pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 24 मार्च 2020

केरल का पेरियार, जहां कायनात अपने अछूते रूप के साथ विराजमान है

इलायची, लौंग, दालचीनी, जावित्री, जायफल इत्यादि को पहली बार अपने उद्गम स्थलों पर विभिन्न रूपों में देख आश्चर्य से सबकी आँखें और मुंह कुछ देर के लिए तो मानो खुले के खुले रह गए। उत्पादन केंद्र की दूकान पर मंहगी होने के बावजूद मसालों की खूब खरीदारी हुई...!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
दिल्ली के ''RSCB'' के तत्वाधान में 29 फरवरी से सात मार्च तक की केरल यात्रा के दौरान चौथे दिन, अलेप्पी से करीब 140 की.मी. की दुरी पर स्थित थेकाड्डी, जिसे पेरियार के नाम से भी जाना जाता है, जाना तय था। वैसे थेकाड्डी कस्बे का नाम है और पेरियार वह जगह है जहां वन्य जीव अभयारण्य स्थित है। तमिलनाडु की सीमा से लगती, दक्षिणी-पश्चिमी घाट की कार्डामम और पेंडलाम नामक पहाड़ियों, घने वनों और सुंदर झीलों से घिरी यह जगह अपने खूबसूरत वन-विहार के लिए जगत्प्रसिद्ध है। प्रसिद्ध राजनेता इरोड वेंकट नायकर रामासामी, जिन्हें सम्मान के साथ पेरियार यानी सम्मानित व्यक्ति कहा जाता था, के नाम पर इस जगह का नामकरण किया गया है।   
पेरियार झील 
चार मार्च की सुबह नाश्ता-पानी निपटा अपनी बस ''रानी'' में हमनें अपनी सीटें संभाल लीं। प्रत्येक सदस्य पिछले तीन दिनों के ''हेक्टिक शड्यूल'' के बावजूद खुद को बिल्कुल तारो-ताजा महसूस कर रहा था। हो सकता है इसका कारण यहां की साफ़ आबो-हवा और चिंता-तनाव मुक्त वातावरण का भी असर हो ! यात्रा की परंपरा के अनुसार हमारे कप्तान श्री नरूला जी ने तीन बार गायत्री पाठ किया ! फिर माइक प्रेमी खेमानी जी ने जगह संभाली और फिर वही भजनों, गानों, चुटकुलों का वह लंबा दौर शुरू हो गया, जिसमें अन्नू जी, खन्ना जी, श्रीमती और श्री मेहरा जी, श्रीमती और श्री बेदी जी के साथ-साथ कदम जी और मैंने भी पूरे जोशोखरोश के साथ भाग लिया ! पर सबसे ज्यादा समां बांधा नीरू जी ने जिनका गायन, वाद्य संगीत के साथ एक अलग ही अंदाज के साथ सामने आता रहा। कहते हैं ना कि खरबूजे को देख खरबूजा रंग बदलता है, तो तीन दिन से अलग चुप से रहे सिद्दार्थ और जीनु को भी जोश आ गया और वे भी इस महफ़िल का हिस्सा बनने से अपने को नहीं रोक पाए।


सबसे युवा और कर्मठ सदस्य, नरूला जी 




पेरियार के रास्ते में ही वनौषधि उत्पादन केंद्र पर रुक कर पहली बार उन मसालों, जिनका उपयोग रोज ही हमारी रसोई में होता है, के पौधों, लताओं और वृक्षों को देखने का सुयोग मिला। इलायची, लौंग, दालचीनी, जावित्री, जायफल इत्यादि को पहली बार अपने उद्गम स्थलों पर विभिन्न रूपों में देख आश्चर्य से सबकी आँखें और मुंह कुछ देर के लिए तो मानो खुले के खुले रह गए। उत्पादन केंद्र की दूकान पर मंहगी होने के बावजूद खूब खरीदारी हुई। करीब घंटे-डेढ़ के बाद ही आगे चलना संभव हो पाया।   
इलायची 



लौंग 
काली मिर्च 

चीकू 

वनीला, दुनिया की दूसरी सबसे मंहगी उपज 


दालचीनी 

अच्छे-खासे नियमानुसार चलते प्रोग्राम में एक छोटा सा व्यवधान तब महसूस हुआ जब पेरियार पहुंच कर यह पता चला कि जीप सफारी बंद है और वन-विहार नहीं हो सकेगा ! अब कर भी क्या सकते थे, सो जो उपलब्ध था उसी सरकारी बस में पेरियार झील तक गए। 


पोज़ ऐसे भी दिए जाते हैं 

सब कुछ बंद होने के बावजूद वहां प्रकृति अपने मनोहारी अनुपम रूप साक्षात उपस्थित थी। यादगार के लिए फोटो वगैरह ली गयीं और सर्वसम्मति से वापस होटल आने का प्रस्ताव पास हो गया। पिछली थकान उतारने का एक मौका या कहिए बहाना मिल गया था।
थेकाड्डी में भी एक रात का ही स्टे था। दूसरे दिन मनोहारी मुन्नार हमारा इंतजार कर रहा था ! जिसकी हरी-भरी चाय की वादियों में दो दिन का समय गुजरना था, जो कम तो था पर कार्यक्रम के समय की पाबंदी भी तो थी !  

शनिवार, 21 मार्च 2020

जान लेवा संकट के समय तो मतभेद भुला, एकजुट हों

हमारे यहां के लोग इस वायरस के प्रकोप से बचने के बजाए उसका और उससे सावधान करने वालों का मजाक उड़ाने को ही अपनी बुद्धिमत्ता समझते हैं ! खुदा ना खास्ता यदि उस समय  ऐसे विरोध करने, मजाक उड़ाने, सावधानी के लिए अपनाए जाने वाले कदमों को नकारने वाले, बहके हुए लोगों के परिवार का कोई सदस्य इस महामारी की चपेट में आ जाता है तो इनकी सारी अक्लमंदी, अपने आकाओं के प्रति वफादारी, कुंठित मानसिक प्रवृत्ति सब धरी की धरी रह जाएंगी

#हिन्दी_ब्लागिंग
विपदा दरवाजे पर दस्तक दे रही है और कुछ बेअक़्ल उसे वाद्य संगीत समझ रहे हैं, मजाक उड़ा रहे हैं, घोर पूर्वाग्रहों से ग्रसित ऐसे लोग, उनके ही भले के लिए प्रसारित हिदायतों में मीन-मेख निकाल रहे हैं ! कोरोना से भी खतरनाक ऐसे लोग खुद तो मौत को दावत दे ही रहे हैं बाकियों के लिए भी घोर विपत्ति का वायस बन रहे हैं ! 

एक समय था जब देश-समाज पर आन पड़ी मुसीबत के समय सारा अवाम, अपना धर्म, जाति, भाषा सब दरकिनार कर एकजुट हो जाता था ! चाहे 1962 हो, 65 हो या 71 हर बार देश गवाह रहा कि उस पर विपदा आते ही पक्ष-विपक्ष, नेता-अभिनेता, मंत्री-संत्री सब अपना स्वार्थ, मतभेद, राग-द्वेष भूल उसके हित के लिए कंधे से कंधा मिला कर खड़े हो जाते थे ! ऐसा एक बार नहीं कई बार हुआ, जब पूर्व से पश्चिम, उत्तर से दक्षिण सिर्फ भारत नजर आता था। आज ना वैसे नेता रहे ना हीं वैसा माहौल ! 

आज लगभग पूरे विश्व से रोज ही दिल दहला देने वाली ख़बरें आ रही हैं ! खासकर चीन और इटली, जहां हालात बेकाबू हो चुके हैं ! हज़ारों-हजार शवों को बिना शिनाख्त किए कहीं भी दफनाया जा रहा है ! शवों को कंधा देने के लिए कोई नहीं मिल रहा है ! लाश में तब्दील हो चुके ऐसे लोग मौत से पहले भी अकेले थे बाद में तो होना ही था ! वह भी लावारिस रूप में ! आज ही अखबार में था कि हम इटली जैसी स्थिति से एक माह और अमेरिका से सिर्फ 15 दिन दूर हैं। यह भी गौरतलब है कि इटली, अमेरिका, जर्मनी, स्पेन जैसे देशों में शुरूआती लापरवाही बहुत भारी पड़ी थी, जहां अब यह आशंका हो गयी है कि यदि जल्दी ही हालत काबू में नहीं आए तो अमेरिका में 22 तथा ब्रिटेन में 5 लाख लोगों की मौत हो सकती है ! जबकि ये देश प्रगति में हमसे कई गुना आगे हैं। फिर भी हमारी तैयारी की प्रशंसा के बदले कुंठित आत्मश्लाघि विद्वान निंदा और मजाक बनाने से बाज नहीं आ रहे ! यह हंसी-ठिठोली उस बात से बिलकुल अलग है जो हमारे ग्रंथों में विपदा का सामना निर्भीक और हंसते हुए करने को कही गयी है। यहां सिर्फ और सिर्फ व्यक्तिगत द्वेष नजर आ रहा है। ऐसे मूढ़मति और उनके तथाकथित नेता अपनी ओछी मानसिकता और स्वार्थ के तहत अभी भी समय की भयावकता को समझ नहीं पा रहे हैं, या यूं कहिए समझना ही नहीं चाहते ! जबकि भारत तथा राज्यों की सरकारें और उनके स्वास्थ्य महकमें धीरे-धीरे स्कूल, कॉलेज, रेल, मॉल, धर्मस्थल और भीड़-भाड़ वाली जगहों को बंद करते जा रहे हैं। 

आज हमारी सरकार भविष्य के खतरे को देखते हुए जो एहतियाद बरत रही है उससे हम अभी इलाज के मामले में कई देशों से आगे हैं। इस स्थिति को बरकरार रखते हुए लोगों को पूरी तरह रोग और चिंता मुक्त करने के लिए जरुरी है कि हम बताई, सुझाई जा रही सावधानियों पर पूरी गंभीरता से अमल करें। लोगों को भी समझाएं, जागरूक बनाएं ! सुरक्षित रहने के तरीकों का सपरिवार पालन करें ! उसे किसी भी तरह हलके में ना लें !  क्योंकि लापरवाही से यदि इसके ''तीसरे स्टेज'' की स्थिति आ गयी तो उन विषम परिस्थियों को संभालना बहुत मुश्किल हो जाएगा ! क्योंकि हमारे यहां के लोग इस वायरस के प्रकोप से बचने के बजाए उसका और उससे सावधान करने वालों का मजाक उड़ाने को ही अपनी बुद्धिमत्ता समझते हैं ! खुदा ना खास्ता यदि उस समय  ऐसे विरोध करने, मजाक उड़ाने, सावधानी के लिए अपनाए जाने वाले कदमों को नकारने वाले, बहके हुए लोगों के परिवार का कोई सदस्य इस महामारी की चपेट में आ जाता है तो इनकी सारी अक्लमंदी, अपने आकाओं के प्रति वफादारी, कुंठित मानसिक प्रवृत्ति सब धरी की धरी रह जाएंगी और इन्हें भी बदहवास हो उन्हीं सरकारी अस्पतालों की ओर दौड़ना पडेगा जिनका आज ये मजाक बना रहे हैं ! अभी भी समय है निर्देशों का कड़ाई से पालन करें, सावधान रहें, खुद भी सुरक्षित रहें दूसरों को भी रहने दें।    

बुधवार, 18 मार्च 2020

प्रभु कभी अपने बच्चों को नहीं बिसारते

आज  कोरोना की भयावकता को देख युद्ध स्तर पर इसके खिलाफ मुहीम छेड़ी जा चुकी है ! जिसके तहत कई मंदिरों को बंद कर दिया गया है तो कुछ में अत्यधिक सावधानी बरती जा रही है। इस पर कुछ अति बुद्धिमान तथा आत्मश्लाघी विद्वान भगवान का मजाक उड़ाने से भी बाज नहीं आ रहे ! इसी पर एक पुरानी कहानी याद आ गयी...............! 

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देश के एक हिस्से में बरसात के दिनों में तूफ़ान आ जाने से हाहाकार मचा हुआ था ! सैलाब ने हर ओर तबाही मचा दी थी ! बड़े-बड़े घर जमींदोज हो गए थे ! धन-जन की बेहिसाब क्षति हुई थी। इंसान-पशु-मवेशी सब बाढ़ की चपेट में आ जान गंवा रहे थे। ऐसे में भगवान में गहरी आस्था रखने वाला एक आदमी किसी तरह खुद को बचाते हुए एक पेड़ पर बैठा प्रभु से खुद को बचाने की गुहार लगा रहा था। उसे पूरा विश्वास था कि भगवान् उसकी रक्षा जरूर करेंगे। तभी उधर से एक नाव गुजरी और उसे देख उन्होंने पुकार कर कहा कि नौका में आ जाओ ! पर उसने जवाब दिया कि आप जाओ, मुझे मेरे भगवान बचा लेंगे। उसे ना आता देख नाव आगे बढ़ ली। कुछ देर बाद वहां से लोगों को पानी से बचा सुरक्षित जगह तक ले जाता हुआ एक स्टीमर गुजरा, उसमें बैठे कर्मियों के उसे बुलाने पर उसने उनको भी वही जवाब दिया, कि उसे उसके प्रभु बचा लेंगे ! उसको समझाने का कोई असर ना होते देख वे भी आगे चले गए। इधर शाम घिरने लगी थी, ऐसे में कुछ देर बाद उधर से सेना के जवान अपनी मोटर बोट से निकले और इसे देख बोले कि इधर के सभी लोगों को बचा लिया गया है, यह अंतिम प्रयास है ! तुम ही बचे हो आ जाओ ! पर इस भोले भक्त ने फिर वही राग अलाप कर ईश्वर की दुहाई दी ! लाख समझाने पर भी उसके ना मानने और अपने राहत कार्य में विलंब होता देख वे लोग भी आगे बढ़ गए।

रात घिर आई, पानी का वेग बढ़ गया और वह पेड़ जिसका सहारा उस आदमी ने लिया था उखड कर पानी में जा गिरा ! दिन भर के भूखे-प्यासे, थके-हारे उस आदमी की पानी से संघर्ष ना कर पाने से मौत हो गयी। मरणोपरांत जब वह ऊपर भगवान के सामने हाजिर हुआ तो गुस्से से भरा हुआ था ! उसने चिल्ला कर शिकायत की कि मैं तुम्हारा भक्त, मुसीबत में पड़ा, गहरी आस्था से तुम्हें पुकार रहा था ! मुझे पूरा विश्वास था कि तुम मुझे बचा लोगे ! पर तुमने तो मेरी एक ना सुनी और मुझे मार ही डाला, ऐसा क्यों ?
प्रभु बोले, अरे मुर्ख ! मैंने तो तेरी हर पल सहायता करनी चाही ! पहले एक नाव भेजी, तूने उसे नकार दिया ! फिर मैंने स्टीमर भेजा, तू उसमें भी नहीं चढ़ा ! फिर मैंने सेना के जवानों को तुझे बचाने भेजा, पर तू कूढ़मगज तब भी नहीं माना ! तो क्या मैं खुद गरुड़ पर सवार हो तुझे बचाने आता ? चल जा अपने लेखे-जोखे का हिसाब होने तक अपने अगले जन्म का इंतजार कर !

मंगलवार, 17 मार्च 2020

पूरब का वेनिस. केरल का अलेप्पी नगर।

बैक वाटर नौका विहार के दौरान लैगूनों पर रहने वालों को अपने काम-काज में रत देखा। उनके मुख्य स्थल पर आने-जाने के लिए शहरों की बस सेवा की तरह वहां छोटे-बड़े स्टीमरों की फेरी की सेवा उपलब्ध है, पर तक़रीबन हर घर के सामने हैसियत के अनुसार छोटी-बड़ी-सामान्य-सुंदर-मोटर चालित हर तरह की नौकाएं बंधी दिखाई पड़ती हैं। जैसी मैदानी इलाकों में स्कूटर,बाइक या कारें खड़ी रहती हैं...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग 
केरल का एक छोटा सा नगर अलेप्पी, जिसे अलाप्पुझा के नाम से भी जाना जाता है। यह त्रिवेंद्रम से तक़रीबन डेढ़ सौ की.मी. की दुरी पर समुद्र के किनारे स्थित है। इसका मुख्य आकर्षण हरे-भरे वृक्षों, पौधों, गुल्मों, लताओं, जिनमें नारियल के पेड़ों की प्रमुखता होती है, के किनारे ठहरे हुए पानी में धीमी गति से नौका विहार है। जिसका एक अलग ही रोमांच है। यह केरल के बैक वॉटर पर्यटन का सबसे लोकप्रिय केंद्र है। 
केरल की सबसे पुरानी परंपराओं में से एक विश्व प्रसिद्ध सालाना "स्नेक बोट रेस" का आयोजन यहीं किया जाता है। ''नेहरू ट्रॉफ़ी बोट रेस'', जिसे स्थानीय भाषा में वल्लमकली कहलाने वाला यह एक भव्य आयोजन है, जिसे अगस्त और सितंबर माह के बीच आयोजित किया जाता है। ये नौका दौड़ आमतौर पर फसल के मौसम के दौरान आयोजित की जाती है। 


धान के खेत में खड़ा रेस्त्रां 
गदा नुमा वातानुकूलन 
इसमें कई नाविक एक साथ सम्मोहित करने वाले समन्वय के साथ पूरे वेग से कतारबद्ध होकर लगभग 100 फिट लंबी नौकाओं का संचालन करते हैं।पुन्नमडाकायल झील पर बड़ी तादाद में देश -विदेश के लोग एकत्रित हो इस अनोखी रेस का आनंद उठाते हैं। 1952 से शुरू हुआ यह रोमांचकारी खेल आज भी उतने ही जोशो-खरोश से खेला और देखा जाता है।
होटल 



लैगून पर बसे घर 
हमारा जाना तो मार्च में हुआ था सो हमने बैक वॉटर में क्रूज और नौका के मिले-जुले रूप तथाकथित हाउसबोट में सवार हो करीब डेढ़ घंटे तक मंथर गति से घूमते हुए प्रकृति के इस अनोखे रूप का आस्वादन किया। इसी सफर के दौरान लैगूनों पर रहने वालों को अपने काम-काज में रत देखा। उनके मुख्य स्थल पर आने-जाने के लिए शहरों की बस सेवा की तरह वहां छोटे-बड़े स्टीमरों की फेरी की सेवा उपलब्ध है पर तक़रीबन हर घर के सामने हैसियत के अनुसार छोटी-बड़ी-सामान्य-सुंदर-मोटर चालित हर तरह की नौकाएं बंधी दिखाई पड़ती हैं। जैसी मैदानी इलाकों में स्कूटर,बाइक या कारें खड़ी रहती हैं। अभी तो स्वच्छ हवा-पानी और प्रकृति की गोद में उनका रहन-सहन बहुत लुभावना और मनभावक लग रहा था पर हम में से कोई भी उस समय की कल्पना नहीं कर सकता था जब यही कायनात बरसात के मौसम में अपना रौद्र रूप धारण कर कहर बरपाने लगती है !  


घर का वाहन 
त्रिवेंद्रम से पिछले दिन की कन्याकुमारी की यात्रा की तरह ही सुबह जल्द निकलना हुआ। यात्रा की शुरुआत गायत्री मंत्र की तीन आवृतियों और कुछेक भजनों के बाद गानों का तथा अंतराक्षरी का जो दौर शुरू हुआ वह तीन घंटे के बाद दोपहर के भोजन की आवश्यकता को देखते हुए ही थमा। हमारे लिए अलेप्पी में तीन बजे नौका, जिसे द्वितलीय बजरा कहना ज्यादा मुनासिब होगा, इंतजार कर रहा था। आज की रात अलेप्पी में ही बितानी तय थी सो होटल में ''चेक इन'' कर कुछ दूर खड़े बजरे पर सवार हो गए। हालांकि नौका विहार का मौका विभिन्न शहरों में कई बार मिल चुका है पर यहां यही कहा जा सकता है कि यह अनुभव अद्भुत था। 


सूर्यास्त होने वाला था ! 6.45 पर क्षितिज पर सूर्य और सागर के मिलन के उस अलौकिक, दर्शनीय व अद्भुत प्राकृतिक लम्हे को अपनी आँखों और कैमरों में कैद करने के  करने के लिए हर कोई बेचैन था ! सो पहुंच गए अलेप्पी ''सी बीच'', उस अस्मरणीय पल का गवाह बनने।



विदाई 
ग्रहाधिराज की भाव-भीनी विदाई हुई ! मस्ती की गई ! चाय वगैरह छकी गई और लौटना हुआ होटल ! अभी आठ भी नहीं बजे थे तो सिद्दार्थ ने रात्रिभोज के पहले एक राउंड ''म्यूजिकल चेयर'' का प्रपोजल रखा जो सहर्ष स्वीकार हुआ। फिर डिनर और निद्रा का आह्वान ! 
कल फिर पेरियार जो जाना था ! 

शनिवार, 14 मार्च 2020

कन्याकुमारी, तीन-तीन सागर जिसके पांव पखारते हैं

यहां के तीन दर्शनीय स्थानों में पहले मंडपम में देवी कन्याकुमारी के पैरों की छाप पत्थर पर उकेरी हुई है ! दूसरा मुख्य भवन जिसके अंदर चार फुट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्वामी विवेकानंद की बेहद खूबसूरत कांसे की बनी मूर्ति स्थित है, जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव नजर आता है तथा तीसरा ध्यान कक्ष जिसकी दिवार पर ''ॐ'' की आकृति बनी हुई है और शांत नीम अँधेरे में लगातार ''ओउम'' की ध्वनि उच्चारित होती रहती है..........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
कन्याकुमारी, भारत के सुदूर दक्षिणी छोर पर स्थित तमिलनाडु प्रांत का एक शहर, जो हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर के अनोखे त्रिवेणी संगम स्थल पर स्थित है, तथा जिसके सैंकड़ों मील  के संतरण के बाद जाकर ही दक्षिणी ध्रुव का स्थल मिल पाता है। भारत के पर्यटक स्थल के रूप में भी इस स्थान का अपना ही महत्च है। दूर-दूर फैले समुद्र की विशाल लहरों के बीच यहां का सूर्योदय और सूर्यास्त का नजारा एक अलौकिक दृश्य प्रदान करता है। 
देश का अंतिम छोर
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झरोखे से 
स्टीमर का इंतजार, जेटी पर बने कक्ष में 
स्टीमर में चढने के पहले, समूहचित्र 

स्वंय ! पीछे दूर कन्याकुमारी तट 
त्रिवेंद्रम से कन्याकुमारी की करीब सौ की.मी. की दूरी पार करने में करीब साढ़े तीन-चार घंटे लग ही जाते हैं। इसलिए अपनी यात्रा के दूसरे दिन सुबह नाश्ता वगैरह निपटा आठ बजे ग्रुप के सभी 31(29+2) सदस्यों ने बस में अपनी-अपनी सीट संभाल ली। दस्तूरानुसार हमारे ''सबसे युवा कप्तान 78 वर्षीय नरूला जी'' ने गायत्री मंत्र का पाठ कर यात्रा का शुभारंभ किया। समय अफरात था पर गाने, अंतराक्षरी तथा चुटकुलों में कब बीत गया पता ही नहीं चला ! यह भी एक अविस्मरणीय समय था।






साज-संभार 
कन्याकुमारी से करीब 500 मीटर की दूरी पर स्थित विवेकानंद स्मारक से कुछ ही दूरी पर एक दूसरी चट्टान पर तमिल भाषा के विख्यात संत कवि और दार्शनिक तिरुवल्लुवर की 133 फुट ऊँची प्रतिमा भी  बनी हुई है, जो उनकी विख्यात कृति तिरुक्कुरल के 133 अध्यायों को ध्यान में रख बनाई गयी है।  उस दिन कन्याकुमारी से विवेकानंद स्मारक तक 50/- में जाने-आने के किराए साथ दो स्टीमर ही कार्यरत थे, ऊपर से रविवार का दिन, तो भीड़ कुछ ज्यादा ही थी। फिर भी पौने घंटे में नंबर आ ही गया। लाइफ जैकेट पहने सागर की उत्ताल लहरों पर डोलते सभी की निगाहें शनैः - शनैः पास आती शिला पर टिकी हुई थीं। 
अंतरजाल के सौजन्य से 
ध्यानकक्ष 


स्मारक दर्शन की फीस 20/- अदा कर वहां देखने के तीन स्थान हैं, पहला मंडपम जिसमें देवी कन्याकुमारी के पैरों की छाप पत्थर पर उकेरी हुई है ! दूसरा मुख्य भवन जिसके अंदर चार फुट ऊंचे प्लेटफॉर्म पर स्वामी विवेकानंद की बेहद खूबसूरत कांसे की बनी मूर्ति स्थित है, जिसकी ऊंचाई साढ़े आठ फुट है. इसमें स्वामी जी का व्यक्तित्व एकदम सजीव नजर आता है तथा तीसरा ध्यान कक्ष जिसकी दिवार पर हरे रंग के प्रकाशमान ''ॐ'' की आकृति बनी हुई है और जहां शांत, नीम अंधेरे में लगातार ''ओउम'' की ध्वनि उच्चारित होती रहती है। यहां बैठने पर असीम शांति की एक दिव्य अनुभूति का एहसास होता है, जिसका शब्दों में वर्णन करना असंभव है। इसके अलावा स्वामी जी से संबंधित साहित्य, शिला के बारे में परिचय देने के लिए एक कक्ष, वर्षा जल को संग्रहित करने के लिए बने कुंड तथा प्रसाधन गृह तो हैं ही पर पूरी शिला से प्रकृति का जो अवर्चनीय, अलौकिक सौंदर्य दिख पड़ता है वह तो वर्णनातीत है।  
वर्षा जल का संग्रहण 
वार्तालाप 
यहां से वापस जाने की तनिक भी इच्छा ना होने पर भी जाना तो था ही ! लौटते समय ''हाई टाइड'' का समय हो गया था, इस वजह से समुंद्र की बेचैनी भी बढ़ गयी थी। स्टीमर को लौटने में भारी मशक्कत का सामना करना पड़  रहा था। लहरें उछाल मारती हुईं स्टीमर के अंदर तक आ रहीं थीं। ऐसी ही एक लहार ने किनारे बैठीं श्रीमती जी को आपादमस्तक भिगो डाला। किनारे पहुंच कर वहां से कुछ ही दूर उस स्थानपर गए जो हिंद महासागर, बंगाल की खाड़ी और अरब सागर का अनोखा और प्राकृतिक मिलन स्थल है !  
विश्राम 
इस पवित्र व अनूठे स्थान को ''त्रिवेणी संगम'' के नाम से जाना जाता है। पर इसकी हालत और बिखरी गंदगी को देख मन कुछ उचाट सा हो गया। पता नहीं कब हम अपनी धार्मिक, ऐतिहासिक, प्राकृतिक धरोहरों, विरासतों, स्थानों की अहमियत व खासियत समझेंगें। कब व्यवसायिक दोहन के दुष्परिणामों को समझ पाएंगे ! कब !!  
त्रिवेणी संगम 




रात की चादर ओढ़े कोवलम बीच 
समय की कमी को देखते हुए वापस त्रिवेंद्रम जाना ही तय पाया गया, जहां रुकते-चलते पहुंचते-पहुंचते साढ़े सात बज ही गए थे। फिर भी एक बार अंधेरे में ही सही ''कोवलम बीच'' के भी दर्शन कर करीब साढ़े आठ के लगभग वापस होटल पहुंच लिए।   
@तीसरे दिन - अलैप्पी का पिछला पानी, बैक वॉटर    

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...