़ती थी ! पहले आधा की.मी. तय कर मेन रोड़ पर आना पड़ता था, वहां से बस ले कर सोदपुर स्टेशन, फिर वहां से लोकल ट्रेन से सातंवा स्टेशन कांकिनाड़ा ! उसके बाद फिर वहां से तकरीबन पौन की.मी. पर स्थित मील के अंदर घरों तक ! फिर वैसी ही वापसी ! पागलपन जैसा काम था !

मुझे याद है, उस दिन वैसा करने पर मैं शिव पर बहुत झल्लाया था, गुस्सा हुआ था ! पर वह सर झुकाए सब सुनता रहा..........फिर माँ की ममता सब पर भारी रही ! समय अपनी गति से चलता रहा ! पांच साल निकल गए ! इसी बीच प्रभु ने भी मुझे गृहस्त बनाने की योजना बना डाली ! दिल्ली से संबंध जुड़ा ! यहां भी शिव साये की तरह मेरे साथ रहा ! एक राज की बात बताऊँ, शिव के दिल्ली प्रवास ने वधु-पक्ष पर काफी रुआब डाला था 😀  

हा लांकि शिव ने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, पर उसके भविष्य को और आने वाली जिम्मेदारियों को ध्यान में रख मैंने उसे मील में स्थाई काम पर रखवा दिया ! मेहनती तो बहुत था, वहां भी कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया। 

मय का फेर ! बिमारी और स्वास्थय के चलते मुझे काम छोड़ना पड़ा ! इसी चक्कर में दिल्ली प्रवास और व्यस्तता के चलते सब पीछे छूट गया ! शिव की खोज-खबर लेने की कोशिशें नाकाम रहीं ! पर मुझे विश्वास है कि अपनी मेहनत के बूते वह जहां भी होगा खुश होगा ! प्रभु उसे स्वस्थ-प्रसन्न रखें ! 

शुक्रवार, 21 मार्च 2025

रॉबिन्सन क्रूसो का मैन फ्राइडे, क्या से क्या हो गया

अपने सृजन के समय जो चरित्र एक भरोसेमंद, भलामानस व मददगार के रूप में गढ़ा गया था ! वह आज तक आते-आते पूर्णतया रीढ़-विहीन, मतलब-परस्त, कुटिल, धूर्त और सिर्फ अपने भले की सोच रखने वाला हो गया है ! वैसे तो ये समाज के हर तबके में उपलब्ध है, पर इनकी हाई-ब्रीड राजनितिक नर्सरियों में बड़ी कुशलता और देख-रेख के बीच पनपती है ! जिन्हें बड़ी आसानी से देखा, पहचाना तो जा सकता है पर वह आम इंसान की जिंदगी के लिए खरपतवार ही सिद्ध होती है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग

 भी-कभी साहित्य का कोई शब्द, वाक्य, मुहावरा या चरित्र वर्षों बाद पुस्तक के पन्नों से निकल साक्षात देह धारण कर लेता है ! ऐसे कई उदाहरणों में से एक है, वर्षों पहले लिखे गए एक उपन्यास 'रॉबिन्सन क्रूसो' का एक काल्पनिक पात्र ''मैन फ्राइडे'' ! हम में से अधिकांश ने वह रोचक उपन्यास जरूर पढ़ा होगा। 

अपने मैनफ्राइडे के साथ क्रूसो  
ज से तकरीबन आठ सौ साल पहले एक अंग्रेज लेखक डैनियल डेफो या डैनियल फ़ो​ ने एक उपन्यास की रचना की थी, जिसका नाम था रॉबिन्सन क्रूसो। यह इतना लोकप्रिय हुआ कि 1719 में ही इसके चार संस्करणों ने छप कर इतिहास रच दिया। केवल पुस्तक रूप में ही नहीं बल्कि फिल्म, टेलीविजन और रेडियो तक में भी इसका रूपांतरण हुआ ! आज भी उसकी कहानी उतनी ही लोकप्रिय है। 

सका नायक क्रूसो अपने माता-पिता की इच्छा के विरुद्ध इंग्लैंड से समुद्री यात्राओं पर निकल पड़ता है। अपनी कई रोमांचक, खतरनाक समुद्री यात्राओं में से एक कठिन उथल-पुथल भरी यात्रा में उसका जहाज तूफान में नष्ट हो जाता है और वह एक टापू में शरण लेता है ! वही उसकी भेंट एक स्थानीय व्यक्ति से होती है, पर दोनों एक दूसरे की भाषा नहीं समझते ! पर इसके बावजूद वह स्थानीय जंगली व्यक्ति क्रूसो का वफादार सेवक व सखा बन उसकी हर संभव मदद करता है, उसे हर खतरे से यहां तक कि खुद को जोखिम में डाल नरभक्षियों से भी बचाता है ! चूंकि जिस दिन इनकी भेंट होती है वह दिन शुक्रवार का था, इसलिए क्रूसो ने संवाद हीनता की वजह से उसे, मेरा आदमी शुक्रवार यानी मैन फ्राइडे का नाम दे दिया !

आज का शुक्रु 
पने सृजन के समय जो चरित्र एक भरोसेमंद, भलामानस व मददगार के रूप में गढ़ा गया था ! परंतु समय के साथ अब वह एक अपमान सूचक शब्द सा बन गया है ! तक आते-आते उसका अर्थ  पूर्णतया रीढ़-विहीन,  मतलब-परस्त, कुटिल, धूर्त और सिर्फ अपने भले की सोच रखने वाला हो गया है ! वैसे तो ये समाज के हर तबके में  उपलब्ध है, पर इनकी हाई-ब्रीड, राजनितिक नर्सरियों में बड़ी कुशलता और देख-रेख के बीच पनपती है ! जिन्हें बड़ी आसानी से देखा, पहचाना तो जा सकता है पर वह आम इंसान की जिंदगी के लिए खरपतवार ही सिद्ध होती है.......! 

@आभार अंतर्जाल 

मंगलवार, 18 मार्च 2025

लड्डू गोपाल जी के संरक्षण में चल रही एक मिठाई की दुकान

दुकान में ग्राहक आते हैं, अपनी पसंद की मिठाई लेते हैं, डिब्बे पर लिखी सारी जानकारी पढ़ते हैं और पास पड़े डिब्बे में उसकी कीमत डाल देते हैं। ग्राहकों की सहूलियत के लिए पास ही अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोट भी रखे रहते हैं जिससे मिठाई की उचित कीमत अदा की जा सके। क्यू आर कोड से भी भुगतान की सुविधा है ! इसके अलावा जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे भी मिठाई ले जा सकते हैं, इस विश्वास के साथ कि जब भी संभव होगा, वे उधार चुकता कर देंगे...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

के दौर में, जहां भाई-भाई का विश्वास नहीं करता ! धन-दौलत के लालच पिता-पुत्र में ठन जाती हो ! छोटी-छोटी बातों पर संदेह किया जाता हो ! आस्था-विश्वास-भाईचारा-इंसानियत किसी बीते युग की बातें लगती हों ! वहीं कुछ लोग ऐसे भी हैं जिनकी ईश्वर पर अटूट आस्था है। जिनका विश्वास है कि भले ही दिखते ना हों पर भगवान सदा हमारे साथ रहते हैं !  
 
लड्डू गोपाल जी 
बलपुर के नेपियर टाउन में रहने वाले ऐसे ही एक प्रभु भक्त हैं, विजय पांडे जी। उनका मिठाई का कारोबार है। उनकी बचपन से ही श्री कृष्ण जी के बालरूप लड्डू गोपाल में गहरी आस्था व श्रद्धा है। चौबीस घंटे खुली रहने वाली उनकी दुकान 2014 से मंदिरों और पूजास्थलों के साथ-साथ श्रद्धालुओं की मांग पूरी करती आ रही है। पर उस दूकान में ना हीं कोई मालिक है, ना हीं कोई विक्रेता है, ना हीं कोई कैशियर है, ना हीं कोई सुरक्षा कर्मी ! यह दुकान पूरी तरह से विश्वास और ईमानदारी पर टिकी हुई है और पूरी तरह से भगवान के भरोसे चल रही है। यहां आने वाला हर ग्राहक अपनी जरूरत के अनुसार मिठाई उठाता है और पूरी ईमानदारी से पैसे रखकर चला जाता है। 

विजय पांडे जी 
ऐसा ख्याल कैसे आया, इस बारे में विजय जी बताते हैं कि एक दिन उनकी दुकान पर एक व्यक्ति आया, जो अपनी बेटी के जन्म-दिन पर मिठाई लेना चाहता था पर उसके पास पैसे नहीं थे, पर संकोचवश वह बोल नहीं पा रहा था ! विजय जी ने उसकी मजबूरी समझी और बिना झिझक उसे मिठाई दे दी और कहा कि जब संभव हो, वह पैसे दे जाए ! इसी घटना के बाद उन्होंने सोचा कि मजबूरी के संकोच के कारण कोई भी इंसान से कुछ माँगने पर झिझकेगा परंतु ईश्वर से नहीं ! आज यदि यहां मेरी जगह दुकान पर खुद लड्डू गोपाल बैठे होते, तो यह आदमी इतना संकोच नहीं करता ! बस, उसी समय से उन्होंने पूरी दुकान प्रभु को सौंप दी, उन्हें ही मालिक बना दिया ! इसीलिए इस दुकान में प्रवेश करते ही सर्वप्रथम लड्डू गोपाल जी के दर्शन होते हैं। 
लड्डू गोपाल जी का कैश काउंटर 
ने पियर टाउन के शास्त्री ब्रिज के पास स्थित इस दुकान में ग्राहक आते हैं, अपनी पसंद की मिठाई लेते हैं, डिब्बे पर लिखी सारी जानकारी पढ़ते हैं और पास पड़े डिब्बे में उसकी कीमत डाल देते हैं। ग्राहकों की सहूलियत के लिए पास ही अलग-अलग मूल्यवर्ग के नोट भी रखे रहते हैं जिससे मिठाई की उचित कीमत अदा की जा सके। क्यू आर कोड से भी भुगतान की सुविधा है ! इसके अलावा जिनके पास पैसे नहीं हैं, वे भी मिठाई ले जा सकते हैं, इस विश्वास के साथ कि जब भी संभव होगा, वे उधार चुकता कर देंगे ! देश में अपनी तरह का शायद यह पहला प्रयोग है !
प्रवेश द्वार 
विजय जी का कहना है, यहां जो भी ग्राहक आता है, तो उसे पता होता है कि वह किसी इंसान से नहीं, बल्कि भगवान से लेन-देन कर रहा है, ऐसे में बेईमानी की गुंजाइश ही नहीं बचती ! यह पूछने पर कि भविष्य कैसा होगा, उन्होंने कहा मुझे पूरा भरोसा है कि लोग लड्डू गोपाल से धोखा नहीं करेंगे, सब कुछ ठीक चलेगा ! इसका प्रमाण है वह वजन की मशीन जिसे ग्राहकों की वजन को लेकर किसी शंका के समाधान के लिए रखा गया है पर आज तक किसी ने भी उसका उपयोग नहीं किया है !
इस प्रयोग की सफलता के बाद आम लोगों के मन में यह सवाल भी उठता है कि क्या इसी तरह की ईमानदारी आधारित दुकानों की संख्या बढ़ सकती है ? क्या दूसरे व्यवसाय भी इस मॉडल को अपनाएंगे ? फिलहाल, विजय पांडे जी ने समाज को एक नई सोच और दिशा दी है, जहां मुनाफे से ज्यादा आस्था, विश्वास, सौहार्द का वातावरण दिखाई देता है ! प्रभु उनके भरोसे को डगमगाने ना दें ! 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

गुरुवार, 27 फ़रवरी 2025

महाकुंभ की सफलता का श्रेय इन्हें भी जाता है

 इस महाकुंभ की अपार सफलता के पीछे उन विपक्षी नेताओं का भी बहुत बड़ा सहयोग है, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर को दांव पर लगा, अपने भविष्य को अंधकार में धकेल, लोगों की भावनाओं, उनकी आस्थाओं को दरकिनार कर लगातार विष-वमन करते हुए इस आयोजन की बुराई की ! किसी भी तरह इस आयोजन को रोकने-बदनाम करने के लगातार षड्यंत्र रचे ! वे खुद बर्बाद होने, उपेक्षित होने, बदनाम होने के बावजूद अपने मिशन पर लगे रहे ! उनके इसी उद्यम के कारण पूरा सरकारी तंत्र सदा सचेत, मुस्तैद तथा सतर्क रहा ! जनता को ऐसे लोगों की कद्र करते हुए, उन्हें सदा-सदा के लिए विपक्ष में बैठाए रखना चाहिए जिससे वे भविष्य में भी ऐसे ही सरकार की सतर्कता बनाए रख सकें..................!  
#हिन्दी_ब्लागिंग 
पैंतालीस दिन यानी डेढ़ महीने तक चले महाकुंभ का, हिमालय जैसा अभूतपूर्व कीर्तिमान बना कर, समापन हो गया ! पर जाते-जाते उसने दुनिया को सनातन की विशालता, उसकी गहराई, उसकी आस्था, उसकी व्यापकता का ऐसा परिचय करवा दिया, जिसको सारा विश्व वर्षों-वर्ष याद रखेगा ! इतने बड़े आयोजन का सफलता पूर्वक निर्वहण ही अपने-आप में ही एक कीर्तिमान है ! एक मील का पत्थर है ! एक ऐसा उच्चमान जिसे सालों-साल याद रखा जाएगा ! भविष्य में कहीं भी होने वाले हर बड़े समागम का ऐसा प्रतिस्पर्धी, जिसके प्रत्यक्ष उपस्थित ना होते हुए भी उसकी तुलना उस समय के आयोजन की सफलता से की जाएगी ! एक ऐसी उपलब्धि जिसका उल्लेख आज संसार के हर देश में हो रहा है ! दुनिया अचंभित है ! विकसित देश अपने लोगों को भेज रहे हैं, ऐसे भीड़ प्रबंधन (Crowd Management) को समझने, उसकी कार्यशैली, उसकी विधि को जानने के लिए ! 
सफलता के सिपहसालार 
कोई भी विशाल-विराट अभियान तभी सफल होता है जब उससे जुड़े सभी लोग अपनी पूरी क्षमता से, पूरी तन्मयता से, पूरे समर्पण से अपने आप को उसमें झोंक दें ! योगी जी के नेतृत्व में यहां यही हुआ ! इसमें कोई शक नहीं कि यदि योगी जी ने इस असंभव से काम को ना संभाला होता तो इसकी सफलता अनिश्चित ही थी ! इसके लिए उनकी प्रशंसा करना सूर्य को दीपक दिखाने जैसा ही होगा ! वे ही इस अकल्पनीय, अद्भुत, अभूतपूर्व, अद्वितीय सफलता के कारक रहे ! उनको तथा उन के लिए पूरे सरकारी तंत्र को अनेकानेक साधुवाद। वहां कार्यरत एक-एक कर्मी का, चाहे वह सफाई से जुड़ा हो, चाहे सुरक्षा से, चाहे व्यवस्था से, पूरा देश दिल से आभारी है और रहेगा ! 
सफल आयोजन के हकदार 
भार तो प्रयागराज के प्रत्येक निवासी का भी है, जिन्होंने अपनी चिंता ना कर, अपनी असुविधाओं को दरकिनार कर, अपनी परेशानियों की शिकायत ना कर करोड़ों-करोड़ लोगों का अपने परिवार सदृश समझ उनका स्वागत किया ! यदि इस पूरे आयोजन के दौरान वहां के हर मेहमान को खाना-पानी-चाय-नाश्ते-यातायात या अन्य किसी मूलभूत सुविधा की कमी महसूस नहीं हुई तो इसका श्रेय वहां के स्थानीय लोगों को जाता है ! इस भागीरथ प्रयास की जितनी भी प्रशंसा की जाए कम है। इससे जुड़े सभी व्यक्ति सम्मान पाने के हकदार हैं !
 गंगा पूजन 
परंतु इसके अलावा वहां जाने वाले पैंसठ करोड़ से भी ज्यादा श्रद्धालुओं को भी कोटि-कोटि धन्यवाद, क्योंकि उनके गिलहरी सहयोग के बिना कुंभ की सफलता शायद संदिग्ध हो जाती ! वैयक्तिक व्यवहार, नैतिकता या सामान्य शिष्टाचार को लेकर हमारे बारे में कोई अच्छी राय नहीं है ! हम अपनी हितानुसार नियम-कानून का पालन करते आए हैं ! अपनी सुविधा को उन पर तरजीह देते हैं ! पर महाकुंभ में भाग लेने वाले श्रद्धालुजन मर्यादित रहे, सयंमित रहे, धैर्यवान रहे, जागरूक रहे ! कभी भी उच्छृंखलता नहीं दर्शाई ! यदि ऐसा ना होता तो 15-20 हजार सफाई कर्मियों के लिए हर समय सफाई बनाए रखना लगभग असंभव था ! यदि यह जन-सैलाब जरा सा भी अमर्यादित हो जाता तो बीसियों हजार सुरक्षा कर्मियों की हालत सागर में तिनके के मानिंद हो जाती ! इसलिए महाकुंभ के सुखद समापन का श्रेय तीर्थ यात्रियों को भी जाता है। 
 
जन सैलाब 
यदि देखा जाए तो इस महाकुंभ की अपार सफलता के पीछे उन विपक्षी नेताओं का भी बहुत बड़ा सहयोग है, जिन्होंने अपने राजनीतिक करियर को दांव पर लगा, बिना अपने भविष्य को ध्यान में रखे, लोगों की भावनाओं, उनकी आस्थाओं को दरकिनार कर लगातार विष-वमन करते हुए इस आयोजन की बुराई की ! किसी भी तरह इस आयोजन को रोकने-बदनाम करने के लगातार षड्यंत्र रचे ! खुद और अपने लगे-बंधों से लोगों को डराने-धमकाने की चेष्टा की ! इस महा पर्व को बदनाम करने के लिए धर्म, संस्कृति, परंपरा, समाज सभी के विरोधी बन गए ! वे खुद बर्बाद होने, उपेक्षित होने, बदनाम होने, जनता द्वारा नकार दिए जाने के बावजूद अपने मिशन पर लगे रहे ! यही कारण था कि पूरा सरकारी तंत्र सदा सचेत रहा ! किसी भी अनहोनी, आपदा, विपदा या षड्यंत्र का सामना करने के लिए मुस्तैद रहा ! सरकार को उनका आभार मानना चाहिए तथा जनता को ऐसे लोगों की कद्र करते हुए उन्हें सदा-सदा के लिए विपक्ष में बैठाए रखना चाहिए, जिससे वे भविष्य में भी ऐसे ही सरकार की सतर्कता बनाए रख सकें !  

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

बुधवार, 26 फ़रवरी 2025

आम इंसान की समृद्धि में तीर्थों का योगदान,

इस बात पर मंथन आरंभ हो चुका है कि क्यों ना देश के सभी नामी-गिरामी, प्रसिद्ध, श्रद्धा के केंद्रों को  व्यवस्थित और सर्व सुविधायुक्त कर उन्हें और भी लोकप्रिय बनाया जाए ! इससे, पर्यटन बढ़ेगा, लोगों को घर बैठे रोजगार मिलेगा, पलायन रुकेगा, लोग समृद्ध होंगे, समाज में संपन्नता आएगी, खुशहाली बढ़ेगी, निर्धनता कम होगी। इसके साथ ही सरकार की आमदनी बढ़ेगी ! जिससे जन-सुविधाओं का और तेजी से विकास हो पाएगा ! पर सबसे बड़ी बात, अपनी संस्कृति का, अपनी परंपराओं का, अपने सनातन का भी सुचारु रूप से प्रचार-प्रसार हो सकेगा............!

#हिन्दी_ब्लागिंग   

देश को अपनी आर्थिक अवस्था को मजबूत करने का एक नया स्रोत मिल गया है और वह है धार्मिक पर्यटन (Religious Tourism), इसका आभास तो तब ही मिल गया था, जब माता वैष्णव देवी की यात्रा में मूलभूत सुविधाओं का इजाफा होने पर श्रद्धालुओं की संख्या कई गुना बढ़ गई थी ! पर तब की तथाकथित धर्म-निरपेक्ष सरकारों ने अपने निजी स्वार्थों के लिए, इसे ज्यादा महत्व नहीं दिया था ! पर वर्षों बाद जब काशी विश्वनाथ और उज्जैन के महाकाल कॉरिडोर बने और उनको जनता का जिस तरह का प्रतिसाद मिला, वह एक नई खोज, एक नए विचार का उद्घोषक था ! राम मंदिर निर्माण ने इस विचार को और भी पुख्ता किया तथा इस महाकुंभ ने तो जैसे उस पर मोहर ही लगा एक नई राह ही प्रशस्त कर दी !

श्रीराम मंदिर 
अब देश की दशा-दिशा निर्धारित करने वालों को अपनी आर्थिक स्थित मजबूत करने के लिए एक अकूत खजाना मिल गया है ! उन्हें समझ आ गया है कि देश की धर्म-परायण जनता को यदि पर्याप्त सुरक्षा और सुख-सुविधा मिले तो वह धार्मिक स्थलों के दर्शन के लिए भी उतनी ही तत्पर रहती है, जितनी अन्य किसी पर्यटन स्थल के लिए ! महाकुंभ में श्रद्धालुओं की अनपेक्षित, अविश्वसनीय, अकल्पनीय, मर्यादित उपस्थिति इसका ज्वलंत उदाहरण है ! इसी से प्रोत्साहित हो कर अब इस बात पर मंथन आरंभ हो चुका है कि क्यों ना देश के सभी नामी-गिरामी, प्रसिद्ध, श्रद्धा के केंद्रों को भी व्यवस्थित और सर्व सुविधायुक्त कर उन्हें और भी लोकप्रिय बनाया जाए ! इससे पर्यटन बढ़ेगा ! लोगों को घर बैठे रोजगार मिलेगा ! पलायन रुकेगा ! लोग समृद्ध होंगे ! समाज में संपन्नता आएगी ! खुशहाली बढ़ेगी ! निर्धनता कम होगी ! इसके साथ ही सरकार की आमदनी बढ़ेगी, जिससे जन-सुविधाओं का और तेजी से विकास हो पाएगा ! पर सबसे बड़ी बात, अपनी संस्कृति का, अपनी परंपराओं का, अपने सनातन का भी सुचारु रूप से  प्रचार-प्रसार हो सकेगा ! 
विश्वनाथ मंदिर परिभ्रमण पथ 

महाकाल मंदिर परिसर 
महा कुंभ के दौरान प्रयागराज के हर वर्ग के, हर तबके के लोगों को जो आमदनी हुई वह आँखें चौंधियाने वाली है ! इसमें अब कोई शक नहीं कि सुप्रसिद्ध स्थानों पर होने वाले ऐसे आयोजन या आने वाले समय में उन स्थानों पर बनने वाले एक-एक धार्मिक परिभ्रमण पथ, पर्यटन और मंदिरों की अर्थ-व्यवस्था (Religious Tourism and Temple Economy) देश के वाणिज्य, व्यापार और अर्थव्यवस्था में सुधार की अहम कड़ी होने जा रहे हैं ! कुंभ तिथि तो चार सालों में एक बार आती है पर माघ मेला तो हर साल लगता है ! छठ पूजा तो हर साल होती है ! गंगा दशहरा तो हर साल होता है ! तो ऐसे हर तीज-त्योहारों को भव्य, सुव्यवस्थित व सुरक्षित बना लोगों को आने के लिए प्रोत्साहित किया जाएगा ! 

जन सैलाब 

महाकुंभ 
यह सब जो आगत भविष्य में होने जा रहा है, वही कुछ लोगों के लिए, जो अपनी राजनितिक लड़ाई तो हार ही चुके हैं अपनी पहचान तक गंवाने की कगार तक पहुँच गए हैं, परेशानी का कारण बना हुआ है। उन्हें अपना नामो-निशान मिटता साफ दिखाई पड़ रहा है। इसीलिए वे अपने बचे-खुचे पूर्वाग्रही, भ्रमित वोटरों को बचाए रखने के लिए कुंभ के बहाने सनातन का विरोध कर रहे हैं, अपनी संस्कृति का विरोध कर रहे हैं, अपने ही धर्म का विरोध कर रहे हैं, ! देश वासियों की आस्था, श्रद्धा, उनके संस्कारों की थाह के सामने हर बार मुंहकी खाने के बावजूद बेशर्मी की हद पार कर अनर्गल झूठ फैलाने की कोशिश कर रहे हैं। अभी तो ऐसे लोगों की तिलमिलाहट और बढ़ेगी जब संभल जैसे कई नए-नए तीर्थ देश और विश्व के नक्शे पर उभर कर सामने आएंगे ! भगवान ऐसे लोगों को सद्बुद्धि दे जिससे ये अपने स्वार्थों से ऊपर उठ देशहितार्थ कुछ कर सकें ! 
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से

शुक्रवार, 14 फ़रवरी 2025

वैलेंटाइन दिवस, दो तबकों की रंजिश का प्रतीक तो नहीं.......?

वैलेंटाइन दिवस, जिसे प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित किया गया था,  वह अब मुख्य रूप से प्रेमी जोड़ों के प्यार के त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा है। इसमें भी एक कटु सत्य यह है कि इसको मनाने वाले अधिकांश, या कहिए मुट्ठी भर लोगों को छोड़, शायद ही कोई वैलेंटाइन को याद भी करता होगा या उसके बारे में कुछ जानता भी होगा ! ऐसे लोगों के लिए यह दिन सिर्फ सारी वर्जनाओं को ताक पर रखने या उन्हें तोड़ने का मौका होता है ! यही कारण है कि शुरुआत के दिनों की उस एक दिनी फिल्म ने आज हफ्ते भर के सीरियल का रूप ले लिया है...........!!
 
#हिन्दी_ब्लागिंग 
 
अपने देश के एक खास तबके को पश्चिम सदा से आकर्षित करता रहा है ! वहां की हर अच्छी-बुरी बात को अपनाने की ललक सदा से इसवर्ग में रही है ! हो सकता है कि सैकड़ों सालों की परवशता और उससे उपजी हीन मानसिकता या फिर वहां  की चकाचौंध इसका कारण  हो,  पर यह सच्चाई है !  इसी मनोवृत्ति के कारण वसंतोत्सव,  करवा चौथ,  भाई दूज जैसे अपने परंपरागत मासूम त्योहारों का मजाक बना कर, उन्हें आयातित उत्सवों के सामने कमतर साबित करने की कुत्सित कोशिश की जाती रही,  पर जनमानस का साथ ना मिलने पर उन पर आधुनिकता का मुल्लमा चढ़ा कर, बाजार की सुरसा भूख के हवाले कर दिया गया ! आज उसका परिणाम सबके सबके सामने है !
 
वसंत
किसी की अच्छाई अपनाने में कोई बुराई नहीं है, पर उस बात का अपने परिप्रेक्ष्य, माहौल, परिस्थियों के अनुसार उनके औचित्य का आकलन जरूर होना चाहिए, जो कभी नहीं किया गया ! ऐसे ही 1992 के दशक के आस-पास हमारे किशोरों, युवक-युवतियों को निशाना बना, जिस एक-दिनी वैलेंटाइन दिवस जैसे जलसे का बीजारोपण किया गया था, वह आज एक विशाल वृक्ष बन चुका है ! उसी की छांव में आज का मौकापरस्त बाजार अपना तमाशा शुरू कर, युवाओं को अपनी ओर आकर्षित करने में कोई कोर-कसर नहीं छोड़ता ! यही कारण है कि शुरुआत के दिनों की उस एक दिनी फिल्म ने आज हफ्ते भर के सीरियल का रूप ले लिया है!

14 फरवरी, वैलेंटाइन दिवस, जिसे योजनाबद्ध तरीके से सदियों पहले रोम में समाज के लोगों के बीच आपसी प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित कर एक विशेष दिन का रूप दिया गया, क्या वह उस समय के वहां के दो शक्तिशाली गुट, राजपरिवार और धर्मगुरुओं की सत्ता लालसा का कारण तो नहीं था ! क्योंकि उस समय रोम में ये दोनों धड़े अपनी-अपनी जगह काफी शक्तिशाली थे और समाज पर दोनों का ही अच्छा-खासा दबदबा हुआ करता था !
 
रोम में तीसरी सदी में राजा क्लॉडियस का शासन था। एस समय किसी बिमारी से काफी लोगों के मारे जाने के कारण रोमन सेना में सैनिकों की भारी कमी हो गई ! उधर शादी के बाद ज्यादातर सैनिक सेना से विमुख हो जाते थे ! सो क्लॉडियस ने सैनिकों के परम्परागत विवाह पर रोक लगा दी। उसका मानना था कि अविवाहित पुरुष ही सेना में अच्छी तरह से अपना कर्त्तव्य निभा सकते हैं ! क्योंकि उन पर परिवार की अतिरिक्त जिम्मेदारी नहीं होती, उनका ध्यान नहीं भटकता ! यदि निष्पक्ष रूप से देखा जाए तो राजा द्वारा बनाया गया वह कानून गलत भी नहीं था, उसने तो देशहित के लिए वैसा कदम उठाया था ! जिससे रोम की सेना शक्तिशाली और देश की सुरक्षा सुदृढ़ बनी रह सके !  

वैसे तो वैलेंटाइन नाम के बहुत से संत हुए हैं पर यह वाकया उस वक्त के रोम के इसी नाम के एक पादरी संत वैलेंटाइन से जुड़ा हुआ है, जिन्हें जनता का अपार स्नेह तथा वहां के धर्म गुरुओं का पूर्ण समर्थन प्राप्त था। दोनों धड़ों की आपसी रंजिश को राजा के उस कानून ने और हवा दे दी ! धर्म गुरुओं को प्रजा को अपनी तरफ करने का मौका मिल गया ! उन्होंने  वैलेंटाइन को आगे कर राजा क्लैडियस के आदेश की खिलाफत करनी शुरू कर दी ! वैलेंटाइन ने गुप्त रूप से सैनिकों का विवाह करवाना शुरू कर दिया। इस बात की जानकारी जब राजा को हुई तो उसने उनको मौत की सजा सुना दी ! 14 फरवरी 269 को संत वैलेंटाइन को मौत के घाट उतार दिया गया। फिर 496 ई. में पोप ग्लेसियस ने इस दिन को उस संत के नाम पर "सेंट वैलेंटाइन्स डे" घोषित कर दिया।

वैलेंटाइन दिवस, जिसे समाज के लोगों के बीच आपसी प्यार व सद्भाव की कामना स्थापित करने वाले दिन के रूप में प्रचारित कर, संत वैलेंटाइन को दी गई मौत की सजा वाली तारीख, 14 फरवरी के दिन से  शुरू किया गया था, वह अब दुनिया भर में अपना रूप बदल, मुख्य रूप से प्रेमी जोड़ों के प्यार के त्योहार के रूप में मनाया जाने लगा है। इसमें भी एक कटु सत्य यह है कि इसको मनाने वाले अधिकांश, या कहिए मुट्ठी भर लोगों को छोड़, शायद ही कोई वैलेंटाइन को याद भी करता होगा या उसके बारे में कुछ जानता भी होगा ! ऐसे लोगों के लिए यह दिन सिर्फ सारी वर्जनाओं को ताक पर रखने या उन्हें तोड़ने का मौका होता है ! 
 
सेंट वैलेंटाइन का होना एक सच्चाई है ! उनको मारा गया, यह भी सच्चाई है ! कई चर्चों में  उनकी निशानियां या अवशेष भी हैं, यह भी सच्चाई है ! पर जो कथाएं, किवदंतियां, दंतकथाएं उनको ले कर जनमानस में चल रही हैं, उनमें कितनी सच्चाई है, यह नहीं कहा जा सकता ! क्योंकि कुछ लोगों का मानना है कि उन्हें मृत्युदंड राजद्रोह के लिए नहीं बल्कि धर्मद्रोह के लिए दिया गया था ! तो असलियत क्या है ? कहा नहीं जा सकता ! अब जो है वो तो हइए है 😌

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