इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
बुधवार, 31 मई 2023
नागपुर का जीरो माइल स्टोन स्मारक
शुक्रवार, 28 अप्रैल 2023
मैं, मेरा चश्मा और बंदर कृष्णभूमि के
पर इस बार अपहरणकर्ता की फिल्डिंग कमजोर थी ! हो सकता है नौसिखिया हो ! क्योंकि उसकी ओर जैसे ही फ्रूटी फेंकी गई, उसने चश्मा नीचे फेंक, माल लपकना चाहा और हड़बड़ी में ना माया मिली ना राम ! बेचारे का चेहरा देखने लायक था ! पर यहां कुछ सवाल भी खड़े होते हैं कि यहां के वानरों ने अपने सदा से प्रिय केले और चने जैसे खाद्यों को छोड़ यह फ्रूटी की लत कैसे पाल ली ! जिससे ना तो उनका पेट भरता होगा नाहीं भूख मिटती होगी ! क्या यह कोई सोची-समझी साजिश तो नहीं .............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
पिछले दिनों RSCB के सौजन्य से वृन्दावन-मथुरा जाने का सुयोग बना ! संयोगवश ग्रुप की अगुवाई की बागडोर मेरे ही हाथों में थी ! चलने के पहले मिली हिदायतों में सबसे अहम् बात जो बताई गई वह थी, दोनों जगहों के बंदरों से सावधानी बरतने की ! खासकर वृन्दावन के इन स्वच्छंद जीवों से, जहां इनका उत्पात खौफ का रूप ले चुका है ! इनका आतंक मथुरा में भी है पर वृन्दावन की तुलना में कुछ कम ! हम सब ने इस बात की अच्छी तरह गांठ बांध ली थी ! जिसका असर भी रहा ! दोपहर तक पहुंचने के बाद गुफा मंदिर, प्रेम मंदिर और इस्कॉन मंदिर के दर्शनों में रात का पहला पहर बिना किसी विघ्न-बाधा के गुजर गया ! सब लोग निश्चिंतता के बावजूद सावधान भी थे !
रात के नौ बजे के लगभग, भारी भीड़ के बीच हम सब भी बांके बिहारी जी के दर्शनार्थ, कतारों में लगे हुए थे ! वहां पहली बार वानर-चश्मा प्रेम के दर्शन हुए ! इतनी भीड़, जहां पैर रखने की जगह तक मिलना मुश्किल हो रहा था, उसके बावजूद ये चपल प्राणी, बड़ी सफाई और बिजली की फुर्ती से, बिना किसी को संभलने का मौका दिए, उनके चश्मों को हथिया जा रहे थे ! जिनके साथ यह घट रहा था, उनको छोड़ बाकी सब इस मुफ्त के शो का मजा ले रहे थे ! चश्मा लौटता था पर ''साहब को फ्रूटी'' की रिश्वत देने के बाद ! हम सब सुरक्षित थे !
बांकेबिहारी जी के दर्शनों के बाद हम सब कुछ अलग-थलग पड़ गए थे ! सब को इकठ्ठा करना था ! गलियों में रौशनी कम थी ! रात घिर आई थी ! मैंने सोचा ''भाई लोग'' भी आराम करने चले गए होंगें सो चश्मा कान पर चढ़ा लिया ! जरा सी देर बाद लगा जैसे किसी ने कंधे पर हाथ रखा हो, मैं समझा साथी मनोज जी होंगे...! जब तक पलटा चश्मा सामने के घर की मुंडेर तक जा पहुंचा था ! वहां से गुजर रहे एक दो बच्चों ने कहा, अंकल उसे फ्रूटी दीजिए ! पास ही दूकान बंद होने-होने को थी, वहाँ से फ्रूटी ले, उसी बच्चे को देने को कहा ! बच्चे ने फ्रूटी फेंकी......बंदर ने लपकी और बजाए चश्मा फेंकने के और ऊपर चढ़ गया ! बच्चे ने कहा, अंकल एक और दीजिए ! एक और ले कर दी गई, पर वह तो और आगे खिसक गया और चश्मे की डंडी को चबाना शुरू कर दिया ! अब मुझे परेशानी का अनुभव हुआ ! चश्मा ''प्रोग्रेसिव'' था, यूँही छोड़ते नहीं बन रहा था ! उसी बच्चे ने फिर एक और फ्रूटी देने को कहा, कोई और चारा भी तो नहीं था ! तीसरी भेंट दी गई और आश्चर्य इस बार अगले ने चश्मा जमीन पर दे मारा ! बच गया, उसी बच्चे ने लपक लिया था ! अब जब ऊपर ध्यान गया तो देखा वहां तीन सदस्य विराजमान थे ! जब तक तीनों को ''गिफ्ट'' नहीं मिला बंधक को छोड़ा नहीं गया था !
इन सब बातों से जो बात सामने आई, वह कुछ सवाल भी खड़े करती है ! सबसे अहम् तो यही है कि वानरों ने अपने सदा से प्रिय केले और चने जैसे खाद्यों को छोड़ यह फ्रूटी की लत कैसे पाल ली ! जिससे ना तो उनका पेट भरता है नाहीं भूख मिटती होगी ! तो क्या दुकानदारों ने अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए इनका दुरोपयोग किया ! क्योंकि मेरे साथ जहां भी छिनताई हुई वहां बगल में ही किराने की दुकान थी ! सदा ही इनका 99 % लक्ष्य चश्मा ही होता है जो शरीर पर कुछ कम सुरक्षित जगह पर रहता है ! हालांकि मोबाईल और हाथ में पकड़े छोटे-छोटे सामान भी जाते हैं पर बहुत ही कम, क्योंकि हाथ से सामान लेने पर कभी ''देने'' भी पड़ सकते हैं ! इसके अलावा वहां के स्थानीय रहवासी तुरंत घटनाग्रस्त इंसान से फ्रूटी ही देने की सिफारिश करता है ! खैर जो भी हो, आप-हम यदि पैक्ड फ्रूटी पिएं तो हो सकता है कि उसमें कुछ द्रव्य बच जाए, पर मजाल है कि एक बूँद भी चिपकी रह जाए, जब डिब्बा इन कपिवंशियों के हाथ में हो !
@ फोटो अंतर्जाल के सौजन्य से
रविवार, 23 अप्रैल 2023
फोन से लगाव, रिश्तों में अलगाव (मोबिकेट)
आज मोबाइल शिष्टाचार पर बात करना करना ठीक ऐसा ही है जैसे किसी कॉलेज के छात्र को पांचवीं क्लास का कोर्स समझाया जा रहा हो ! अधिकाँश लोग इन सब बातों को जानते भी हैं, पर फिर भी जाने-अनजाने चूक हो ही जाती है ! आज की दुनिया में यह भले ही एक वरदान है, लेकिन इसका अनुचित प्रयोग कभी-कभी दूसरों की परेशानी का सबब बन जाता है ! खास कर तब, जब यह बिना एहसास दिलाए आपकी लत में बदल चुका हो ! आज खुद को भोजन मिले ना मिले पर इसका 'पेट'भरे रहना, इसकी चार्जिंग की ज्यादा चिंता रहती है ! इसलिए यह जरुरी हो गया है कि अभिभावक बचपन से ही अपने बच्चों को "मोबिकेट" से अवगत कराते रहें............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
कल मेरे एक मित्र घर आए ! मैं लैप-टॉप पर अपना कुछ काम कर रहा था ! उनके आते ही मैंने उसे बंद कर उनका अभिवादन किया ! अभी आधे मिनट की दुआ-सलाम भी ठीक तरह से नहीं हुई थी कि उनका फोन घनघना उठा और वे उस पर व्यस्त हो गए ! बात खत्म होने के बाद भी वे उसमें निरपेक्ष भाव से अपना सर झुकाए कुछ खोजने की मुद्रा बनाए रहे ! इधर मैं उजबक की तरह उनको ताकता बैठा था ! बीच में एक बार मैंने एक मैग्जीन उठा उसके एक-दो पन्ने पलटे कि शायद भाई साहब को मेरी असहजता का कुछ एहसास हो ओर पर वे वैसे ही निर्विकार रूप से अपने प्रिय के साथ मौन भाव से गुफ्तगू में व्यस्त बने रहे ! हार कर मैं भी अपने कम्प्यूटर को दोबारा होश में ले आया ! हालांकि मुखातिब उनकी ओर ही रहा ! पर पता नहीं उन्हें क्या लगा या क्या याद आ गया कि वे अचानक उठ कर बोले, अच्छा चला जाए ! मैंने कहा, बस ! बैठो ! बोले, नहीं फिर कभी आऊंगा !
मोबाइल फोन, आज हर आम और खास के लिए यह कितना महत्वपूर्ण बन गया है, इसके बारे में बात करना समय बर्बाद करना है ! आज खुद को भोजन मिले ना मिले पर इसका ''पेट'' भरे रहना, इसकी चार्जिंग, जरुरी है ! आज की दुनिया में यह भले ही एक वरदान है, लेकिन इसका अनुचित प्रयोग कभी-कभी दूसरों की परेशानी का सबब बन जाता है ! और खास कर तब, जब यह बिना एहसास दिलाए आपकी लत में बदल चुका हो ! सोचिए आप किसी के घर गए हैं, तो वह अपने दस काम छोड़ आपकी अगवानी करता है और आप हैं कि आपका फोन आपको छोड़ ही नहीं रहा ! मान लीजिए इसका उल्टा हो जाए, आप किसी के यहां जाएं और वह अपने फोन पर व्यस्त रहे, तो.......!
घर के अलावा आज तो यह हालत हैं कि कुछ लोग ऑफिस पहुँच कर भी अपने फोन से बाहर नहीं निकल पाते ! मिटिंग हो, सामने क्लाइंट हो, जरुरी कागजात देखे-परखे जाने हों, जरुरी काम समय सीमा में निपटना हो, इनका फोन बीच में गुर्राने लगता है और ये सब कुछ छोड़ उसमें घुस जाते हैं बिना चिंता किए कि सामने वाले का समय बर्बाद हो रहा है ! बहुत जरुरी सूचना हो तो भी अलग बात है, बेकार के मीम या क्लिप को भी बिना पूरा हुआ नहीं छोड़ते ! मैंने तो ऐसे-ऐसे शख्स भी देखे हैं जो अपनई इन समय खाऊ बकवासों को अपने काम के लिए बैठे व्यक्ति को भी दिखाने से बाज नहीं आते ! कई तो अपना काम छोड़ फोन उठा बहार की तरफ चल देते हैं, चहलकदमी करते हुए, मोबाईल जो ठहरा ! इस लत के तहत, अनजाने ही सही, यदि किसी के साथ बात करते या सामने बैठे हुए आप अपने फोन पर ''अन्वेषण'' करते हैं तो सामने वाला अपने को उपेक्षित समझ, भले ही मुंह से कुछ न बोले, बुरा जरूर मान बैठता है भले ही अपनी जरुरत के लिए दांत निपोरता रहे !
जानकारों ने, मनोवैज्ञानिकों ने, इस लत के लिए कुछ सुझाव दिए हैं ! उन पर अमल करना तो हमारा काम है, जिससे फिजूल की परिस्थितियां या माहौल पनपने ना पाएं ! इन सुझावों पर बात करना फिलहाल ऐसा ही है जैसे किसी कॉलेज के छात्र को पांचवीं क्लास का कोर्स समझाया जाए ! पर यह जरुरी भी है कि अभिभावक शुरू से ही अपने बच्चों को "मोबिकेट" की जानकारी से अवगत कराते रहें !
सबसे पहले तो फोन आने या करने पर अपना स्पष्ट परिचय दें ! ''पहचान कौन'' या ''अच्छा ! अब हम कौन हो गए'' जैसे वाक्यों से सामने वाले के धैर्य की परीक्षा ना लें ! हो सकता है कि आपने जिसे फोन किया हो उसके बजाए सामने कोई और हो, जो आपकी आवाज ना पहचानता हो !फोन करते समय सामने वाले का गर्मजोशी और खुशदिली से अभिवादन करें ! आपका लहजा ही आपकी छवि घडता है ! स्पष्ट, संक्षिप्त और सामने वाले की व्यस्तता को देख बात करें ! बात करते समय किसी का भी तेज बोलना या चिल्लाना अच्छा नहीं माना जाता, फिर भले ही वह आपका लहजा हो या फिर फोन की रिंग-टोन ! हमेशा विनम्र रहें और अभद्र भाषा के प्रयोग तथा किसी को कभी भी फोन करने से बचें। गलती से गलत नंबर लग जाए तो क्षमा जरूर मांगें !
जब भी आपसे कोई आमने-सामने बात कर रहा हो तो मोबाईल पर बेहद जरुरी कॉल को छोड़ ना ज्यादा बात करें नाहीं स्क्रॉल करें ! वहीं ड्राइविंग के वक्त, खाने की टेबल पर, बिस्तर या टॉयलेट में तो खासतौर पर मोबाइल न ले जाएं । इसके अलावा अपने कार्यस्थल या किसी मीटिंग के दौरान फोन साइलेंट या वाइब्रेशन पर रखें और मेसेज भी न करें ! कुछ खास जगहों या अवसरों, जैसे धार्मिक स्थलों, बैठकों, अस्पतालों, सिनेमाघरों, पुस्तकालयों, अन्त्येष्टि इत्यादि पर बेहतर है कि फोन बंद ही रखा जाए !
इन सब के अलावा कुछ बातें और भी ध्यान देने लायक हैं ! कईयों की आदत होती है दूसरों के फोन में ताक-झांक करने की जो कतई उचित नहीं है नाहीं बिना किसी की इजाजत उसका फोन देखने लगें ! बिना वजह कोई भी एसएमएस दूसरों को फारवर्ड ना करें, जरूरी नहीं कि जो चीज आपको अच्छी लगे वह दूसरों को भी भाए ! आजकल मोबाइल में कैमरा, रिकॉर्डर और ऐसी अनेक सुविधाएं होती हैं। इन सुविधाओं का बेजा इस्तेमाल न कर जरूरत के वक्त ही इस्तेमाल करें !
आज ध्यान में रखने की बात यह है कि यदि आधुनिक यंत्रों का आविष्कार यदि हमें तरह-तरह की सुख-सुविधा प्रदान कर रहा है, तो हमारा भी फर्ज बनता है कि हमारी सहूलियतें दूसरों की मुसीबत या असुविधा ना बन जाएं !
गुरुवार, 13 अप्रैल 2023
नजरबट्टू, क्या या कौन है ये
प्राचीन काल से ही यह मान्यता चली आ रही है कि किसी के प्रति मन की बुरी भावनाएं यथा द्वेष, ईर्ष्या, जलन इत्यादि नकारात्मक ऊर्जा के रूप में आँखों के जरिए बाहर आ दूसरों का अहित कर सकती हैं ! जिसे आम बोल-चाल की भाषा में नजर लगना कहा जाता है ! इसके प्रतिकार के लिए नजरबट्टू का उपयोग किया जाता रहा है ! यह एक पाम या ताड़ प्रजाति के वृक्ष के काले रंग का फल है जो दक्षिण भारत में प्रचुरता के साथ पाया जाता है, जिसकी माला लोग अपने बच्चों को बुरी नजर से बचाने के लिये पहनाते हैं.........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
इंसान की फितरत है कि वह किसी अनजाने डर से सदा त्रस्त रहता है ! इसीलिए विश्वास-अंधविश्वास उस पर सदा हावी रहते हैं ! तर्क और अंधविश्वास की मुठभेड़ में सदा अंधविश्वास ही भारी पड़ता है ! वैसे भी सभी को लगता है कि जरा सा टोटका करने से शायद, यदि अनहोनी टल ही जाए तो इसमें नुक्सान या बुराई क्या है ! यह भी देखा गया है कि इससे एक संबल, एक सुरक्षा की भावना भी मिलती है, जिससे दिलो-दिमाग को कुछ राहत का एहसास हो जाता है ! यही कारण है कि सदियों से दुनिया भर में टोन-टोटके आजमाए जाते रहे हैं !
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| नजरबट्टू के फल |
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| बिजुका |
मंगलवार, 4 अप्रैल 2023
हमारा वैदिक गणित
आश्चर्य के साथ खेद भी होता है कि हमने अपने ऋषि-मुनियों द्वारा रचित, अपनी इस अनमोल, अति उपयोगी, बहुमूल्य धरोहर का अब तक अपने पाठ्यकर्मों में उपयोग कर अपनी पीढ़ियों को लाभान्वित क्यों नहीं किया ! क्यों अभी भी हम विदेशियों द्वारा थोपे गए पाठ्यक्रमो को ढोए जा रहे हैं ! किनके अहम्, गलत सोच या विचारों ने हमें उत्कृष्टता अपनाने से रोक रखा है ! आज जरुरत है, इस ग्रंथ जैसे अनेक ग्रंथों को अवैज्ञानिक मानने वाले, किसी और विचारधारा से ग्रस्त तथाकथित बुद्धिजीवियों को परे धकेल, उनसे किनारा कर, बिना किसी सोच या गुरेज के अपने सनातन ज्ञान को अपना कर अपने देश के भविष्य को और बेहतर बनाने की............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
यह तो लंबे समय से ज्ञात है कि भारतीय गणित की समृद्धि शून्य की खोज से भी आगे तक फैली हुई है। उसी समृद्ध खजाने की एक कड़ी है वैदिक गणित, एक अद्भुत, चमत्कारी एवं क्रान्तिकारी ग्रन्थ ! जिसमें अथर्ववेद के परिशिष्ट के एक हिस्से में उल्लेखित 16 सूत्र तथा 13 उपसूत्रों के सहारे शीघ्र गणना करने की अद्भुत व नितांत अलग सी विधियां बहुत ही सरल ढंग से सिखाई गई हैं ! इस ग्रंथ की यह विशेषता है कि यह किसी भी व्यक्ति की सरल और जटिल दोनों प्रकार की गणितीय समस्याओं को तेजी से सुलझाने में मदद करता है। यह कठिन अवधारणाओं को याद रखने के बोझ को भी कम करता है।
वैदिक गणित की रचना का श्रेय स्वामी भारती कृष्णतीर्थ को जाता है ! उनका जन्म 14 मार्च 1884 को तिन्निवेलि, तमिलनाडु के एक सम्पन्न परिवार में हुआ था। बचपन से ही कुशाग्र बुद्धि कृष्ण तीर्थ ने बी.ए.और एम.ए. की परीक्षाओं में सर्वोच्च अंक प्राप्त किए थे। केवल बीस वर्ष की आयु में सन् 1904 में उन्होंने अमेरिकन कॉलेज ऑफ साइंस रोचेस्टर, न्यूयार्क के बम्बई केन्द्र से इतिहास, संस्कृत, दर्शन, अंग्रेजी, गणित और विज्ञान जैसे विषयों में एक साथ सर्वोच्च अंकों के साथ उत्तीर्ण कर सभी को आश्चर्य में डाल दिया था। अपने प्रिय विषय वैदिक गणित को वे व्यावहारिक विद्या के रूप में प्रस्तुत करते थे। ज्ञान, आयु और अनुभव की प्रौढ़ता प्राप्त कर लेने के बाद 35 वर्ष की आयु में शारदापीठ के शंकराचार्य स्वामी त्रिविक्रम तीर्थ महाराज ने 4 जुलाई सन् 1919 को उन्हें काशी में सन्यास की दीक्षा दी और नाम दिया स्वामी भारतीकृष्ण तीर्थ।
आज का समय तीव्र प्रतिस्पर्द्धा का है ! जिसमें सफल होने के लिए समय एक बहुत बड़ा कारक है ! किसी भी स्पर्द्धा में सफल होने के लिए गति एवं सटीकता की सबसे ज्यादा जरुरत होती है। वैदिक गणित के सूत्रों और नियमों का अभ्यास किसी भी स्पर्धा व परीक्षा में बहुत ही सहायक होता है ! इसका प्रत्यक्ष अनुभव, इस विधा से जुड़े देश-विदेश के विद्वानों को हो रहा है। वैदिक गणित की विधियाँ एक ओर जहाँ गणित शिक्षण को सरल एवं रोचक बनाती हैं, वहीं दूसरी ओर नवीन शोध की ओर प्रेरित भी करती हैं। गणित के क्षेत्र में स्वामी भारती कृष्ण तीर्थ का अद्वितीय योगदान है। उन्होंने 2 फरवरी 1960 में बम्बई में महासमाधि ले ली थी ! वैदिक गणित ग्रंथ का प्रकाशन, स्वामी जी के देहावसान के पश्चात् 1965 में बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय द्वारा किया गया ! जो आज विश्व प्रसिद्ध है।
आश्चर्य के साथ खेद भी होता है कि हमने अपने ऋषि-मुनियों द्वारा रचित, अपनी इस अनमोल, अति उपयोगी, बहुमूल्य धरोहर का अब तक अपने पाठ्यकर्मों में उपयोग कर अपनी पीढ़ियों को लाभान्वित क्यों नहीं किया ! क्यों अभी भी हम विदेशियों द्वारा थोपे गए पाठ्यक्रमो को ढोए जा रहे हैं ! किनके अहम्, गलत सोच या विचारों ने हमें उत्कृष्टता अपनाने से रोक रखा है ! अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है, जरुरत है, स्वामी तीर्थ के आलोचकों और इस ग्रंथ जैसे अनेक ग्रंथों को अवैज्ञानिक मानने वाले, किसी और विचारधारा से ग्रस्त तथाकथित बुद्धिजीवियों को परे धकेल, उनसे किनारा कर, बिना किसी सोच या गुरेज के अपने सनातन ज्ञान को अपना कर अपने देश के भविष्य को और बेहतर बनाने की !
बुजुर्गों से अक्सर पहाड़ों (Tables) के बारे में सुनने को मिलता था कि उनको याद रखने में कितनी मशक्कत करनी पड़ती थी ! सीधे-सादे पहाड़ों की तो बात अलग, उसके पहले ''सवा'' और ''ड़ेढ'' के पहाड़ों को भी रटना पड़ता था ! आज के गैजट्स से सुसज्जित पीढ़ी तो शायद उसकी कल्पना भी नहीं कर सकती ! उस समय देश के कर्णधारों ने यदि वैदिक ग्रंथों की अहमियत समझ ली होती तो शायद हम वर्तमान समय से शायद और भी आगे होते !
ग्रंथ मेंउल्लेखित विधियों की एक झलक -
यदि कोई कहे कि 38 का पहाड़ा सुनाओ तो एक बार तो दिमाग झटका खा ही जाएगा ! तुरंत कैलकुलेटर की खोज शुरू हो जाएगी ! पर इस गणित की सहायता से किन्हीं भी दो अंकों का टेबल तुरंत जाना जा सकता है, उदाहणार्थ :-
"38" का पहाड़ा
इसके लिए पहले 3 का टेबल लिख लें, फिर उसके साथ बगल में 8 का टेबल लिख लें
03 0 8 (3+0) 38
06 1 6 (6+1) 76
09 2 4 (9+2) 114
12 3 2 (12+3) 152
15 4 0 (15+4) 190
18 4 8 (18+4) 228
21 5 6 (21+5) 266
24 6 4 (24+6) 304
27 7 2 (27+7) 342
30 8 0 (30+8) 380
उसी तरह ''87'' का पहाड़ा
08 0 7 (08+0) 87
16 1 4 (16+1) 174
24 2 1 (24+2) 261
32 2 8 (32+2) 348
40 3 5 (40+3) 435
48 4 2 (48+4) 522
56 4 9 (56+4) 609
64 5 6 (64+5) 696
72 6 3 (72+6) 783
80 7 0 (80+7) 870
उतना ही आसान ''92'' का
09 02 (09+0) 92
18 04 (18+0) 184
27 06 (27+0) 276
36 08 (36+0) 368
45 10 (45+1) 460
54 12 (54+1) 552
63 14 (63+1) 644
72 16 (72+1) 736
81 18 (81+1) 828
90 20 (90+2) 920
है ना आसान ! कितनी सहजता से इसी तरह 10 से 99 तक का टेबल आसानी से बनाया जा सकता है ! ऐसी ही विशेष विधियों का संकलन है इस वैदिक गणित में ! यह है हमारा ज्ञान, विज्ञान, हमारी मेधा, हमारा अनुसंधान ! हमारा देश सदा से बहुमुखी प्रतिभा संपन्न रहा है ! सदियों से विद्या के अकल्पनीय खजाने से भरपूर रही है हमारी धरा ! यूं ही विश्व गुरु कहलाने का हक हमें नहीं मिल गया था ! पता नहीं क्यों कुछ लोगों को अपने देश की बड़ाई, उसका गौरव, उसका मान, रास नहीं आता..........!
@साभार वैदिक गणित
मंगलवार, 28 मार्च 2023
एक नहीं थे, असुर, राक्षस, दैत्य और दानव
विद्वानों का यह भी मानना है कि हो सकता है कि राक्षस जंगलों के रक्षक रहे हों और मानवों द्वारा वनों को जलाने, अतिक्रमण करने, चरागाह और आश्रम बनाने पर उनका विरोध किया हो और दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन गए हों ! क्योंकि उनका मिल-जुल कर रहने का भी उल्लेख मिलता है ! यह भी देखने में आता है कि दैत्य, दानव और राक्षसों के कुल में आपसी विवाह तो होते ही थे, साथ ही इनके कुल की कन्याओं ने मानवों से भी विवाह किया था ...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारे ग्रंथों में अक्सर चार नाम सामने आते रहते हैं, असुर, राक्षस, दैत्य और दानव ! हम लोग इनको एक दूसरे का एकरूप मानने की भूल कर बैठते हैं और पर्यायवाची की तरह उपयोग में ले आते हैं ! जबकि ये सब अलग-अलग हैं ! वैसे ये व्यक्तियों के नाम ना हो कर जातियों की पहचान बताते हैं ! शायद समय समय पर इन तीनों जातियों के देवताओं से युद्ध करने के कारण इन्हें एक ही समझ, इनकी सामान्य धर्मविरोधी जाति के रूप में छवि बन गई हो ! पर इनमें आपस में काफी अंतर और असमानता है !
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| ऋषि कश्यप |
राक्षस, असुर, दैत्य और दानव, जिन्हें अंग्रेजी में डीमन शब्द में लपेट दिया गया है ! इन जातियों का हमारे ग्रंथों में विस्तार से विवरण मिलता है ! ये कश्यप ऋषि और उनकी विभिन्न पत्नियों से उत्पन्न संतानें थीं ! दैत्यों की माता दिति, दानवों की माता दनु और राक्षसों की माता सुरसा थीं !
असुर, यह एक तरह से प्रतीकात्मक शब्द है ! वे, जो सुर यानी देवता नहीं थे, इसमें विभिन्न जातियों का समावेश हो सकता है ! इसका एक अर्थ यह भी है कि जो सूर्य के बिना रहते हों यानी धरती के नीचे, पाताल में ! ये स्वर्गवासी देवताओं के शत्रु थे ! इनकी मनुष्यों से कोई दुश्मनी नहीं थी, पर जो भी सुरों का सहायक होता था वह इनका शत्रु माना जाता था ! जहाँ तक 'असुर' शब्द का सवाल है इसका प्रयोग विशेष रूप से दैत्यों के लिए और सामान्य रूप से उक्त तीनों देव विरोधी जातियों के लिए होता है।
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| रावण |
राक्षस, इन्हें जाति ना कह कर एक पंथ कहा जा सकता है ! कश्यप-सुरसा की वंशावली में रावण ने रक्ष प्रथा या रक्ष पंथ की स्थापना की थी। इस पंथ के अनुयायी, गरीब, कमजोर, विकास के पीछे रह गए लोगों को अपने साथ रखते और अपना विरोध करने वालों का संहार कर देते थे ! रक्ष पंथ को मानने वाले राक्षस कहलाते थे। रामायण और महाभारत ग्रंथों में अच्छे और बुरे दोनों प्रकार के राक्षस योद्धाओं का विवरण है ! वे शक्तिशाली योद्धा, विशेषज्ञ, जादूगर, आकार और रूप प्रवर्तक तथा भ्रम फैलाने की कला के जानकर बताए गए हैं ! महाभारत काल तक आते-आते यह वंश लगभग खत्म हो गया, क्योंकि घटोत्कच के बाद किसी प्रमुख नाम का उल्लेख नहीं मिलता !
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| प्रह्लाद |
दैत्य :- ये महर्षि कश्यप और दिति की आसुरी प्रवृत्ति की संतानें थीं ! पर इन्हें मान-सम्मान भी बहुत मिला ! इनमें हिरण्यकशिपु और हिरण्याक्ष बहुत प्रसिद्ध हुए थे ! इनका अपने सौतेले भाइयों से अक्सर युद्ध होता रहता था ! हिरण्याक्ष का पुत्र कालनेमि था, जिसने द्वापर युग तक श्रीहरि के सभी अवतारों से प्रतिशोध लेने की चेष्टा की और हर बार उनके हाथों मारा गया। बड़े भाई हिरण्यकशिपु के सबसे छोटे पुत्र प्रह्लाद थे, जो महान विष्णु भक्त हुए। उनके पौत्र बलि को सबसे बड़े दानी और प्रतापी राजा के रूप में ख्याति प्राप्त है ! इनके पुत्र बाणासुर की पुत्री उषा का विवाह श्रीकृष्ण के पौत्र अनिरुद्ध के साथ हुआ था !
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| राजा बलि |
दानव :- ऋषि कश्यप और दनु के वंशज दानव कहे जाते हैं। ये दैत्यों और आदित्यों के छोटे भाई थे ! ये दैत्य और राक्षसों की भांति उतने सुसंस्कृत नही होते थे। दनु के चौंतीस पुत्रों के नाम महाभारत में गिनाए गए हैं ! जिनमें विप्रचित्ति सबसे बड़ा था। इनमें वृषपर्वा नाम के दानवराज का नाम भी आया है जो ययाति की पत्नी शर्मिष्ठा के पिता थे। महाभारत में इनका नाम प्रमुखता से आता है। मय दानव को तो सभी जानते हैं जो असुरों के शिल्पी थे। इन्ही की पुत्री मंदोदरी रावण की पत्नी थी। इसी कुल में जन्मा विद्युतजिव्ह रावण की बहन शूर्पणखा का पति था !
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| मयासुर को पांडवों के लिए भवन निर्माण का निर्देश देते श्रीकृष्ण |
इस प्रकार देखा जाए तो यह जातियां भी विश्व का एक अंग ही थीं ! जिन्हें जाने-अनजाने-परस्थितिवश अच्छाई या बुराई मिली ! मानव समेत उनका मिल-जुल कर रहने का भी उल्लेख मिलता है ! जब तक कि अपने अहम् नियम, कायदे या सिद्धांत के कारण आपसी मतभेद ना पैदा हो गए हों ! विद्वानों का यह भी मानना है कि हो सकता है कि राक्षस जंगलों के रक्षक रहे हों और मानवों द्वारा वनों को जलाने, अतिक्रमण करने, चरागाह और आश्रम बनाने पर उनका विरोध किया हो और दोनों एक दूसरे के दुश्मन बन गए हों ! क्योंकि यह भी देखने में आता है कि दैत्य, दानव और राक्षसों के कुल में आपसी विवाह तो होते ही थे, साथ ही इनके कुल की कन्याओं ने मानवों से भी विवाह किया था !
@ चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से, साभार
मंगलवार, 21 मार्च 2023
पंद्रह-सोलह साल का खेल करियर, नो-बॉल एक भी नहीं........ गजबे है भई
विशिष्ट पोस्ट
जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया
अनेकों बार Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...
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कल रात अपने एक राजस्थानी मित्र के चिरंजीव की शादी में जाना हुआ था। बातों ही बातों में पता चला कि राजस्थानी भाषा में पति और पत्नी के लिए अलग...
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शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
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आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
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चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...









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