pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 7 फ़रवरी 2019

मंगता कौन ?

भिखारी तो दोनों ही थे, फर्क सिर्फ इतना था कि एक मजबूर हो कर मांग रहा था और दूसरा मजबूर करवा कर ! एक को देख मन में करुणा, दया का भाव जागृत होता था तो दूसरे को देख नफ़रत, घृणा और क्षोभ ! एक को कुछ दे कर किसी की जेब पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ रहा था जबकि दूसरे को देने से पूरे देश की अर्थ व्यवस्था डांवाडोल हो रही थी ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
प्रदेश से आरक्षण की मांग को ले कर रैली को राजधानी तक जाना था। उन तीनों ने भी मुफ्त में खाने-पीने और राजधानी की सैर का मौका लपक लिया। शहर पहुंचते ही पुलिस से मुठभेड़ हुई ! ट्रैक्टर-ट्रालियां, दो पहिया, छोटी गाड़ियां, टपरे-छकड़े सब रोक दिए गए ! नतीजतन नारेबाजी, चक्का जाम. आगजनी, तोड़-फोड़ आदि तो होनी ही थी ! इस सब से मची अफरातफरी के बाद सरकार कसमसाई ! आरक्षण पर आश्वासन और फौरी तौर पर मुफ्त का राशन-पानी-बिजली-मंहगाई भत्ते की घोषणा हुई। भीड़ वापस !

ये तीनों भी रैली और अपनी सफल यात्रा पर इतराते अपने वाहन की खोज में मटरगस्ती कर रहे थे कि एक भिखारी ने अपनी भूख का हवाला दे कर उनसे कुछ देने का अनुरोध किया ! एक-दो बार टालने के बाद तीनों भड़क उठे, ''शर्म नहीं आती भीख मांगते ? कुछ काम क्यों नहीं करते ? मुफ्त में खाने की आदत पड़ गयी है ! चलो आगे जाओ !!''

 भिखारी तो दोनों ही थे, फर्क सिर्फ इतना था कि एक मजबूर हो कर मांग रहा था और दूसरा मजबूर करवा कर ! एक को देख मन में करुणा, दया का भाव जागृत होता था तो दूसरे को देख नफ़रत, घृणा और क्षोभ ! एक को कुछ दे कर किसी की जेब पर कोई ख़ास फर्क नहीं पड़ रहा था जबकि दूसरे को देने से पूरे देश की अर्थ व्यवस्था डांवाडोल हो रही थी !!

शनिवार, 2 फ़रवरी 2019

भगवान को सरल जन ही प्रिय हैं !

बेचारा दौड़ा-दौड़ा महात्मा जी के पास गया और बोला महाराज आज रसोई ठंडी पड़ी है, कुछ बन नहीं रहा ! महात्मा जी बोले, अरे तुम्हें बताना भूल गया था, आज एकादशी है, ना कुछ बनेगा, नाहीं मिलेगा। सबका उपवास रहेगा। ये बोला, मेरा भी ? महात्मा बोले, हाँ ! सभी का। यह बोला, महाराज आपके इतने चेले हैं, उनसे करवा लो ! महात्मा बोले, नहीं सभी को करना होता है। यह घबड़ाया, बोला महाराज यदि मैंने आज एकादशी कर ली तो मैं तो द्वादशी देख ही नहीं पाऊँगा ! महात्मा समझ गए कि ये भूखा नहीं रह सकता...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
सरलता का अर्थ है, अंदर-बाहर से एक जैसा होना। मन, वचन और कर्म में समान होना। ऐसे लोगों मे दर्प, दंभ, अहम आदि दुर्गुण नहीं होते ! सरलता में मित्रता है, प्रेम है, अपनापन है, जोड़ने की शक्ति है। यही जोड़ने की शक्ति व्यक्ति को व्यक्ति से, समाज से और फिर परमात्मा तक से जोड़ देती है। पिछले दिनों इसी पर एक कथा पढ़ने को मिली, बहुत अच्छी लगी तो लगा सबसे साझा करनी चाहिए ! कुछ लम्बी जरूर है पर मनोरंजक भी है। 

किसी गांव में एक किसान अपने तीन बेटों के साथ रहा करता था। उसका छोटा बेटा सीधा-सादा, सरल ह्रदय, भोला-भाला था। किसान के दोनों बेटे खेत में अपने पिता का हाथ बटाते थे पर छोटे को भोजन बहुत प्रिय था। उसकी खुराक भी कुछ ज्यादा ही थी। वह खाता था और पड़ा रहता था। समय की मार एक दिन किसान का निधन हो गया। अब दोनों भाइयों को निठ्ठला छोटा भाई भार लगने लगा। काम का ना काज का दुश्मन अनाज का ! उन्होंने उसे एक दिन घर से निकाल दिया। अब वह कहां जाता ! ऐसे ही बिसूरते हुए गांव के बाहर बैठा हुआ था कि उसे एक महात्मा अपने शिष्यों के साथ आते दिखे। सभी हट्टे-कट्टे, स्वस्थ नजर आ रहे थे। इसने सोचा सब मोटे-ताजे, तंदरुस्त नजर आ रहे हैं, यह सब खूब खाते होंगे ! मुझे भी भोजन मिल जाएगा। यही सोच वह महात्माजी के चरणों में लोट गया और अपने को भी चेला बनाने की और साथ ले चलने की विनती करने लगा। महात्मा दयालु थे, उन्होंने उसे तुलसी की माला पहना दी, नाम रख दिया, मंत्र दे दिया ! बोले चलो ! यह ठहरा भोला बंदा, पूछने लगा, करना क्या होगा ? महात्मा बोले, कुछ नहीं, पूजा-आरती में खड़े रहना है। भगवान का नाम लेते रहना है। उनका ध्यान करना है, बस। पर इसको तो अपने भोजन की चिंता थी ! सो फिर पूछा, महाराज खाने को ? महात्मा मुस्कुराए, बोले, दोनों समय प्रेम से, भरपेट ! पर महाराज मेरा दो वक्त से....! महात्मा हंसने लगे, बोले तुम्हें चार बार मिलेगा, अब खुश ! उसको लगा यह तो स्वर्ग मिल गया ! करना कुछ नहीं, खाना भरपूर। वह साथ हो लिया।

पर उसे क्या पता था की यहां भी मुसीबत आएगी। एक दिन उठ कर देखा तो भंडार में सब वैसे ही पड़ा था, चूल्हे भी ठंडे पड़े थे, कोई हलचल नहीं। बेचारा दौड़ा-दौड़ा महात्मा जी के पास गया और बोला महाराज आज रसोई ठंडी पड़ी है, कुछ बन नहीं रहा ! महात्मा जी बोले, अरे तुम्हें बताना भूल गया था, आज एकादशी है, ना कुछ बनेगा, नाहीं मिलेगा। सबका उपवास रहेगा। ये बोला, मेरा भी ? महात्मा बोले, हाँ ! सभी का। यह बोला, महाराज आपके इतने चेले हैं, उनसे करवा लो ! महात्मा बोले, नहीं सभी को करना होता है। यह घबड़ाया, बोलै महाराज यदि मैंने आज एकादशी कर ली तो मैं तो द्वादशी देख ही नहीं पाऊँगा ! महात्मा समझ गए कि ये भूखा नहीं रह सकता ! बोले नियमानुसार तो भोजन नहीं बन सकता पर भगवान के भोग के रूप में बना लो और उनका भोग जरूर लगाना। जाओ भंडारे से सामान ले कर बाहर जा बना लो। बंदा खुश उसने सामान लिया, नदी किनारे जा, जैसा बन पड़ा बना, भोग लगाने को प्रभु को पुकारने लगा कि आइए भोग लगा लीजिए ! उसे लगा कि यूँ ही बुलाने पर भगवान आते होंगे और भोजन ग्रहण करते होंगे ! पर प्रभू नहीं आए ! इसको लग रही थी भूख ! बार-बार बुलाने पर भी जब प्रभू नहीं आए तो इसे लगा कि इस रूखे-सूखे भोजन को देख वे नहीं आ रहे हैं सो इसने ऊँची आवाज में कहा, सुनो आज मंदिर के भरोसे मत रहना, आज पूरी हलवा नहीं मिलेगा। आज एकादशी है वहां कुछ नहीं बना, भूखे रह जाओगे ! आज तो यही सूखी रोटी और नदी का पानी है। जल्दी आ जाओ, मुझे भी जोरों की भूख लगी है। उसकी इस सरलता पर प्रभू रीझ गए और प्रकट हो गए। पर वे अकेले नहीं आए, उनके साथ सीता माता भी थीं। अब जब इसने प्रभू और सीता माता को देखा तो उनकी सुंदर जोड़ी को देखता ही रह गया, तन-मन आनंद से भर गए पर साथ ही उदास भी हो गया ! सोचने लगा गुरु जी ने एक भगवान के लिए कहा था ये तो दो आ गए ! अब वो कभी भगवान जी को देखता तो कभी भोजन की ओर ! प्रभू भी कौतुक कर रहे थे, बोले क्या हुआ ? बोला, कुछ नहीं एक के इंतजाम की बात थी, आप दो जने आ गए ! थोड़ी एकादशी तो करवा ही दोगे ! चलो कोई बात नहीं ! विराजो। भगवान बैठ गए ! भोजन परोस दिया। बोला, मैं कुछ भूखा तो रहा पर आपको देख कर बहुत अच्छा लगा ! चलो आज का तो हो गया, मैं समझ गया कि आप दो आते हो; अगली एकादशी पर मैं ज्यादा इंतजाम कर के रखुंगा। पर आज की तरह परेशान मत करना जल्दी आ जाना। भगवान ने कहा, ठीक है और चले गए।

इधर इसने आ कर गुरु जी से कुछ नहीं बताया क्योंकि इसे लग रहा था भगवान ऐसे ही आते होंगे, गुरु जी को मालुम ही होगा, इसमें बताने वाली बात ही क्या है। इतना सरलचित्त ! अगली एकादशी आई तो महात्मा जी से बोला, गुरूजी कुछ सामान बढ़वाओ ! उन्होंने पूछा, क्यों ? तो बोला, वहां दो भगवान आते हैं। गुरूजी समझे इस बार भूखा रह गया होगा; इसी से ऐसा कह रहा है। उन्होंने सामान बढ़वा दिया। अब इसने सारा सामान ले, नदी किनारे पहुंच, भोजन बना, प्रभू को पुकारा ! भगवान तो इंतजार ही कर रहे थे। प्रकट हो गए। पर इस बार साथ में लक्ष्मण जी भी थे ! अब इसने जो तीन को देखा तो बोला, हद हो गयी; एक को बुलाओ तो दो आते हैं; दो का इंतजाम करो तो तीन आते हैं ! अब यह कौन है ? प्रभू बोले, ये मेरे छोटे भाई लक्ष्मण हैं। भोले बंदे को शक ! पूछने लगा, सच कह रहे हो या ऐसे ही पकड़ लाए हो ? प्रभू मुस्कुराते हुए बोले, नहीं-नहीं, सच में मेरे छोटे भाई हैं। ये परेशान, बोला, गुरु जी ने तो सिर्फ ठाकुर जी को भोग लगाने को कहा था, यहां तो पूरा परिवार ही आ गया ! उसकी बात पर प्रभू और सीता मैया तो खूब हँसे पर लक्ष्मण जी सोचने लगे, प्रभू कहाँ ले आए ! क्या स्वागत हुआ है। बंदा बोला, चलो कोई बात नहीं, भूखा भले ही रह जाऊं, पर आपलोगों को देख कर मुझे अच्छा बहुत लगता है। चलिए विराजिए, एक ही तो ज्यादा है, हो जाएगा। सबने भोग लगाया। प्रभू जब चलने लगे तो इसने बार-बार उनके चरणों में सर नवाया, बोलने लगा, आप लोग बहुत अच्छे लगते हो, बहुत सुंदर हो ! कहते-कहते उसकी आँखों में आंसू भर आए। तभी अचानक उसने भगवान से कहा, प्रभू , अगली एकादशी का अभी से बता जाओ कितने आओगे, ताकि मैं उतने का इंतजाम कर रखूँ। यही एक बात है पहले से बता दिया करो कितने आओगे ! और कोई परेशानी नहीं है। प्रभू तो कौतुक कर ही रहे थे, बोले, तुम चिंता मत करो, सब ठीक हो जाएगा, हम आ जाएंगे !

इस बार भी इसने महात्मा जी को कुछ नहीं बताया। अगली एकादशी भी आ गयी। अब गुरु जी से सामान कैसे बढ़वाऊं यह सोच कर परेशान था। इसे कुछ उदास सा देख महात्मा जी ने ही पूछ लिया, क्या बात है बच्चा ? कोई परेशानी हो तो बताओ ! जब उन्होंने पूछ ही लिया तो इसने कहा, क्या बताएं, वहाँ बहुत से भगवान आते हैं, हर बार भोजन कम पड जाता है। राशन दोगुना करवा दें। महात्मा जी ने सोचा, इतना तो यह खा नहीं सकता ! जरूर बेच देता होगा। पर बोले कुछ नहीं और उसके कहे मुताबिक़ राशन दिलवा दिया। पर करता क्या है यह देखने उसके पीछे-पीछे जाने की ठानी। यह सरल ह्रदय सामान ले जा पहुंचा नदी तट पर। पर इस बार उसने भोजन बनाया नहीं, सोचा पहले बुला कर देख लूँ, कितने आते हैं, फिरउसी हिसाब से बनाऊंगा। सो इसने प्रभू को पुकारा ! इसके पुकारते ही भगवान भी आ गए। पर अकेले नहीं इस बार लक्ष्मण जी के साथ-साथ भरत जी, शत्रुघ्न जी तथा हनुमान जी भी साथ थे, यानी पूरा राम दरबार ! इसने देखा तो परेशान, बोला, प्रभू यह तो हद है ! एक को बुलाया तो दो आए, फिर तीन आज तो इतने सारे ! इंसान तो इंसान आप तो वानर को भी साथ ले आए। तो सुन लो मैंने भी भोजन नहीं बनाया है ! प्रभू ने पूछा,  ऐसा क्यों ? तो बोला, जब मुझे मिलना ही नहीं, तो मैं क्यों बनाऊँ ? यह सारा सामान पड़ा है, बनवा लो और भोग लगा लो ! इतना कह वो एक किनारे पेड़ के नीचे जा कर बैठ गया। भगवान भी भक्त के वश ! भोजन व्यवस्था संभाल ली गयी। भरत जी और हनुमान जी ने सफाई वगैरह की, लक्ष्मण जी लकड़ी-पानी ले कर आए। शत्रुघ्न जी ने सामान व्यवस्थित किया और सीता जी ने रसोई संभाली। अब जब साक्षात अन्नपूर्णा को भोजन बनाते देखा तो जितने ऋषि-मुनि-संत-महात्मा थे वे सब भी आ उपस्थित हुए, माँ के हाथों का प्रसाद पाने को। उधर इतना कुछ हो रहा था और इधर हमारा भक्त आँख बंद किए बैठा था। जब प्रभू ने पूछा, भाई आँख क्यों मूँदे बैठे हो ? तो बोला, पहले तो कुछ मिल भी जाता था आज इतनी भीड़ में जब कुछ मिलना ही नहीं है तो देखने से क्या फायदा !

इधर गुरु जी भी यह देखने पहुँच गए कि देखें ये सामान का करता क्या है ! तो देखते क्या हैं कि ये आँखें मूंदे बैठा है और सामने सामान यूँ ही पड़ा हुआ है ! अचरज में पड़ वे बोले, क्यों बच्चा, क्या हो रहा है ? उनकी आवाज सुन ये उठा और बोला आपने तो अच्छी मुसीबत में डाल दिया ! देखिए कितने भगवान आए हुए हैं ! गुरु जी ने इधर-उधर देखा उन्हें कुछ भी दिखाई नहीं दिया, बोले, यहाँ तो कोई भी नहीं है ! तुम दिख रहे हो और सामान दिख रहा है बस ! सामने खड़े प्रभू मुस्कुरा रहे थे। इसने सामने खड़े भगवान से कहा, गुरु जी ने तो मुझसे एक भी एकादशी नहीं करवाई, तुमने पूरी करवा दी और उन्हें पता भी नहीं लगने दे रहे हो ! इनको क्यों नहीं दिखते ? इनको भी दिखो ! प्रभू बोले, मैं इनको नहीं दिख सकता ! क्यों नहीं दिख सकते ? ये मेरे गुरु हैं, विद्वान हैं, नेक हैं, महान हैं। प्रभू बोले, इसमें कोई संदेह नहीं, तुम्हारे गुरु बहुत महान हैं, विद्वान हैं, योग्य हैं, भजनानंदी हैं फिर भी मैं उन्हें नहीं दिखूंगा ! आँखों में आंसू ला वह बोला, इतना सब है फिर क्यों नहीं दिखोगे ? इसलिए क्योंकि वे तुम्हारी तरह सरल नहीं हैं। मैं तो सरल के लिए सरलता से मिलता हूँ। उसको बड़बड़ाते देख गुरूजी ने पूछा, क्या हुआ बच्चा ? क्यों रो रहे हो ? तो बोला, भगवान् कह रहे हैं कि आप सरल नहीं हो ! इतना सुनते ही गुरु जी की आँखों से अविरल जल बहने लगा ! बोले, सचमुच सब कुछ जीवन में मिला पर सरलता नहीं मिल पाई ! जिससे भगवान् के दर्शन होते थे वही नहीं मिला तो मेरा तप-पूजा-पाठ यहां तक कि जीवन भी व्यर्थ है ! उनके आंसू थमते नहीं थे ! उनका ऐसा पश्चाताप देख प्रभू भी पिघल गए और उन्हें भी दर्शन दे कृतार्थ किया।          

शुक्रवार, 18 जनवरी 2019

संतरा और कीनू, फर्क क्या है ?

आम धारणा है कि एक जैसी चीजों में यदि किसी एक वस्तु की कीमत दूसरी से कम है तो उसकी गुणवत्ता में भी जरूर कुछ कमी होगी ¡ जैसे संतरे की तुलना में कीनू की कीमत में फर्क होने के कारण इसको कुछ कम कर के आंका जाता है ¡ जब की यह हर लिहाज से संतरे के पासंग है। सस्ता होने के बावजूद यह ऊर्जाप्रद, खनिज, विटामिन और लाभकारी पोषण तत्वों से भरपूर फल है । इसका रस और फल बड़ों और बच्चों सभी के लिए संतरे के समान ही सुरक्षित है। यह सबसे स्वस्थकर साइट्रस फलों में से एक माना जाता है ....... ¡

#हिन्दी_ब्लागिंग 
जैसे  गर्मियों में फलों के राजा आम की बहार रहती है वैसे ही सर्दियों में संतरा या नारंगी अपने स्वाद, सुगंध और
कीनू 
अपनी गुणवत्ता के कारण सबका चहेता बना रहता है। हालांकि यह फ़रवरी-मार्च तक आसानी से उपलब्ध रहता है पर इस बार यह हाट-बाज़ार-नुक्कड़-ढेले सब  ठीयों से अचानक ही गायब हो गया है और उसकी जगह, अफरात रूप में हर जगह उसी परिवार का एक सदस्य कीनू या किन्नू नजर आने लगा है। पर संतरे की बनिस्पत कहीं सस्ता होने के बावजूद लोग इसे लेने में थोड़ा हिचकिचाते हैं। आम धारणा है कि यह संतरे जितना लाभदायक नहीं है ! मेरी भी कुछ ऐसी ही सोच थी पर पिछले महीने पंजाब प्रवास पर सारे भ्रम दूर हो गए ! 

पंजाब में मेरे मामाजी के दोस्त हैं श्री रामपाल जी, उनके पुश्तैनी कीनू के बाग़ हैं। इस बार उनसे मिलना हुआ और बाग़ की सैर भी ! बीस-बीस फुट ऊँचे पेड़ों पर पत्तियां कम कीनू फल ही ज्यादा नजर आ रहे थे। सारा
पेड़ों पर लदे कीनू 
वातावरण जैसे नारंगी रंग में रंग गया हो। रामपाल जी ने ही बताया कि संतरे और कीनू एक ही बिरादरी के फल हैं। पर जहां संतरे का अस्तित्व बहुत पहले का है वहीं कीनू संतरे और माल्टे की संकर प्रजाति है। संतरे की तुलना में उसकी गुणवत्ता में कोई कमी या फर्क नहीं होता। उल्टा कीनू में ज्यादा मिठास और रस होता है ! और यह 
सबसे स्‍वस्‍थ साइट्रस फलों में से एक माना जाता है। रंग-रूप तक़रीबन एक जैसे होने के बावजूद दोनों में बहुत मामूली सा अंतर होता है, जिससे लोगों को इनमें फर्क करने में दिक्कत होती है। कीनू का आकार कुछ बड़ा होता है। इसका छिलका कुछ पतला, चमकदार और मुलायम होता है तथा इसमें बीजों की मात्रा संतरे से ज्यादा होती है। हाँ ''पैकिंग'' के लिहाज से संतरे का अंदुरुनी भाग कुछ सफाई और सलीकेदार होता है और आसानी से छिला जा सकता है, जबकि कीनू का थोड़ा बेतरतीब ! वह भी शायद उसके बचाव की दृष्टि हेतु। इसका उत्पादन भी संतरे की बनिस्पत बहुत ज्यादा होता है। जो किसानों के लिए भी आर्थिक दृष्टि से लाभप्रद है। 

मेरे यह पूछने पर कि इतने गुणों के बावजूद इसकी कीमतें संतरे से इतनी कम क्यों होती हैं ! इस पर रामपालजी ने इसके दो प्रमुख कारण बताए ! पहला तो यह कि कीनू का छिलका बहुत नरम होता है, अतः इसे पेड़ से तोड़ना और पैक करके एक्सपोर्ट करना कुछ मुश्किल काम है। इसके ढीले छिलके के कारण, कीनू को
संतरे 
एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाने के दौरान अतिरिक्त देखभाल की आवश्यकता होती है, क्योंकि यह आसानी से क्षतिग्रस्त हो जाता है। दूसरे इसमें बीजों की अधिकता से इसका जूस या स्क्वैश बनाना थोड़ा कठिन होता है क्योंकि ऐसा करते समय यदि इसका एक भी बीज भी पिस जाए तो सारे रस का स्वाद बिगड़ जाता है ! व्यावसायिक उपयोग
 तथा एक्सपोर्ट नहीं होने के कारणों से ही इसकी कीमत संतरे से कम भी उतना हो जाती है वरना यह भी उतना ही लाभदायक फल है। इसमें कैलौरी कम होती है पर पोषक तत्वों की मात्रा बहुत ज्यादा होती है। 


इसलिए यदि संतरे और कीनू को लेकर कोई संदेह मन में हो तो उसे नि:संकोच त्याग, कम कीमत में इस 


ऊर्जावान, लाभप्रद, खनिज, विटामिन और पोषक तत्वों से भरपूर फल का रोज सेवन करें। किन्नू का रस और फल बड़ों और बच्चों सभी के लिए सुरक्षित है। पर अति तो हर चीज की नुकसानदायक होती है सो इसका भी हर खाद्य पदार्थ की तरह उचित मात्रा में ही उपयोग किया जाना चाहिए। बाकि तो सब ठिक्के है.........!

मंगलवार, 8 जनवरी 2019

रिलायंस जूट मील, स्वर्गादपि गरीयसी

आज के बच्चे और उनके कुछ पहले के युवा तो शायद हमारे उन सुनहरे दिनों की कल्पना भी नहीं कर सकते, जब रिलायंस के बच्चे ही नहीं पूरा स्टाफ एक परिवार की तरह हुआ करता था ! हरेक का सुख-दुःख, ख़ुशी-गमी, सफलता-असफलता, रीती-रिवाज सबके हुआ करते थे ! हम बच्चे सबके सांझा थे, मजाल है कि खाने-नाश्ते के समय आप किसी और के घर पर हों और बिना खाए रह जाओ ! अच्छा लगा होगा यह पढ़ कर ! पर इसके साथ ही यह भी था कि शरारत-बदमाशी-मस्ती करते पकडे जाने पर शिकायत के लिए पापा या मम्मी का इंतजार नहीं किया जाता था, जो भी काका-काकी सामने होते थे वही, वहीं ''लपेट-लपुट'' कर मामला निपटा देते थे  :-)

#हिन्दी-ब्लागिंग   
कभी-कभी यादों के लगातार थपेड़ों से जब यादाश्त पर जमी काई की कुछ परत छटती है तो कभी-कभी ऐसे नायाब और बेशकीमती मोती उभर कर सामने आ जाते हैं, जिन्हें अपने पास रखा ही नहीं जा सकता वे होते ही हैं बांटने के लिए ! बचपन से युवावस्था तक का समय जहां गुजरा हो उसे भूल पाना असंभव होता है ! इसीलिए जब-जब रिलायंस ग्रुप की पिक्स सामने आती हैं तब-तब दिमाग के स्क्रीन पर पुरानी यादें आ-आ कर पुराने दिनों को साकार कर देती हैं। आज के बच्चे और उनके कुछ पहले के युवा तो शायद हमारे उन सुनहरे दिनों की कल्पना भी नहीं कर सकते, जब रिलायंस के बच्चे ही नहीं पूरा स्टाफ एक परिवार की तरह हुआ करता था ! हरेक का सुख-दुःख, ख़ुशी-गमी, सफलता-असफलता, रीती-रिवाज सबके हुआ करते थे ! हम बच्चे सबके सांझा थे, मजाल है कि खाने-नाश्ते के समय आप किसी और के घर पर हों और बिना खाए रह जाओ ! अच्छा लगा होगा यह पढ़ कर ! पर इसके साथ ही यह भी था कि शरारत-बदमाशी-मस्ती करते पकडे जाने पर शिकायत के लिए पापा या मम्मी का इंतजार नहीं किया जाता था, जो भी काका-काकी सामने होते थे वही, वहीं ''लपेट-लपुट'' कर मामला निपटा देते थे ! आज उन्हीं दिनों एक किस्सा झाड़-पोछ कर सबके सामने रखने की कोशिश करता हूँ !  

बीच वाली बिल्डिंग 
अंग्रजों द्वारा बंगाल के चौबीस परगना के भाटपारा में स्थापित #रिलायंस_जूट_मील पर 1963-64 में कानोरिया परिवार का मालिकाना हक़ हुआ। उस समय तीन ही बिल्डिंग्स हुआ करती थीं। जेटी के पास वाली, बीच वाली और उधर गेट के पास तीसरी। उस समय डागा जी, चीफ एग्जेक्युटिव थे। शांत स्वभाव के बुजुर्ग, रोब-दाब भरी गंभीर शक्शियत, समय और काम के पाबंद, उसूलों के पक्के ! सुलझे हुए एडमिनिस्ट्रेटर। इस सबके बावजूद उन्हें कभी गुस्से में जोर से बोलते किसी ने नहीं सुना। हम सब के दादाजी के समान। 
पैदल पथ 
आज की जेनेरेशन को सुन कर अजीब लगेगा कि उन दिनों फ्रिज, गीजर, एसी वगैरह तो हुआ नहीं करते थे ! यहां तक कि रसोई गैस भी नहीं थी। तब हर घर में कोयले की सिगड़ी पर ही खाना बनता था। कोयला ठीक से सुलगने के पहले बहुत धुआं देता है सो घरों में काम करने वाले सहायक/सहायिकाएं चूल्हे को सुलगा कर घरों के बाहर रख देते थे, फिर धुआं ख़त्म होने के पश्चात उसे रसोई में ले जाया जाता था। तब हर घर के लिए रोज 15 कीलो कोयला, 5 कीलो बर्फ फ्रिज की जगह, जिसे ''मील-मेड आइस बॉक्स'' में रखा जाता था और गर्म पानी के लिए घरों के पिछवाड़े की ओर बड़े-बड़े सिलिंडर हुआ करते थे, जिनमें कोयले से पानी गर्म कर घरों में भेजा जाता था। एक चौपहिया वाहन ''एम्बैसडर'' हुआ करता था जो वक्त-जरुरत सबके लिए उपलब्ध था। मील के अंदर हर छोटा-बड़ा पैदल ही चलता था। 

इन सीढ़ियों के पास ही अंगीठी सुलग रही थी, यहीं से धुआं अंदर जा ऊपर तक धुआं-धुआं किए दे रहा था 
मैं जो बताने जा रहा हूँ वह बात शायद 64-65 की है। तीनों बिल्डिंग्स में बाहर-बाहर रंग-पुताई हुई थी। उन दिनों भी सिर्फ बाहर के रंग-रोगन में 15 से 20 हजार का खर्च आ जाता था जो एक बड़ी रकम हुआ करती थी। रंग वगैरह हुए हफ्ता-दस दिन ही हुए थे। एक शाम डागा जी शाम के समय मेन आफिस से घर आ रहे थे। जब वे बीच वाली बिल्डिंग के पास पहुंचे तो देखा वहां एक सिगड़ी सुलग-सुलग कर धुऐं का गुबार उगल रही है। उस दिन हवा भी जेटी की तरफ से इधर की ओर चल रही थी; सो धूआँ मजे से सीढ़ियों से होता हुआ ऊपर दूसरी मंजिल तक जा रहा था। अपने इस सफर में वह पहली और दूसरी मंजिल की बड़ी-बड़ी खिड़कियों से बाहर भी किसी मनचले की तरह ताका-झाँकी करने से बाज नहीं आ रहा था ! डागा जी यह देखते ही खड़े हो गए ! ना कोई पूछ-ताछ की, ना हीं गुस्से से चिल्लाए ! उधर लॉन में एक माली काम कर रहा था; उसे बुलाया और चूल्हा उठवा कर गंगा में फिंकवा दिया !! उसी दम वापस लौटे, आफिस गए, एक साथ पच्चीस गैस कनेक्शन का आर्डर पास किया, इस हिदायत के साथ कि दो घंटे के अंदर हर घर में गैस पहुंच जानी चाहिए ! मील के बाहर ही पेट्रोल पंप था (अभी भी होगा) उन्हीं के पास गैस की भी एजेंसी थी ! उस रात रिलायंस में सबके घर धुंआ रहित वातावरण में खाना बना। 
जिधर से चूल्हा गंगा धाम सिधारा 
ऐसे हुआ करते थे एडमिनिस्ट्रेटर ! जो संस्था को अपना समझ चलाते थे। पर अपने स्टाफ का दुःख-दर्द भी समझते थे। वे जानते थे कि कोयले का उपयोग ही होता है भोजन बनाने में उसके सिवा और कोई चारा नहीं है। पर दूसरी तरफ संस्था का नुक्सान भी अनदेखा नहीं किया जा सकता था ! त्वरित निर्णय ने दोनों समस्याएं हल कर दीं। तभी तो छोटा-बड़ा हर स्टाफ, कर्मचारी, सदस्य उन्हें अपना मान उनकी इज्जत करता था तथा अपना बेहतर देने को तत्पर रहता था। 

@यह संस्मरण पसंद आए तो कुछ और रोचक प्रसंग याद करने की कोशिश को प्रोत्साहन मिलेगा। यदि इससे किसी को कुछ और याद आ जाए तो साझा जरूर करे !      

शनिवार, 5 जनवरी 2019

हम वाकई में असहिष्णु हैं !

यह सब लिखने-बोलने की तनिक भी इच्छा नहीं करती, क्योंकि ऐसा करना बर्रे के छत्ते पर पत्थर फेंकने के समान है !पर जब कुछ लोग रोज-रोज सोशल मिडिया पर आ बकवास कर दूसरों पर सही-गलत इल्जाम मढ़ने से बाज नहीं आते तो ना चाहते हुए भी रोष प्रकट हो जाता है ! कई दिनों से घुमड़ता आक्रोश आज ना चाहते हुए भी सहिष्णुता का बाना त्याग असहिष्णुता का आकार पा ही गया ! पर यह भी सच है कि जिस दिन देश के अवाम के सामने सारी असलियत आ जाएगी, उस दिन ऐसे लोगों की तक़रीबन बंद हो चुकी दुकानें, ढहा भी दी जाएंगी। क्योंकि अति तो किसी भी चीज की खतरनाक होती है और सच का सूर्य कितने भी घने बादलों से ढका हो अपने तेज व प्रकाश से सामने आ ही जाता है और तब सहिष्णु और असहिष्णुता का फर्क भी किसी को समझाना नहीं पडेगा ............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारे देश में कुछ लोग ऐसे हैं जो ना हीं देश को अपना मानते हैं और नाहीं भगवान को ! ऐसे लोगों को भी हमने सर माथे पर बैठा रखा है, क्योंकि हम असहिष्णु जो हैं ! यहां रह कर, यहां का खा-पी कर विदेशों का गुण-गान करने वालों को भी हम अपने देश के सम्मानों से सम्मानित करते नहीं अघाते, क्योंकि हम असहिष्णु हैं ! अपने देवी-देवताओं की, अपनी आस्थाओं की ऐसी की तैसी करने वालों को भी हमने माननीय बना रखा है, क्योंकि हम असहिष्णु हैं ! अपने नेताओं को, अपने शहीदों को, अपने सुरक्षा बलों को गालियां देने वालों, उनको नीचा दिखाने वालों, उनका अपमान करने वालों की बातों को भी हम टाल जाते हैं क्योंकि हम असहिष्णु जो ठहरे। ऊपर से विडंबना यह है कि ऐसे लोग भक्क से मुंह खोल खुद तो रोज विष-वमन करते हैं, पर अपना जरा सा विरोध होते ही अपने जामे से बाहर हो जाते हैं, सामने वाले को तरह-तरह के अलंकारों से विभूषित करते हुए ! इन्हें हमारे रहन-सहन, बोल-चाल, खान-पान, आस्था-धर्म, परंपरा-विश्वास यानी हर चीज से शिकायत है ! पर असहिष्णु कौन ?... हम !

इन जैसे सहिष्णु जानते हैं कि इस देश में कैसा भी अपराध करने, अराजकता फ़ैलाने, दुष्कर्म करने, वैमनस्य फैलाने यानी किसी भी प्रकार का गलत काम करने पर यदि उसका हजार लोग विरोध करेंगे तो दस लोग पक्ष में भी खड़े हो जाएंगे, इन्हीं दस लोगों का साथ, इनका हौसला और हिमाकत सदा बनाए रखता है। यह बात समाज के हर क्षेत्र में होने वाले दुष्कर्मों पर लागू होती है। ताजा उदहारण है, सिर्फ हठधर्मिता के कारण ऐसी दो महिलाओं ने सबरीमाला के मंदिर में प्रवेश किया जिन्हें शायद ही यह पता भी हो कि अय्यप्पा कौन थे ? पर सिर्फ करोड़ों लोगों को नीचा दिखाने की गरज से आठ सौ साल से चली आ रही परंपरा को तोड़ने की हिमाकत कर डाली गयी। भगवान के लिए उसके सारे बच्चे बिना भेदभाव के बराबर होते हैं ; हरेक को पूरा हक़ है उसके पास जाने का, उसे अपने सुख-दुःख का भागीदार बनाने का, उससे अपने कष्टों से निजात दिलाने की प्रार्थना करने का, क्योंकि मनुष्य का अंतिम सहारा तो वही होता है ! यदि कहीं कोई मतभेद है तो उसे सुलझाया भी जा सकता है ! पर इस तरह की हेकड़ी और अक्खड़ता तो कतई स्वीकार करने योग्य नहीं है। यह जो हुआ वह आस्था की बात ही नहीं है उसका ध्येय समाज में आपस में दरार डालने का था, अराजकता फैलाने का था और वह सफल हुआ ! क्योंकि उन महिला रूपी मोहरों का किसी भी तथाकथित आजादी वाले अभियान से या किसी व्यक्तिगत स्वतंत्रता से या किसी आस्था से कोई लेना-देना नहीं था ! उनका संबंध उस पंथ से है, जो देवी-देवता-भगवान् आदि पर विश्वास ही नहीं करता। जब किसी पर तुम्हारा विश्वास ही नहीं है, आस्था ही नहीं है तो तुम मंदिर में कौन सी पूजा कर लोगों के सामने कोई आदर्श रखने जा रहे हो ? पर हम तो यह पूछ ही नहीं सकते क्योंकि हम तो असहिष्णु हैं !

ये वही लोग हैं जो सदा ग़रीबों की गरीबी का रोना रो-रो कर अपने वर्तमान-भविष्य को हंसाते रहे हैं। एक तिहाई शताब्दी तक एक प्रदेश पर राज करने के बावजूद उस प्रदेश का आज भी यह हाल है कि वहां भिखारियों की तादाद देश में सबसे ज्यादा है ! गरीब-गुरबों को बराबरी का सपना दिखाने वाले इनके नेताओं के अपने परिवार में जब कोई ''उत्सव'' होता है तो उसमें करोड़ों की राशि पानी की तरह बहा दी जाती है ! और असहिष्णु हम हो जाते हैं। इनसे कभी बात कर के देखिए, लगेगा किसी पड़ोसी दुश्मन देश के प्रवक्ता से बात हो रही है। पर असहिष्णुता हम पर थोप दी जाती है। बहुत कम लोग जानते होंगे कि 1962 के युद्ध में हमारी बुरी तरह हार हुई थी ! हजारों जवान मारे और घायल हुए थे ! उसी समय कलकत्ता में घायल जवानों के उपचार के दौरान खून की जरुरत को लेकर रक्त-दान की अपील की गयी, एक पार्टी सदस्य ने अपना खून देने की इच्छा जाहिर की तो उसे पार्टी विरोधी हरकतों के इल्जाम के साथ बाहर का रास्ता दिखा दिया गया, पर असहिष्णु हम कहलाते हैं !

अपने कालेज के दौरान यह विचार बहुत अच्छा लगता था कि देश में हर इंसान को बराबरी का हक़ होना चाहिए। सबकी जिंदगी में खुशहाली होनी चाहिए। सब को अपने काम का उचित पारश्रमिक मिलना चाहिए। शोषण ख़त्म होना चाहिए इत्यादि इत्यादि ! पर नौकरी के दौरान जब हकीकत सामने आई तो दृश्य कुछ और ही था ! अधिकाँश नेताओं का किसी से कोई लेना-देना नहीं था ! हड़ताल, विरोध, हंगामें के बाद इन नेताओं के घर और बड़े और पक्के होते जाते थे, पैरों के बीच गाड़ियां आ जाती थीं, चेहरे की लुनाई और बढ़ जाती थी ! और जिसके बल पर यह होता था वह अपनी हफ्ते की तीन-चार रूपए की बढ़ोत्तरी पर ही संतुष्ट हो, अपने इन्हीं आकाओं के झंडे कंधों पर उठाए, उनका स्तुति गान करते हुए, अपनी कभी ख़त्म ना होने वाली सदाबहार गरीबी को ढोता रहता था, ढोता रहता था ! उसकी वह नियति आज भी वैसी ही है। धीरे-धीरे सड़क छाप लोग नेता बन अवाम को डरा-धमका कर पंथ के नाम पर उनकी मेहनत की कमाई की छिनताई करने लगे। धंधा अच्छा था बिना मेहनत-मजदूरी किए सब कुछ हासिल हो जाता था। त्यौहार के दिनों में तो खाते-पीते लोग घर से बाहर निकलने से घबराने लगे थे। यह सब देख बहुतेरों का गरीबों के इन छद्म मसीहाओं से मोह-भंग हो गया।

कौन नहीं चाहता कि गरीब, सर्वहारा भी दो समय का भोजन पा रात को एक छत के नीचे चैन की नींद सो सके ?  उसके बच्चे ढंग की शिक्षा पा सकें, हारी-बिमारी में उसे दूसरों का मोहताज ना होना पड़े !  पर इसके लिए किसी और की, दिन-रात मेहनत कर कमाई गयी कमाई को तो छीना नहीं जाना चाहिए ! बराबरी का हक़ जरूर मिले पर इसका मतलब यह तो नहीं कि आप किसी के घर में घुस कर उस पर कब्ज़ा कर लें ! एक सवाल और कि यह जितने भी अपने आप को गरीबों का मसीहा साबित करने में जुटे हुए शातिर हैं उनका खुद का क्या योगदान है ग़रीबों की सहायता करने में ? दूसरों का धन तो कोई भी किसी को दे सकता है ! पर इन्होंने खुद अपनी जेब से क्या दिया, कभी किसी को, सिर्फ भाषणों, आश्वासनों के अलावा ! कितने दरियादिल लोग हैं इनमें, जो किसी एक भी गरीब परिवार का जिम्मा लिए हुए है ? कड़वी सच्चाई यह है कि किसी को अवाम से नहीं सिर्फ उसके मत से मतलब है, जिससे येन-केन-प्रकारेण: साम-दाम-दंड-भेद, निति-अनीति कुछ भी अपनाते हुए सत्ता हासिल करने या उसके नजदीक मंडराते रह कर, लोगों को बेवकूफ बना अपनी दूकान में रोटियां सेकी जा सकें ! यह किसी एक दल की बात नहीं है: देश में कुकुरमुत्ते की तरह उग आए हर दल में ऐसे अनेकों मौकापरस्त-अवसरवादी लोग घुसे बैठे हैं।

कई दिनों से घुमड़ता आक्रोश आज ना चाहते हुए भी सहिष्णुता का बाना त्याग असहिष्णुता का आकार पा ही गया ! पर यह भी सच है कि जिस दिन देश के अवाम के सामने असलियत आ जाएगी उस दिन ऐसे लोगों की तक़रीबन बंद हो चुकी दुकानें, ढहा भी दी जाएंगी। क्योंकि अति तो किसी भी चीज की खतरनाक होती है और सच का सूर्य कितने भी घने बादलों से ढका हो अपने तेज व प्रकाश से सामने आ ही जाता है और तब सहिष्णु और असहिष्णुता का फर्क भी किसी को समझाना नहीं पडेगा !

गुरुवार, 3 जनवरी 2019

गुणों की खान है, गुड़

प्रकृति और इंसान के आपसी ताल-मेल की अद्भुत उपज है, गुड़। धरा ने आदमी की मेधा की परख के लिए द्रव्य रूप में अमृत रूपी रस को डंडों में भर खेतों में उपजाया तो इंसान ने उसे ठोस रूप दे एक बहुगुणी वस्तु की शक्ल दे दी। वस्तु भी कैसी, जिसका उपयोग वर्षों तक शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, सामान्य व शुभ अवसरों पर सदियों से अमीरों और ग़रीबों में मीठे और कुछ-कुछ ओषधि के रूप में होता रहा। भले ही विदेशी बाजार अपने मतलब के लिए इसे कितना ही अस्वास्थयकर कहे, पुरातन कहे पर सही मायने में यह अत्यंत गुणकारी, फायदेमंद, सेहतप्रद और सर्वसुलभ प्रकृति की देन है.........!


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हमारे देश में व्यापार की अनंत संभावनाओं को देखते हुए विदेशी व्यापारियों ने यत्र-तत्र-सर्वत्रअपना जाल तो फैलाया ही है साथ ही हनारी कई उपयोगी-स्वास्थयकर और गुणकारी वस्तुओं, जैसे घी, तेल, मसाले, वनौषधियों, जड़ी-बूटियों इत्यादि के बारे में भ्रामक अफवाहें फैला उन्हें हानिकारक और निरुपयोगी सिद्ध करने में भी कोई कसर नहीं छोड़ी है ! ऐसी ही एक अत्यंत उपयोगी वस्तु है गुड़ !


प्रकृति और इंसान के आपसी ताल-मेल की अद्भुत उपज है, गुड़। धरा ने आदमी की मेधा की परख के लिए द्रव्य रूप में अमृत रूपी रस को डंडों में भर खेतों में उपजाया तो इंसान ने उसे ठोस रूप दे एक बहुगुणी वस्तु की शक्ल दे दी। वस्तु भी कैसी, जिसका उपयोग वर्षों तक शादी-ब्याह, तीज-त्यौहार, सामान्य व शुभ अवसरों पर सदियों से अमीरों और ग़रीबों में मीठे और कुछ-कुछ ओषधि के रूप में होता रहा। हालांकि समय के साथ इसको परिष्कृत कर इसके और शुद्ध रूपों की ईजाद, शक्कर तथा चीनी के रूपों में हुई, पर उनमे इसके लाभकारी गुणों का समावेश नहीं हो पाया।
सर्दियों की फसल, गन्ने से तैयार होने वाला गर्म तासीर वाला गुड़, मनुष्य को प्रकृति की अनुपम देन है। चिकित्सा-शास्त्र भी इसमें पाए जाने वाले खनिजों के कारण, मानता है कि यह इंसानों के साथ-साथ जानवरों के लिए भी उतना ही उपयोगी व गुणकारी है। इस बात का ज्ञान हमारे पूर्वजों को बहुत पहले से ही रहा है इसीलिए वे अपने पालतू पशुओं के लिए भी इसका उपयोग बेझिझक करते आ रहे हैं। पर बाजार के बहकावे में आ आधुनिक पीढ़ी और शहरवासी उचित जानकारी के अभाव में इसका उपयोग करने से कतराते हैं जबकि यह चीनी से ज्यादा सुरक्षित, फायदेमंद और गुणकारी है।
खजूर का गुड़ 
आधुनिकता भले ही इसे कितना ही अस्वास्थयकर कहे, पुरातन कहे पर सही मायने में यह अत्यंत गुणकारी, फायदेमंद, सेहतप्रद और सर्वसुलभ प्रकृति की देन है। उचित मात्रा में इसके सेवन से पाचन तंत्र सही रहता है, भोजन पचाने में सहायता करता है, भूख बढ़ाता है, पेट की व्याधियों को दूर करता है, अनीमिया से बचाता है, यादाश्त तेज करता है, रक्त-चाप ठीक रखता है, ऊर्जा का बेहतरीन स्रोत है,  खून को शुद्ध करता है, आँखों के लिए फायदेमंद है, सर्दी में शरीर का तापमान ठीक रखता है, हड्डियों को मजबूती प्रदान करता है, सर्दी-जुकाम-खांसी-एलर्जी, जोड़ों के दर्द आदि में भी फायदा पहुंचाता है। आयुर्वेद में रात के भोजनोपरांत रोज इसकी करीब एक तोला मात्रा लेने की सलाह दी जाती है। हाँ शुगर के रोगियों को थोड़ा परहेज जरुरी है।
नारियल गुड़ 

गुड़ का उत्पादन हमारे देश के अलावा श्री लंका, नेपाल, पकिस्तान, अफगानिस्तान, ईरान, जापान, इंडोनेशिया, मेक्सिको, ब्राजील इत्यादि अनेक देशों में किया जाता है। हर जगह के वातावरण के अनुसार ही इसके स्वाद, गुण और विशेषताएं होती हैं। जो बहुत कुछ इसको बनाने वाले के हुनर और कार्यकुशलता पर भी निर्भर करती हैं।जहां श्री लंका के गुड़ को सर्वोपरि माना जाता है, वहीं हमारे देश में पंजाब का गुड़ और शक्कर बेहतरीन मानी जाती है। ईख के अलावा हमारे देश के पूर्वोत्तर और दक्षिणी राज्यों में खजूर के रस से भी गुड़ बनाया जाता है, जो हल्की या कुछ कम मिठास पसंद करने वालों के लिए बेहतरीन विकल्प है। इधर नारियल के रस से भी गुड़ बनाया जाने लगा है पर उसके गुण-शक्लो-सूरत चीनी के ज्यादा करीबी होते हैं। 


गुड़ चक्की 
वैसे तो इसका सेवन साल भर किया जा सकता है पर अभी इस सर्दी के मौसम में तो गुड़ के सेवन का बेहतरीन अवसर है। भले ही इसका सीधा उपयोग करें या फिर इससे बने ढेरों सुस्वादु खाद्य पदार्थों का सेवन करें ! पर जरा-ज़रा सा रोज जरूर खाएं और साल भर सेहतमंद रहने का फायदा उठाएं। 

मंगलवार, 25 दिसंबर 2018

बॉक्सिंग डे यानी डिब्बा दिवस

अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

 भारत ने अब तक 14 बॉक्सिंग डे टेस्ट मैच खेले हैं और इनमें से दस में उसे हार का सामना करना पड़ा. उसने केवल एक मैच जीता है जबकि तीन अन्य ड्रॉ रहे हैं. ऑस्ट्रेलिया में वह सात बॉक्सिंग डे टेस्ट का हिस्सा रहा और इनमें से पांच मैचों में उसे हार झेलनी पड़ी. जबकि दो मैच का कोई रिजल्‍ट नहीं निकला.
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भारत ऑस्ट्रेलिआ के बीच तीसरा क्रिकेट टेस्ट मैच कल, यानी 26 दिसंबर 2018 को खेला जाना है। क्रिसमस के बाद का दूसरा दिन योरोप में "बॉक्सिंग दिवस'' के रूप में जाना जाता है। इसलिए इस दिन खेले गए मैच को बॉक्सिंग डे मैच कहते हैं। भारत ने अपने विदेशी दौरों पर 14 बॉक्सिंग डे मैच खेले हैं। जिनमें दस में हार मिली है, तीन ड्रॉ रहे हैं तथा सिर्फ एक मैच ही जीत पाया है वह भी साऊथ अफ्रीका से !  ऑस्ट्रेलिआ में बॉक्सिंग डे के मैच मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड पर ही खेले जाते हैं। अब तक हम ने इस दिन वहां सात टेस्ट खेले हैं, जिनमें पांच में हार का सामना करना पड़ा है और बाकी दो ड्रॉ रहे हैं। इस तरह देखें तो तस्वीर निराशाजनक ही रही है। 
 मेलबोर्न क्रिकेट ग्राउंड 
अब रही इस दिन के नाम की बात ! बॉक्सिंग दिवस एक धर्मनिरपेक्ष उत्सव दिवस है। जो 26 दिसम्बर को मनाया जाता है, अर्थात बड़े दिन के अगले दिन, जो कि सेंट स्टीफेन दिवस भी है इसलिए यह एक धार्मिक अवकाश भी है। पर इसी दिन कई देशों में तरह-तरह के खरलों की शुरुआत होने के कारण ऐसा लगता है कि इस दिन का संबंध शायद बॉक्सिंग के खेल से हो, जबकी ऐसा नहीं है। हालांकि इस के बारे में कुछ ज्यादा स्पष्ट नहीं है। पर हर जगह ग़रीबों, जरूरतमंदों को धन या अन्य दान दे कर उनकी सहायता करने का चलन रहा है तो ऐसा मन जाता है कि तक़रीबन रोमन काल से यह परिपाटी चली आ रही है जब जरुरत का सामान और खाद्यपदार्थ डिब्बों में बंद कर उन्हें जरुरत मंद-बेसहारा लोगों के लिए चर्चों के बाहर रख दिए जाता था। वहीं कुछ खाली बॉक्स भी सेंट स्टीफेन की दावत के नाम पर कुछ रकम इकट्ठी करने के लिए रख दिए जाते थे। इन्हीं डिब्बों या बाक्सों के लेन-देन के कारण इस दिन का नाम बॉक्सिंग डे पड़ गया। 
इसको मनाने का कोई बहुत ही कठोर नियम नहीं है। कभी-कभी जब 26 दिसम्बर को रविवार पड़ जाता है तो बॉक्सिंग दिवस अगले दिन अर्थात 27 दिसम्बर को और यदि बॉक्सिंग दिवस शनिवार को पड़ जाये तो उसके बदले में आने वाले सोमवार को अवकाश दिया जाता है। परन्तु यदि क्रिसमस शनिवार को हो तो क्रिसमस की सुनिश्चित छुट्टी सोमवार 27 दिसम्बर को होती है और बॉक्सिंग दिवस का सुनिश्चित अवकाश मंगलवार 28 दिसम्बर को होता है।
अब वहां विदेशों में छुट्टी कभी भी हो पर अपने देश के क्रिकेट प्रेमी तो इस बार यही दुआ कर रहे हैं कि इस बार बॉक्सिंग दिवस पर खेले जाने वाले मैच में भारतीय टीम का डिब्बा गोल ना हो। वर्षों से हमारी टीम के साथ जुड़ा हुआ ''जिंक्स'' भी जाने वाले साल के साथ ही विदा हो। आमीन ! 

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