बुधवार, 9 फ़रवरी 2022

हमारी लता जी, कुछ छुए-अनछुए पहलू

इतनी बड़ी हस्ती के बारे में जितना भी लिखा जाए वह कम ही लगेगा ! कितना भी शोध कर लीजिए, कुछ न कुछ छूट ही जाएगा ! कितनी भी बातें कर लीजिए, कम ही रह जाएंगी ! इतने विशाल व्यक्तित्व को शब्दों में सहेजना मुमकिन नहीं है ! पर जो भी हो यह सच है कि वे सदा हमारे हृदयों पर राज करती रहेंगी, ससम्मान ! जब भी गीत-संगीत की बात होगी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाएगा !  जब तक प्रकृति में संगीत रहेगा तब तक लता जी भी हम सब के बीच रहेंगी...........!!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

यह शाश्वत सत्य है कि जो भी इस धरा पर जन्म लेगा, चाहे वह कोई भी हो, चल-अचल, जड़-चेतन, उसकी मृत्यु निश्चित है ! इसीलिए इसे मृत्युलोक भी कहा जाता है। यहां रोज हजारों-लाखों लोग मरते हैं जिनकी कोई खोज-खबर नहीं होती ! कुछ विशेष लोगों की खबर कुछ लोगों तक पहुंचती है, कुछ दिनों बाद लोग उन्हें भूल-भाल जाते हैं ! पर कुछ महान, दिव्य हस्तियां ऐसी भी होती हैं, जिनका अस्तित्व भौतिक रूप से विलीन हो जाने के बावजूद यहां लोगों के जेहन में सदा मौजूद रहता है ! ऐसी ही दिव्यात्मा थीं हमारी लता जी ! जिनको भुला पाना शायद ही कभी संभव हो पाए ! एक ऐसी हस्ती जिसके लिए देश ही नहीं, विदेशों में भी लोग शोकग्रस्त हो गए !   

महान लोगों का जीवन एक खुली किताब सा हो जाता है। लोगों की उनमें दिलचस्पी के कारण उनकी हर बात सार्वजनिक हो जाती है ! कुछ बातें बेहद आम हो जाती हैं पर कुछ फिर भी ऐसी होती हैं जो बहुत से लोगों तक नहीं पहुँच पातीं ! लता जी से संबंधित ऐसी ही कुछ बातों का, जो सोशल माध्यम पर उपलब्ध होने के बावजूद बेहद आम नहीं हुईं है। आज श्रद्धांजलि स्वरूप कुछ ऐसी ही बातों का यहां जिक्र, जिससे उनकी याद यहां सदा दर्ज रहे ! 



उनके पिता दीनानाथ और मां शेवांति जी ने अपनी इस पहली संतान का नाम हेमा रखा था। पर बाद में उनके पिताजी ने अपने एक नाटक भाव-बंधन के एक अति लोकप्रिय किरदार लतिका से प्रभावित हो उनका नाम लता कर दिया।  

लता जी अपने स्कूल के पहले दिन अपनी छोटी बहन आशा को भी साथ ले गईं थीं ! पर जब स्कूल द्वारा दोनों की फीस मांगी गई तब उन्होंने खुद भी स्कूल न जाने का फैसला कर लिया ! उनकी शिक्षा घर पर ही संपन्न हुई ! हालांकि उन्हें जीवन में छह-छह यूनिवर्सिटियों से मानद उपाधि द्वारा नवाजा गया। 

लता जी तब 5-6 वर्ष की थीं तो पिता की अनुपस्थिति में उनके शिष्य को एक राग गलत गाते सुन, उसको सही तरह गा कर बताया ! उनके पिता जी को तब तक लता जी के हुनर का पता नहीं था ! उनको एक जटिल राग को सहजता से गाता देख वे आश्चर्यचकित रह गए ! तभी से उन्होंने लता जी को प्रशिक्षित करना शुरू कर दिया।   


लता जी को रेडिओ सुनने का बहुत शौक था ! पर जिस दिन वह अपना पहला रेडियो घर ला उसे सुनने बैठीं तो पहली खबर ही सहगल जी के देहावसान की मिली, उन्होंने रेडिओ ही वापस कर दिया !

लता जी के लिए गायन एक पूजा थी, आराधना थी ! वे जब भी कोई गाना रिकॉर्ड करती थीं तो अपने जूते या चप्पल जो भी पहने होती थीं, उतार देती थीं।


वे आनंदअघन, जो कि 17 शताब्दी के एक जैन साधू, रहस्यमय कवि और भजन गायक थे, के नाम से गाने भी कंपोज किया करती थीं। बंगाली भाषा में 'तारे आमी चोखने देखिनी' और 'आमी नी' गाने उन्होंने ही कंपोज किए थे। जिन्हें किशोर कुमार ने गाया था। इसके अलावा मराठी में भी कुछ गाने कंपोज़ किए थे। 



1974 में, लता जी लंदन के रॉयल अल्बर्ट हॉल में प्रदर्शन करने वाली पहली भारतीय महिला बनीं। ज्ञातव्य है कि वहां सिर्फ ब्रिटिशर ही अपनी प्रस्तुति दे सकते थे ! पर लता जी के कारण वहां की सरकार ने अपना नियम बदला।    

फिल्म जगत से जुड़ी दो ही हस्तियों को भारत रत्न और दादा साहब फाल्के पुरस्कार से नवाजा  गया है ! लता जी के अलावा यह गौरव सत्यजीत रे जी को ही मिला है ! 


राज्य सभा के सदस्य के रूप में उन्होंने कभी वेतन या दिल्ली में घर नहीं लिया। आज के तथाकथित नेता तो पता नहीं इन सहूलियतों के लिए क्या-क्या कर जाते हैं !

वे हर काम को पूर्णरूपेण सही ढंग से करने में विश्वास रखती थीं यानी जूनून की हद तक पूरी परफेक्शनिस्ट थीं ! पूरी गहराई तक जा-समझ कर ही उसे पूरा करती थीं। फिर चाहे वह गायन हो या फोटोग्राफी। गायन की तरह ही वे बेहद कुशल फोटोग्राफर थीं ! जो उनका बेहद पसंदीदा शौक था ! 

लताजी को स्वर कोकिला की उपाधि देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल जी ने बड़ी आत्मीयता के साथ दी थी।

 


वैसे तो हर बड़ी और नामचीन अभिनेत्री की यही इच्छा होती थी कि उस पर फिल्माया गया गाना लता जी ही गाएं ! पर कहते हैं मधुबाला जी तो अपने कंट्रैक्ट में बाकायदा यह शर्त रखती थीं कि उनके गाने सिर्फ लता जी ही गाएंगी !

वैसे तो बड़े से बड़े संगीत विशेषज्ञ उनके गायन में कोई त्रुटि नहीं ढूंढ पाते, पर लता जी कभी भी अपनी रचनाओं से पूर्णतया संतुष्ट नहीं होती थीं, उन्हें सदैव लगता था कि इस से भी बेहतर किया जा सकता है ! एक बार उन्होंने बताया था कि मैं अपने गाने नहीं सुनती क्योंकि मुझे लगता है कि उनमें मुझे कोई न कोई कमी नजर आ जाएगी ! उनका नाम 1974 की गिनीज बुक में as the most recorded artist के रूप में दर्ज किया गया था।



लता जी को क्रिकेट से भी बहुत लगाव था। यह तो सभी जानते हैं कि 1983 में वर्ल्ड कप जीतने पर क्रिकेट कंट्रोल बोर्ड के पास इतना पैसा नहीं था की वह खिलाडियों को कुछ दे सके ! तब लता जी ने आगे आ कर अपनी तरफ से कॉन्सर्ट आयोजित कर बीस लाख रुपए अर्जित किए और उन्हें खिलाड़ियों को दे कर उन्हें सम्मानित किया ! 
 

क्रिकेट के शौक ने ही उन्हें राज सिंह डूंगरपुर से मिलवाया था। राज सिंह जी लता जी के क्रिकेट प्रेमी और खिलाड़ी भाई हृदयनाथ जी के दोस्त थे। उन्हीं ने दोनों को मिलवाया था ! इन दोनों के संबंधों की अनेक बातें हैं। जिनकी चर्चा सोशल मिड़िया, संगीत की दुनिया या कहीं होती भी है तो बड़े अदब के साथ की जाती है। यह भी कि दोनों ने आजीवन विवाह नहीं किया और राज सिंह जी लताजी को अक्सर ''मिठू'' कह कर बुलाया करते थे !


लता जी ने भारतीय सेना को समर्पित अपना अंतिम गाना ''सौगंध मुझे इस मिटटी की'' रेकॉर्ड करवाया था जो 30 मार्च 2019 रिलीज किया गया था।

लताजी ने अपने जीवनकाल  में अनगिनत लोगों को मोटीवेट किया है। उनके गाए गानों से लाखों लोग अपना जीवनयापन कर रहे हैं। लता जी के गानों को गा-गा कर कई लोग नाम-दाम पा गए ! टीवी के उलटे-सीधे कार्यक्रमों में उनकी नकल कर बहुतों ने पैसा बनाया ! उदहारण स्वरूप लोगों को याद होगा कैसे बंगाल की रानू मंडल, जो सड़कों पर लता जी के गाने गा कर गुजर-बसर करती थी, कैसे रातों रात स्टार बन गई थी ! पर ऐसे धूमकेतु, जो बिना मेहनत-समर्पण-लगन के कुछ समय के लिए चमक, फिर गुमनामी के अँधेरे में गुम हो जाते हैं, उनके लिए लता जी ने एक सारगर्भित संदेश  दिया था ! उन्होंने कहा था कि "मै खुशनसीब हूं कि मेरे काम और नाम की वजह से कोई आगे बढ़ पा रहा है। मगर, मैं आजकल के नए गायकों को यह सलाह देना चाहती हूं कि आपको मेरे, आशा, किशोर दा, रफी साहब, मुकेशा दा या किसी और पुराने सिंगर्स के गानों को कॉपी नहीं करना चाहिए। बल्कि आपको अपना काम अपने अंदाज में दिखाना चाहिए। किसी को कॉपी करना गलत नहीं है मगर, इससे आपका नाम ज्‍यादा दिन तक नहीं हो पाएगा। आपको अपने गीतों से अपनी पहचान बनानी चाहिए।''



इतनी बड़ी हस्ती के बारे में जितना भी लिखा जाए वह कम ही लगेगा ! कितना भी शोध कर लीजिए, कुछ न कुछ छूट ही जाएगा ! कितनी भी बातें कर लीजिए, कम ही रह
 जाएंगी ! इतने विशाल व्यक्तित्व को शब्दों में सहेजना मुमकिन नहीं है ! पर जो भी हो यह सच है कि वे सदा हमारे हृदयों पर राज करती रहेंगी, ससम्मान ! जब भी गीत-संगीत की बात होगी उनका नाम प्रमुखता से लिया जाएगा !  जब तक प्रकृति में संगीत रहेगा तब तक लता जी भी हम सब के बीच रहेंगी ! 

@सहयोग हेतु अंतर्जाल का हार्दिक आभार 

सोमवार, 31 जनवरी 2022

येड़ा बन कर पेड़ा खाना

बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते और उसके आने पर सबके सामने उसे एक दो रुपये का और एक पांच रुपये का सिक्का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते थे ! जिस पर सोनू झट से दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता था ! इस बात पर सब हंसने लगते, सोनू की कमअक्ली पर ! पर सोनू पर उनके हंसने या अपने मजाक बनने का कोई असर नहीं होता, वह तो सिक्का उठा, यह जा; वह जा.................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मुहावरे जिंदगी के तजुर्बों पर ही बनते हैं ! इनमें समाज और लोगों के अनुभवों का सार होता है। ऐसा ही एक मुहावरा है, ''येड़ा बन कर पेड़ा खाना !'' वैसे तो यह एक बंबइया मुहावरा है, जिसका मतलब होता है, खुद को बेवकूफ जतला कर अपना अभिलाषित या वांछित पा लेना ! पर आज कल ऐसे येड़े देश भर में अपने पेड़ों की तलाश में विचरते नजर आ रहे हैं ! बस जरा सा फर्क है कि वे दूसरों को येड़ा बना पेड़ा खुद खा रहे हैं ! इसी मंजर पर एक पुरानी बात याद आ गई ! आशा है गुदगुदाएगी जरूर !

जिस दिन मैंने पांच का सिक्का उठा लिया, उसी दिन यह खेल बंद हो जाएगा और मेरी आमदनी भी 

रायपुर में मेरी रिहाइश के दौरान मेरे एक पडोसी थे, माधव जी ! मिलनसार, हंसमुख, खुश मिजाज ! अच्छा-खासा परिवार ! उनके स्वभाव के कारण उनके मित्रों की भी अच्छी-खासी जमात थी ! घर में किसी न किसी का आना-जाना लगा ही रहता था। उनके सात और पांच साल के दो लड़के थे ! बड़े को प्यार से सोनू तथा छोटे को छोटू कह कर बुलाया जाता था। अपने मजाकिया स्वभाव के कारण माधव जी अक्सर अपने घर आने वालों को सोनू की 'बुद्धिमंदता' का खेल दिखलाते रहते थे ! होता क्या था कि बातचीत के दौरान ही माधवजी सोनू को आवाज लगाते और उसके आने पर  सबके सामने उसे एक दो रुपये का और एक पांच रुपये का सिक्का दिखला कर कोई एक उठाने को कहते थे ! जिस पर सोनू झट से दोनों सिक्कों में कुछ बड़ा दो रुपये का सिक्का ही उठाता था ! इस बात पर सब हंसने लगते, सोनू की कमअक्ली पर ! पर सोनू पर उनके हंसने या अपने मजाक बनने का कोई असर नहीं होता, वह तो सिक्का उठा, यह जा, वह जा।माधवजी भी मजे ले-ले कर बताते कि बचपन से ही सोनू बड़ा सिक्का ही उठाता है, बिना उसकी कीमत जाने ! जबकि छोटू को इसकी समझ है। यह खेल काफी समय से चला आ रहा है, पर सोनू वैसे का वैसा ही है !

पर सोनू की माँ, श्रीमती माधव को यह सब अच्छा नहीं लगता था कि कोई उनके बेटे का मजाक बनाए। पर कई बार कहने, समझाने के बावजूद भी माधवजी अपने इस खेल को बंद नहीं करते थे। एक बार सोनू के मामाजी इनके यहाँ आए। बातों-बातों में बहन ने भाई को इस बारे में भी बताया। मामाजी को भी यह बात खली। उन्होंने अकेले में सोनू को बुलाया और कहा, बेटा तुम बड़े हो गए हो ! स्कूल जाते हो, पढाई में भी ठीक हो, तो तुम्हें क्या यह नहीं पता कि दो रुपये, पांच रुपयों से कम होते हैं ?

पता है, सोनू ने कहा !  

तब तुम सदा लोगों के सामने दो रुपये ही क्यों उठाते हो ? लोग तुम्हारा मजाक बनाते हैं ? मामाजी ने आश्चर्य चकित हो पूछा।

मामाजी ! जिस दिन मैंने पांच का सिक्का उठा लिया, उसी दिन यह खेल बंद हो जाएगा और मेरी आमदनी भी ! सोनू ने निर्लिप्त भाव से जवाब दिया !

मामाजी हतप्रभ से अपने चतुर भांजे का मुख देखते ही रह गए ! ठीक वैसे ही जैसे हम आज अपने आस-पास के चतुरों की चतुराई देखते रह जाते हैं ! पता ही नहीं चलता कौन येड़ा है और कौन पेड़ा खा रहा है !

सोमवार, 24 जनवरी 2022

मोमबत्तियों की बढ़ती संख्या से विचलित ना हों, उनके बढ़ते आलोक का आनंद लें

पोर्टब्लेयर और दिल्ली, दोनों जगहों के तापमान में बहुत ज्यादा अंतर था। वहां एक टी शर्ट भी भारी लगती थी तो यहां सब कुछ ठंड की चपेट में था ! पर जो है वह तो हइए है ! शुक्र इस बात का रहा कि उम्र-दराज होने के बावजूद किसी भी सदस्य को कोई खास तकलीफ नहीं हुई जबकि पूरा दौरा कुछ थका देने वाला ही था ! पर हरेक सदस्य ने यह सिद्ध कर दिया कि उम्र सिर्फ एक अंक ही है ! तन पर भले ही समय की छेनी अपना असर दिखा रही हो, दिमाग युवा और मन अभी भी बच्चा ही है ! हम वे लोग हैं जो केक पर की मोमबत्तियों की बढ़ती संख्या से विचलित ना हो कर उनके बढ़ते अलोक का आनंद लेते हैं..............!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 

जनकपुरी की #RSCB (Retired and Senior Citizen Brotherhood) संस्था द्वारा आयोजित 11 से 16 दिसंबर की पोर्टब्लेयर यात्रा का पांचवां दिन घर वापसी के रूप में शुरू हुआ ! नील द्वीप से अपने उसी क्रूज, Green Ocean, से ही वापसी भी थी ! पोर्टब्लेयर से हैवलॉक होते हुए यह नील टापू तक करीब ढाई घंटे में पहुंचता है पर वापसी में सीधे नील से पोर्टब्लेयर आने में दो घंटे ही लगते हैं ! पर यह समय भी गाने-बजाने में कैसे निकल जाता है, पता ही नहीं चलता ! दोपहर एक बजते-बजते पोर्टब्लेयर के उसी होटल J में, जिसमें दो दिन पहले ठहरे थे, पहुँच फिर चेक इन कर लिया गया ! यह होटल अबरदीन बाजार में स्थित है यहाँ से मरीना बीच की दूरी सिर्फ पांच मिनट,पैदल की है ! भोजनोपरांत कुछ लोग शहर भ्रमण और कुछ लोग खरीदारी के लिए निकल गए तो कुछ ने अपने कमरे में ही समय व्यतीत करने का निश्चय किया !


होटल से 

अपनी मनमोहक खूबसूरती, शांति और जलीय खेलों, जलीय जीव-जन्तुओं को बेहद करीब से देख सकने की सुविधा जैसी रोमांचक खूबियों के कारण अंडमान द्वीप समूह पर्यटकों को सदा आकर्षित करता रहा है ! दिल्ली से करीब ढाई हजार किमी (2485) दूर इसकी राजधानी पोर्ट ब्लेयर अपनी ऐतिहासिक जेल, म्यूजियम, जापानी बंकर, मरीना पार्क जैसी बेहद सुंदर जगहों के लिए विश्व प्रसिद्ध है ! यहां की वन संपदा के दोहन के लिए सन1789 में अंग्रेज सरकार द्वारा लेफ्टिनेंट रेगिनाल्ड ब्लेयर के नेतृत्व में एक सर्वे करवाया गया तथा उसी सर्वेयर के नाम पर ही यहां के मुख्य द्वीप का नाम पोर्ट ब्लेयर रख दिया गया !  

क्लॉक टॉवर 



काले पानी की सजा पाने वालों में विभिन्न प्रदेशों, जातियों, धर्मों के स्त्री-पुरुष दोनों ही होते थे ! ब्रिटिश सरकार के अधिकारी इन कैदियों में से कइयों की सजा समय-समय पर उनका आचरण देख काम या माफ करते रहते थे ! पर सजा मुक्त होने पर भी उन्हें मुख्य भूमि पर ना भेज, वहीं बसा दिया जाता था। उनके आपस में विवाह भी करवा, परिवार बनवा, कुछ टुकड़े जमीनों के भी दे दिए जाते थे ! इस तरह ये द्वीप बसते चले गए ! सरकार की पुलिस में भी हर धर्म जाति के लोग थे, तो उनकी आस्था और धर्म की तुष्टि को पूरा करने के लिए अंग्रेजों ने पोर्टब्लेयर में एक-एक मंदिर, गुरुद्वारा और मस्जिद का निर्माण करवा उनका संचालन पुलिस विभाग को सौंप दिया ! आज भी यह प्रथा चली आ रही है और इन तीनों धर्मस्थलों को पुलिस के नाम से ही जाना जाता है !   

पुलिस मंदिर 

इनके अलावा अबरदीन मार्ग पर हनुमान जी का एक और मंदिर भी है। इसका गुंबद देश के दक्षिणी भागों के मंदिरों जैसा है ! इसकी मुख्य प्रतिमाएं पूर्णतया सोने से मढ़ी हुई हैं, जो बहुत ही सुंदर और सजीव सी हैं ! फिर भी किसी तरह का पहरा या अतिरिक्त सुरक्षा की जरुरत महसूस नहीं की जाती ! शायद द्वीप की रक्षार्थ सागर की उपस्थिति ही पर्याप्त है ! आश्चर्य की बात है कि इन सब दर्शनीय स्थलों का उल्लेख किसी भी यात्रा विवरणिका में उपलब्ध नहीं करवाया जाता ! पर जो भी हो यह जगहें देखने लायक जरूर हैं।

मंदिर की छत पर बना अत्यंत सुंदर चित्र 



वापसी 
शाश्वत नियम है कि हर चीज का अंत होता ही है ! सो इस यादगार यात्रा का समापन भी आ ही पहुंचा ! आते समय बेंगलुरु होते हुए आए थे, लौटते वक्त Go First की कोलकाता होते हुए दिल्ली की फ्लाइट थी ! दोपहर सवा ग्यारह बजे शुरू हुई हवाई यात्रा ने घुमाते-फिराते शाम पांच बजे दिल्ली पहुंचा दिया ! ग्रुप के मित्रों ने आपस में संबंध बनाए रखने के वादे के साथ विदा ली ! दोनों जगहों के तापमान में बहुत ज्यादा अंतर था, वहां एक टी शर्ट भी भारी लगती थी तो यहां सब कुछ ठंड की चपेट में था ! पर जो है वह तो हइए है ! शुक्र इस बात का रहा कि उम्र-दराज होने के बावजूद किसी भी सदस्य को कोई ख़ास तकलीफ नहीं हुई जबकि पूरा दौरा कुछ थका देने वाला ही था ! पर हरेक सदस्य ने यह सिद्ध कर दिया कि उम्र सिर्फ एक अंक है ! तन पर भले ही समय की छेनी अपना असर दिखा रही हो, दिमाग युवा और मन बच्चा ही होना चाहिए ! हम वे लोग हैं जो केक पर की मोमबत्तियों की संख्या से विचलित ना हो कर उनके बढ़ते आलोक का आनंद लेते हैं ! 

गुरुवार, 20 जनवरी 2022

अंडमान का नील द्वीप यानी शहीद टापू

करीब दो सौ मीटर चलने के बाद हमारे बाईं तरफ वह पुल दिखने लगा ! प्रकृति की अद्भुत करामात थी ! एक चट्टान पर आर्क की तरह की दूसरी पत्थर की रचना पुल की आकृति बना रही थी ! पता नहीं कितने सालों से भूकंप और सागर की हवा के थपेड़े सहते, यूँ ही, समय रुपी काल से अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष किए जा रही है ! अद्भुत था सब कुछ ! गर्मी के साथ-साथ धूप भी बहुत तेज थी, सो कुछ देर ठहर, वापस हो लिए.....! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हैवलॉक के अद्भुत राधानगर बीच पर से ढलते सूर्य की अलौकिक छवि को अपने दिलो-दिमाग में समेटे हम होटल लौट तो आए थे पर उस ढलती शाम की यादें आँखों में कैद सी हो कर रह गई थीं ! अगले दिन उन्हीं के साथ ही अगले पड़ाव नील टापू, जो इस #RSCB (Retired and Senior Citizen Brotherhood) संस्था द्वारा आयोजित अंडमान यात्रा का अंतिम पड़ाव था, पर भी जाना था। नील द्वीप अपनी विभिन्न सब्जियों, साग-भाजी तथा वनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध है ! इसे सब्जियों की खान भी कहा जा सकता है !

सुबह नाश्ते इत्यादि का कार्यक्रम निपटा जब नील द्वीप पहुंचे तो पूरी दोपहर हो चुकी थी ! नील द्वीप का नाम बदल कर अब शहीद टापू कर दिया गया है। पोर्टब्लेयर से कोई 35-40 किमी दूर यह 13.7 Sq. किमी का एक छोटा सा खूबसूरत टापू है ! एक बात जो बहुत सुखद और आश्चर्य भरी लगी कि हैवलॉक के सारे गांवों के नाम श्री कृष्ण जी के नामों पर है तो नील के तटों के नाम रामायण के किरदारों पर आधारित हैं, जैसे सीतापुर, भरतपुर व लक्ष्मणपुर ! नील द्वीप के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक सुभाष मेला है, जिसका आयोजन दिसंबर के अंत और जनवरी महीने की शुरुआत में किया जाता है ! यह त्योहार नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती का प्रतीक है। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।




कोरल की सुरक्षा के कारण जेटी से किनारे तक करीब आधा किमी का पुल बना हुआ है ! इस पार आने पर स्थानीय गाइड की सलाह के अनुसार लगेज होटल भिजवा कर सभी जने लक्ष्मणपुर तट की पुल रूपी संरचना देखने के लिए अग्रसर हो लिए ! यह संरचना जिसे स्थानीय लोग हावड़ा पुल  भी कहते हैं, तट से चट्टानों और वृक्षों की ओट के कारण सीधे दिखाई नहीं पड़ती ! इसके लिए किनारे से और आगे सागर की ओर जाना पड़ता है ! दोपहर बाद सागर में ज्वार आ जाने पर फिर जाया नहीं जा सकता इसीलिए पहले यहां आना तय किया गया था ! तट पूरी तरह कोरल के अवशेषों से पटा पड़ा है ! यह मृत कोरल अवशेष बहुत कठोर और नुकीले होते हैं जिससे बहुत संभल कर चलना पड़ रहा था ! आगे जाने पर समुद्र की लहरें आ-आ कर पैरों से टकराने और स्वनिर्मित गढ्ढों को पानी से भरने लगीं ! उनके साथ ही कई छोटे-छोटे जीव और मछलियां भी किनारे पर आ अठखेलियां करते नजर आए ! 





करीब दो सौ मीटर चलने के बाद हमारे बाईं तरफ वह पुल दिखने लगा ! प्रकृति की अद्भुत करामात थी ! एक चट्टान पर आर्क की तरह की दूसरी पत्थर की रचना पुल की आकृति बना रही थी ! कुछ-कुछ ऐसा लगता था जैसे जुरासिक काल का कोई डायनासोर सागर का पानी पी रहा हो ! पता नहीं कितने सालों से भूकंप और सागर की हवा के थपेड़े सहते, यूँ ही समय से अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष किए जा रही है ! अद्भुत था सब कुछ ! गर्मी के साथ-साथ धूप भी बहुत तेज थी, सो कुछ देर ठहर, उदर पूर्ति के लिए वापस हो लिए !



 


भोजनोपरांत कुछ विश्राम के पश्चात काफिला भरतपुर बीच के लिए रवाना हो गया ! यह काफी विस्तृत तट है ! यहाँ भी जल संबंधी खेलों की सारी सुविधाएं हैं ! जैसे स्कूबा डाइविंग, स्पीड बोट राइड, ग्लास बॉटम बोट राइड इत्यादि ! यदि कुछ नहीं करना चाहते हों तो आराम से किनारे बैठ सुन्दर हरे-नीले पानी को अठखेलयाँ करते देखने का अपूर्व सुख लीजिए ! तट पर ही खरीदारी के लिए समुद्र से प्राप्त वस्तुओं से बनी चीजों की दुकाने हैं ! यहां आए पर्यटकों को यह जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि अंडमान के तटों पर सागर द्वारा उपलब्ध कोई भी वस्तु द्वीप से बाहर नहीं ले जाई जा सकती, जब तक उसकी रसीद ना हो ! स्थानीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए सरकार द्वारा ऐसी व्यवस्था की गई है !





आज यात्रा का चौथा दिन था ! कल वापस पोर्टब्लेयर लौटना था ! यात्रा का समापन नजदीक होने के कारण मन कुछ खिन्न सा भी था !

सोमवार, 10 जनवरी 2022

हैवलॉक टापू , अंडमान

सुखद आश्चर्य है कि इस द्वीप पर के पाँचों गाँव, गोविंदनगर, विजयनगर, श्यामनगर, कृष्णनगर और राधानगर श्री कृष्ण और राधा जी के नाम पर हैं। सुबह 7.15 पर क्रूज की सवारी लेनी थी। यह भी एक यादगार लम्हा था ! वातानुकूलित तीन मंजिला इस जहाज में ऊपरी माले पर रेस्त्रां तथा डांस फ्लोर था ! इसके चलने के 15 मिनट बाद सबको घूमने-विचरने की छूट मिल गई ! हमारे ग्रुप के अलावा तकरीबन 99% यात्री युवा नवविवाहित थे ! सो DJ की जो धूम शुरू हुई, पता ही नहीं चला कि कैसे दो घंटे बीत गए ! गहरे नीले पानी को तेजी से चीर कर आगे बढ़ते देखना भी एक रोमांचकारी अनुभव था............!     

#हिन्दी_ब्लागिंग 

अंडमान-निकोबार द्वीप समूह विभिन्न देशों की सत्ताओं के अंतर्गत विभिन्न नाम पाता रहा है। पर 1943 में नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वारा इन द्वीपों को आजाद घोषित कर इनका नाम स्वराज द्वीप रख दिया गया था ! पर ब्रिटिश हुकूमत ने सत्ता में आते ही फिर इनका नाम बदल, 1857 के स्वतंत्रता संग्राम में हिस्सा लेने वाले अपने क्रूर सेना नायकों के नाम पर कर दिया, जिसे नेताजी सुभाष चंद्र बोस के यहां तिरंगा फहराने की 75वीं वर्षगांठ के मौके पर प्रधानमंत्री मोदी ने फिर एक बार गुलामी के प्रतीकों का सफाया करते हुए रॉस आईलैंड का नाम बदल कर नेताजी सुभाष चंद्र बोस द्वीप, नील आईलैंड का नाम शहीद द्वीप और हैवलॉक आईलैंड का नाम स्वराज द्वीप कर दिया। अपनी हाल की यात्रा के दौरान पाया कि आम आदमी दासता की बेड़ियों की याद दिलाते अंग्रेजों के नामों के बदलने से खुश है ! पर कुछ अंग्रेज-परस्त लोग इसमें भी राजनीती करने से बाज नहीं आ रहे !

                                    

यहां के अधिकांश निवासी 1971 के बांग्लादेश स्वाधीनता युद्ध के दौरान भारत आए शरणार्थी और उनके वंशज हैं। सुखद आश्चर्य है कि इस द्वीप पर के पाँचों गाँव, गोविंदनगर, विजयनगर, श्यामनगर, कृष्णनगर और राधानगर श्री कृष्ण और राधा जी के नाम पर हैं। शीशे की तरह साफ, निर्मल नीले पानी, सफेद रेत, हरे-भरे-घने मैंग्रोव वृक्षों के जंगल और कॉरल रीफ के लिए मशहूर हैवलॉक आईलैंड पर्यटकों का पसंदीदा टापू है ! राधानगर सागर तट को एशिया का सर्वोत्तम तट घोषित किया गया है। 2020 में अंतर्राष्ट्रीय Blue Flag Certification से नवाजे जाने वाले  हमारे दस सागर तटों में एक यहां का राधानगर समुद्र तट भी है। जो अपने साफ-सुथरे परिवेश, स्वच्छ-निर्मल-हानि रहित स्नान के योग्य जल, अद्भुत, सुरक्षित, स्वस्थकर वातावरण के चलते एशिया का सर्वोत्तम तटों में एक माना जाता है !



     

अंडमान यात्रा के तीसरे दिन यही हमारा गंत्वय था ! इसके लिए सुबह 7.15 पर क्रूज की सवारी लेनी थी। यह शटल सेवा है ! पोर्टब्लेयर से हैवलॉक, फिर वहां से नील टापू ! फिर नील से हैवलॉक और वहाँ से पोर्टब्लेयर ! चूँकि वापसी के लिए फ्लाइट पोर्टब्लेयर से ही लेनी थी, इसलिए सुबह का नाश्ता लेने के बाद दो दिनों के लिए जरुरी सामान ले कर, सभी ने अपना बचा हुआ लगेज होटल के लॉकर में ही जमा करवा चेक आउट कर लिया ! लौटने के बाद दोबारा चेक इन यहीं जो करना था ! 

क्रूज का सफर भी एक यादगार लम्हा था ! वातानुकूलित तीन मंजिला इस जहाज में ऊपरी माले पर रेस्त्रां तथा डांस फ्लोर था ! इसके चलने के 15 मिनट बाद सबको घूमने-विचरने की छूट मिल गई ! हमारे ग्रुप के अलावा तकरीबन 99% यात्री युवा नवविवाहित थे ! सो DJ की जो धूम शुरू हुई, पता ही नहीं चला कि कैसे दो घंटे बीत गए ! गहरे नीले पानी को तेजी से चीर कर आगे बढ़ते देखना भी एक रोमांचकारी अनुभव था !





हैवलॉक में होटल की औपचरिकता में कुछ समय लगना था ! उसे वहां के तरणताल में तरोताजा हो कर बिताया गया ! फिर भोजनोपरांत यहां के एक और मशहूर व रमणीय सागर तट काला पत्थर पहुंचे ! नाम चाहे जैसा भी था पर नजारा अद्भुत था ! चांदी जैसी रेत वाले बीच से सागर का पानी तीन रंगों में दिखलाई पड़ रहा था, नीला-सफेद और हरा ! प्रकृति की अलौकिक लीला ! शांत, मुग्ध कर देने वाला सौंदर्य, साफ-सुथरा वातावरण, जैसे किसी दूसरे लोक में आ पहुंचे हों ! पर समय की सीमा कहीं भी अपना पीछा नहीं छोड़ती ! कार्यक्रम घडी की सूइयों से बंधे होते हैं ! वैसे भी राधानगर के विश्व-प्रसिद्ध सागर तट पर जाना ही था जहां सूर्यास्त का नजारा अपने आप में अजूबा कहलाता है !



स्थल पर आने-जाने के लिए बस का इंतजाम था ! उसने 15-20 मिनट में राधानगर पहुंचा दिया ! करीब दो किमी चौड़ा और पचास-साठ मीटर सामने का खुला-खुला चांदी सी की रेत वाला बीच ! अलबत्ता अब तक की देखी गई सब जगहों से ज्यादा गुलजार ! अब वो बीच ही क्या जो खुद के पानी में उतरने को मजबूर ना कर दे ! तो सारे भाई लोग जा समाए निर्मल-स्वच्छ जल के आगोश में ! पर समय कहां रुकता है ! सूरज अपने सफर के अंत तक जा पहुंचा ! सफेद-पीला रंग, भगवा-लाल होने लगा ! जैसे सागर से मिलने को आतुर सूर्य का तपते सोने जैसा रंग सागर के नीले रंग में घुलने लगा हो ! चारों ओर बासंती आभा छा गई ! तभी अचानक क्षितिज पर हलके बादलों के समूह ने डेरा डाल सूर्य को भले ही छुपा लिया पर नजारा अद्भुत था ! लोग चित्र-लिखित से खड़े कायनात के इस अप्रतिम सौंदर्य का रस-पान कर रहे थे !




अँधेरा छाते-छाते होटल लौटना हो गया ! रिफ्रेश हो फिर महफिल जमी, तंबोला की, श्रीमती निर्मल और श्रीमती सतविंदर जी की अगुआई में ! हल्के-फुल्के लम्हों के बीच रात्रि भोजन के पश्चात निद्रा देवी का पयाम आया, ''आ जाओ अब ! कल फिर निकलना है नील जजीरे की ओर !'' कहना कहां टाला जा सकता था ! यात्रा की थकान से बचने का इन्हीं का तो सबसे बड़ा आसरा था ! 

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