जब एकांत में आपकी बेपनाह याद आती है ! जब आपसे एकतरफा बात करता हूँ ! तब लाख कोशिशों के बाद भी आँखें किसी भी तरह काबू में नहीं रहतीं
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 15 मई 2021
बाबूजी मैं आपसे बहुत प्यार करता था, पर.......
मंगलवार, 11 मई 2021
कण्वाश्रम, बाल भरत की क्रीड़ास्थली
चारों ओर सघन, सुनसान पर सुरम्य अरण्य से घिरे इस स्थल का मुख्य आकर्षण, सुन्दर चित्रों से सुसज्जित चार दीवारी से घिरा भरत स्मारक है जिसका निर्माण 1956 में हुआ बतलाते हैं। इस गोल इमारत के निचले हिस्से में भरत से संबंधित चित्रावली है ! ऊपर पहले खंड में देवताओं के वैद्य धन्वन्तरि जी की बहुत सुंदर प्रतिमा स्थापित है ! मूर्ति का चेहरा और आँखें इतनी सजीव हैं कि लगता है अभी सचल हो उठेंगी। उस के ऊपर कण्व ऋषि की प्रतिमा है पर वहां जाने का रास्ता नहीं है...............!
#हिन्दी-ब्लागिंग
ऋषि विश्वामित्र और अप्सरा मेनका की पुत्री शकुंतला की कथा का वर्णन महाभारत में भी आता है ! पर इसको अमर किया महाकवि कालिदास के संस्कृत नाटक अभिज्ञान शाकुंतलम ने ! इसकी कथा तो तक़रीबन सभी को ज्ञात ही है कि कैसे दुष्यंत-शकुंतला का गंधर्व विवाह हुआ, और कैसे शकुंतला को दुर्वासा ऋषि के श्राप के कारण कण्वाश्रम में ही रहना पड़ा था ! जहां उनके पुत्र भरत का जन्म हुआ ! भरत के बल के बारे में ऐसा माना जाता है कि वह बाल्यकाल में वन में सिंह जैसे हिंस्र जानवरों के बीच निर्भय-निडर हो उनके साथ खेला करते थे ! खेल ही खेल में अनेक जंगली जानवरों को पकड़कर उन्हें पेड़ों से बांध देते थे या फिर उनकी सवारी करने लगते थे। इसी कारण ऋषि कण्व के आश्रम के निवासियों ने उनका नाम सर्वदमन रख दिया था। जो आगे चल कर एक महान प्रतापी सम्राट बने ! उन्हीं के नाम पर हमारे देश का नाम भारत पड़ा।
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| यज्ञ स्थान |
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| विचार-विमर्श |
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| धन्वन्तरी जी की सजीव सी प्रतिमा |
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| ऊपर चढ़ने का घुमावदार पथ |
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| कार पार्किंग से भरत स्मारक जाने का मार्ग |
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| रॉकेट के बेस जैसा विचित्र पेड़ का तना |
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| ध्यान कक्ष |
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| भ्रमण पर आईं स्कूली बालिकाऐं |
रविवार, 9 मई 2021
गांव से माँ का आना
अधिकतर संतान द्वारा बूढ़े माँ-बाप की बेकद्री, अवहेलना, बेइज्जती इत्यादि को मुद्दा बना कर कथाएं गढ़ी जाती रही हैं ! होते होंगे ऐसे नाशुक्रे लोग ! पर कुछ ऐसे भी होते हैं जो आज की विषम परिस्थितियों में, जीविकोपार्जन की मजबूरियों के चलते चाह कर भी संयुक्त परिवार में नहीं रह सकते ! अलग रहने को मजबूर होते हैं ! ऐसी ही एक कल्पना है यह ! जहां ऐसा नहीं है कि अलग रहते हुए बेटा-बहू को मां की कमी नहीं खलती, उसका आना-जाना अच्छा नहीं लगता ! वे तो उन्हें बेहद प्यार करते हैं ! उन्हें सदा माँ के सानिध्य की जरूरत रहती है ! पर फिर भी वे चाहते हैं कि माँ इस शुष्क, नीरस, प्रदूषित वातावरण से जितनी जल्दी वापस चली जाए उतना ही अच्छा ! पर क्यूँ ...........?
(मातृदिवस पर एक पुरानी रचना का पुन: प्रकाशन)
गांव से माँ आई है। गर्मी पूरे यौवन पर है। गांव शहर में बहुत फर्क है। पर माँ को यह कहां मालुम है। माँ तो शहर आई है, अपने बेटे, बहू और पोते-पोतियों के पास, प्यार, ममता, स्नेह की गठरी बांधे। माँ को सभी बहुत चाहते हैं पर इस चाहत में भी चिंता छिपी है कि कहीं उन्हें किसी चीज से परेशानी ना हो। खाने-पीने-रहने की कोई कमी नहीं है, दोनों जगह न यहां, न वहां गांव में। पर जहां गांव में लाख कमियों के बावजूद पानी की कोई कमी नहीं है, वहीं शहर में पानी मिनटों के हिसाब से आता है और बूदों के हिसाब से खर्च किया जाता है ! यही बात दोनों जगहों की चिंता का वायस है। भेजते समय वहां गांव के बेटे-बहू को चिंता थी कि कैसे शहर में माँ तारतम्य बैठा पाएगी ! शहर में बेटा-बहू इसलिए परेशान कि यहां कैसे माँ बिना पानी-बिजली के रह पाएगी ! पर माँ तो आई है प्रेम लुटाने ! उसे नहीं मालुम शहर-गांव का भेद। शनिवार, 8 मई 2021
...........तो फिर कोरोना का कोई दोष नहीं है
गुरुवार, 6 मई 2021
समय निकाल कर सोचिएगा जरूर, यह आज भी सामयिक है
कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे !सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, छद्म इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा .............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारे देश पर सदियों से बाहरी आक्रांताओं द्वारा लूट-खसोट के लिए हमले होते रहे हैं। उनके आतंक का हमारे वीर, देशभक्त रणबांकुरों ने माकूल जवाब भी दिया है ! पर विडंबना यह भी रही कि वे सब विभिन्न कारणों से कभी भी एकजुट होकर दुश्मन को चुन्नौती नहीं दे पाए ! ऐसे एक-दो नहीं हजारों योद्धा हुए हैं जिनके नाम सुन कर ही दुश्मनों के पसीने छूट जाते थे। परन्तु विभिन्न षड्यंत्रों के तहत, देसी-विदेशी आकाओं द्वारा पोषित, हमारे छद्म, तथाकथित इतिहासकारों ने अपने आकाओं के झूठे-सच्चे किस्सों की खातिर उन वीरों को गुमनामी के कोहरे के पीछे धकेल कर रख दिया। परन्तु उनके शौर्य, जज्बे, देश के प्रति आत्मोसर्ग को जनमानस की यादों से कभी नहीं हटा पाए।
फिर भी कुछ नाम ऐसे हैं जो अपने बाहुबल, निर्भयता, शौर्य और देशप्रेम की खातिर इतिहास के पन्नों के मोहताज नहीं रहे ! सोचने की बात है कि वेतनभोगी, स्वामिभक्त, इतिहासकार रूपी चारण जब उनकी ख्याति को इतिहास के पन्नों में, तोड़-मरोड़ कर ही सही, जगह देने के लिए मजबूर हो गए तो असल में वे देशरत्न कितने महान होंगे ! सैंकड़ों ऐसे नाम हैं जिन्हें मुगलों, अंग्रेजों, वामियों के अतिरिक्त हमारे खुद के लोगों ने नीचा दिखाने के लिए तरह-तरह के प्रपंच रचे ! आज के माहौल में एक ऐसा ही नाम फिर याद आता है, जिसके दुश्मन को नेस्तनाबूद करने के हठ के चलते उसके खुद के सरदारों ने ही जहर दे कर मार डाला था ! राणा सांगा ! जी हाँ ! उस जैसा राणा ना कभी हुआ और अब तो क्या ही होगा !
कुछ समय बाद एक आँख, एक हाथ और एक पैर ना होने के बावजूद उस अप्रतिम योद्धा ने फिर बाबर से मुकाबला करने का निश्चय किया। पर इस बार उनके साथी सरदार इसके लिए राजी नहीं हुए। उन्हें जब लगा कि राणा बिना युद्ध किए नहीं मानेंगे तो उन सब ने षड्यंत्र कर राणा को जहर दे दिया........!
राणा संग्राम सिंह यानी राणा सांगा ! मेवाड़ की धरती जिन्हें जन्म दे कर धन्य हो गई। वे मेवाड़ के सबसे महान शासक थे। उनके राजकाल में मेवाड़ ने आशातीत सफलताएं, शक्ति, समृद्धि और ऊंचाइयां प्राप्त की थीं। उनका साम्राज्य उत्तर में सतलुज नदी से लेकर दक्षिण में नर्मदा तक और पूर्व में भरतपुर से लेकर पश्चिम में सिंधु तक फैला हुआ था। राणा सांगा पहले और अंतिम भारतीय शासक थे, जो तक़रीबन तमाम राजपूत राजाओं को अपने नेतृत्व में शामिल करने में सफल रहे थे ताकि विदेशी लुटेरों को देश के बाहर खदेड़ दिया जा सके ! उनका व्यक्तित्व, कृतित्व, शौर्य ही कुछ ऐसा था कि तमाम आपसी भेदभावों के बावजूद तमाम राजा उनके राजनितिक और सैन्य कौशल के कायल थे। उस समय उनके सामने था काबुल से आया एक आक्रांता, बाबर ! उसने भी अपने संस्मरण बाबरनामा में उन्हें उस समय का सबसे शक्तिशाली शासक बताया है।
आखिर वह दिन भी आ ही गया ! खानवा में बाबर की सेना के सामने राणा सांगा की सेना आ डटी, जो तक़रीबन अपने विपक्षी से दुगनी थी ! पर उनके पास ना हीं अच्छे घोड़े थे और ना हीं तोपें ! जबकि बाबर की असली ताकत थी उसका तोपखाना ! जिसका कोई जवाब राणा के पास नहीं था। पता नहीं इस ओर कोई ध्यान क्यों नहीं दिया गया था ! जबकि इसका उपयोग और शक्ति साल भर पहले ही पानीपत के मैदान में बाबर-लोधी युद्ध में सिद्ध हो चुकी थी। क्यों युद्ध में वर्षों से चले आ रहे पारंपरिक तरीके ही अपनाए गए ! क्यों नहीं दुनिया में अपनाई जा रही युद्ध नीतियों को अपनाने में रूचि दिखाई गई ! अस्त्रों-शस्त्रों के आधुनिकरण और उनमें आ रहे बदलावों पर ध्यान क्यों नहीं दिया गया ! सैनिकों को देश के लिए निछावर होना जरूर सिखाया गया पर ना उन्हें अच्छे घोड़े उपलब्ध करवाए गए और ना हीं उच्च-कोटि के हथियार !
शनिवार, 1 मई 2021
क्रिकेट और कोरोना
जिस तरह क्रिकेट में रन बनाने के लिए सबसे आवश्यक चुस्त शरीर और बेहतरीन बल्ला होना सबसे जरुरी है उसी तरह कोरोना से निपटने के लिए भी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता यानी इम्युनिटी और डॉक्टरी प्रोटोकॉल का पालन ही सबसे जरुरी है। आज मीडिया पर हर तीसरा इंसान अपने गले में दो सौ रूपए का स्टेथोस्कोप लटकाए डॉक्टर बन कोरोना का शर्तिया इलाज बताए जा रहा है ! ऐसी सुनी-सुनाई बातों, मीडिया पर धकेले जा रहे नुस्खों या गुगलिया ज्ञान द्वारा कुछ भी आजमा लेना और उस पर ज्यादा ध्यान देना, किसी को भी हार की कगार पर ले जा सकता है.........!
#हिन्दी_ब्लगिंग
अभी देश में क्रिकेट और कोरोना दोनों का दौर जारी है। कुछ लोग भले ही क्रिकेट को भी एक तरह की बिमारी ही मानते हों पर वैसे इसमें और कोरोना में दूर-दूर का कोई रिश्ता नहीं है ! पर कुछ ऐसी बातें हैं, जो कोरोना से बचाव में क्रिकेट के खेल से समझी या सीखी जा सकती हैं !
क्रिकेट में जीतने के लिए सबसे बड़ी अहमियत रन बनाने की होती है। उन्हीं के कमी-बेशी से हार-जीत निर्धारित की जाती है। रन बनाने के लिए जो दो चीजें सबसे जरुरी होती हैं उनमें पहला है चुस्त शरीर ! जो अपनी तेज निगाहें, दिमाग और बाकी शरीर के अवयवों के ताल-मेल, त्वरित निर्णय लेने की क्षमता से खेल को अपने पक्ष में करने में अहम् भूमिका निभाता है। दूसरा है बैट। विशेषज्ञ द्वारा अच्छी तरह तराशा गया हर मानक पर खरा उतरने वाला बेहतरीन मजबूत लकड़ी से बना बल्ला ! बस इन दोनों के अलावा और जो कुछ भी ताम-झाम होता है वह सब गौण है। फिर वह चाहे ग्लव्स हों ! पैड हों ! गार्ड हों ! हेल्मेट हो ! जूते हों या कुछ भी ! यह कोई मायने नहीं रखता कि आपने किस कंपनी के पैड, ग्लव्स या जूते पहने हैं ! उनकी लाइनिंग कैसी है ! उनकी पैडिंग नरम रबर की है या स्पंज की ! यह सब चीजें एक अतिरिक्त आत्मविश्वास जरूर देती हैं जो निश्चिन्त हो खेलने में सहायक होता है ! पर इनके बिना भी रन बनाए जा सकते हैं जो सिर्फ और सिर्फ बल्ले और शरीर के तालमेल से ही संभव है।
सोमवार, 26 अप्रैल 2021
ऑक्सीजन की अति भी खतरनाक हो सकती है
ऑक्सीजन यानी कि प्राण-वायु, जिसके बिना कुछ पल गुजारना भारी पड़ जाता है। पर यदि इसकी बहुलता हो जाए तो खतरा हो जाता है। वैज्ञानिक पाल बर्ट ने यह चेतावनी दी थी कि शुद्ध ऑक्सीजन में सांस लेना जानलेवा हो सकता है। ज्यादा खोज करने पर वैज्ञानिकों ने पाया कि हम ज्यादा से ज्यादा 24 घंटे तक शुद्ध आक्सीजन सहन कर सकते हैं, उसके बाद निमोनिया हो जाता है। इसके बाद ऑक्सीजन की अधिकता से उसका मानसिक संतुलन बिगडने लगता है। उसकी यादाश्त लुप्त हो जाती है। अगर यह दवाब और बढ़ जाए तो दौरे पड़ने शुरु हो जाते हैं..................!
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