बालकगणों के लिए मील के फैक्ट्री एरिया के अलावा हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी, पर जब भी मुझे दिखता, उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे.................!
#हिन्दी_ब्लागिंग
मैं छोटा था और वह मुझसे भी छोटा था ! पता नहीं कहां से आया था, कौन लाया था ! यादाश्त में उसका घरों में काम करते सहायक का रूप ही दर्ज है। शिव उसका नाम था, ना आगे कुछ ना ही पीछे ! कभी पूछा भी नहीं ! भले ही नाम के आगे-पीछे कुछ न हो पर मेरे साथ शायद उसके किसी पिछले जन्म का कोई संबंध जरूर था !
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शिव, पचास साल पहले |
बात साठ के उत्तरार्द्ध की है। बंगाल के नार्थ परगना जिले के भाटपारा इलाके में स्थित रिलायंस जूट मील में बचपन का वह बेफिक्र, सुखद, अवर्चनीय समय था ! स्कूल से कॉलेज और फिर कार्यक्षेत्र तक का सफर वहीं रहते पूरा हुआ ! उस जगह से मेरे परिवार का पच्चीस साल से भी ज्यादा का नाता रहा !
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लॉन |
मील के स्टाफ परिसर में देश के तकरीबन हर प्रांत के लोगों के होने के बावजूद वहां एक परिवार का माहौल था ! तीज-त्यौहार, सुख-दुःख सबके साझा होते थे ! बच्चों को खेल-कूद या किसी भी घर में आने-जाने की पूरी छूट तो थी पर लाड-प्यार-डांट-डपट का हक भी सभी बड़ों को था ! उन दिनों वहां के सर्वेसर्वा डागा जी थे ! जो सिर्फ मील के ही नहीं, उसके स्टाफ के परिवारों के भी संरक्षक थे ! हर कोई उन्हें परिवार के मुखिया के रूप में आदर सहित देखता था !
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परिसर |
बात हो रही थी शिव की ! जैसा कि मैंने बताया बालकगणों के लिए वहां की हर जगह, हर क्षेत्र, निर्बाध था ! उसी के चलते एक घर में काम करते शिव को देखना हुआ। सांवले रंग का, गोल-मटोल, भोला-भाला, नाटा सा बालक ! कोई ऐब नहीं, कोई लत नहीं। उससे कभी बातचीत नहीं होती थी पर जब भी मुझे दिखता उसके चेहरे पर एक बाल सुलभ मुस्कान खिंच जाती ! अच्छा लगता था वह मुझे।
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कैसे भुलाएं इस जगह को |
स मय ने अपनी यात्रा के दौरान मुझे रिलायंस से करीब बीस किमी दूर सोदपुर में स्थित कमरहट्टी जूट मील पहुंचा दिया ! काम मैं वहां जरूर करता था, पर सप्ताहंत या मौका मिलते या बना कर ''घर'' पहुँच जाया करता था। ऐसे ही साल भर बीत गया ! एक दिन रिलायंस आया हुआ था कि अचानक शिव मेरे पास आया और मेरे साथ चलने की इच्छा जाहिर की ! उन दिनों मेरे खाने-पीने का इंतजाम मील के मेस में ही था ! उसके रहने-खाने के इंतजाम के बारे में सोच-विचार कर, कुछ समय पश्चात मेस में उसे सहायक के रूप में रखवा उसके रहने खाने का प्रबंध करवा कर मैंने उसकी इच्छा पूरी कर दी।
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वृक्षों के पीछे हुगली यानी गंगा नदी |
यहां से शुरू होती है शिव के मेरे मैन फ्राइडे बनने की यात्रा ! पता नहीं उस किशोर को मेरे से क्या लगाव था, काम तो उसको रिलांयस में भी मिल सकता था ! खैर ! यहां वह मेरी छोटी से छोटी जरुरत का ध्यान और ख्याल रखने लगा ! कभी-कभी मेरे साथ रिलायंस भी चला जाता था। हालांकि मेस का खाना साफ-सुथरे परिवेश में सफाई पसंद महाराज द्वारा बहुत अच्छी क्वालिटी का बना होता था, पर माँ को उस बारे में सदा चिंता लगी रहती थी ! ऐसे ही एक दिन इस समस्या के निदान हेतु शिव ने माँ को कह दिया आप दोपहर का खाना तैयार रखा करें, मैं भैया के लिए ले जाया करूँगा !
मुझे इस सांठ-गाँठ के बारे में कुछ पता नहीं था। एक दिन ग्यारह बजे काम से लौटने पर देखता हूँ कि मेरे कमरे में टेबल पर एक टिफिन रखा हुआ है ! पूछताछ पर शिव ने बताया मैं घर से लाया हूँ ! घर से.......! मैं भौचक्क ! यहां यह बताना जरुरी है कि सिमित समय में दोनों जगहों पर आना-जाना आसान नहीं था ! सीधा सड़क मार्ग नहीं था, बस बदलनी पड़ती थी ! वैसे भी सड़क मार्ग से बहुत समय लगता था ! इसलिए यात्रा कई चरणों में पूरी करनी पड़ती थी ! पहले आधा की.मी. तय कर मेन रोड़ पर आना पड़ता था, वहां से बस ले कर सोदपुर स्टेशन, फिर वहां से लोकल ट्रेन से सातंवा स्टेशन कांकिनाड़ा ! उसके बाद फिर वहां से तकरीबन पौन की.मी. पर स्थित मील के अंदर घरों तक ! फिर वैसी ही वापसी ! पागलपन जैसा काम था !
मुझे याद है, उस दिन वैसा करने पर मैं शिव पर बहुत झल्लाया था, गुस्सा हुआ था ! पर वह सर झुकाए सब सुनता रहा..........फिर माँ की ममता सब पर भारी रही ! समय अपनी गति से चलता रहा ! पांच साल निकल गए ! इसी बीच प्रभु ने भी मुझे गृहस्त बनाने की योजना बना डाली ! दिल्ली से संबंध जुड़ा ! यहां भी शिव साये की तरह मेरे साथ रहा ! एक राज की बात बताऊँ, शिव के दिल्ली प्रवास ने वधु-पक्ष पर काफी रुआब डाला था 😀
हा लांकि शिव ने मुझसे कभी कुछ नहीं मांगा, पर उसके भविष्य को और आने वाली जिम्मेदारियों को ध्यान में रख मैंने उसे मील में स्थाई काम पर रखवा दिया ! मेहनती तो बहुत था, वहां भी कभी किसी को शिकायत का मौका नहीं दिया।
स मय का फेर ! बिमारी और स्वास्थय के चलते मुझे काम छोड़ना पड़ा ! इसी चक्कर में दिल्ली प्रवास और व्यस्तता के चलते सब पीछे छूट गया ! शिव की खोज-खबर लेने की कोशिशें नाकाम रहीं ! पर मुझे विश्वास है कि अपनी मेहनत के बूते वह जहां भी होगा खुश होगा ! प्रभु उसे स्वस्थ-प्रसन्न रखें !