pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 11 सितंबर 2019

लखनऊ का आम्बेडकर मेमोरियल पार्क, एक हाथी पालना ही........यहां तो अनगिनत हैं

भव्यता के बावजूद इस जगह को ''पार्क या उद्यान'' कहना बिलकुल सही नहीं होगा क्योंकि 107 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह लता-पादप विहीन एक पथरीला परिसर है, जो पूरी तरह से राजस्थान के लाल बलुआ पत्थरों द्वारा निर्मित है। इस मेमोरियल को वास्तुकला की सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि इसकी विशालता को देखने के लिए जाना चाहिए, जिसे सामने पाते ही दर्शक अचंभित नहीं स्तंभित हो रह जाता है ! उसके मन में एक ही बात आती है कि इसे मैं पूरी तरह देख भी पाऊंगा या नहीं ! फिर दिमाग में जमा-घटाव शुरू हो जाता है कि क्या देखा जाए और क्या छोड़ दिया जाए ..........!


#हिन्दी_ब्लागिंग 
लखनऊ के गोमती नगर इलाके में स्थित आम्बेडकर मेमोरियल पार्क, जिसका पहले डॉ. भीमराव आम्बेडकर सामाजिक परिवर्तन प्रतीक स्थल जैसा भारी-भरकम नाम था, को देखने के पश्चात ऐसा अहसास होता है कि यह जगह डॉ. आम्बेडकर को समर्पित होने और ज्योतिराव फूले, नारायण गुरु, बिरसा मुंडा, शाहू जी महाराज, कांशी राम जैसी हस्तियों के कार्यों से जन-जन को परिचित करवाने और उनकी यादों को सहेजने के बावजूद  पूरी तरह से सु.श्री. मायावती जी पर ही केंद्रित है, जिन्होंने अपने कार्यकाल में इसका निर्माण करवाया था। 







सबसे पहली बात तो यह कि इस जगह को ''पार्क या उद्यान'' कहना बिलकुल सही नहीं होगा क्योंकि 107 एकड़ के क्षेत्र में फैला यह लता-पादप विहीन एक पथरीला परिसर है, जो पूरी तरह से राजस्थान के लाल बलुआ पत्थरों द्वारा निर्मित है। इस पर तक़रीबन 700 करोड़ रुपयों का भारी-भरकम खर्च किया गया है। जिसमें साठ वृहदाकार और अनगिनत छोटे-बड़े आकार के हर जगह छाई हाथियों की संरचनाओं, बेशुमार स्तंभों, संग्रहालय, आम्बेडकर स्तूप, सामाजिक परिवर्तन गैलरी तथा कुछ अन्य संरचनाओं जैसे प्रतिबिम्ब व दृश्य स्थल के साथ-साथ कई विभूतियों की आदम कद मूर्तियां भी स्थापित हैं। पर सबसे बड़े आकर्षण के रूप में जिसको पेश किया या करवाया गया है वे हैं विशाल, हाथ में पर्स थामे मायावती की प्रतिमाएं।








यह बात सही है कि सारा परिसर बहुत ही भव्य है ! पर इस मेमोरियल को वास्तुकला की सुंदरता के लिए नहीं, बल्कि इसकी विशालता को देखने के लिए जाना चाहिए, जहां हजारों श्रमिकों, कलाकारों, इंजीनियरों की दिन-रात की मेहनत का परिणाम साफ़ नज़र आता है। अंदर जाते ही दर्शक एक अलग तरह की ही दुनिया में खो जाता है ! वह अचंभित नहीं स्तंभित हो रह जाता है ! उसके मन में एक ही बात आती है कि इतना विशाल ! मैं पूरी तरह देख भी पाऊंगा या नहीं ! फिर दिमाग में जमा-घटाव शुरू हो जाता है कि क्या देखा जाए और क्या छोड़ दिया जाए ! 










उसके साथ ही जो एक और चीज उसे सबसे ज्यादा खटकती है, वह है हरियाली की अत्यधिक कमी ! दूर-दूर तक किसी वृक्ष का नामोनिशान तक नहीं ! जो थोड़ा-बहुत हरापन कुछ क्यारियों में है, वह भी नहीं के बराबर ! अवलोकन के दौरान यदि जरा सी भी गर्मी बढ़ जाए तो यहां आने वालों बुरा हाल हो जाता है। फिर इतने लम्बे-चौड़े परिसर को अच्छी तरह देखने-जानने के लिए काफी समय और श्रम की जरुरत है ! आधी जगहों को देखने-घूमने के बाद ही शरीर जवाब देने लगता है। यह अलग बात है कि परिसर का वातावरण बहुत शांत है  




इसकी सुंदरता-भव्यता-विशालता सब अपनी जगह ठीक हैं पर इसे ले कर ज्यादातर लोगों की राय अब भी यही है कि पूर्वाग्रहों, कुंठा और सत्ता के मद में चूर, पागलपन की हद पार कर अपने विरोधियों को सिर्फ अपनी हैसियत दिखाने के लिए स्वतंत्र भारत में अब तक का किसी भी राज्य में राज्य-प्रमुख द्वारा बहाया गया अपनी प्रकार का यह अकूत धन था ! इसके अलावा इसके निर्माण में हजारों-हजार पेड़ कटे, पर्यावरण को क्षति पहुंची, हरियाली का कोई ध्यान नहीं रखा गया। सिर्फ पत्थरों से ही परिसर को विकसित किए जाने से तापमान में जो बढ़ोत्तरी दर्ज की गयी उसके हिसाब-किताब का तो एक अलग ही खाता है ! इन सब के इतर जो एक और ख़तरनाक, अनदेखी, भयोत्पादक आशंका उभरती है, वह है जाति-भेद का और गहराना !










इतने विशाल और विस्तृत परिसर के रख-रखाव, देख-रेख को संभालना भी अपने-आप में एक बेहद खर्चीला और श्रमसाध्य कार्य है। इसकी यथास्थिति को बनाए रखना हाथी पालने जैसा हो गया है ! कहां तो एक ही हाथी सारे जमा-खर्च बिगाड़ देता है यहां तो अनगिनत हैं ! धीरे-धीरे इसके रख-रखाव की कमी भी साफ़ झलकती सामने आने लगी है ! जगह-जगह टूट-फूट तो है ही शौचालय की ओर गंदगी भी पसरने लगी है ! अब इसे चाहे किसी ने, कैसे भी, किसीलिए भी बनाया हो, पैसा तो अवाम का ही लगा है ! निरपेक्ष रह कर देखें तो इससे तो इंकार नहीं किया जा सकता कि परिसर अपने आप में खूबसूरत और दर्शनीय तो है ही, जिसे देखने लोग आते भी हैं। वैसे भी वक्त, अरबों रुपये, इंसान की मेहनत को अब यूं ही जाया तो नहीं किया जा सकता। तो सार-संभार में चौकसी तो बरतनी ही जानी चाहिए। जिससे देश-विदेश से आने वाले पर्यटकों पर विपरीत प्रभाव ना पड़े। 

शुक्रवार, 6 सितंबर 2019

मुस्कुराइये ? कि आप लखनऊ में हैं

लखनऊ की तहजीब, नफासत, पूरतकल्लुफ़, उसकी जुबान, उसकी भव्यता का जिक्र तो बचपन से ही सुनते आए हैं ! शानो-शौकत, सुंदरता से भरपूर, आदिगंगा के नाम से जानी जाने वाली गोमती नदी के किनारे बसे इस शहर की तुलना कश्मीर से की जाती थी। कहा जाता था कि जो सुकून यहां है वह कहीं और नहीं ! पर लखनऊ जंक्शन पर उतरते ही यह सारी बातें, सारी धारणाएं, सारे ख्यालात धराशाई होते नजर आए...........!

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पिछले दिनों ''परिकल्पना परिवार'' का सदस्य होने के नाते लखनऊ में आयोजित उसकी वार्षिक महासभा में सम्मिलित होने का सुअवसर प्राप्त हुआ। वैसे चौथाई सदी से कुछ ज्यादा और आधी सदी से कुछ कम समय पहले एक बार लखनऊ जाने का मौका जरूर मिला था,  पर उस यात्रा की कुछ ही यादें सपनों की मानिंद ही बच पायीं थीं। थोड़ी-थोड़ी भूलभुलैया, कुछ-कुछ गजिंग, ज़रा-ज़रा सी उस चिकन के गुलाबी कुर्ते की छवि जो वहां से लिया गया था। हाँ, एक बात जो कभी भी नहीं भूली वह थी भूलभुलैया के गाइड द्वारा बताई वहां से निकलने की राजदारी ! जिसका उपयोग कर इस बार के गाइड को चकित कर दिया !

आप यदि पहली बार या वर्षों बाद कहीं जाते हैं तो दिमाग में उस जगह की एक छवि, उसके बारे  में सुनी हुई  बातों या पढ़ी गयी जानकारियों से मिल कर बनी होती है। अब लखनऊ की तहजीब, नफासत, पूरतकल्लुफ़, उसकी जुबान, उसकी भव्यता का जिक्र तो बचपन से ही सुनते आए हैं ! यह वह जगह थी जहां तू-तड़ाक की भाषा को पसंद नहीं किया जाता था। नवाबों के इस शहर की शाम को शाम-ए-अवध के नाम से दुनिया भर में मशहूरी मिली हुई थी। इसके लजीज पकवानों को किसी की भी जिव्हा को ललचाने में महारत हासिल थी। शानो-शौकत, सुंदरता से भरपूर, आदिगंगा के नाम से जानी जाने वाली गोमती नदी के किनारे बसे इस शहर की तुलना कश्मीर से की जाती थी। कहा जाता था कि जो सुकून यहां है वह कहीं और नहीं ! पर लखनऊ जंक्शन पर उतरते ही यह सारी बातें, सारी धारणाएं, सारे ख्यालात धराशाई होते नजर आए ! दूसरे बड़े शहरों की तरह ही यहां भी बाज़ार की व्यव्सायिकता, पैसे की महत्ता, जुबान की मिठास की कमी, अफरा-तफरी, अनियंत्रित ट्रैफिक के साथ ही स्वार्थी आधुनिक शैली की पदचाप साफ़ सुनायी देने लगी ! एक बात और पुख्ता हो गयी कि कश्मीर से कन्याकुमारी तक प्रदेश चाहे कोई भी हो, शहर चाहे कहीं भी हो वहां के बस या रेल स्टेशनों पर मिलने वाले ऑटो-टैक्सी वालों की एक ही बिरादरी होती है, जिनका ध्येय सिर्फ नवागंतुक से ज्यादा ज्यादा वसूली कर लेना होता है। 

पता नहीं इस शहर को किसकी नज़र लग गयी है ! कभी बागों का शहर कहलाने वाला लखनऊ अब कंक्रीट का शहर बनता जा रहा है ! इसके लिए बहुत हद तक राजनीती का भी हाथ है ! नए बसाए जा रहे इलाकों की कुछ जगहों को छोड़ दिया जाए तो हर जगह बढ़ती आबादी के कारण बेतरतीबी, फैलती गंदगी, अनियंत्रित ट्रैफिक, पर्यावरण को खतरे में डालते हजारों धुआं उगलते वाहन, खस्ता हाल सड़कें, अफरा-तफरी, कम होती सामाजिक चेतना व जागरूकता, कर्तव्य विमुखता, बढ़ते पर्यटन के बावजूद शहर में हर जगह रख-रखाव की कमी बहुत खलती है। खासकर ऐतिहासिक इमारतों को सिर्फ उपार्जन का जरिया बना दिया गया है ! उनकी अनदेखी, बदहाली, बढती टूट-फूट, मरम्मत मांगती खस्ता हालत पर शायद कोई ध्यान ही नहीं देना चाहता ! शहर की 
आत्मा जैसे कहीं खो गयी है ! ऐसा लगता है कि ''मुस्कुराइये कि आप लखनऊ में हैं''  महज एक सरकारी स्लोगन भर बन कर रह गया है ! 

सबसे ज्यादा दुःख और अफ़सोस इस बात का है कि तमाम इलमो-अदब की गतिविधियों का केंद्र, नवाबों का यह शहर आज बदहाली की कगार पर खड़ा नजर आता है ! इसका एक ही हल हो सकता है जब इसको प्यार करने वाले यहां के वाशिंदे, बुद्धिजीवी, इतिहासकार, पर्यावरणप्रेमी तहा जागरूक नयी पीढ़ी सभी अपने व्यक्तिगत-राजनितिक मतभेद भुला, एकजुट हो इसके लिए आवाज और कदम उठाएं !  जिससे यह शहर फिर से अपना खोया हुआ गौरव, ख्याति, भव्यता और सम्मान प्राप्त कर सके ! 

मंगलवार, 20 अगस्त 2019

राजस्थान का लोहार्गल धाम, जहां पांडवों के हथियार गले थे

महाभारत युद्ध समाप्त हो चुका था, पर पांडव अपने भाई बंधुओं और अन्य स्वजनों की हत्या करने के पाप से अत्यंत व्यथित थे। उन्हें दुःखी तथा पश्चाताप की अग्नि में जलते देख श्री कृष्ण जी ने उन्हें पाप मुक्ति के लिए विभिन्न तीर्थ स्थलों के तीर्थाटन की सलाह दी तथा यह भी बतलाया कि जिस तीर्थ में तुम्हारे हथियार पानी में गल जायेंगे वहीं तुम्हारा मनोरथ पूर्ण होगा। घूमते-घूमते पांडव लोहार्गल आये तथा जैसे ही उन्होंने यहां के सूर्यकुंड़ में स्नान किया उनके सारे हथियार पानी में गल गये। उन्होंने इस स्थान की महिमा को समझ इसे तीर्थ-राज की उपाधी से विभूषित किया। फिर शिव जी की आराधना कर मोक्ष की प्राप्ति की

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लोहार्गल राजस्थान में शेखावटी इलाके की नवलगढ़ तहसील में, झुंझुनू शहर से तकरीबन 70 कि.मी. और उदयपुरवाटी से करीब दस कि.मी. की दूरी पर आड़ावल पर्वत की घाटी में स्थित है। लोहार्गल का अर्थ है, वह स्थान जहां लोहा गल जाए। पुराणों में भी इस स्थान का जिक्र मिलता है। अरावली पर्वत शाखाओं की सबसे ऊँची 1050 मी. की चोटी की तलहटी में स्थित इस जगह को स्थानीय लोग ''लुहागरजी'' के नाम से भी पुकारते हैं। पहले यहां सिर्फ साधू-संत ही रहा करते थे, पर अब यहां कई परिवार बस गए हैं। जो मुख्यतः अचार के व्यवसाय से जुड़े हैं। मुख्य मार्ग से करीब पांच-छह कि.मी. की चढ़ाई नुमा दूरी पर कुंड के पास तरह-तरह के अचारों से सजी बीसीओं दुकानें स्थित हैं जिनकी अचारी खुशबू से सारा इलाका महकता रहता है। 
लोहार्गल से भगवान परशुराम का भी नाम जुड़ा हुआ है। कहा जाता है कि क्षत्रियों के संहार के पश्चात क्रोध शांत होने पर जब उन्हें अपनी गलती का एहसास हुआ तो पश्चाताप स्वरुप उन्होंने यहां यज्ञ किया तथा नरसंहार के पाप से मुक्ति पाई थी। यहां एक विशाल बावड़ी भी है जिसका निर्माण महात्मा चेतनदास जी ने करवाया था। यह राजस्थान की बड़ी बावड़ियों में से एक है। पास ही पहाड़ी पर एक प्राचीन सूर्य मंदिर बना हुआ है। इसके साथ ही वनखण्डी जी का मंदिर है। कुण्ड के पास ही प्राचीन शिव तथा हनुमान मंदिर तथा पांडव गुफा भी स्थित है। इनके अलावा चार सौ सीढ़ियां चढने पर मालकेतु जी के दर्शन भी किए जा सकते हैं। 

यहां के प्राचीन सूर्य मंदिर के पीछे भी एक अनोखी कथा प्रचलित है। प्राचीन काल में काशी में सूर्यभान नामक राजा हुए थे, जिन्हें वृद्धावस्था में अपंग लड़की के रूप में एक संतान हुई। राजा ने तमाम ज्योतिर्विदों से उसके बारे में जानकारी हासिल की तो पता चला कि पूर्व के जन्म में वह लड़की मर्कटी थी, जो शिकारी के हाथों मारी गई थी। शिकारी उस मृत बंदरिया को एक बरगद के पेड़ पर लटका कर चला गया था। अभक्ष्य होने के कारण उसका बाकी शरीर तो हवा और धूप से सूख कर लोहार्गल धाम के पवित्र जलकुंड में गिर गया पर उसका एक हाथ वहीं पेड़ पर अटका रह गया था। इसीलिए पुनर्जन्म में इसे ऐसे हस्त-विहीन शरीर की प्राप्ति हुई। इस व्याधि के परिमार्जन हेतु उन्होंने राजा को उपाय सुझाया कि यदि आप उस हाथ को भी ला कर कुंड के पवित्र जल में डाल दें तो इस बच्ची का अंपगत्व समाप्त हो जाएगा। राजा तुरंत लोहार्गल आए तथा उस बरगद की शाखा से बंदरिया के हाथ को जलकुंड में डाल दिया। जिससे उनकी पुत्री का हाथ स्वतः ही ठीक हो गया। इस चमत्कार से प्रभावित हो राजा ने यहां पर सूर्य मंदिर व सूर्यकुंड का निर्माण करवा कर इस तीर्थ को भव्य रूप दिया।
एक यह भी मान्यता है, भगवान विष्णु के चमत्कार से प्राचीन काल में पहाड़ों से एक जल धारा निकली थी जिसका पानी अनवरत बह कर सूर्यकुंड में जाता रहता है। इस प्राचीन, धार्मिक, ऐतिहासिक स्थल के प्रति लोगों में अटूट आस्था है। लोगों का यहां वर्ष भर आना-जाना लगा रहता है। माघ मास की सप्तमी को सूर्यसप्तमी महोत्सव मनाया जाता है। श्रावण मास में भक्तजन यहां के सूर्यकुंड से जल भर कर कांवड़ उठाते हैं। जिसमें सूर्य नारायण की शोभायात्रा के अलावा सत्संग प्रवचन के साथ विशाल भंडारे का आयोजन भी किया जाता है।हज़ारों नर-नारी यहां आ कुंड में स्नान कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।  

लोहार्गल एक प्राचीन, धार्मिक व ऐतिहासिक स्थल जरूर है, लोगों की इसके प्रति अटूट आस्था भी है, भक्तों का यहां आना-जाना भी लगा रहता है, फिर भी इस क्षेत्र की हालत अत्यंत सोचनीय है। सरकार की ओर से पूर्णतया उपेक्षित इस जगह पर प्राथमिक सुविधाएं भी उपलब्ध नहीं हैं। चारों ओर गंदगी का आलम है। पशु-मवेशी खुले आम घूमते रहते हैं। सड़कों की हालत दयनीय है। नियमित बस सेवा भी उपलब्ध नहीं है। रहने खाने का भी कोई माकूल इंतजाम नहीं है। यदि इस ओर थोड़ा सा भी ध्यान पर्यटन विभाग दे तो यहां देशी-विदेशी पर्यटकों का आना शुरु हो सकता है।

सोमवार, 12 अगस्त 2019

शिव मंदिर, जटोली का

हिमाचल के सोलन जिले के जटोली इलाके में स्थित है,भगवान शिव का एक अनूठा मंदिर ! यह मान्यता  चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थीं। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ .............! 
सावन के पावन समय पर विशेष !

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हिमालय को सदा देवभूमि माना जाता रहा है। ऐसा अटूट विश्वास है कि यहां कण-कण में भोले भंडारी का वास है। इसीलिए इस क्षेत्र में विश्व विख्यात शिव धाम तो हैं ही उनके साथ-साथ और भी, लोगों की आस्था के प्रतीक, हजारों शिव मंदिर विद्यमान हैं। इनमें से कुछ ऐसे भी हैं, जो अपने आप में विशेष होते हुए भी अभी देश के दूसरे हिस्सों में उतना प्रख्यात नहीं हो पाए हैं ! ऐसा ही एक मंदिर है, हिमाचल प्रदेश के सोलन जिले में स्थित जटोली का दक्षिण-द्रविड़ शैली में निर्मित शिव मंदिर। इसके 111 फीट ऊँचे गुंबद पर अभी हाल ही में 11 फुट लंबा स्वर्ण कलश चढ़ाया गया है। इससे मंदिर की ऊंचाई करीब 122 फुट तक हो गयी है। इसी कारण इसे एशिया का सबसे ऊंचा मंदिर माना जाता है। शिल्प-कला के इस बेजोड़ भवन को बनाने में करीब 39 साल का समय लगा है। अभी भी कुछ ना कुछ निर्माण चल ही रहा है। जल्द ही यहां17 लाख रुपए की लागत के स्फटिक शिवलिंग की स्थापना और प्राण प्रतिष्ठा की जाने की योजना है।

सोलन-राजगढ़ मार्ग पर सोलन शहर से 7 किलोमीटर की दूरी पर एक स्थान पड़ता है, जटोली ! वहीं से मंदिर तक छोटे वाहनों के आवागमन के लिए सड़क बनी हुई है, जो तक़रीबन समुद्रतल से 1320 मीटर की ऊंचाई पर बने इस शिव मंदिर तक पहुंचाती है। वहां से सौ सीढ़ियां चढ़, मंदिर के मंडप से मुख्यद्वार तक जा, भीतर गर्भगृह में स्थापित शिवलिंग के दर्शन किये जाते हैं। भीतर स्फटिक मणि शिवलिंग के साथ शिव और पार्वती जी की मूर्तियाँ भी स्थापित की गई है | मंदिर के शिखर पर चार किलो सोने का 11 फुट लम्बा कलश मंदिर के सौदर्य में चार चाँद लगाता  हुआ दिखता है। मंदिर के प्रवेश द्वार के ऊपर गणेश जी तथा शेष नाग की प्रतिमाएं बनी हुई हैं, जिन्हें पीले और हरे रंग के कलशों से सुशोभित किया गया है। मंदिर के प्राँगण में जगह-जगह अन्य देवी-देवताओं की कलात्मक प्रतिमाओं के साथ-साथ कई त्रिशूल भी लगे मिलते हैं। मंदिर के पीछे का भाग अन्य भागों से ऊँचा है। मंदिर के उतरी छोर पर प्राकृतिक जलस्त्रोत है जिसके जल को औषधीय तत्वों से पूर्ण अति निर्मल और पवित्र माना जाता है। इसके बारे में कहा जाता है कि बहुत पहले कहीं से घूमते-घामते एक साधू महाराज यहां आ कर गुफा में रहने लगे। स्थानीय लोग एक बार उनकी परीक्षा लेने के लिए  लिए गुफा के आसपास छिप गये लेकिन थोड़ी देर बाद उन्हें गुफा से एक अजगर कि हुंकार सुनाई दी जिसके कारण वे डर गये और अपनी रक्षा हेतु उनसे अपनी  भूल के लिए क्षमा याचना की।  उस साधू ने कई सालो तक यहाँ तप किया। उस समय जटोली में पानी की बहुत तंगी थी ! कहते हैं उसी साधू ने अपने चिमटे को धरती पर मारकर पानी की यही निर्मल धारा निकाली थी जो कभी सूखती नहीं है। 

 यह मान्यता चली आ रही है कि पौराणिक समय में भगवान शिव यहां आए थे और कुछ समय यहां रह कर उन्होंने विश्राम किया था। उस समय उन्होंने अपनी जटाएं भी खोल रखी थीं जो उन्मुक्त हो लहराती रहती थी। इसीलिए उन जटाओं पर इस जगह का नाम जटोली के रूप में विख्यात हुआ। इस मंदिर के निर्माण और परिकल्पना के पीछे स्वामी कृष्णानंद परमहंस जी का उद्यम है। उनके मार्गदर्शन और दिशा-निर्देश पर ही जटोली शिव मंदिर का निर्माण शुरू हुआ। जिन्होंने इसका शिलान्यास वर्ष 1974 में किया था, पर जिसका निर्माण कार्य वर्ष 1983 में जाकर आरम्भ हो पाया। जो 39 वर्षो कि लम्बी अवधि के पश्चात 24  जनवरी, 2013 को स्फटिक शिवलिंग स्थापित होने पर पूर्ण हुआ।  मन्दिर निर्माण पर करोडो रूपए व्यय हुए जिनका इंतजाम प्रभु भगतों और आस्थावानों के सहयोग से ही संभव हो सका। मंदिर में, 1983 में ब्रह्मलीन हुए स्वामी कृष्णानंद की गुफा भी स्थित है, जहां बैठ कर वे शिव आराधना किया करते थे।
महाशिव रात्रि के पावन पर्व पर यहां मंदिर कमिटी की ओर से भव्य कार्यक्रम का आयोजन किया जाता है, जो सारी-सारी रात चलता है। इसके साथ ही विशाल भंडारा भी होता है। दूर-दूर से श्रद्धालुगण यहां आ पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना की पूर्ती की प्रार्थना करते हैं। देश के किसी भी कोने से यहां दिल्ली या चंडीगढ़ होते हुए आराम से पहुंचा जा सकता है। 

गुरुवार, 8 अगस्त 2019

एक बोध कथा का एक्सटेंशन


क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ ! इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके..................!

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एक बार कारोबार में अत्यंत नुक्सान होने की वजह से अपना सब कुछ गंवा बैठे एक बड़े व्यापारी ने, मजबूरी में दूसरे ठाँव, अपने जान-पहचान के लोगों के पास जा कर भाग्य आजमाने निश्चय किया। प्रस्थान वाले दिन अपना बचा-खुचा सामान एक बैल गाडी पर लाद, अपने परिवार, सेवकों और अपने पर आश्रित कुछ लोगों के साथ उसने अपनी यात्रा शुरू की। इनके साथ इनके दो-तीन पालतु कुत्ते भी थे।

रुकते-चलते जब दोपहर सर पर चढ़ आई तो मालिक ने कुत्तों को धूप से बचाने के लिए उन्हें बैल गाडी के नीचे छाया में कर दिया। ा नीचे छाया में चलते हुए कुत्तों को यह लगा कि मालिक ने गाडी की सारी जिम्मेदारी उन्हें सौंप दी है और अब वे ही गाडी को चला रहे हैं। ऐसा ख्याल आते ही वे फूल कर कुप्पा हो गए ! अचानक मिले इस तथाकथित सम्मान से गर्वित हो उनका सारा शरीर तन गया और वे ऐंठ कर गाडी के नीचे चलने लगे।

शाम के बाद जब अंधियारा घिरने लगा तो काफिले को रोक दिया गया। सब अपनी थकान दूर करने और भोजन=पानी का इंतजाम करने में जुट गए। बैलों को भी गाडी से खोल कुछ दूर बांध, चारा-पानी दे दिया गया। इसी बीच अंगड़ाइयां लेते कुत्ते भी गाडी के नीचे से बाहर आ इधर-उधर घूमने लगे। अचानक उन्होंने कुछ दूरी पर बैलों को चारा-पानी खाते देखा तो इनका पारा चढ़ गया कि सारे रास्ते गाडी हम ढ़ोते आए और मजा ये कर रहे हैं। बस फिर क्या था ! दोनों-तीनों लपक कर बैलों के पास पहुंचे और लगे भौंक-भौंक कर अपना गुस्सा जताने ! पहले तो कुछ देर बैल शांत रहे पर आखिर उनको भी तैश आ गया और उन्होंने फुंफकार कर जोर से अपना सर इनकी तरफ घुमाया, कुत्ते तो खैर बच लिए पर बैलों के जोर के झटके से उनका पगहा टूट गया ! बंधन से आजाद होते ही दोनों बैल ये गए वो गए ! और हमारे वीर श्वान पुत्र अपनी जीत के घमंड में इतराते वापस आ गए।

सुबह हुई। जब नित्य-कर्मों से फारिग हो चलने का समय आया, तो बैल गायब ! सब परेशान ! चारों ओर तलाशा गया पर कहीं कोई सुराग नहीं ! खोज-खाज कर सब जने हार-थक कर बैठ गए ! क्या किया जाए कुछ समझ नहीं आ रहा था। रास्ते से गुजरने वाले वाहनों से गाडी को ''टो'' करने की गुजारिश की गयी पर एक तो बैल गाडी, ऊपर से पुरानी, कोई भी साथ ले चलने को राजी नहीं हुआ। कुत्तों को समझ नहीं आ रहा था कि परेशानी क्या है वे गाडी के नीचे खड़े थे उसे ले चलने के लिए ! मालिक ने जब उन्हें नीचे छिपते देखा तो उसे उनका रात का भौंकना भी याद आ गया ! वह समझ गया कि बैल इनके परेशान करने की वजह से ही भागे हैं ! उसने इनको पकड़ा और उसी चाबुक से, जिससे बैलों को हांका जाता था, वो छितरैल की, वह छितरैल की, कि तीनों की भौं-भौं, क्याऊं-क्याऊं में बदल गयी और तो और अब वे बैठने के लायक भी नहीं रहे !

इधर चलने की कोई सूरत नजर ना आने पर, इनको नकारा देख, साथ के संगी-साथी भी एक-एक कर, जिसको जहां, जैसे, जो सुविधा मिली उसे ले, इनको छोड़ आगे बढ़ गए। अब काफिले में वो ही मजबूर लोग रह गए जिनका व्यापारी को छोड़ और कोई ठौर-ठिकाना या उपार्जन का अन्य साधन नहीं था। सूरते हाल यह था कि मालिक खड़े हो, आँखों पर हाथ रखे दूर-दूर तक नजर दौड़ा रहा था कि कोई घोड़ा-गदहा-टट्टू दिख जाए जिससे गाडी आगे रेंग सके ! साथ के लोग इसलिए खड़े थे क्योंकि मालिक खड़ा था और कुत्ते इसलिए क्योंकि वे तो बैठने से ही मजबूर थे !

शनिवार, 3 अगस्त 2019

मिलना ''मैं गाय जैसे'' (मैग्सेसे) पुरस्कार का

''भैया; बताइये ना ! भले ही उतना समझ ना पाएं पर गर्व से अपना छाती तो फुल्लइये सकते हैं  ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।'' 
चैतू मुंह बाए सब सुनता रहा ! कुछ देर बाद उसने पूछा , ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?

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सुबह -सुबह चाय वगैरह से निपटा ही था कि ठाकुर जी की रोजमर्रा की आवश्यक वस्तुओं की दूकान से घर-पहुँच सेवा के तहत उनका सहायक चैतू कुछ सामान पहुंचाने आ गया। सामान रखने के बाद जाते समय मेरे पास आ खड़ा हुआ। मैंने उसे देखा और पूछा ''क्यों चैतू कैसे हो ?''

''ठीक हूँ भईया ! आपसे एकठो बात पूछना था !''

''बोलो ! क्या बात है ?''
   
''भैया, ये ''मैं गाय जैसे'' पुरस्कार क्या होता है ?

मेरा एक बार तो चौंकना स्वाभाविक था, पर इतने दिनों से चैतू को जानने, उससे बतियाते रहने के कारण जल्दी ही समझ में आ गया उसका प्रश्न !

फिर भी पूछ लिया "कहां देखा यह सब ?"

"फेसबुक पर। बहुते लोग एकर बारे में बतिया रहा है।"

''अरे बुड़बक ! वो मैग्सेसे पुरस्कार है ! जो हमारे एक पत्रकार को मिला है। फिलीपींस देश का नाम सुने हो ? वहीं से इसका विजेता चुना जाता है।''

''अरे वाह भईया जी ! बहार का देश हमरे आदमी को समानित किया ! ई तो बहुते अच्छा बात है। ई का बहुत बड़ा इनाम होता है ?''

"हाँ, भाई ! एशिया के लोगों और वहां की संस्थाओं को बढ़िया और उल्लेखनीय काम करने पर उन्हें  इस इनाम के लिए चुना जाता है। दुनिया का सबसे प्रसिद्ध नोबेल पुरुस्कार सुने हो ? समझो, यह एशिया का नोबेल पुरस्कार की तरह है। इसका मिलना हम सबके लिए बड़े गर्व की बात है।''

''तभिएं !! हरदम दुखी और गरियाने वाला लोग भी आज बहुते खुस नज़र आ रहा है। बद्धियो दे रहा है सबको। अच्छा भैया; का पहले भी ऐसा पुरूस्कार हम लोगन को मिला है ?''

''अरे, बहुत बार। हमारे देश में गुणी, ज्ञानी, प्रतिभाशाली लोगों की कोई कमी नहीं है। हमें दुनिया भर के तरह-तरह के सम्मान मिलते रहे हैं। अभी तो हमारे एक ही माननीय को दसियों देश अपना सबसे बड़ा पुरूस्कार दे चुके हैं।'' 

''दसियों ? कऊन-कऊन सा ?"

''अरे, तुम अपना नाम तो बोल नहीं पाते ! वह सब कहां समझोगे !''

''नहीं भैया; बताइये ना ! भले ही बोल ना पाएं पर छाती तो फुल्लइये सकते हैं ! ई तो हमरे देशो के लिए गर्व का बात जो है।''

मजबूरन उसे बताना पड़ा कि बहुत कम समय में हमारे देश के एक ही आदमी को दुनिया के अलग-अलग देशों ने अपने-अपने सर्वोच्च पुरुस्कारों, जैसे, *जायेद मैडल पुरुस्कार, *फिलिप कोटलर पुरूस्कार, *सियोल शांति पुरूस्कार, *चैंपियंस ऑफ द अर्थ पुरुस्कार, *सेंट एंड्रूयज़ पुरूस्कार, *फिलिस्तीन ग्रैंड कॉलर पुरूस्कार, *आमिर अमानुल्लाह खान पुरूस्कार, *किंग अब्दुल सैश पुरूस्कार इत्यादि इत्यादि, से नवाजा है ! कई पुरूस्कार तो पहली बार किसी भारतीय को मिले हैं।  यह भी एक रेकॉर्ड ही है !'' 

चैतू मुंह बाए यह सब सुन रहा था ! कुछ देर बाद उसने पूछा ''तो भैया ! जो आज सब नाच रहा है, ई लोग भी तो इसी देश का आदमी है ! तो ई लोग तब काहे नहीं खुस हुआ ?''

अब मेरी बारी थी चैतू का मुंह तकने की !     

शुक्रवार, 26 जुलाई 2019

आज भी चल रही है 'एक 'घोड़ा ट्रेन''

यह गाडी इतनी सुविधाजनक और लोकप्रिय हो गयी कि हर कोई इसकी सवारी करने लगा। इसलिए एक की बजाए दो गाड़ियां चलने लगीं। आमने-सामने आ जाने पर पड़ने वाली मुश्किल का आसान सा हल निकाल लिया गया। जब बीच रास्ते में दो गाड़ियां मिलतीं तो ''मुसाफिर'' ट्रालियों को बदल लेते ! गाड़ीवान भी अपने-अपने घोड़ों का रुख दूसरी तरफ कर विपरीत दिशा में अग्रसर हो जाते ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
वर्तमान समय में घोड़े द्वारा खींचे जाने वाले वाहन "इक्का, तांगा या बग्गी" बीते दिनों की बात हो चुके हैं। यदि गाहे-बगाहे कहीं दीखते भी हैं तो मनोरंजन, तफरीह या शादी-ब्याह में ! लेकिन यह जान कर आश्चर्य होगा कि हमारे पड़ोसी मुल्क यानी पाकिस्तान में अभी भी लाहौर से करीब सौ की.मी. दूर, घोड़े की सहायता से एक परिवहन सेवा चलाई जा रही है। इस ''सुविधा'' को हॉर्स ट्रेन या घोडा रेल के नाम से जाना जाता है। जो रेल की तर्ज पर पटरियों पर तकरीबन तीन की.मी. तक चल, लोगों को अपने गंतव्य तक पहुंचाती है। इस घोडा-रेल की शुरुआत करीब 100 साल पहले जाने-माने व्यवसायी सर गंगाराम ने की थी | आजकल इसका वीडियो सोशल मीडिया पर काफी देखा और पसंद किया जा रहा है। इसका प्रसारण पाकिस्तान टी.वी. पर अनेकों बार हो चुका है, जिसके फलस्वरूप बाहर से इसे देखने आने वालों का तांता गंगापुर में लगा ही रहता है।
https://youtu.be/9uMhbzNUdlU


राय बहादुर सर गंगाराम  एक प्रसिद्ध इंजिनियर उद्यमी, और साहित्यकार थे।  अपने कपडे के व्यवसाय से लाहौर शहर को हर क्षेत्र में व्यापक सहयोग देने, उसे संवारने, उसे समृद्ध बनाने के अपने उपक्रम के कारण उन्हें ''आधुनिक लाहौर के पिता'' का उपनाम दिया गया था।  दिल्ली में भी अस्पतालों की कमी को देखते हुए 1951 में उनकी याद में एक सर्व-सुविधा युक्त अस्पताल बनाया गया, जिसे गंगाराम हॉस्पिटल के नाम से जाना जाता है। 
  
वे एक बेहतरीन इंजिनियर तो थे ही ! जब उन्होंने अपने क्षेत्र में लोगों को आवागमन की असुविधाओं से जूझते देखा तो उनके दिमाग में एक अनोखी और अद्वितीय परिवहन योजना ने जन्म लिया। वह थी, आज भी चल रही अनोखी घोड़ा ट्रेन सुविधा ! जिला लीलपुर (अब फैसलाबाद) की तहसील जारनवाला में, अपने गांव गंगापुर से बुकियाना रेलवे स्टेशन (लाहौर-जारनवाला रेलवे लाइन पर) तक उन्होंने दो फिट चौड़े रास्ते पर लकड़ी के तख्ते बिछवा कर उस पटरियां लगवा दीं। फिर एक ठेले जैसी ट्रॉली में, पटरी पर चल सकने लायक चक्के फिट कर उसे ट्रैक पर रखवा दिया ! इंजिन की जगह घोड़े का इस्तेमाल किया गया और इस तरह शुरू हो गयी दुनिया की अजीबोगरीब, इकलौती घोडा रेल। पटरियों पर चलने के कारण घोड़े को कम जोर लगाना पड़ता था और सड़क के तांगे वगैरह की बनिस्पत इस ठेले पर एक बार में ज्यादा लोग सफर कर सकते थे। घोड़े को ठोकर इत्यादि से बचाने के लिए तख्तों पर मिटटी डाल उसे अच्छी तरह समतल कर दिया गया था। फिर एक सोसायटी बना इसकी सारी जिम्मेदारी उसे सौंप दी गयी, जो नाम मात्र का शुल्क ले इसकी सेवा लोगों को उपलब्ध करवाने लगी। स्थानीय लोगों में यह अनोखी सवारी के नाम से मशहूर हो गयी।  

यह गाडी इतनी सुविधाजनक और लोकप्रिय हो गयी कि हर कोई इसकी सवारी करने लगा। इसलिए एक की बजाए दो गाड़ियां चलने लगीं। आमने-सामने आ जाने पर पड़ने वाली मुश्किल का आसान सा हल निकाल लिया गया। जब बीच रास्ते में दो गाड़ियां मिलतीं तो ''मुसाफिर'' ट्रालियों को बदल लेते। चालक भी अपने-अपने घोड़ों का रुख दूसरी तरफ कर विपरीत दिशा में अग्रसर हो जाते। आजादी के बाद भी सालों इसका चलना बदस्तूर जारी रहा। पर 1980 के दशक में कुछ कारणों से इसे बंद करना पड़ गया था ! पर चूंकि यह अपनी तरह का एक अनोखा अजूबा था इसलिए 2010 में फैसलाबाद जिला प्राधिकरणों ने सांस्कृतिक विरासत का रूप दे कर इसे फिर से शुरू करवा दिया। भले ही इसके बारे में ज्यादा लोग ना जानते हों पर यह आधुनिक युग का एक अजूबा तो जरूर ही है ! 

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