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गुरुवार, 20 जनवरी 2022

अंडमान का नील द्वीप यानी शहीद टापू

करीब दो सौ मीटर चलने के बाद हमारे बाईं तरफ वह पुल दिखने लगा ! प्रकृति की अद्भुत करामात थी ! एक चट्टान पर आर्क की तरह की दूसरी पत्थर की रचना पुल की आकृति बना रही थी ! पता नहीं कितने सालों से भूकंप और सागर की हवा के थपेड़े सहते, यूँ ही, समय रुपी काल से अपने अस्तित्व को बचाने के लिए संघर्ष किए जा रही है ! अद्भुत था सब कुछ ! गर्मी के साथ-साथ धूप भी बहुत तेज थी, सो कुछ देर ठहर, वापस हो लिए.....! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हैवलॉक के अद्भुत राधानगर बीच पर से ढलते सूर्य की अलौकिक छवि को अपने दिलो-दिमाग में समेटे हम होटल लौट तो आए थे पर उस ढलती शाम की यादें आँखों में कैद सी हो कर रह गई थीं ! अगले दिन उन्हीं के साथ ही अगले पड़ाव नील टापू, जो इस #RSCB (Retired and Senior Citizen Brotherhood) संस्था द्वारा आयोजित अंडमान यात्रा का अंतिम पड़ाव था, पर भी जाना था। नील द्वीप अपनी विभिन्न सब्जियों, साग-भाजी तथा वनस्पतियों के लिए प्रसिद्ध है ! इसे सब्जियों की खान भी कहा जा सकता है !

सुबह नाश्ते इत्यादि का कार्यक्रम निपटा जब नील द्वीप पहुंचे तो पूरी दोपहर हो चुकी थी ! नील द्वीप का नाम बदल कर अब शहीद टापू कर दिया गया है। पोर्टब्लेयर से कोई 35-40 किमी दूर यह 13.7 Sq. किमी का एक छोटा सा खूबसूरत टापू है ! एक बात जो बहुत सुखद और आश्चर्य भरी लगी कि हैवलॉक के सारे गांवों के नाम श्री कृष्ण जी के नामों पर है तो नील के तटों के नाम रामायण के किरदारों पर आधारित हैं, जैसे सीतापुर, भरतपुर व लक्ष्मणपुर ! नील द्वीप के प्रसिद्ध त्योहारों में से एक सुभाष मेला है, जिसका आयोजन दिसंबर के अंत और जनवरी महीने की शुरुआत में किया जाता है ! यह त्योहार नेताजी सुभाष चंद्र बोस की जयंती का प्रतीक है। इस अवसर पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन किया जाता है।




कोरल की सुरक्षा के कारण जेटी से किनारे तक करीब आधा किमी का पुल बना हुआ है ! इस पार आने पर स्थानीय गाइड की सलाह के अनुसार लगेज होटल भिजवा कर सभी जने लक्ष्मणपुर तट की पुल रूपी संरचना देखने के लिए अग्रसर हो लिए ! यह संरचना जिसे स्थानीय लोग हावड़ा पुल  भी कहते हैं, तट से चट्टानों और वृक्षों की ओट के कारण सीधे दिखाई नहीं पड़ती ! इसके लिए किनारे से और आगे सागर की ओर जाना पड़ता है ! दोपहर बाद सागर में ज्वार आ जाने पर फिर जाया नहीं जा सकता इसीलिए पहले यहां आना तय किया गया था ! तट पूरी तरह कोरल के अवशेषों से पटा पड़ा है ! यह मृत कोरल अवशेष बहुत कठोर और नुकीले होते हैं जिससे बहुत संभल कर चलना पड़ रहा था ! आगे जाने पर समुद्र की लहरें आ-आ कर पैरों से टकराने और स्वनिर्मित गढ्ढों को पानी से भरने लगीं ! उनके साथ ही कई छोटे-छोटे जीव और मछलियां भी किनारे पर आ अठखेलियां करते नजर आए ! 





करीब दो सौ मीटर चलने के बाद हमारे बाईं तरफ वह पुल दिखने लगा ! प्रकृति की अद्भुत करामात थी ! एक चट्टान पर आर्क की तरह की दूसरी पत्थर की रचना पुल की आकृति बना रही थी ! कुछ-कुछ ऐसा लगता था जैसे जुरासिक काल का कोई डायनासोर सागर का पानी पी रहा हो ! पता नहीं कितने सालों से भूकंप और सागर की हवा के थपेड़े सहते, यूँ ही समय से अपने अस्तित्व के लिए संघर्ष किए जा रही है ! अद्भुत था सब कुछ ! गर्मी के साथ-साथ धूप भी बहुत तेज थी, सो कुछ देर ठहर, उदर पूर्ति के लिए वापस हो लिए !



 


भोजनोपरांत कुछ विश्राम के पश्चात काफिला भरतपुर बीच के लिए रवाना हो गया ! यह काफी विस्तृत तट है ! यहाँ भी जल संबंधी खेलों की सारी सुविधाएं हैं ! जैसे स्कूबा डाइविंग, स्पीड बोट राइड, ग्लास बॉटम बोट राइड इत्यादि ! यदि कुछ नहीं करना चाहते हों तो आराम से किनारे बैठ सुन्दर हरे-नीले पानी को अठखेलयाँ करते देखने का अपूर्व सुख लीजिए ! तट पर ही खरीदारी के लिए समुद्र से प्राप्त वस्तुओं से बनी चीजों की दुकाने हैं ! यहां आए पर्यटकों को यह जानकारी अवश्य होनी चाहिए कि अंडमान के तटों पर सागर द्वारा उपलब्ध कोई भी वस्तु द्वीप से बाहर नहीं ले जाई जा सकती, जब तक उसकी रसीद ना हो ! स्थानीय लोगों को ज्यादा से ज्यादा रोजगार उपलब्ध करवाने के लिए सरकार द्वारा ऐसी व्यवस्था की गई है !





आज यात्रा का चौथा दिन था ! कल वापस पोर्टब्लेयर लौटना था ! यात्रा का समापन नजदीक होने के कारण मन कुछ खिन्न सा भी था !

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