pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 12 मार्च 2020

केरल यात्रा का पहला पड़ाव, त्रिवेंद्रम ! पहला दिन

जब हम पद्मनाभ मंदिर की ओर उन्मुख हुए, उस समय पांच बजा चाहते थे ! मंदिर पहुंच, वस्त्र बदल, लंबी लाइनों में लग करीब डेढ़ घंटे बाद गर्भ-गृह तक पहुंचे ! पर एक तो घिरते अन्धकार और दूसरे अंदर सिर्फ दीए के प्रकाश के कारण प्रतिमा के होने का आभास ही पाया जा सका। वहां से निकलते-निकलते रात के आठ बज गए थे ! थकान पूरी तरह सबको अपनी गिरफ्त में ले चुकी थी और दूसरी सुबह फिर कन्याकुमारी के लिए एक लंबी यात्रा करनी थी, तो जल्द उठना लाजिमी था............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

RSCB के सौजन्य से केरल यात्रा, 29 फ़रवरी से सात मार्च, का सुयोग प्राप्त हुआ। जिसमें त्रिवेंद्रम, कन्याकुमारी, अलेप्पी, थेकाड्डी, मुन्नार और कोचीन जैसे पड़ाव शामिल थे। मेरे सपत्नीक शामिल होने का सबसे बड़ा आकर्षण थे, पद्मनाभ मंदिर और कन्याकुमारी, जहां जाने का सपना वर्षों से दिलो-दिमाग में कुलबुलाता रहता था पर संयोग नहीं बन पा रहा था। यह अवसर मन चाही मुराद पूरी होने जैसा था।

रिया ट्रेवेल्स, जिनके प्रतिनिधि श्री सिद्दार्थ जो सारी यात्रा के दौरान हमारे साथ बने रहे, द्वारा तयशुदा कार्यक्रम के तहत इंदिरा गांधी टर्मिनल 3 से ''विस्तारा'' की सुविधा लेने के लिए सुबह पांच बजे अपनी उपस्थिति दर्ज करवा दी। वहां अपने औसत 66 साल के, बीस महिलाओं और नौ पुरुषों के ग्रुप को देख एक सुखद अनुभव यह हुआ कि सभी सदस्य चुस्त-दुरुस्त नजर आ रहे थे ! उम्र का प्रभाव सिरे से नदारद था। जबकि हफ्ते भर पहले हुई यात्रा की ब्रीफिंग की मीटिंग में इसका ठीक उलट था।

करीब सवा तीन घंटे की उड़ान के बाद हम सब को त्रिवेंद्रम पोर्ट से वॉल्वो बस, जो पूरी यात्रा के दौरान हमारी सहयात्री रही, द्वारा होटल मौर्या राजधानी पहुंचाया गया। जहां से तारो-ताजा होने के पश्चात शहर दर्शनार्थ निकलना हुआ। क्योंकि मंदिर के खुलने-बंद होने के कई विभिन्न समय थे इसलिए उसके दर्शनों का समय संध्या उपरांत रखा गया। सो सबसे पहले सब करीब तीन की.मी. की परिधि में फैले चिड़ियाघर गए। फिर कुछ लोगों ने साथ ही लगे म्यूजियम को देखा। तकरीबन रात भर जगने, फिर हवाई सफर और इतना घूमने के बाद थकान हावी होने लगी थी फिर भी चाय वगैरह ले पद्मनाभ मंदिर की ओर उन्मुख हो गए, उस समय पांच बजा चाहते थे  
  








पद्मनाभ मंदिर विष्णु जी का वही विश्व प्रसिद्ध मंदिर है जो अपने तहखानों में संग्रहित विशाल, अमोल और अकूत खजाने के कारण सदा चर्चा में रहा है। इसके प्रवेश के अपने नियम कानून हैं जिनके तहत महिलाओं को साड़ी और पुरुषों को सिर्फ धोती पहन कर ही मंदिर में प्रवेश की इजाजत मिलती है, जो वहां की दुकानों पर सर्व सुलभ हैं। पर इसके साथ ही सर ढकने की भी मनाही है, जिसके कारण हमारे दो सिक्ख साथी श्री गिल और श्री बेदी चाहते हुए भी अंदर नहीं जा सके। 
पद्मनाभ स्वामी मंदिर 


  मेहरा जी, नरूला जी तथा मुकुंदी जी 



खैर वस्त्र बदल, लंबी लाइनों में लग करीब डेढ़ घंटे बाद मंदिर के गर्भ-गृह तक पहुंचे ! पर एक तो घिरते अन्धकार और दूसरे अंदर सिर्फ दीए के प्रकाश के कारण प्रतिमा के होने का आभास ही पाया जा सका। वहां से निकलते-निकलते रात के आठ बज गए थे ! थकान पूरी तरह सबको अपनी गिरफ्त में ले चुकी थी और दूसरी सुबह फिर कन्याकुमारी के लिए एक लंबी यात्रा करनी थी, तो जल्द उठाना लाजिमी था। सो सब होटल पहुंच जैसे-तैसे कुछ खा कर अपने-अपने बिस्तर में जा दुबके। कब नींद ने अपने आगोश में लिया कब सुबह हो गयी पता ही नहीं चला। पर सुबह सभी ताजा दम और उत्साहित थे अगली यात्रा को ले कर ! 
@कल कन्याकुमारी         

बुधवार, 11 मार्च 2020

दिल्ली, जनकपुरी की RSCB नामक संस्था वर्षों से वरिष्ठ नागरिकों के लिए कार्यरत है

देश की राजधानी दिल्ली के जनकपुरी इलाके में भी एक ऐसी ही संस्था, Retired & Senior Citizens Brotherhood, कई सालों से समर्पित भाव से वरिष्ठ तथा सेवानिवृत लोगों के लिए कार्यरत है। जो उनकी शारीरिक व मानसिक समस्याओं का हल निकालने में मदद तो करती ही है, साथ ही उनके लिए तरह-तरह की देश-विदेश की यात्राओं का भी आयोजन करती है। इस तरह के कई आयोजन पूरी सफलता के साथ संपन्न हो चुके हैं। ऐसी यात्राओं में सम्मिलित लोगों की आयु, क्षमताओं, आवश्यकताओं को देखते हुए छोटी से छोटी बात का भी पूरी तरह से ध्यान रख कर ही सारे प्रोग्राम की रूपरेखा बनाई जाती है.............!       

#हिन्दी_ब्लागिंग  
समय के साथ-साथ देश-दुनिया-समाज में भी तरह-तरह के उलट-फेर होते रहते हैं। बदलाव होते रहते हैं ! लोगों की सोच बदलती रहती है, समझ बढ़ती है जागरूक लोगों की समाज के प्रति प्रतिबद्धता सामने आती है ! एक-दूसरे के प्रति जिम्मेदारी का एहसास उत्पन्न होता है ! इसी सब के तहत किसी संवेदनशील इंसान का ध्यान समाज के कुछ उन बुजुर्गों की तरफ भी गया होगा, जिन्होंने अपने जीवन का सर्वश्रेष्ठ समय अपने घर-परिवार-समाज को दिया होता है, पर अब उम्र के इस पड़ाव पर शारीरिक रूप से सक्षम होते हुए भी मानसिक तौर पर अपने-आप को जीवन की दौड़ में अनुपयोगी मान, अलग-थलग पड़ जाते हैं ! शौक होते हुए भी उसे पूरा करने में एक झिझक का अनुभव करते हैं। कहीं आने-जाने में युवाओं के साथ कदम-ताल करते समय पिछड़ने का भय मन में घर कर जाता है। तेजी से बदलती चीजों, नए-नए उपकरणों के साथ कुछ-कुछ अपनी घटती शारीरिक क्षमता उन्हें बाहरी दुनिया के साथ ताल-मेल बैठाने में संकोची बना देती है ! ऐसे में वे सिर्फ घर की चारदीवारी में घिर कर रह जाते हैं ! जिससे एक प्रेमल, केयरिंग तथा समर्पित परिवार का सदस्य होने के बावजूद, रोज एक ही तरह की दिनचर्या  उन्हें कुछ हद तक आलसी, निष्क्रिय, चिड़चिड़ा तथा तनावग्रस्त कर एक अलग ही तरह का जीव बना देती है।

समाज के ऐसे बहुत बड़े तबके को जीवन की मुख्य धारा से जोड़ने के लिए देश-दुनिया में तरह-तरह की संस्थाएं आगे आईं। जिनका मुख्य ध्येय और उद्देश्य, बिना किसी लाभार्जन के, समाज के वरिष्ठ, वयोवृद्ध, बुजुर्ग लोगों के जीवन में पसरते मरुधर को फिर से हरियाली में बदलने, उनको आत्मविश्वासी बनाने, उनकी नीरस दिनचर्या को बदलने, उन्हें खुश तथा तनाव मुक्त करने का था।

देश की राजधानी दिल्ली के जनकपुरी इलाके में भी एक ऐसी ही संस्था, Retired & Senior Citizens Brotherhood, कई सालों से समर्पित भाव से वरिष्ठ तथा सेवानिवृत लोगों के लिए कार्यरत है। जो उनकी शारीरिक व मानसिक समस्याओं का हल निकालने, पेंशन संबंधित परेशानियों को सुलझाने, बुजुर्गों के प्रति होने वाली ज्यादितियों में मदद तो करती ही है, साथ ही उनके लिए तरह-तरह की देश-विदेश की यात्राओं का भी आयोजन करती है। इस तरह के कई आयोजन पूरी सफलता के साथ संपन्न हो चुके हैं। ऐसी यात्राओं में सम्मिलित लोगों की आयु, क्षमताओं, आवश्यकताओं को देखते हुए छोटी से छोटी बात को भी पूरी तरह ध्यान में रख कर ही सारे प्रोग्राम की रूपरेखा बनाई जाती है। शुरू में एक मुश्त खर्च ले कर फिर यात्रा की पूरी अवधि में किसी भी तरह का आर्थिक भार नहीं डाला जाता। हाँ व्यक्तिगत शॉपिंग इसमें शामिल नहीं होती। इस तरह के लोग बधाई के पात्र हैं। उनके लिए साधुवाद !!
अभी पिछली 29 फ़रवरी से सात मार्च तक की उनकी केरल यात्रा में मैं भी सपत्नीक शामिल हुआ था। 29 फ़रवरी को सात बजे इंदिरा गांधी टर्मिनल से श्री नरूला जी, जिनके सरल स्वभाव से प्रभावित हो श्रीमती जी ने उनके साथ पिता-पुत्री का रिश्ता गठ डाला, जो एक शांत स्वभाव के हंसमुख, मिलनसार, अनुभवी इंसान हैं, उनके नेतृत्व मे शुरू हुई हवाई यात्रा कब थिरुवनंतपुरम, कन्याकुमारी, अलेप्पी, थेकाड्डी, मुन्नार और कोचीन होते हुए फिर सात मार्च को दोपहर एक बजे वहीं आ कर ख़त्म हो गयी, पता ही नहीं चला ! हालांकि रोज बस और पैदल सफर अत्यधिक थकान उत्पन्न कर देता था पर दूसरे दिन अलसुबह सारे ''युवा वरिष्ठ सदस्य'' बिना किसी देर सबेर, तरोताजा हो आगे के मुकाम के लिए तय समय पर हाजिर रहते थे। मुझे याद नहीं पड़ता कि किसी ने किसी भी दिन जरा सा भी विलंब किया हो। ऐसे जवानों को मेरा ''हैट्स आफ।'' सबसे अच्छी बात यह रही कि 65/66 की औसत उम्र के इस ग्रुप के सदस्यों को तक़रीबन रोज जगह, भोजन, पानी बदलते रहने के बावजूद किसी को भी उदर संबंधी शिकायत पेश नहीं आई ! जबकि इस उम्र में खान-पान में जरा सी लापरवाही या ऊक-चूक परेशानी का सबब बन जाती है।  

इस यात्रा की सफलता में इसका ताना-बाना बुनने वाली कंपनी #रिया_ट्रेवलर्स और उनके सहयोगी #श्री_सिद्दार्थ का भी बहुत बड़ा हाथ था। सिद्दार्थ की तो प्रशंसा करना इसलिए भी लाजिमी है कि पहले दिन से ही उसने सदा मुस्कराते हुए बड़े संयम, धैर्य और शांत रहते हुए हम सब अलग-अलग पैरामीटर वाले लोगों को खुश और संतुष्ट रखा। उनके केरल के सहयोगी जिन्हें सब प्यार से #जीनू कह कर पुकारते रहे उसके स्वभाव का तो वर्णन ही नहीं किया जा सकता। आज के समय में ऐसा सीधा, सरल, मृदु, तत्पर तथा मितभाषी इंसान होना बहुत बड़ी बात है। हम सब इस यात्रा के साथ-साथ उसको भी यथासंभव याद रखेंगे।            

मंगलवार, 10 मार्च 2020

होली के पावन पर्व पर मुस्कुराइए, ठहाके लगाइए

होली है ! 
हंसी, ख़ुशी, मस्ती के पर्व पर सभी को यथायोग्य शुभ व मंगलकामनाएं। सदा स्वस्थ व प्रसन्न रहते हुए हरेक के जीवन में खुशियों के रंग बिखरते रहें। आज के दिन तो बिना हँसे रहना मना है !

 गांव से नये-नये आये नौकर को पानी का गिलास यूंही हाथ में उठा कर लाते देख संताजी चिल्लाए, अरे गधे पानी कहीं इस तरह लाया जाता है ? नौकर ने घबडा कर पूछा, फिर कैसे लाऊं, मालिक ? संताजी बोले, प्लेट में रख कर लाओ। सहमा हुआ नौकर, मालिक चम्मच भी लाऊं या ऐसे ही चाट लेंगे ?

एक दादी मां मरने से बहुत डरती थीं। सो भगवान से सदा प्रार्थना करती रहती थीं। एक बार प्रभू ने तंग आकर उन्हें दर्शन दे ही दिए और बता दिया कि उनकी उम्र अभी चालीस साल और तीन महिने बाकी है। दादी मां खुश। अगले दिन से ही सुखमय जिंदगी की तैयारियां शुरु कर दीं। ब्युटी-पार्लर में जा बाल डाई करवाये, मसाज करवाई, फ़ेशिअल, पैडी और ना जाने क्या-क्या करवा कर जैसे ही बाहर निकलीं एक बस की चपेट में आ स्वर्ग सिधार गयीं। ऊपर जाते ही प्रभू का गला पकड़ लिया, कि तुमने तो मेरी उम्र अभी चालीस साल और बताई थी, तो यह क्या कर दिया। प्रभू भी हड़बड़ा गये, बोले "अरे माई तुम्हें तो मैं पहचान ही नहीं पाया।"

दो चलाकू टाईप के आदमी दिल्ली से, रात में कहीं जाने के लिए ट्रेन के डिब्बे में चढ़े, तो पाया कि कहीं बैठने तक की जगह नहीं है। तभी उनमें से एक चिल्लाने लगा, सांप-साप, भागो-भागो। इतना सुनना था कि सारे यात्री सर पर पैर रख भग लिए। दोंनो ने एक दूसरे को मुस्करा कर देखा और ऊपर की बर्थ पर चादर बिछा कर सो गये। सबेरे नींद खुलने पर उन्होने पाया कि गाड़ी कहीं खड़ी है, उन्होनें बाहर झाड़ु देते आदमी से पूछा कि भाई कौन सा स्टेशन है? उसने जवाब दिया, दिल्ली। अरे दिल्ली तो कल रात में थी, इन्होंने पूछा। तो जवाब मिला, साहब, कल रात इस डिब्बे में सांप निकल आया था तो इस डिब्बे को काट कर अलग कर बाकी गाडी चली गयी थी।
पोता दादा जी से जिद कर रहा था सर्कस दिखाने की। चलिए ना दादा जी सर्कस में नयी-नयी चीजें दिखा रहे हैं। हाथी और गैंडा फुटबाल खेलते हैं। जोकर बहुत हंसाते हैं। पर दादा जी मान ही नहीं रहे थे, क्या बिटवा वही सब पुराने खेल हैं। पोता भी कहां मानने वाला था बोला सुना है इस में ढेर सारे घोड़े ताल में नाचते हैं। दादा जी भी नहीं मान रहे थे बोले देख तो रहे हो मेरी तबीयत ठीक नहीं लग रही है। पर पोता भी अड़ा हुआ था, बताने लगा, उपर झूले में एक साथ दस जने झूलते हैं और अबकी चीन से लड़कियां आयीं हैं जो छोटे-छोटे कपड़ों में पोल डांस करती हैं !

दादा जी उठे बोले चल इतनी जिद करता है तो चले चलता हूं। मैने भी घोड़ों को ताल पर नाचते नहीं देखा है।
संता, बंता तथा कंता पुलिस में भर्ती होने गए। उनको अपराधियों की शिनाख्त करने के लिये एक फोटो दिखाई गयी जिसमें एक आदमी का बगल से खिंचा गया चित्र था। पहले कंता से पूछा गया कि इस आदमी की क्या खासियत है ? इसे कैसे पहचानोगे ? कंता बोला, अरे यह तो बहुत आसान है ! इस आदमी का एक ही कान है। इसे तुरंत पहचान लूंगा। 
सामने वाले ने अपना सिर पीट लिया। इसके बाद बंता को बुला कर उससे भी वही सवाल पूछा गया, उसने भी झट से जवाब दिया कि एक आंख वाले को पकड़ने और पहचानने में कोई दिक्कत नहीं है। साक्षात्कार लेने वाला झल्ला कर बोला, कैसे बेवकूफ हो तुम्हें इतना भी नहीं पता कि यह साइड पोज है। चलो भागो यहां से। चले आते हैं पुलिस में काम पाने। 
अब संता की बारी थी। उसको बुला कर भी वही सवाल पूछा गया, कि इस आदमी को कैसे पहचानोगे ? संता ने गौर से फोटो देखी और बोला, मैं इसे पहचान लूंगा, क्योंकि इसने कान्टेक्ट लेंस लगाया हुआ है। साक्षात्कार लेने वाला हैरान। यह बात तो उसे भी मालुम नहीं थी। तुरंत फाइलें खंगाली गयीं तो पाया गया कि संता का कहना सही है। सबने उसकी सूझ-बूझ की बड़ी प्रशंसा की। फिर ऐसे ही उससे पूछ लिया गया कि उसे यह बात कैसे पता चली। संता बोला, जी यह तो कॉमन सेंस की बात है। एक आंख वालों की नज़र कमजोर होती है और इस बेचारे का कान भी एक ही है तो यह चश्मा तो पहन नहीं सकता। जाहिर है यह कांटेक्ट लेंस ही लगाता होगा।
ननकु  ट्रेन में टायलेट जाकर लौटा तो बदहवास था। सहयात्री ने पूछा, क्या हो गया ?
ननकु बोला टायलेट के छेद से मेरा पर्स नीचे गिर गया।
अरे, तो चेन खींचनी थी ना। सहयात्री ने कहा।
दो बार खींची, पर हर बार पानी बहने लगा।
बाहर से आए पर्यटक को गाइड ने बताया कि जब अकबर सिर्फ चौदह साल का था तभी उसने बादशाह बन देश पर राज करना शुरु कर दिया था। पर्यटक बोला तुम्हारा देश भी अजीब है, यहां चौदह साल में देश संम्भालने दिया जाता है पर शादी अठ्ठारह साल के पहले नहीं करने दी जाती।
अब तुम्हें क्या बताएं साहब कि घर चलाना देश चलाने से कितना मुश्किल है। गाइड ने जवाब दिया।
पत्नी खर्च पूरा ना पड़ने और पति की अल्प कमाई से परेशान थी।एक दिन रहा नहीं गया बोली, "मैं शर्म के मारे अपना सर नहीं उठा पाती हूं। मेरी मां हमारे घर का किराया देती है। मेरी मौसी के यहां से कपड़े आते हैं। मेरी बहन हमारा राशन भरती है। कब हमारी हालत सुधरेगी?
" पति बोला, "शर्म तो आनी ही चाहिए। तुम्हारे दो-दो चाचा हैं जो एक पैसा भी नहीं भेजते।"
बाढ़ग्रस्त इलाके में तैनात कर्मचारियों से वायूसेना ने पूछा कि लोगों को निकालने के लिये कितनी ट्रिप लगेंगी। जवाब दिया गया कि तीस-एक ट्रिप में गांव खाली हो जायेगा। बचाव अभियान शुरु हो गया। एक-दो-तीन-पांच-दस-बीस, पचास फेरे लगने के बाद भी लोग नज़र आते रहे, तो सेना ने पुछा कि आपने तीस फेरों की बात कही थी यहां तो पचास फेरों के बाद भी लोग बचे हुए हैं ऐसा कैसे। नीचे से आवाज आयी कि सर, गांव वाले पहली बार हेलिकॉप्टर  में बैठे हैं तो जैसे ही उन्हें बचाव क्षेत्र में छोड़ कर आते हैं, वे फिर तैर कर वापस यहीं पहुंच जाते हैं।
गांव का एक लड़का अपनी नयी-नयी साईकिल ले, शहर मे नये खुले माल में घूमने आया। स्टैंड में सायकिल रख जब काफ़ी देर बाद लौटा तो अपनी साईकिल को काफ़ी कोशिश के बाद भी नहीं खोज पाया। उसको याद ही नहीं आ रहा था कि उसने उसे कहां रखा था। उसकी आंखों में पानी भर आया। उसने सच्चे मन से भगवान से प्रार्थना की कि हे प्रभू मेरी साईकिल मुझे दिलवा दो, मैं ग्यारह रुपये का प्रसाद चढ़ाऊंगा। दैवयोग से उसे एक तरफ़ खड़ी अपनी साईकिल दिख गयी। उसे ले वह तुरंत मंदिर पहुंचा, भगवान को धन्यवाद दे, प्रसाद चढ़ा, जब बाहर आया तो उसकी साईकिल नदारद थी।

बुधवार, 19 फ़रवरी 2020

कारूं का खजाना ¡ एक बतकही, कारूं पर



भानुमति का पिटारा, छज्जू का चौबारा जैसी अपनी विशेषताओं के लिए मुहावरों और लोकोक्तियों के अति प्रसिद्ध पात्रों की श्रृंखला की तीसरी कड़ी कारूं का  खजाना ! कौन था यह कारूं ? जो कहीं भी बेहिसाब दौलत का जिक्र आते ही सामने आ खड़ा होता है ! जिसके बारे में यह प्रचलित था कि वह यूनानी राजा ''मिडास'' का वंशज है। क्या यह कोई काल्पनिक पात्र था या वास्तव में इसका वजूद था ................!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
कभी-कभी समय के साथ-साथ कल्पित कथा-कहानियां या उसके पात्र हमसे इतने घुल-मिल जाते हैं कि हम उन्हें वास्तविक समझने लगने लगते हैं और इसके उलट कभी-कभी वास्तविक घटनाएं, पात्र और उनके द्वारा किए गए मानवेत्तर कार्य इतने लोकप्रिय हो जाते हैं कि लोकोक्तियां या मुहावरे बन, वास्तविकता और कल्पना की सीमा को ही ख़त्म कर देते हैं ! ऐसा ही एक पात्र है कारूं ! बेहिसाब दौलत का जब कहीं भी जिक्र होता है तो कारूं के खजाने का मुहावरे के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है ! भारत में यह मुहावरा फ़ारसी से आया है। जहां कारूं का उल्लेख कारून के रूप में मिलता है। अंग्रेजी में यही कारून, क्रोशस के रूप में उल्लेखित है ! जहां ''एज़ रिच एज़ क्रोशस'' वाक्य मशहूर है। कौन था यह शख्स ? क्या यह कोई काल्पनिक पात्र था या वास्तव में इसका वजूद था ? इतिहास के सागर में यदि गोता मारा जाए तो यह सच सामने आता है कि यह नाम कोई कोरी कल्पना नहीं है। कभी इस नाम का एक बहुत ही धनी राजा हुआ था पर वह जितना ऐश्वर्यवान था उतना ही महाकंजूस तथा घमंडी भी था।   
कारूं 
ईसा से 560 से 547 वर्ष पूर्व एशिया माइनर यानी आज की टर्की में लीडियन साम्राज्य के राजा क्रोशस का शासन था, जिसकी राजधानी सार्डिस थी। उसके बारे में यह प्रचलित था कि वह यूनानी राजा ''मिडास'' का वंशज है। हो सकता है यह धारणा उसके स्वर्ण के प्रति अत्यधिक मोह के कारण बनी हो ! उसके राज्य में ढेरों सोने की खदानों के अलावा राज्य में से हो कर बहती नदियों में भी प्रचुरता से स्वर्ण कणों की उपलब्धता थी। लीडिया की धरती उस समय सोने का पर्याय बन गयी थी। उसकी समृद्धि, धन-वैभव, विशाल व असाधारण खजाने की ख्याति देश-विदेश में चारों ओर फैली हुई थी। पर इतनी अकूत संपत्ति का स्वामी होने के बावजूद वह पर्ले दर्जे का घमंडी व कंजूस था। पर इसके बावजूद उसने दुनिया को एक अनोखी देन भी दी थी और वह है टकसाल ! क्रोशस से पहले सिक्के ठोक-पीट कर बनाए जाते थे पर उसने सोने को ढाल कर इलेक्ट्रम नामक स्वर्णमुद्रा की ईजाद की जिसकी गुणवत्ता बनाए रखने पर बड़ी कड़ाई से ध्यान रखा गया। इसके अलावा वह पहला एशियाई राजा था जिसने यूनान पर अपना अधिकार स्थापित किया। 
ढली हुई स्वर्णमुद्रा 
सदियाँ बीत गयीं उस रहस्यमय खजाने पर समय की धूल जमती चली गई ! वह अप्रतिम खजाने का क्या हश्र हुआ यह सवाल अभी तक सुलझ नहीं पाया है। ऐसा माना जाता है कि वह विशाल धन भंडार किसी शाप की वजह से तुर्की के उसाक प्रांत में जमींदोज हो गया है और जो कोई भी उसको हासिल करने की कोशिश करेगा उसकी या तो मौत हो जाएगी या बहुत नुकसान झेलना पडेगा ! पर दुनिया में साहसियों, हठधर्मियों और सुनी-सुनाई बातों पर विश्वास न करने वालों की बड़ी-पूरी जमात है ! ऐसे ही लोग समय-समय पर उस खजाने को हथियाने की कोशिश करते रहे हैं ! बहुतों को बहुत कुछ हासिल भी हुआ, पर वे उसका उपयोग कुछ दिनों तक ही कर पाए और किसी न किसी हादसे का शिकार हो गए ! 
इसके बावजूद भी बीच-बीच में तुर्की के आस-पास लालचवश या जरुरत के लिए हुए खनन इत्यादि में तरह-तरह के आभूषण, सोने-चांदी के पात्र, स्वर्णमुद्राएँ और सोने से भरे बर्तन मिलने की ख़बरें आती रहती हैं, पर साथ ही प्राप्तकर्ता के साथ हुए हादसों का जिक्र भी होता है ! इससे यह धारणा और भी पुख्ता होती जाती है कि यह खजाना शापित है ! खजाना तो है इसका प्रमाण है यहां से प्राप्त अमूल्य वस्तुओं में से करीब 363 वे नायाब और अमूल्य कलाकृतियां जो टर्की के म्यूजियम में सुरक्षित रखी हुए हैं ! वास्तविकता चाहे जो हो पर जब तक यह कायनात रहेगी, कारूं के खजाने की चर्चा और लोकोक्ति भी जीवित रहेगी। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

सोमवार, 17 फ़रवरी 2020

जीवन को जीएं, काटें नहीं

पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। 


#हिन्दी_ब्लागिंग 

अपनी दिनभर की दिनचर्या में रोज ही ऐसे कई युवा मिल जाते हैं जो निढाल, निस्तेज, सुस्त नजर आते हैं। जैसे जबरदस्ती शरीर को ढो रहे हों। अधिकांश नवयुवकों को किसी ना किसी व्याधि से ग्रस्त दवा फांकते देखना बडा अजीब लगता है। आज के प्रतिस्पर्द्धात्मक समय में हर तीसरा व्यक्ति किसी न किसी समस्या से जुझता हुआ किसी यंत्र की कसी हुई तार की तरह हर वक्त तना रहता है। जिसके फलस्वरूप देखने में बिमारी ना लगने वाली, सर दर्द, कमर दर्द, अनिद्रा, अपच, कब्ज जैसी व्याधियां उसे अपने चंगुल में फंसाती चली जाती हैं, जिससे अच्छा भला युवा उम्रदराज लगने लगता है। सदियों से हमारे यहां प्रभू से प्रार्थना की जाती रही है कि "हे प्रभू हमें सौ साल की उम्र प्राप्त हो।" पर यदि 30-35 साल के बाद ही रो-धो कर, दवाएं फांक कर, ज्यादातर समय बिस्तर पर गुजार कर जीना पडे तो ऐसे जीवन से क्या फायदा।

      

निश्चिंतता 
पिछले पंद्रह-बीस सालों में लोगों की जीवनचर्या में बहुत परिवर्तन आया है। कुछ को तो समस्याएं घेरती हैं तो कुछ खुद समस्याओं से जा लिपटते हैं। हमारा शरीर भी एक मशीन ही है जिसे हर यंत्र की तरह उचित रख-रखाव की जरुरत पडती है पर विडंबना ही है कि इस सबसे ज्यादा जरूरी और कीमती यंत्र की ही सबसे ज्यादा उपेक्षा की जाती है। अनियमित दिनचर्या, कुछ भी खाने-पीने का शौक, लापरवाही, मौज-मस्ती युक्त अपना रख-रखाव इस मशीन को भी बाध्य कर देता है अपने से ही विद्रोह के लिए। युवावस्था में यदि थोडी सी भी "केयर" अपने तन-बदन की कर ली जाए तो यह एक लम्बे अरसे तक मनुष्य का साथ निभाता है। लोग भूल जाते हैं कि मौज-मस्ती भी तभी तक रास आती है जब तक शरीर स्वस्थ और मन प्रसन्न रहता है। 

पर इस नैराश्य पूर्ण स्थिति में भी आप अपने चारों ओर देखें तो आपको ऐसे अनेक लोग दिख जाएंगे जो अपने कर्मों से, अपने आचरण से, अपने अनुभवों से हमारा मार्ग-दर्शन कर सकते हैं। जिन्हें देख जिंदगी को खुशहाल बनाने के तौर-तरीकों को समझा जा सकता है, उनसे बहुत कुछ सीखा जा सकता है। ऐसे ही एक शख्स हैं मेरे मामा जी। जो 85 साल के होने के बावजूद किसी 35 साल के युवा से कम नहीं हैं। आज देश-प्रदेश के लोगों के बीच बहुचर्चित शतायु मैराथन धावक फौजा सिंह के प्रांत पंजाब के एक कस्बे फगवाडा के पास के गांव हदियाबाद के एक मध्यम वर्गीय परिवार में जन्में श्री प्यारे लाल सुंधीर बचपन से ही सामान्य कद-काठी के इंसान रहे। पर लाख विषमताओं, हजारों अडचनों, सैंकडों परेशानियों के बावजूद उन्होंने अनियमितता का सहारा नहीं लिया। यहां तक कि छोटी उम्र में ही जीवनसाथी की असमय मृत्यु के बाद भी उन्होंने अपने को संभाले रखा और अपने बच्चों को सही तालीम दिलवा कर उन्हें जीवन पथ पर अग्रसर और स्थापित किया। आज जब वे हर तरह से सम्पन्न हैं, घर में हर आधुनिक सुविधा उपलब्ध है फिर भी इस उम्र में में भी उन्हें खाली बैठना ग्वारा नहीं है। आज भी सिर्फ व्यस्त रहने के लिए उन्होंने अपने व्यवसाय को तिलांजली नहीं दी है।  घर में कार होने के बावजूद अपनी सेहत की खातिर इस उम्र में भी रोज 10 से 15 की.मी. सायकिल पर चलना उनका शौक है। किसी भी तरह की चिंता, फिक्र, तनाव को वे पास नहीं फटकने देते। इसी वजह से बिना किसी का साथ ढूंढे अपनी बिटिया के पास नार्वे तक हर ढेढ दो साल बाद चक्कर लगाने से नहीं घबराते। वहा भी घर पर नहीं रुकते, आस-पास के दूसरे देशों को देखना, घूमना भी उनका शगल है, फिर चाहे किसी का साथ मिले या ना मिले। अपना देश तो इनका घूमा हुआ ही है वह भी अकेले. हमारे यहां तो उनका हर साल आना हमारी जरूरत है। उनके 10-15 दिनों का प्रवास हमें एक नई शक्ति प्रदान कर जाता है।  यह सब उन लोगों के लिए सबक है जो बचपन के खान-पान की कमी, अपनी उम्र, किसी का सहारा ना होने या अपनी जीवन में ना टाली जा सकने वाली मुसीबतों को अपने द्वारा पैदा की गयीं मुसीबतों का जिम्मेदार मानते हैं। सीधी  सी बात है जिसमे जीने की उद्दाम इच्छा हो उसके लिए कोइ बाधा कोइ मायने नहीं रखती।    

सोचिए जब होनी को टाला नहीं जा सकता तो फिर परेशान क्यों ? जब जो होना है, हो कर ही रहना है तो फिर नैराश्य क्यों ? जब भविष्य अपने वश में नहीं है तो उसके लिए वर्तमान में चिंता क्यों ?

जरा सोचिए, मैं भी सोचता हूं ! कठिन जरूर है पर मुश्किल बिल्कुल नहीं !

शनिवार, 8 फ़रवरी 2020

पार्ले-जी के बिस्कुट की वह क्यूट सी बच्ची

स्पर्द्धा में टिके रहने के लिए अपने ''पारले ग्लूको'' के नाम और उस समय के कवर पर की ''गाय और ग्वालन'' की तस्वीर को बदल एक विशेष पीले रंग के कवर. लाल रंग के लोगो व एक लड़की की फोटो के साथ एक नए पैकिंग को पेटेंट करवा उसे 1982 में बाजार में उतारा।  इतना सम्मान पाने वाली किस बच्ची की फोटो है यह.........? 

#हिन्दी_ब्लागिंग
पतानहीं कैसे यह बात चली और एक बहस शुरू हो गयी, पारले बिस्कुट के रैपर पर छपी बच्ची की पहचान को ले कर ! अधिकतर गूगल ज्ञानियों का दावा था कि यह फोटो सुधा कृष्णमूर्ति जी के पिताजी द्वारा खींची गयी, बचपन की फोटो है, जब वह चार साल की थीं !  कई इसे नीरू देशपांडे की तथा कुछ गुंजन गंडानिया की बता रहे थे। अक्सर कई चीजों को ले कर क्षण भर के लिए ऐसी जिज्ञासाएं उठती रहती हैं और कुछ देर बाद ही वह भूला भी दी जाती हैं ! पर इस बार सोचा कि गहरे पानी पैठ ही लिया जाए।

सन 1929 में एक रेशम के व्यापारी मोहनलाल चौहान ने मुंबई के पास इर्ले और पार्ले नामक गांवों के क्षेत्र में टॉफी, कैंडी व मिठाई इत्यादि बनाने के लिए एक छोटे से कारखाने ''पारले एग्रो उत्पादन'' की शुरुआत की तथा स्वदेशी आंदोलन से प्रभावित हो कर खुद कन्फेक्शनरी बनाने की कला सीख अपने परिवार के सदस्यों के साथ काम शुरू कर दिया। सारा परिवार अपने काम में इतना मशगूल हो गया कि अपने संस्थान को कोई नाम देना ही याद ना रहा ! कुछ समय उपरांत नजदीकी स्टेशन, विले पार्ले, जो खुद पास के गांव पार्ले के नाम पर आधारित था, के नाम पर ही अपना नामकरण  कर दिया गया। इनका पहला उत्पाद नारंगी कैंडी थी। कारखाने की स्थापना के करीब दस साल बाद पारले कम्पनी ने 1939 में अपना पहला बिस्कुट निकाला था। जिसके बाद से यह भारत की सबसे बड़ी खाद्य उत्पाद कंपनियों से एक हो गयी थी। यह बात है, दूसरे विश्व युद्व की। कम कीमत और उच्च गुणवत्ता के कारण इसकी मांग उस समय इतनी बढ़ गयी कि आपूर्ति करना मुश्किल हो गया था। 
वैसे तो पारले कंपनी और भी बहुत सारी चीजें बनाती हैं जैसे कि सॉस, टॉफी, केक पर इसका सर्वोपरि बिकने वाला उत्पाद बिस्कुट ही है। जिसे गरीब हो या आमिर, चाहे बच्चा हो या बूढ़ा, हर कोई खाता-पसंद करता है। शायद ही देश में ऐसा कोई हो जिसने पारले का बिस्कुट कभी ना कभी, कहीं ना कहीं ना खाया हो। 
जैसा की होना ही था, इसकी प्रसिद्धि और कमाई देख अन्य निर्माता भी इस क्षेत्र में उतरे, जिनमें ब्रिटानिया प्रमुख था। उसने अपना ग्लूकोज बिस्कुट ब्रिटानिया-डी के नाम से बाजार में उतारा। मजबूरन पार्ले ने स्पर्द्धा में टिके रहने के लिए अपने ''पारले ग्लूको'' के नाम और उस समय के कवर पर की ''गाय और ग्वालन'' की तस्वीर को बदल एक विशेष पीले रंग के कवर. लाल रंग के लोगो व एक लड़की की फोटो के साथ एक नए पैकिंग को पेटेंट करवा उसे 1982 में बाजार में उतारा। पहले के पारले-जी यानी पारले ग्लूकोज को बदल नया नारा दिया पारले जीनियस। खर्च में कटौती के लिए वैक्स पेपर को प्लास्टिक के रैपर से बदल  दिया गया। जो भी हो इसकी लोकप्रियता अभी भी बरकरार है। सर्वे को देखा जाए तो पारले-जी की बिक्री दुनिया के चौथे सबसे बड़े बिस्कुट उपभोक्ता मुल्क चीन से भी ज्यादा है। भारत से बाहर यह यूरोप, ब्रिटेन, अमेरिका, कनाडा, आदि में भी उपलब्ध है। पारले-जी अकेला ऐसा बिस्कुट है जो कि गांवों से लेकर शहरों तक में एक ही रेट से बिकता है और दोनों जगह ही इसकी लोकप्रियता एक समान है।

अब रैपर पर छपी मासूम सी सुंदर बच्ची की बात, जिस पर बहस और यह लेख शुरू हुआ था ! तो यह जान लें कि यह फोटो किसी मॉडल या सेलिब्रेटी की नहीं बल्कि एक ऐनिमेटड पिक्चर है जिसका निर्माण 1979 में किया गया था। यह बात पारले कंपनी के ग्रुप प्रोडक्ट मैनेजर रहे मंयक शाह ने साफ़ की कि पारले के पैकिट पर दिखायी देने वाली लडकी एक काल्पनिक लडकी का चित्र है। जिसे एवरेस्ट क्रियेटिव कंपनी के चित्रकार मगनलाल दहिया ने 1960 के दशक में इस तस्वीर को पारले कंपनी के लिए बनाया था। उसके बाद ये बिस्कुटों पर नजर आने लगी थी। उनके अनुसार इससे संबंधित सारी अफवाहें बेबुनियाद हैं। तो यह है उस रैपर पर छपी क्यूट सी बच्ची के फोटो की हकीकत !  

सोमवार, 3 फ़रवरी 2020

उस दिन कुछ भी हो सकता था, एक संस्मरण

भयंकर और डरावना दृश्य था !आगे-आगे एक इंसान को घसीटते ले जाती गाडी और पीछे कुछ भी कर गुजरने पर उतारू, डंडे-लाठी उठाए चीखते-चिल्लाते-आक्रोषित लोगों का सागर ! लगातार बजते हार्न को सुन दरबान के साथ जैसे ही उन्होंने गेट से बाहर देखा, पलक झपकते ही उन्हें सारा माजरा समझ में आ गया ! उन्होंने तुरंत पूरा गेट खुलवाया और गाडी अंदर आते ही हतबुद्धि दरबान के साथ मिल उसे तुरंत बंद करवा दिया। गाडी को रोकते ही दुबे ने जोर से कहा, माँ जी लोग, जल्दी से कहीं भी जा कर छिप जाइये और इतना कह खुद भागता चला गया, क्योंकि वह जानता था कि यदि कहीं भीड़ के हाथ पड़ गया तो उसका क्या हश्र होगा ............! 

#हिंदी_ब्लागिंग  
घटना काफी पुरानी है पर जेहन में गहराई तक पैबस्त है ! अखबार इत्यादि में यदा-कदा वैसी दुर्घटनाओं का जिक्र देख वह दिन जैसे फिर आँखों के सामने साकार हो उठता है ! सन तो ठीक-ठीक याद नहीं पर शायद 64-65 के वर्षांत का अपराह्न था, क्योंकि उस दिन मील के बाहर की एक टीम के साथ क्रिकेट का मैच चल रहा था और हम जीत की कगार पर थे। तभी अचानक एक भीषण शोर की आवाज उठी, देखा तो सैंकड़ों की बेकाबू भीड़ क्लब वाले गेट की तरफ से घुसी चली आ रही है। कैसे-क्यूँ-क्या हुआ, कुछ पता नहीं, आज तक ऐसा कभी कुछ घटा नहीं था ! अफरा-तफरी मच गयी ! जिसके जहां सींग समाए जा दुबका ! कौन कहां गया कुछ पता नहीं ! हम चार-पांच बच्चे ऊपर दूसरे माले पर जा, रेलिंग से लटक कर नीचे ताकने लगे ! नीचे कोहराम मचा हुआ था ! नरमुंड ही नरमुंड ! सारा पार्क उजाड़ दिया गया था ! लोग बढे ही चले आ रहे थे ! करीब आधे घंटे के तांडव के बाद पुलिस पहुंची ! लाठी-चार्ज हुआ ! भगदड़ मची ! सबको खदेड़ने के बाद करीब चार-पांच बोरी चप्पलें-जूते और तक़रीबन दस-पंद्रह सायकिलें जब्त की गयीं। पार्क का यह हाल था जैसे कोई हाथी उसे रौंद गया हो ! 

मील के अधिकारी वर्ग और कामगारों के बीच सदा तनाव भरा रिश्ता रहा है ! संस्थान के अपने कामगारों की भलाई के लाख प्रयासों के बावजूद कुछ मतलब-परस्त मजदूर नेता सिर्फ अपनी रोटी सेंकने के लिए, कामगारों में स्टाफ के प्रति जहर उगल नफरत की दिवार बनाए रखते थे। ऐसे लोग दोनों तरफ के हितैषी बन अपना उल्लू सीधा करने में अत्यंत दक्ष होते थे। इसी नफ़रत, द्वेष, रोष के कारण उस दिन एक छोटी सी घटना ने विकराल रूप ले लिया था।  

क्यों ऐसी अनहोनी घटी ! उस दिन सुबह। मंजू भाभी (डागाजी की पुत्रवधु) भंडारी तथा राजगढ़िया आंटी तथा मेरी माता जी, सुबह किसी काम से मील की अम्बैसडर कार में बाहर गयीं हुई थीं। मील का सबसे विश्वसनीय-भरोसेमंद-दक्ष ड्राइवर दुबे भइया थे। जाहिर है वही गाडी चला रहे थे। लौटते समय कांकिनाड़ा के संकरे बाज़ार से गुजरते हुए एक नौसिखिए, लापरवाह, बेखबर सायकिल सवार बालक को कार छू गयी ! घबड़ाहट और डर के मारे वह सायकिल समेत गिर पड़ा ! हालांकि उसे कोई चोट नहीं लगी थी पर हल्ला मच गया कि मील की गाडी ने बच्चे का एक्सीडेंट कर दिया है। पहले दुबे ने सोचा कि उतर कर देखें बच्चे को, पर बढ़ते हुजूम, गाडी में महिलाओं की उपस्थिति और आक्रोषित आवाजों को देख-सुन उसने गाडी आगे बढ़ा दी ! इससे लोग और भड़क गए और एक ''हीरो'' उछल कर गाडी के बोनट पर चढ़ने की कोशिश में फिसल कर गाडी के अगले बाएं चक्के में जा फंसा ! गाडी की महिलाएं इस हादसे से अनजान थीं और बार-बार दुबे को गाडी रोकने को कह रहीं थीं, पर दुबे को तो हकीकत समझ में आ चुकी थी, उसको अपने से ज्यादा माँ समान महिलाओं की चिंता थी ! इसीलिए कभी आँख भी ना उठाने वाले युवक को मजबूरन जोर से कहना पड़ा, ''माँ जी, आपलोग चुपचाप बैठिए, गाडी अंदर जा कर ही रुकेगी !'' इधर हर राह चलते की नजर जब गाडी से घिसटती मानव देह पर पड़ती तो पहले तो वह एकबारगी सन्न रह जाता पर अगले ही पल भीड़ का अंग बन, रोको, मारो, मारो चिल्लाते गाडी के पीछे दौड़ने लगता ! देखते-देखते सैंकड़ों की संख्या में गुस्साए लोग जो हाथ लगा ले, गाडी के पीछे लग गए ! भयंकर और डरावना दृश्य था। आगे-आगे एक इंसान को घसीटते ले जाती गाडी और पीछे कुछ भी कर गुजरने पर उतारू, डंडे-लाठी उठाए चीखते-चिल्लाते-आक्रोषित लोगों का सागर !   

दुबे के लिए तो यह जीवन की सबसे बड़ी परीक्षा की घडी थी ! बहुत बड़ा भार था उसके ऊपर ! चार संभ्रांत महिलाओं की सुरक्षा की जिम्मेदारी ! करीब तीन पहियों पर दौड़ रही गाडी का संचालन ! परिस्थितिवश ही सही एक इंसान की मौत का खौफ ! इतने तनाव के बावजूद संयत रहना, दिलो-दिमाग पर काबू रखना बहुत बड़ी बात थी ! उसका सिर्फ एक ही लक्ष्य था, किसी भी तरह गाडी को मील परिसर में पहुंचा देना इसके लिए उसने एक तरह से अपनी जान की बाजी लगा दी थी। डेढ़-दो की.मी. की दूरी जैसे ख़त्म ही नहीं हो रही थी। 

मैनेजर गेट के लिए जैसे ही गाडी बायीं तरफ मुड़ी दुबे ने हार्न बजाना शुरू कर दिया। संयोगवश वहां दरबान के अलावा एक और सज्जन भी मौजूद थे ! लगातार बजते हार्न को सुन दरबान के साथ जैसे ही उन्होंने गेट से बाहर देखा, पलक झपकते ही उन्हें सारा माजरा समझ में आ गया ! उन्होंने तुरंत पूरा गेट खुलवाया और गाडी अंदर आते ही हतबुद्धि दरबान के साथ मिल उसे तुरंत बंद करवा दिया। गाडी को रोकते ही दुबे ने जोर से कहा, माँ जी लोग, जल्दी से कहीं भी जा कर छिप जाइये और इतना कह खुद भागता चला गया, क्योंकि वह जानता था की यदि कहीं भीड़ के हाथ पड़ गया तो उसका क्या हश्र होगा ! गाडी में आगे मेरी माताजी बैठीं थीं वह जैसे ही उतरीं उनका पैर लाश से जा टकराया, वे तो जैसे होश ही गंवा बैठीं ! बाकियों का भी क्या हुआ, क्या हुआ करते जब वास्तविकता से सामना हुआ तो सारी जैसे जड़ हो गयीं ! तभी उन सज्जन ने, जिनका नाम याद आते-आते भी नहीं आ रहा है, तुरंत सब को झिंझोड़ कर अपने साथ ले जा एक जगह बंद कर दिया, इस हिदायत के साथ कि कोई बाहर झांकेगा भी नहीं। 

तब तक गेट पीटना आरंभ हो चुका था ! तभी दो चार अति उत्साहित जनों ने गेट के ऊपर से आ उसे खोल दिया ! फिर क्या था टिडडी दल की तरह लोग सब तरफ छा गए ! ''दुबे को बाहर निकालो ! उसे हमारे हवाले करो ! उसे छोड़ेंगे नहीं ! साहब लोगों का जुलुम नहीं सहा जाएगा !'' जैसी आवाजें कानफोड़ू शोर बन गयीं थीं ! जैसे बाढ़ अपने किनारों को तहस-नहस कर चारों ओर कहर बरपा देती है उसी तरह हजारों बेकाबू लोग घुसे चले आ रहे थे ! सारा गुस्सा पेड़-पौधों, फूलों-क्यारियों पर उतारा जा रहा था।

अंदर आने वालों की संख्या भले ही हजारों में थी पर उसमें 95 प्रतिशत से भी ज्यादा वे तमाशबीन लोग थे जिन्होंने मील के इस हिस्से के कभी दर्शन नहीं किए थे। मील के अंदर, वह भी रिहायशी इलाके में आना उनके लिए बहुत बड़ी उपलब्धि थी, जिसका ख्वाब भी उन्होंने कभी नहीं देखा था। इसीलिए बाग़-बगीचे को ही नुक्सान पहुंचा वह भी इतनी बड़ी बेतरतीब-बेकाबू भीड़ के कारण ! इसके अलावा कोई तोड़-फोड़, पथराव या आगजनी की हरकत को अंजाम नहीं दिया गया।  यहां तक कि गेट पर ही खड़ी गाडी को भी कुछ डेंटों के अलावा ज्यादा नहीं छेड़ा गया।   

कुछ ही देर बाद पुलिस का आगमन हुआ ! लोगों को गेट के बाहर निकाला गया ! दुबे को जीप में उनको दिखाते हुए कि गिरफ्तार कर लिया गया है, थाने ले जाया गया ! केस चला, गलती ना पाए जाने से दुबे बरी हुए ! उन्हें मामला ठंडा होने तक गांव भेज दिया गया ! पीड़ितों को हर्जाना मिला और एक दुर्घटना पैबस्त हो गयी जेहन में, कभी-कभी यादों में उभर आने के लिए ! पर यह सोच कर आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं कि यदि उस दिन प्रभु का साथ न होता, गाडी बाजार में ही रोक ली जाती, कार का इंजन रास्ते में ही बंद या खराब हो जाता, चक्के जाम ही हो जाते, दुबे आपा खो संतुलन बिगाड़ बैठता, वो सज्जन गेट पर ना होते, आपाधापी में गेट बंद ही ना हो पाता...तो ..तो...... ?

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