गुरुवार, 16 सितंबर 2010

प्रेम की पराकाष्ठा











भगवान से प्रेम बहुत से लोग करते हैं। पहुंचे हुए संतों ने उनकी उपस्थिति भी महसूस की है, कहते हैं। हमने उसे सदा सर्वशक्तिमान ही माना है। उसके थकने की तो कोई कल्पना भी नहीं कर पाया है। पर विदेशी भक्तों का प्रेम सराहनीय है जिनकी सोच ने, प्रेम ने, ममता ने लगातार एक ही स्थिति में खड़े प्रभू को जरा आराम देने की सोची, उनकी बांह के नीचे सहारा देकर।




उसपर छवि कितनी सुन्दर हैं, आखें ही नहीं हटती।

7 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

इनकी छवि का कहना ही क्या...

मनोज कुमार ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति। हार्दिक शुभकामनाएं!

अलाउद्दीन के शासनकाल में सस्‍ता भारत-१, राजभाषा हिन्दी पर मनोज कुमार की प्रस्तुति, पधारें

अभिलाषा की तीव्रता एक समीक्षा आचार्य परशुराम राय, द्वारा “मनोज” पर, पढिए!

डॉ. मोनिका शर्मा ने कहा…

sachmuch inki chabi se kisi ki aankhen nahin hat saktin...... bahut sunder prastuti

शिवम् मिश्रा ने कहा…


बेहतरीन पोस्ट लेखन के बधाई !

आशा है कि अपने सार्थक लेखन से,आप इसी तरह, ब्लाग जगत को समृद्ध करेंगे।

आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है-पधारें

वन्दना ने कहा…

यही तो प्रेम है ……………भक्त तो अपने भगवान को ज़रा भी दुखी या परेशान नही देख सकता।

http://vandana-zindagi.blogspot.com/2010/09/blog-post_15.html
कृष्ण प्रेम के प्रति एक भाव ये भी देखें।

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…

सुंदर चित्र.

रानीविशाल ने कहा…

बहुत अच्छी प्रस्तुति
यहाँ भी पधारें ...
विरक्ति पथ