रविवार, 10 जनवरी 2021

अरे ! बासी भात तो छुपा रुस्तम निकला

हमारे देश के कई भागों में चावल के उपयोग की प्राथमिकता पीढ़ियों से चली आ रही है। चूँकि हमारे यहां संयुक्त परिवार तथा मेहमानवाजी का चलन भी सदा से  रहा है, इसलिए कुछ अतिरिक्त चावल बनाना एक नियम सा बन गया था, जिससे किसी के देर से या अचानक आने पर उसे तुरंत भोजन करवाया जा सके। ऐसे में कुछ ना कुछ भोजन बच जाना स्वाभाविक ही था। उस समय में मितव्यतता के साथ-साथ अन्न का बहुत आदर होता था ! इसी के चलते इस खाद्य का आविष्कार हुआ

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अंग्रेजी राज में थौमस् बैबिंग्टन् मैकाॅलेऽ की असीम अनुकम्पा से हम सब इतने शिक्षित हो गए कि हमें अपना सारा अतीत, गौरव, संस्कृति, परम्पराएं दकियानूसी लगने लगीं। हमें अपने रहन-सहन, खान-पान, परंपराएं अपनाने में शर्म आने लगी ! अपने रीती-रिवाज पिछड़ेपैन की निशानी लगने लगे ! कभी खेती के तरीकों के लिए जो पश्चिम अपने को हमारा ऋणी मानता था, हम अब उसी के पदचिन्हों पर चलने की भूल कर बैठे ! हमें ध्यान ही नहीं रहा कि हर देश-प्रदेश का पहनना-ओढ़ना, भोजन इत्यादि वहां की आबो-हवा, मौसम और प्रकृति के अनुसार होता है ! पश्चिम की नक़ल की अंधी दौड़ में हमने कई जीवनोपयोगी रोजमर्रा की घर में उपयोग होने वाली वस्तुओं को नजरंदाज तो किया ही, अपने सेहतमंद, पौष्टिक खाद्यों को भी तब तक हेय नजर से देखते रहे जब तक पश्चिम से उस चीज की उपयोगिता, गुणवत्ता, लाभ, उपादेयता आदि पर मोहर लग कर ना आ जाए। इसी हीन भावना के कारण हमने अपनी कई दिव्य, अमूल्य ओषधियों, जड़ी-बूटियों, मसालों पर उन्हें पेटेंट करने का मौका दे दिया ! 

आज एक ऐसे ही खाद्य पदार्थ की चर्चा ! जिसको हमारे तथाकथित पढ़े-लिखे आधुनिक नगरनिवासी, गांव के गरीबों व मजबूर लोगों द्वारा मजबूरी और बेहाली में पेट भरने का  बासी  खाना कह, समझ कर हिकारत की दृष्टि से देखा करते थे। उसी तिरस्कृत खाद्य को अमेरिकन न्यूट्रीशियन एसोसिएशन (ANA) ने महिमांडित करते हुए उसके अनेकों फायदों को दुनिया के सामने उजागर किया है। हमारे देश के कई भागों में चावल के उपयोग की प्राथमिकता पीढ़ियों से चली आ रही है। चूँकि हमारे यहां संयुक्त परिवार तथा मेहमानवाजी का चलन भी सदा से  रहा है, इसलिए कुछ अतिरिक्त चावल बनाना एक नियम सा बन गया था, जिससे किसी के देर से या अचानक आने पर उसे तुरंत भोजन करवाया जा सके। ऐसे में कुछ ना कुछ भोजन बच जाना स्वाभाविक ही था। उस समय में मितव्यतता के साथ-साथ अन्न का बहुत आदर होता था ! इसी के चलते इस खाद्य का आविष्कार हुआ जिसे बंगाल में पांथा भात, ओडिसा में पखाल, छत्तीसगढ़ में भोर बासी, तमिलनाडु और दक्षिणी क्षेत्र में पयड़दु या तथा बिहार अंचल में  'पानी भात' कहा जाता है। देश के दक्षिणी, पूर्वी और कुछ उत्तरी भागों के अलावा इसे म्यांमार, नेपाल और बांग्ला देश जैसी जगहों में भी खाया जाता है।

यह शरीर को ऊर्जावान बनाता है ! थकान महसूस नहीं होने देता ! सुस्ती दूर करता है ! शरीर में लाभकारी बैक्टेरिया की बढ़त होती है ! शरीर की बढ़ी हुई गर्मी कम होती है ! पेट के लिए बहुत मुफीद है ! रक्तचाप को नियंत्रित करता है 

है क्या यह ! यह रात के बचे हुए चावल का दूसरे दिन बनाया गया एक व्यंजन है ! जिसके लिए कुछ ज्यादा उठा-पटक भी नहीं करनी पड़ती। सिर्फ रात के बचे भात को पानी में डुबो कर रख दिया जाता है ! रखने के लिए यदि मिटटी का बर्तन हो तो और भी बेहतर है, जिससे इसका स्वाद काफी बढ़ जाता है। रात भर पानी में रहने से यह किण्वित याने फर्मेन्टेड हो जाता है अर्थात इसमें खमीर की उत्पत्ति हो जाती है। सुबह इसका पानी निकाल चावल को दही, अचार, चटनी या सिर्फ नमक-मिर्च के साथ अपनी सुविधा और स्वादानुसार खाया जा सकता है। इस सुपाच्य और पौष्टिक खाद्य की तासीर ठंडी होती है इसलिए गर्मी और उमस के मौसम के लिए यह बहुत लाभकारी होता है। इसका निकला हुआ पानी भी काफी सुपाच्य होता है।

अमेरिकन न्यूट्रीशियन एसोसिएशन की रिपोर्ट के अनुसार यह शरीर को ऊर्जावान बनाता है ! थकान महसूस नहीं होने देता ! सुस्ती दूर करता है ! शरीर में लिए लाभकारी बैक्टेरिया की बढ़त होती है ! शरीर की बढ़ी हुई गर्मी कम होती है ! पेट के लिए बहुत मुफीद है ! चूँकि फायबर युक्त होता है, इसलिए कब्ज वगैरह से भी निजात दिलाता है ! रक्तचाप को नियंत्रित करता है ! टेंशन दूर करता है ! इसका विटामिन B12 का भंडार एलर्जी, त्वचा की बीमारियों और झुर्रियों वगैरह को दूर रखता है। 


योरोपियन तो इसके इतने भक्त हो गए हैं कि इसकी वहां बाकायदा ''मॉर्निंग राइस'' ब्रांड नाम से बिक्री होनी भी शुरू हो चुकी है। अब हमारे यहां भी इस पर और शोध के लिए प्रोजेक्ट बनने आरंम्भ हो चुके हैं। चलिए, देर आए दुरुस्त आए ! जागे तो सही ! अपनी धरोहरों की कीमत पहचानी तो सही ! यदि ऐसा एक कदम उठा है: तो आशा है भविष्य में हम अपने अनमोल पर हाशिए धकेल दिए गए अनुपम ज्ञान का फिर मानव कल्याण के लिए उपयोग कर सकेंगे। पर पहले हमें अपने अंदर गहरे तक पैठ चुकी हीन भावना और अपने ही प्रति सहेजी हुई नकारात्मकता को निकाल फेंक, अपने ऋषि - मुनियों द्वारा बताए - सुझाए गए आहारों, उनके गुणों और उनको अपनाने के कारणों को अपनी आगे की पीढ़ियों को समझाना पडेगा ! जिससे वे सिर्फ चलन के कारण कुछ भी खाने के पहले उसके गुण-दोषों को ठीक से समझ सकें और भोजन विकार से खुद को बचा सकें।   

आभार - अंतर्जाल तथा मैनेजमेंट फंडा    

बुधवार, 6 जनवरी 2021

मानव खुद को जहान का मालिक ना समझ, सिर्फ रखवाला ही माने तभी बेहतरी है

सृष्टि की  सृजन क्रिया में  जीवाणु से  लेकर मनुष्य  तक, तथा  एल्गी-कवक से  लेकर वृक्ष-वनस्पतियों तक करोड़ों  तरह के उत्पाद  अस्तित्व में आए। जिनके संरक्षण के लिए जल-थल -आकाश-अग्नि -वायु का सहयोग लिया गया। इन सब में संतुलन बनाए रखने के लिए एक सुसम्बद्ध चक्र का निर्माण किया गया।  जिसके  लिए  अपने आप में  महत्वपूर्ण  करोड़ों  जीव-जंतुओं की श्रृंखला बनी। जिनमें सिरमौर रहा, इंसान !

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कायनात ने इस धरा को खूबसूरत बनाने के लिए  कोई कोर-कसर नहीं छोड़ी। तरह-तरह के पशु-पक्षी, जीव-जंतु, पेड़-पौधे !  उनके  अनुसार हवा-पानी, खान-पान, रहन-सहन का पूरा इंतजाम !  हरेक अपने आप में  पूर्ण रूप से एक स्वतंत्र इकाई ! फिर भी सबकी अपनी  अहमियत,  खासियत  व  हैसियत ! सभी का इस वसुंधरा को सुरक्षित, खुशहाल, सुन्दर तथा पूर्ण बनाने में किसी ना किसी तरह का सहयोग। प्रकृति ने  मनुष्य, पशु, पक्षी, पौधे व पर्यावरण सब  को एक दूसरे का पूरक बनाया, जिससे संतुलन बना रहे। इस काम के लिए ईश्वर ने मनुष्य को सभी प्राणियों से  कुछ ज्यादा समझदार  बनाया और अपनी  बनाई हुई दुनिया की बागडोर उसके हाथों सौंप दी।  जिससे वह अपने ''साथियों'' की देख-भाल तो  कर ही सके, साथ ही उसकी बनाई इस अद्भुत कृति की भी ठीक तरह से सार-संभार हो सके।  

प्रकृति ने अपनी बगिया को सजाने के लिए तरह - तरह की  करोड़ों  नेमतों की रचना  की। विभिन्न  तरह के उत्पादों का सृजन किया। जिसके लिए छोटे से छोटे जीवाणु से लेकर मनुष्य, एल्गी-कवक से ले कर वृक्ष-वनस्पतियों तक अस्तित्व में आए। जिनके संरक्षण के लिए जल - थल - आकाश -अग्नि-वायु का सहयोग लिया गया। इन सब में संतुलन बनाए रखने के लिए एक ''सुसम्बद्ध चक्र'' का निर्माण किया गया। इसके लिए अपने आप में महत्वपूर्ण करोड़ों जीव-जंतुओं की श्रृंखला बनी: जिनमें सिरमौर रहा, इंसान !

इंसान कुदरत की बेहतरीन रचना तो है, पर संतुलन बनाए रखने के लिए, उसे दिमागी तौर पर तो सर्वश्रेष्ठ बनाया पर उतनी  शारीरिक क्षमता नहीं दी। समस्त चराचर  की जीवन प्रणाली देखी जाए तो  शायद ही कोई जीव अपने  सृजनकर्ताओं पर इतना  निर्भर होता है जितना कि इंसान !  जहां जन्म के कुछ  ही समय के बाद सब, अपने लिए ही सही, स्वछंद जिंदगी जीना आरंभ कर देते हैं ! वहीं  इसके उलट मानव को अपने पैरों पर खड़े होने, अपनी हिफाजत करने, सोचने - समझने लायक होने में वर्षों लग जाते हैं। परन्तु  इसीलिए वह एक पारिवारिक - सामाजिक जीव भी बन पाता है। जो  ता-उम्र अपनी  संतति की  चिंता में  अपने आप को डुबाए रखता है। पहले अपने बच्चों और फिर उनके बच्चों की परवरिश में अपने को उलझाए-उलझाए जीवन गुजार देता है। पर इन्हीं उलझावों से ही लगाव,  स्नेह जैसी भावनाएं ! प्रेम,  दया, करुणा,  ममता,  त्याग,  परोपकार, सहानुभूति,  जैसे सद्विचार भी पनप पाते हैं ! जो  मानव को उत्कृष्ट और सर्वोपरि बनाते हैं।  उसको दूसरों का सुख - दुःख समझने की  लियाकत देते हैं। उसे मनुष्य ही नहीं पशु-पक्षियों, पेड़-पौधे, पर्यावरण को बचाने की भी समझ प्रदान करते हैं। सिर्फ अपने लिए ही नहीं समस्त जगत के लिए जीने का हौसला देते हैं।

यह सही है  कि जहां  अच्छाई होती है, वहां कुछ ना कुछ बुराई  भी होती है ! पर साथ ही यह भी सच्चाई है कि दुनिया में अच्छाई  की बहुलता है और उसी के प्रयासों से  ही यह संसार भी कायम है ! हालांकि कुछ भ्रष्ट लोगों ने पृथ्वी पर उपलब्ध  जल,  अनाज,  पशु-पक्षी,  पेड़-पौधे व ऊर्जा  के स्त्रोतों पर अपना मालिकाना हक़ समझ, उनका असंतुलित  दोहन कर लिया। जिसका  खामियाजा दुनिया भर के लोगों को अपने जान-माल से करना पड़ा !  प्रकृति से नसीहत मिलते ही आदमी  को अपनी औकात समझ में आ गई और वह आखिरकार अपनी भूल सुधारने के लिए मजबूर भी हुआ ! 

अब तो यही आशा करनी चाहिए कि हाल में आन पड़ी जानलेवा, बेकाबू आपदाओं से  सबक सीख समस्त मानव जाति अपने आप  को ही जहान भर का मालिक ना समझ, सिर्फ रखवाला  ही मानेगी और अपने साथ-साथ पृथ्वी और पृथ्वीवासियों  के हक़ का सम्मान  कर उन्हें भी अपनी तरह से जीने और रहने का हक़ प्रदान करेगी ।     

शनिवार, 26 दिसंबर 2020

बॉक्सिंग डे, जिसका बॉक्सिंग के खेल से कोई लेना-देना नहीं है

बॉक्सिंग डे को मनाने का कोई बहुत ही कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो  इसे अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है.......................!

भारत ने अब तक 14 बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच खेले हैं और इनमें से दस में उसे हार का सामना करना पड़ा. उसने केवल एक मैच जीता है जबकि तीन अन्य ड्रॉ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में वह सात बॉक्सिंग डे टेस्ट का हिस्सा रहा और इनमें से पांच मैचों में उसे हार झेलनी पड़ी. जबकि दो मैच का कोई रिजल्‍ट नहीं निकला.
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बॉक्सिंग डे, यानी अवकाश दिवस ! इसका बॉक्सिंग के खेल से दूर-दूर का भी संबंध नहीं है। इसे एक धर्मनिरपेक्ष उत्सव कहा जा सकता है। जो 26 दिसम्बर को मनाया जाता है। पर इस दिन कई देशों में तरह-तरह के खेलों की शुरुआत होने और मिलते-जुलते नाम की वजह से ऐसा लगता है कि शायद बॉक्सिंग के खेल से इसका नाता हो। जबकी ऐसा नहीं है ! ब्रिटेन और उसके शासित देशों में इसकी परंपरा रही है। जो अब अन्य जगहों पर भी फ़ैल गयी है।  पहले इस दिन क्रिसमस के दूसरे दिन  जरूरतमंदों, बेसहारा सर्वहारा लोगों के लिए आवश्यक वस्तुओं को डिब्बे में बंद कर चर्चों के सामने रख देने की परंपरा थी। जिससे किसी को किसी के सामने शर्मिंदगी का एहसास ना हो। पर समय के साथ-साथ अब उस परंपरा के साथ-साथ इसने खरीदारी के उत्सव का रूप ले लिया है। इस दिन लोग जम कर सामान खरीदते हैं इसलिए दुकानदार भी लुभावने प्रस्ताव पेश करने में पीछे नहीं रहते। एक तरह से यह दिन  शॉपिंग डे में तब्दील हो गया है।  

तक़रीबन रोमन काल से चली आ रही इस परिपाटी के बारे में कुछ ज्यादा स्पष्ट नहीं है, पर इस दिन हर जगह ग़रीबों, जरूरतमंदों को धन या अन्य दान दे कर उनकी सहायता करने का चलन रहा है। इस दिन चर्चों के बाहर जीवनोपयोगी आवश्यक वस्तुओं को डिब्बों में बंद कर उन्हें जरुरतमंद-बेसहारा लोगों के लिए रख दिए जाता था। इन्हीं के साथ वहीं कुछ खाली बॉक्स भी सेंट स्टीफेन की दावत के नाम पर कुछ रकम इकट्ठी करने के लिए रख दिए जाते थे। इन्हीं बॉक्सों या डिब्बों के लेन-देन के कारण इस दिन को बॉक्सिंग डे के नाम से जाना जाने लगा है। 

इसको मनाने का कोई बहुत ही अनिवार्य या कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो बॉक्सिंग दिवस अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है।
इस दिन कई खेलों के शुरू होने का चलन रहा है। उसी में क्रिकेट भी शामिल है। इस बार भी हम आस्ट्रेलिया के दौरे पर हैं और बॉक्सिंग डे पर ही, एक मैच से पीछे चल रही हमारी टीम को दूसरा टेस्ट मैच खेलना है। हमारा इस दिन खेले गए मैचों का रेकॉर्ड बहुत ही "गरीब" रहा है !  हमने अब तक इस दिन आस्ट्रेलिया के साथ आठ, द. अफ्रीका के खिलाफ पांच और न्यूजीलैंड के साथ एक मैच खेला है। जिसमें दो में ही जीत मिल पाई हैं ! नौ में हार तथा तीन बेनतीजा रहे हैं। इस बार अपने देश के क्रिकेट प्रेमी यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। 
आमीन !!

मंगलवार, 22 दिसंबर 2020

अपनी भाषा को पहले हमें ही सम्मान देना है

विश्व में केवल संस्कृत ही ऐसी भाषा है जिसमें सिर्फ  "एक अक्षर, दो अक्षर या केवल तीन ही अक्षरों" से पूरा वाक्य बनाया जा सकता है। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। यानी किसी वस्तु की संज्ञा या नाम क्यों पड़ा यह विस्तार से बताती है। जैसे इस विश्व का नाम संसार इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है ! पर विडंबना है कि ऐसी सरल और समृद्ध भाषा को अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लडनी पड़ रही है.............!!

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भाषा अभिव्यक्ति का वह सर्वाधिक विश्वसनीय माध्यम या जरिया है, जिसके द्वारा हम आपस में अपने मनोभावों को, विचारों को व्यक्त करते हैं, एक-दूसरे से जुड़ पाते हैं। यह हमारे समाज के निर्माण, विकास, अस्मिता, सामाजिक व सांस्कृतिक पहचान का भी महत्वपूर्ण साधन है। इसके लिये हमारी वाचिक ध्वनियां सहायक होती हैं, जो शब्दों और वाक्यों का समूह बन एक-दूसरे को अपने मन की बात बताती-समझाती हैं। इसके बिना मनुष्य व समाज सर्वथा अपूर्ण हैं !  

हमारे शोषण के साथ-साथ हमारी धरोहरों, हमारी संस्कृति, हमारे शिक्षण संस्थानों, हमारे इतिहास के अलावा हमारी प्राचीनतम व समृद्धतम भाषा को, भी कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई 

जाहिर है समय, परिवेश, स्थितियों के अनुसार अलग-अलग स्थानों पर विभिन्न तरह की भाषाओं का उद्भव हुआ। मानव के उत्थान के साथ-साथ उसका आरंभिक ''नाद'' विकास करते हुए संपन्न भाषाओं में बदलता चला गया। इस समय सारे संसार में हजारों (अनुमानत: 6809) प्रकार की भाषाएँ, वर्षों से अपनी-अपनी जरुरत के अनुसार बोली जाती रही हैं। इनमें से कई तो हजारों-हजार साल से अपना अस्तित्व बनाए रखे हुए हैं। बहुतेरे देशों ने सिर्फ अपनी भाषा का उपयोग करते हुए भी ज्ञान-विज्ञान, पठन-पाठन में असाधारण प्रगति की है। उन्हें अपनी वाक्संपदा पर नाज है। थोड़ी-बहुत कमी-त्रुटि तो हर चीज में होती ही है, पर इसका मतलब यह नहीं कि दूसरी बोलियां हेय हैं, दोयम हैं ! 

हमारे देश पर सैंकड़ों सालों तक गैरों ने राज किया ! सालों-साल गुलाम रहने का असर हमारे दिलो-दिमाग पर भी पड़ना ही था ! हम अपना सुनहरा अतीत बिसारते चले गए ! हमें शासक और उनके कारिंदों की बातों में ही सच्चाई नजर आने लगी ! इस कुचक्र में कुछ हमारे अपने मतलबपरस्त लोगों का भी योगदान रहा है ! हमार शोषण के साथ-साथ हमारी धरोहरों, हमारी संस्कृति, हमारे शिक्षण संस्थानों, हमारे इतिहास के अलावा हमारी उस प्राचीनतम व समृद्धतम भाषा को, जिसमें हजारों साल पहले हमारे ऋषि-मुनियों ने ज्ञान-विज्ञान तथा जीवन के सार को लिपिबद्ध कर दिया था, उसे भी कमतर आंकने में कोई कसर नहीं छोड़ी गई !

हम शुरू से ही सहिष्णु रहे हैं। हमने दुनिया को ही अपना परिवार माना है ! हर अच्छी चीज का स्वागत किया है। दूसरे धर्मों, संस्कृतियों, मान्यताओं को भी अपने में सहर्ष समो लिया है। हमारे इसी विवेक, सहनशीलता, सामंजस्य को कमजोरी मान लिया गया ! अच्छाइयों के साथ बुराइयां भी थोपी जाने लगीं। सबसे ज्यादा नुक्सान अंग्रेजी हुकूमत के दौरान हुआ, जब उन्होंने अंग्रेजी को कुछ ऐसा आभामंडित कर दिया जैसे वह विश्व की सर्वोपरि भाषा हो ! उसके बिना कोई भी उपलब्धि हासिल ना की जा सकती हो ! देश में उसे रोजगार हासिल करने का मुख्य जरिया बना दिया गया। वर्षों-वर्ष यह गलतफहमी पलती रही ! पर फिर समय आ ही गया जब उन्हें बताना जरुरी हो गया कि समृद्ध भाषा कैसी होती है !

उदाहरण स्वरूप अंग्रेज़ी वर्णमाला में कुल 26 अक्षर होते हैं। जिन्हें दर्शाने के लिए एक बहुत प्रसिद्ध वाक्य गढ़ उसमें वर्णमाला के सभी अक्षर समाहित किए गए हैं "THE QUICK BROWN FOX JUMPS OVER A LAZY DOG" पर वाक्य को पूरा करने के लिए O को चार बार और  A, E, U तथा R को दो-दो बार सम्मिलित करना पड़ा है। इस तरह इस वाक्य में 33 अक्षरों का प्रयोग किया गया है। इसके अलावा इस वाक्य में अक्षरों का क्रम भी सही नहीं है। जहां वाक्य T से शुरु होता है वहीं G से खत्म हो रहा है। भले ही ''टाइप'' करने की सुविधा के लिए ऐसा किया गया हो !

अब संस्कृत का उदहारण लें, 

क:खगीघाङ्चिच्छौजाझाञ्ज्ञोSटौठीडढण:। तथोदधीन पफर्बाभीर्मयोSरिल्वाशिषां सह।। 

जिसका अर्थ है कि, पक्षियों का प्रेम, शुद्ध बुद्धि का, दूसरे का बल अपहरण करने में पारंगत, शत्रु-संहारकों में अग्रणी, मन से निश्चल तथा निडर और महासागर का सर्जन करने वाला कौन ? राजा मय ! जिसको शत्रुओं के भी आशीर्वाद मिले हैं।

इस श्लोक में संस्कृत वर्णमाला के सभी 33 व्यंजन तो हैं ही वे भी पूरे क्रमानुसार। यह खूबसूरती संस्कृत जैसी समृद्ध भाषा को छोड़ अन्यत्र कहीं नहीं मिल सकती ! 

संस्कृत में श्लोक सुनिए, मंत्र सुनिए, भजन सुनिए ! इसके उच्चारणों में वह शक्ति है जो किसी को भी मंत्रमुग्ध कर सकती है ! एकाकार कर सकती है ! सम्मोहित कर किसी और लोक में पहुंचा सकती है। यही अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें केवल "एक अक्षर" से ही पूरा वाक्य लिखा जा सकता है। महाकवि भारवि ने अपने काव्य संग्रह किरातार्जुनीयम् में केवल “न” व्यंजन का प्रयोग कर अद्भुत श्लोक की रचना की है जो थोड़े में ही बहुत कह जाती है -

 न नोननुन्नो नुन्नोनो नाना नानानना ननु। नुन्नोऽनुन्नो ननुन्नेनो नानेना नुन्ननुन्ननुत्॥

यानी, जो मनुष्य युद्ध में अपने से दुर्बल मनुष्य के हाथों घायल हुआ है वह सच्चा मनुष्य नहीं है। ऐसे ही अपने से दुर्बल को घायल करता है वो भी मनुष्य नहीं है। घायल मनुष्य का स्वामी यदि घायल न हुआ हो तो ऐसे मनुष्य को घायल नहीं कहते और घायल मनुष्य को घायल करें वो भी मनुष्य नहीं है। 

दाददो दुद्द्दुद्दादि दादादो दुददीददोः। दुद्दादं दददे दुद्दे ददादददोऽददः॥ 

अर्थात, दान देने वाले, खलों को उपताप देने वाले, शुद्धि देने वाले, दुष्ट्मर्दक भुजाओं वाले, दानी तथा अदानी दोनों को दान देने वाले, राक्षसों का खंडन करने वाले ने, शत्रु के विरुद्ध शस्त्र को उठाया।

इसक अलावा सिर्फ दो और तीन अक्षरों से पूरा वाक्य बनाना सिर्फ संस्कृत भाषा में ही संभव है -

कवि माघ ने शिशुपालवधम् महाकाव्य में केवल “भ” और “र ” दो ही अक्षरों से एक श्लोक की रचना कर डाली -

भूरिभिर्भारिभिर्भीराभूभारैरभिरेभिरे। भेरीरे भिभिरभ्राभैरभीरुभिरिभैरिभा:।।

अर्थात, निर्भय हाथी जो कि भूमि पर भार स्वरूप लगता है, अपने वजन के चलते, जिसकी आवाज नगाड़े की तरह है और जो काले बादलों सा है, वह दूसरे दुश्मन हाथी पर आक्रमण कर रहा है।

देवानां नन्दनो देवो नोदनो वेदनिंदिनां। दिवं दुदाव नादेन दाने दानवनंदिनः।।

अर्थात - वह परमात्मा जो दूसरे देवों को सुख प्रदान करता है और जो वेदों को नहीं मानते उनको कष्ट प्रदान करता है। वह स्वर्ग को उस ध्वनि नाद से भर देता है, जिस तरह के नाद से उसने दानव को मारा था। 

ऐसे सैंकड़ों उदहारण मिल जाएंगें जो निर्विवाद रूप से संस्कृत को विश्व की सर्वश्रेष्ठ, व्याकरणिक, तर्कसंगत, वैज्ञानिक, त्रुटिहीन भाषा सिद्ध कर सकते हों। इसीलिए जब संस्कृत को सर्वोपरि कहा जाता है तो उसके पीछे इस तरह के अद्भुत साक्ष्य होते हैं। यह विश्व की अकेली ऐसी भाषा है, जिसमें "अभिधान-सार्थकता" मिलती है। यानी किसी वस्तु की संज्ञा या नाम क्यों पड़ा यह विस्तार से बताती है। जैसे इस विश्व का नाम संसार इसलिये है क्यूँकि वह चलता रहता है, परिवर्तित होता रहता है ! पर विडंबना है कि ऐसी सरल और समृद्ध भाषा को अपने ही देश में अपने ही लोगों में अपने अस्तित्व की लड़ाई लडनी पड़ रही है !

@संदर्भ - अंतरजाल 

शुक्रवार, 18 दिसंबर 2020

एक मंदिर, जिसके सामने से गुजरते वक्त ट्रेनों की गति धीमी हो जाती है :-

यह शायद देश का एकमात्र मंदिर है, जिसमें हनुमान जी की प्रतिमा के बाएं बाजू पर श्री सिद्धि विनायक गणेशजी भी विराजित हैं। एक ही प्रतिमा में दोनों देवताओं के होने से ये अनूठी प्रतिमा अत्यंत शुभ, पवित्र, कल्याणकारी और फलदायी मानी जाती है............!

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मानव के होश संभालने के साथ-साथ ही ईश्वर की कल्पना भी अस्तित्व में आ गई थी। हालांकि उसके निराकार होने की मान्यता भी है। फिर भी उसकी शक्ति का एहसास किया जाता रहा है ! ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जो उसके अस्तित्व को महसूस कराते रहते हैं। हमारा देश तो भरा पड़ा है ऐसे अलौकिक, आश्चर्यजनक, हैरतंगेज चमत्कारों से ! 
ऐसी ही एक जगह है मध्य प्रदेश के भोपाल-रतलाम रेल मार्ग पर शाजापुर जिले का बोलाई गांव। कभी इस जगह बारह टोले हुआ करते थे। फिर समय के साथ सबने साथ रहना शुरू किया तो यह गांव बना बोलाई। यहीं स्थित है, तक़रीबन 600 साल पुराना एक हनुमान जी का मंदिर। जिसे सिद्धवीर खेड़ापति हनुमान मंदिर के नाम से जाना जाता है। यह शायद देश का एकमात्र मंदिर है, जिसमें हनुमान जी की प्रतिमा के बाएं बाजू पर श्री सिद्धि विनायक गणेशजी भी विराजित हैं। एक ही प्रतिमा में दोनों देवताओं के होने से ये अनूठी प्रतिमा अत्यंत शुभ, पवित्र, कल्याणकारी और फलदायी मानी जाती है। 
वैसे तो इस मंदिर से कई चमत्कारों का संबंध है। पर इसका सबसे बड़ा चमत्कार यह है कि इस मंदिर के सामने से जब भी कोई भी ट्रेन गुजरने को होती है, तो उसके पहले ही उसकी गति अपने आप कम हो जाती है। गाडी के चालक को कुछ ऐसा एहसास होता है जैसे कि कोई उसे ट्रेन की स्पीड कम करने के लिए कह रहा हो। यदि कोई ड्राइवर इसे नजरअंदाज करता है तो अपने आप ही ट्रेन की स्पीड कम हो जाती है। कुछ समय पहले इसी जगह के पास रेल लाइन पर दो मालगाडियां आपस में टकरा गईं थीं। बाद में दोनों गाड़ियों के चालकों ने बताया था कि उन्हें घटना के कुछ देर पहले विचित्र सा अहसास हुआ था, मानो कोई ट्रेन की रफ्तार कम करने के लिए कह रहा हो। पर उन्होंने इसे मन का वहम मान कर गति धीमी नहीं की औऱ इसी कारण आमने-सामने की टक्कर हो गई थी। पर आश्चर्य की बात यह थी कि भीषण हादसे के बाद भी कोई हताहत नहीं हुआ था।
मंदिर से जुडी मान्यता है कि मंदिर में विराजित हनुमान जी अपने भक्तों को उनके भविष्य में होने वाली कुछ घटनाओं का पूर्वाभास करवा देते हैं, जिससे वह सचेत रह सके ! अनगिनत लोगों को इसका आभास हुआ है इसीलिए इस मंदिर के प्रति लोगों की आस्था दिन प्रति दिन बढ़ती ही जा रही है। इसी के साथ यह धारणा भी है कि यहां आने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी होती हैं इसीलिए हर मंगल, शनि और बुधवार को दूर-दूर से आए श्रद्धालुओं का तांता लगा रहता है जो यहां आ कर अपनी मनोकामना पूर्ती के लिए अपने आराध्य की पूजा-अर्चना करते हैं।   

शुक्रवार, 11 दिसंबर 2020

ट्रेन के डिब्बों का रंग फिर लाल होने लगा है

इस चतुर इंसान ने मौका ताड़ा और रेलवे के वरिष्ठ अधिकारियों से बात की और फिर हो गया, डिब्बों का रंग नीला। उनका तर्क था की लाल रंग क्रोध, उत्तेजना व आवेश का रंग है, इसी कारण रेल एक्सीडेंट होते हैं ! नीला रंग शांति का प्रतीक है इसलिए दुर्घटनाओं का ख़तरा बिल्कुल कम हो जाएगा ! दुर्घटनाएं कितनी कम हुईं ये तो सबने देखा पर करोड़ों अरबों के खेल का खेल पर्दे के पीछे हो गया.................!!

#हिन्दी_ब्लागिंग    

भारत में रेल का परिचय अंग्रेजों द्वारा सन 1853 में बहुत ही मामूली शुरूआत से हुआ जब बंबई से थाणे तक की 34 किमी की दूरी तय कर इतिहास बनाया था ! हालांकि उसके पहले 1837 में मद्रास में लाल पहाड़ियों से चिंताद्रीपेत पुल तक तथा 1851 में रुड़की में सोलानी नदी पर एक एक्वाडक्ट के लिए निर्माण सामग्री पहुंचाई गई थी पर वह सिर्फ माल ढोने के लिए किया गया था। शायद अंग्रेजों को लाल रंग बहुत पसंद था सो रेल गाड़ियों के डिब्बे भी लाल रंग के ही होते थे। वर्षों-वर्ष यही रंग चलता भी रहा !

शुरू के डेढ़-दो दशकों को छोड़ दें जिसने भी रेल की कमान संभाली उसने इससे कुछ ना कुछ फायदा जरूर उठाया ! पर यह एक दुधारू गाय है, यह पहचान दो चतुर लोग ही कर पाए ! ऐसे ही एक दूरंदेशी, महत्वाकांक्षी, पारखी को जब इसकी बागडोर संभालने का सुअवसर मिला, उस समय केंद्र में सरकार भी लुंज-पुंज सी ही थी ! इस चतुर इंसान ने मौका ताड़ा और वरिष्ठ अधिकारियों से बात की और फिर हो गया, डिब्बों का रंग नीला। उनका तर्क था की लाल रंग रोष, आक्रमकता तथा उत्तेजना का रंग है, इसी कारण रेल एक्सीडेंट होते हैं ! नीला रंग शांति का प्रतीक है इसलिए दुर्घटनाओं का ख़तरा बिल्कुल कम हो जाएगा ! दुर्घटनाएं कितनी कम हुईं ये तो सबने देखा पर करोड़ों अरबों के खेल का खेल पर्दे के पीछे हो गया। 

                                  
आज फिर से रेल के लाल डिब्बे नजर आने लगे हैं, पर ये नीले से लाल नहीं किए जाते बल्कि इनका मूल रंग ही मुख्यता लाल रखा गया है। नई तकनीकी के उच्च गुणवत्ता के इन लाल और सिल्वर रंग के कोच को एलएचबी (Link Hoffman Bush) कहा जाता है। जो एल्युमिनियम तथा स्टेलनेस स्टील से एंटी टेलीस्कोपिक सिस्टम के द्वारा बने होने के कारण भार में हल्के होते हैं और इनको 160 किलोमीटर से 200 किलोमीटर/घंटा पर दौड़ाया जा सकता है। ये आसानी से पटरी से नहीं उतरते ! बड़े झटके भी आसानी से झेल लेते है। जिसकी वजह से एक्सीडेंट बहुत ही कम हो जाते हैं। इनको रिपेयर की जरुरत भी काफी देर के बाद पड़ती है।  इनमें डिस्क ब्रेक लगाये जाते हैं, जिससे इन्हें जल्दी रोका जा सकता है। इसके अलावा इसमें ज्यादा यात्रियों के लिए सीटें होती हैं। 

                                       
नीले इंग के डिब्बों का निर्माण इंटीग्रल कोच फैक्ट्री में किया जाता है। ये लोहे के बनते हैं इसलिए कुछ भारी होते हैं। इनकी गति भी 70 से 140 तक ही होती है। सबसे खतरनाक बात यह है कि घटना के दौरान इनके डिब्बे एक दूसरे पर चढ़ जाते हैं। यात्रियों के लिए सीटें भी लाल वाले से कम होती हैं। इसके रख-रखाव को भी जल्दी-जसल्दय करना पड़ता है। 



वैसे कुछ गाड़ियों में हरे, मिले-जुले पीले रंग या कुछ और रंगों में भी होते हैं पर मुख्यता नीले और लाल रंग के डिब्बे ही ज्यादातर उपयोग में आते हैं।  

मंगलवार, 8 दिसंबर 2020

किसान कानून के सकारात्मक परिणाम से कुछेक का अस्तित्व ही न मिट जाए

किसान की जिंदगी का हाल उजागर करती 1953 में फिल्म आई ''दो बीघा जमीन !'' उसके बाद भी हमारे देश के ''सुखी-खुशहाल, चिंता-फ़िक्र से मुक्त, उल्लास से नाचते-गाते किसानों'' पर, मदर इंडिया, हीरा-मोती, उपकार, कड़वी हवा, लगान, पीपली लाइव, किसान जैसी अनेक फ़िल्में आईं। पर समय एक सा कहां रहता है ! फिर आ गया 2014 का साल..............!

#हिन्दी_ब्लागिंग  

कहते हैं फ़िल्में समाज का आईना होती हैं ! जो कुछ भी समाज में घट रहा होता है उसे ही पर्दे पर साकार कर दिया जाता है। जागरूक फिल्मकार सदा ही बिना किसी फायदे-नुक्सान-आलोचना-दवाब की परवाह किए बगैर अवाम की ज्वलंत समस्याओं को सामने लाते रहे हैं। स्वतंत्रता मिलने के कुछ ही साल बाद, आजादी का खुमार उतरने पर फिल्मकारों का ध्यान देश-समाज की धुरी रहे किसान पर भी गया ! उसकी जिंदगी का हाल उजागर करती 1953 में फिल्म आई ''दो बीघा जमीन !'' उसके बाद भी हमारे देश के ''सुखी-खुशहाल, चिंता-फ़िक्र से मुक्त, उल्लास से नाचते-गाते किसानों'' पर, मदर इंडिया, हीरा-मोती, उपकार, कड़वी हवा, लगान, पीपली लाइव, किसान जैसी अनेक फ़िल्में बनाई गईं। पर समय एक सा कहां रहता है ! फिर आ गया 2014 का साल ! बस फिर क्या था ! तभी से किसान की जिंदगी दूभर हो गई ! फसल की कीमत ना मिलने पर उसे नष्ट किया जाने लगा ! भूखों मरने की नौबत आ गई ! कइयों ने  तंग आ कर आत्महत्या कर ली। बिचौलिए हावी हो गए ! आढ़तिए उनका हक़ मारने लगे ! 

सच तो यह है कि देश के सबसे कमजोर, गरीब, कोमल तबके के सदस्य किसान की बदहाली शुरू से ही जस की तस रही है ! सदा उसका शोषण हुआ है ! आजादी के दशकों बाद भी हालत बहुत ज्यादा सुधार हुआ नहीं लगता। ऐसे में यदि बेहतरी की सोच के साथ एक कदम उठा है तो उसका स्वागत होना चाहिए ना कि उसके डगमगाने के डर से, बिना पूरा परिणाम जाने उसे उठने ही नहीं दिया जाए ! जब वर्षों वर्ष बदहाली में गुजरे हैं तो क्यों नहीं एक नई पहल का स्वागत किया जाए। विरोध का कारण साफ़ है वे बिचौलिए-आढ़तिए जो भोले-भाले किसानों की सरलता और अनभिज्ञता का सदियों से फायदा उठाते आए हैं उन्हें अपना विनाश नजर आने लगा है। 

यदि आप सचमुच लोगों का भला चाहते हो तो प्रयोग होने दो। सफल रहा तो किसान खुश, देश खुशहाल ! नहीं तो फिर आप तो हैं ही छीछालेदर करने को ! पर कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको इस कानून का सही परिणाम दिखने लगा हो और अपना अस्तित्व मिटते....

वैसे देर से ही सही आम इंसान भी एक बात समझने लगा है कि देश की सबसे पुरानी राजनितिक पार्टी जिसके नेताओं ने आजादी की लड़ाई में आगे आ कर हिस्सा लिया ! अपने समय की सबसे लोकप्रय पार्टी रही ! एक से बढ़ कर एक नेताओं ने उसके झंडे तले रह कर देश की सेवा की ! आज वह सिर्फ मतलब और मौका परस्त लोगों का जमावड़ा बन कर रह गई है ! जो सिर्फ उसके नाम और इतिहास का सहारा लिए किसी तरह अपने अस्तित्व को बचाए रखने की जुगाड़ में हैं। अवाम भी उसकी नकारात्मक सोच, कड़वी भाषा, सिर्फ विरोध के लिए विरोध वाली शैली से तंग आ चुका है ! किसी को समझ नहीं आता कि उन्हें हर चीज से ''एलर्जी'' क्यों है ! चाहे वह नोटबंदी हो, जीएसटी हो, सर्जिकल स्ट्राइक हो, राफ़ेल का सौदा हो,  राम मंदिर का मुद्दा हो, 370 हो, कोरोना हो, उसकी दवाई हो, अर्थ व्यवस्था हो चाहे यह किसान कानून ! हर जगह उन्हें सिर्फ बुराई ही नजर आती है ! मजे की बात यह भी है कि हर बार उन्हें अपनी बात का गलत होने पर शर्मिंदगी भी उठानी पड़ी है, पर सुधार कभी और कहीं से आता नहीं दिखता ! 

उनके प्रवक्ता तो एक से एक महान लोग हैं जो बिना किसी शर्म-लिहाज के भद्द पिटने के बावजूद झूठ को सच बनाने में लगे रहते हैं ! अभी टीवी पर एक महोदय दावा कर रहे थे कि जब भाजपा दो से तीन सौ के पार जा सकती है तो उनके तो अभी सौ लोग हैं, अगले चुनाव में देखिएगा ! पता नहीं इनका अगला अपना पिछड़ा क्यों नहीं देखता ! पर वे यह आकलन करना भूल गए कि दो से तीन शतक तक पहुँचाने की उपलब्धि पनपते हुए हुई है और वे पतझड़ की ओर उन्मुख हैं वह भी ऐसे पेड़ के जिसकी जड़ों में घुन लग चुका है ! 

जब हर जगह बदलाव की बयार बह रही है तो यहां भी उसे आजमाने में क्या बुराई है ! जबकि पुरानी व्यवस्था का परिणाम सामने है ! यदि आप सचमुच लोगों का भला चाहते हो तो प्रयोग होने दो। सफल रहा तो किसान खुश, देश खुशहाल ! नहीं तो फिर आप तो हैं ही छीछालेदर करने को ! और तब तो आपकी भी पौ बारह होगी ! पर कहीं ऐसा तो नहीं कि आपको इस कानून का सही परिणाम दिखने लगा हो और अपना अस्तित्व मिटते........लगता तो यही है !!

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