रविवार, 12 जुलाई 2009

न भूलने वाला जायका अमृतसर का.

एक चैनल पर विनोद दुआ जी को घूम-घूम कर लोगों को देश भर के जायके दिलवाते देख कर मुझे भी अपनी अमृतसर यात्रा की याद आ गयी। सारी दुनिया में, पवित्र नगर, अमृतसर स्वर्ण मंदिर के लिये मशहूर है। है ही ऐसी जगह जहां आकर मन को एक अद्भुत शक्ति मिलती है। लगता है कि कोई जरूर है जो सदा हमारे पर अपनी दया दृष्टि बनाये रख रहा है। यहां का "कडाह प्रसाद" जो शुद्ध देशी घी में मंदिर परिसर में ही बनाया जाता है अपने अद्भुत स्वाद के कारण एक अनोखी तृप्ति प्रदान करता है। शायद इसी के प्रभाव से अमृतसर की भोज्य सामग्री अपने आप में अनूठी है। मेरे इस प्रवास पर मेरे मौसेरे भाई (भाई कम दोस्त ज्यादा) जीवन जी का बड़ा सहयोग रहा था। चुन-चुन कर उन्होंने जो स्वाद चखाए, वह किसी नवांगतुक के लिये थोड़े समय में खोज पाना मुश्किल होता है। क्योंकि बाहर से आने वाले के लिये तो सभी दुकाने अमृतसर की ही होती हैं। उनमें से सिरमौर के यहां ले जाने के लिये किसी जानकार का होना जरूरी होता है। मैं उनका सदा शुक्रगुजार रहुंगा।
आप एक बार आकर यहां के ढाबों का स्वाद जीभ को ले लेने भर दें, मजाल है कभी वह इस स्वाद को भूल पाये। बात चाहे पीढियों से चले आ रहे 'केसर के ढाबे' की हो चाहे 'भ्राबां के ढाबे' की, इनके भरवां पराठे, दाल और मोटी मलाई वाला दही कितना भी खालें पेट भर जाता है पर मन नहीं। सारा खेल धीमी आंच और शुद्ध घी का होता है। यह इनकी ईमानदारी की ही बरकत है कि मंहगाई के इस जमाने में जबकि यह ग्राहक से कुछ भी वसूल सकते हैं, ये सिर्फ जायज कीमतों पर ही लोगों का पेट भरने का व्रत ले अपना काम करते जाते हैं।
अमृतसर की बात हो और यहां के कुलचों का जिक्र ना हो यह कैसे हो सकता है। यहां के कुलचे जब देशी घी में नहा कर निकलते हैं तो उनका रूप-रंग तथा उनमें भरे गये अनारदाने और किसमिस का स्वाद बड़े-बड़े उपवासियों को अपना उपवास तोड़ने पर मजबूर कर देते हैं। इन कुलचों का अभिन्न अंग होते हैं मसालेदार चने। जिनको बनाने का तरीका जानने के लिये देश के बड़े-बड़े पंचतारा होटलों के शेफ भी लालायित रहते हैं।
पूरे खाने की बात हो या चाट पकौड़ी की अमृतसर किसी बात में पीछे नहीं है। यहां के 'बृजवासी चाट भंडार' पर कभी चखी, आलू की टिक्की का जायका आज भी यह लिखते-लिखते मुंह में पानी ला दे रहा है। सादी आलू की टिक्की हो या सोयाबीन की पिठ्ठी से भरी दही, सोंठ और हरी चटनी के साथ या पनीर वाली, मिलती बहुत से शहरों में हैं पर इनके जैसा स्वाद अन्यत्र दुर्लभ है। एक बात और जब कभी भी आप यहां आयें तो पनीर की भुजिया खाना तथा पेड़ा ड़लवा कर लस्सी पीना ना भूलें। इसके अलावा आप यहां का स्वाद अपने साथ बांध कर भी ले जा सकते हैं। यहां की आलूबुखारा भरी बड़ियां या अनारदाने वाले पापड़, ये घर पर भी आपको अपनी यात्रा का स्वाद दिलवाते रहेंगे।
ऐसा नहीं है कि यहां सिर्फ शाकाहारी भोजन ही मिलता है। सुना है यहां का मांसाहार लोगों को लखनवी या हैदराबादी स्वाद भूलने पर मजबूर कर देता है। ऐसे रेस्त्रांओं पर जुटी भीड़ इस बात का साक्षी थी। पर मुझ जैसों के लिये वह स्वाद लेना मुश्किल था। सो उसका जायका तो आपको खुद ही लेना पड़ेगा जाकर।
तो कब जा रहे हैं अमृतसर बताईयेगा।

5 टिप्‍पणियां:

डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

मेरा अमृतसर जाना तो साल मं एक बार हो ही जाता है।
इस बार मैं भी आपके बताए गये खानों का स्वाद जरूर चखूँगा।

राज भाटिय़ा ने कहा…

बहुत अच्छी जान कारी दी आप ने धन्यवाद

विवेक सिंह ने कहा…

आपका लेख पढ़कर जल्दी जाने का मन कर रहा है . वैसे कई बार प्लान बनते बनते बिगड़ गया है !

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

मेरे तो मुंह में पानी आ गया.

महेन्द्र मिश्र ने कहा…

स्वर्ण मंदिर के बारे में और खाने पीने के मामले की बढ़िया जानकारी दी है आपने . अवसर मिला तो जरुर घूमने जाऊंगा . आभार.

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