pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 13 सितंबर 2018

महाभारत में अंक "18" की प्रमुखता, संयोग या रहस्य !

महर्षि वेदव्यास जी ने 18 पुराणों की रचना की थी। इस महाग्रंथ में भी 18 अध्याय हैं। श्रीकृष्ण जी ने 18 दिन तक अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, जिसके भी 18 ही अध्याय हैं।  युद्ध भी पूरे 18 दिन तक चला। इसमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 यानी कुल 18 अक्षोहिणी सेना ने भाग लिया। एक अक्षौहिणी सेना में शामिल रथों की संख्या होती है 21870, हाथी भी होते हैं 21870, घोड़ों की तादाद होती है 65610 और 109350 पैदल सिपाही होते हैं । इन सबके अंकों को यदि जोड़ा जाए तो सभी का कुल 18 ही आता है । इसके अलावा इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। और सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस महासंग्राम के पश्चात जो जीवित बचे थे उन योद्धाओं की संख्या भी 18 ही थी !  जिनमें पांडवों के पंद्रह और कौरवों के तीन योद्धा थे। सवाल यह उठता है कि सब कुछ 18 की संख्‍या में ही क्यों हुआ या किया गया ? क्या यह संयोग है या इसमें कोई रहस्य छिपा है ...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
महाभारत जैसा अप्रतिम ग्रंथ ना फिर कभी रचा गया और अब शायद कभी लिखा भी नहीं जा सकेगा।
इस ग्रंथ को 'पंचम वेद' कहा गया है। यह ग्रंथ हमारे देश के मन-प्राण में बसा हुआ है। ऐसा महाकाव्य विश्व में और कहीं भी नहीं है। ऐसी मान्यता है कि दुनिया में ऐसा कुछ भी नहीं है जिसका वर्णन इसमें ना हुआ हो। अब तो इसमें वर्णित दुनिया के पहले विनाशकारी विश्व युद्ध, जिसमें तबके 78 देसी-विदेशी राजाओं ने भाग लिया था, की शुरुआत की तिथि भी ज्ञात कर ली गयी है, जो ईसा पूर्व 22 नवंबर 3067 की बनती है। पर एक बात जो अभी भी रहस्य बनी हुई है; उस का कोई ठोस जवाब नहीं मिल पाया है, और वह है इस सारे प्रसंग में अंक18 की प्रमुखता ! 

महर्षि वेदव्यास जी ने 18 पुराणों की रचना की थी। इस महाग्रंथ में भी 18 अध्याय हैं। श्रीकृष्ण जी ने 18 दिन तक अर्जुन को गीता का ज्ञान दिया, जिसके भी 18 ही अध्याय हैं।  युद्ध भी पूरे 18 दिन तक चला। इसमें कौरवों की 11 और पांडवों की 7 यानी कुल 18 अक्षोहिणी सेना ने भाग लिया। एक अक्षौहिणी सेना में शामिल रथों की संख्या होती है 21870, हाथी भी होते हैं 21870, घोड़ों की तादाद होती है 65610 और 109350 पैदल सिपाही होते हैं । इन सबके अंकों को यदि जोड़ा जाए तो
सभी का कुल 18 ही आता है । इसके अलावा इस युद्ध के प्रमुख सूत्रधार भी 18 थे। और सबसे आश्चर्य की बात यह है कि इस महासंग्राम के पश्चात जो जीवित बचे थे उन योद्धाओं की संख्या भी 18 ही थी !  जिनमें पांडवों के पंद्रह और कौरवों के तीन योद्धा थे। सवाल यह उठता है कि सब कुछ 18 की संख्‍या में ही क्यों हुआ या किया गया ? क्या यह संयोग है या इसमें कोई रहस्य छिपा है ? 

वह महाकाव्य जो महर्षि वेदव्यास द्वारा रचा और श्री गणेश द्वारा लिखा गया हो, उसमें कोई भी वाकया यूँ ही नहीं जुड़ गया होगा ! उसका जरूर कोई अपना रहस्य और महत्व होगा ! देखा जाए तो सनातन धर्म में 18 की संख्या बहुत महत्वपूर्ण है। ऐसी मान्यता है कि अंक 18 का उच्चारण  करने से सकारात्मक उर्जा का प्रवाह होता 
है। महाभारत पर अनेक लोगों ने शोध किया है। जिनमें कुछ लोगों का मानना है कि 18 अंक की प्रमुखता का कारण इसके 1 और 8 के अंक हैं। एक का अंक भगवान का प्रतीक है और 8 प्रतीक है सृष्टि की रचना और उसकी असीमितता, अनंतता का ! फिर 18 के अंक 1 और 8 को जोड़ने पर 9 बनता है, जो एक संपूर्ण अंक है। इसमें सभी अंको का समावेश भी होता है। यह सभी अंको में सबसे बड़ा और शक्तिशाली भी माना जाता है। हो सकता है इन सब बातों को ध्यान में रख कर ही अठ्ठारह के अंक को इतना महत्व मिला हो।

एक महत्वपूर्ण बात ! श्रीकृष्ण जी और अंक आठ का आपस में बहुत महत्व रहा है। उनके जीवन के हर मोड़, हर घटना के साथ यह अंक जुड़ा हुआ है। तो यह भी हो सकता है कि कथा में अंक एक को परमेश्वर का और अंक आठ को श्रीकृष्ण का प्रतीक मान, अंक अठ्ठारह बना, उसको प्राथमिकता दे, यह उपदेश दिया गया हो कि जो हुआ वह सब प्रभू की इच्छा, लीला और माया थी। उसके सिवा कुछ नहीं। इसी संदर्भ में महाभारत की एक
उपकथा भी यहां प्रासंगिक है। युद्ध की समाप्ति पर कुछ लोग जीत का श्रेय लेने की कोशिश करने लगे तो श्रीकृष्ण जी ने कहा कि चलो बर्बरीक से इस बारे में पूछते हैं ! क्योंकि उसी ने निरपेक्ष भाव से पूरा युद्ध देखा है। जब सब जने इकट्ठा हो उसके पास पहुंचे और युद्ध में किए गए अपने-अपने पराक्रम के बारे में पूछने लगे; तो उसने कहा, कौन सा गांडीव ? कौन सा अर्जुन ? कौन भीम ? कौन भीष्म ? कौन दुर्योधन ? मैंने तो अठ्ठारहों दिन रणभूमि में सिर्फ कृष्ण ही कृष्ण को देखा। हर ओर वही ! हर जगह वही ! हर रूप में वही ! इतना सुनते ही सब के सर नीचे झुक गए। इससे तो यही लगता है कि वेदव्यास जी ने प्रभू को ही सर्वोच्च पद में रख, उन्हीं को केंद्र बना, उन्हीं के द्वारा ज्ञान प्रदान करवा मानव मात्र का भला चाहते हुए इस महाकाव्य की रचना की होगी।  

शनिवार, 8 सितंबर 2018

कुछ मंदिरों में प्रवेश निषेध जैसे नियमों का औचित्य

उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में फूहड़ता प्रदर्शित करती युवती जैसे लोग अच्छी तरह जानते हैं कि उनके कर्म-कुकर्म के विरोध में यदि हजार आवाजें उठेंगीं तो पक्ष में भी सौ लोग खड़े हो जाएंगे ! यही सौ लोग सदा ऐसे सिरफिरों की ताकत और ढाल बन उनका मंतव्य पूरा करवाने का जरिया बन जाते हैं। । कुछ दिनों पहले तक कौन इस युवती को जानता था ! आज वह घर-घर में पहचानने वाली "चीज'' हो गयी है। उसका उद्देश्य पूरा हो गया है; देख लीजिएगा आने वाले कुछ ही दिनों में हमारे किसी ''पारखी-जौहरी'' फिल्म निर्माता ने उसे अपनी फिल्म ऑफर कर देनी है...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग   
तकरीबन साल भर पहले चुनिंदा मंदिरों में कुछ लोगों के लिए प्रतिबंध होने पर बहुत गुल-गपाड़ा मचा था। इसको ले कर काफी बहस-बाजी भी होती रही, विरोध दर्ज करवाया जाता रहा, आंदोलन होते रहे, और यह सब उन लोगों द्वारा ज्यादा किया गया जिन पर कोई पाबंदी लागू नहीं थी। कुछ लोग जरूर ऐसे हैं जो इंसान की बराबरी के सच्चे दिल से हिमायती हैं, जो अच्छी बात है; पर विडंबना यह भी है कि ज्यादातर प्रतिवाद करने वालों को प्रतिबंधित वर्ग से उतनी हमदर्दी नहीं थी, जितना वे दिखावा करते रहे !! तब ऐसे ही एक विचार मन में आया था कि ऐसा क्यों है ? जबकि पूजास्थलों की व्यवस्था संभालने वाले लोग, विद्वान, धर्म को समझने वाले, धर्म-भीरु होते हैं। उनको क्या यह पता नहीं होता कि उनका वैसा रवैया गलत है ? क्या वे नहीं जानते कि प्रभू के यहां सब बराबर होते हैं ? क्या उन्हें मालुम नहीं कि ऊपर वाले के यहाँ कोई भेद-भाव नहीं होता ! फिर क्यों भगवान् के घर में ही इंसान और इंसान में फर्क किया जाता है ? कोई तो कारण होगा ?

जो कुछ समझ आता है, उसमें पहला तो यही है कि भले ही हम कितना भी कहें पर कड़वी सच्चाई और इतिहास गवाह है अलग-अलग संप्रदायों के अलग-अलग मतों में, विरोधी मान्यताओं, अपने पंथ को श्रेष्ठ मनवाने की जिद, अपने इष्ट को सर्वोपरि मानने के हठ के कारण अक्सर टकराव होते रहे हैं। एक-दूसरे को नीचा दिखाने के प्रयास में जन-धन-स्थल को हानि पहुंचाने के उपक्रमों को भी मौके-बेमौके, जानबूझ कर अंजाम दिया जाता रहा है। हो सकता है ऐसी मानसिकता वाले लोग दूसरे पंथ के पूजा-स्थल में जा गैर-वाजिब हरकतें करते हों ! शुचिता का ध्यान ना रखते हों ! स्थल के सम्मान में कोताही बरती जाती हो ! पूजा-अर्चना में बाधा उत्पन्न करते हों, और वैसे कुछ अवांछनीय, असमाजिक, गैरजिम्मेदाराना लोगों की हरकतों का खामियाजा औरों को भी भुगतना पड़ गया हो। 

दूसरे दुनिया में ऐसे लोग भरे पड़े हैं, जिनका ध्येय किसी न किसी तरह खबरों में बने रहना होता है ! अपने को कुछ अलग दिखाने की लालसा, तुरंत प्रसिद्ध होने की कामना ! अपने को ख़ास मनवाने की इच्छा ! अप्राप्य को येन-केन-प्रकारेण हासिल करने की लालसा उनसे कुछ भी करवा लेती है ! इन्हें ना किसी शुचिता की परवाह होती है, ना हीं किसी तरह की परंपराओं की, ना किसी की आस्था की, ना हीं वर्षों से चली आ रही व्यवस्थाओं की; ऐसे लोग पहले नाम फिर उससे दाम पाने के लिए कुछ भी नैतिक-अनैतिक करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार रहते हैं ! ये लोग अच्छी तरह जानते हैं कि इनके कर्म-कुकर्म के विरोध में यदि हजार आवाजें उठेंगीं तो पक्ष में भी सौ लोग खड़े हो जाएंगे ! यही सौ लोग सदा ऐसे सिरफिरों की ताकत और ढाल बनते आए हैं। दो दिन पहले उज्जैन के महाकाल मंदिर परिसर में फूहड़ता प्रदर्शित करती एक युवती ने फिर इस बात को सिद्ध कर दिया। कुछ दिनों पहले तक कौन इसे जानता था ! पर आज वह घर-घर में पहचानने वाली "चीज'' हो गयी है। उसका मंतव्य सफल हो गया है; देख लीजिएगा आने वाले कुछ ही दिनों में हमारे किसी ''पारखी-जौहरी'' फिल्म निर्माता ने उसे अपनी फिल्म ऑफर कर देनी है ! 

महाकाल मंदिर में यह जो कुछ घटा, यह हिन्दू पूजा स्थलों पर पहली बार नहीं हुआ था ! उस कन्या को लोग भूले नहीं होंगे, जिसने जबरदस्ती शिंगणापुर के शनि-चबूतरे पर चढ़ने को ले कर हंगामा मचाया था ! उसके भी पहले एक फोटो अक्सर दिख जाती थी जिसमें एक लड़का किसी मंदिर में शिवलिंग पर जूते समेत एक पैर रखे दिखाई पड़ता था। भले ही वह सच हो ना हो या फोटो से छेड़-छाड़ की गयी हो; पर वैसा या ऐसा करने वाले की दूषित मानसिकता का तो पता चलता ही था ना !! इसी दौरान सोशल मीडिया पर कुछ तथाकथित आधुनिक महिलाओं ने गर्व से यह स्वीकारा था कि माह के अपने कुछ ख़ास दिनों में भी वे मंदिर जाती हैं ! जबकि समाज के कई परिवारों में शुद्धता को ध्यान में रखते हुए इन दिनों में रसोई में भी जाना अनुचित समझा जाता है। यह कैसी आजादी है ? यह कैसी आधुनिकता है ? ये कैसे संस्कार हैं ?

आश्चर्य होता है कि साल भर पहले मंदिरों में कुछ लोगों के प्रवेश निषेद्ध को ले कर गुल-गपाड़ा मचाने वाले तथाकथित बुद्धिजीवी, आजादी (?) के पक्षकार, मानवाधिकार के स्वयंभू एक पक्षीय झंडावदार, जो उन दिनों जामे से बाहर हो अपन राशन-पानी ले पिले पड़ रहे थे; वे लोग क्या कोमा में चले गए हैं आज ! उनकी सांस की भी आवाज नहीं आ रही ! क्यों नहीं ऐसे लोग उन तथाकथित बाबाओं के विरुद्ध मोर्चा खोलते जो भगवान के नाम पर ज्यादातर महिलाओं का ही शोषण करते हैं ! क्यों नहीं उन पंथों के खिलाफ आवाज उठाते जो जबरन धर्म परिवर्तन करवाने का दुःसाहस करते हैं ! क्या सिर्फ इसलिए क्योंकि वहां नाम मिले ना मिले पर जान को जरूर खतरा होता है !! और यहां तालियां बजती हैं, सम्मान मिलता है ! ऐसे लोगों यह समझ नहीं आता कि अगला तो इनके कंधे पर बंदूक रख इन्हें माध्यम बना अपना काम निकाल गया और यह जूतियों में दाल बाँट-बाँट कर पीते रहे। 

इंसान की बराबरी की हिमायत अच्छी बात है पर वह यदि वही चीज उच्श्रृंखल हो जाए तो ? शायद ऐसे ही कुछ कारण रहे होंगे जब पवित्र स्थानों की सुचिता को बरकरार रखने के लिए कठोर कदम उठाते हुए कुछ इसी प्रकार के अलोकप्रिय निर्णय लेने पड़े होंगे और जैसे गेहूँ के साथ घुन भी पिस जाता है उसी प्रकार कुछ लोगों के अनैतिक कार्यों के परिणाम का खामियाजा कई लोगों को भोगने पर मजबूर होना पड़ा होगा !    

बुधवार, 5 सितंबर 2018

भगवान का धन, भगवान के बंदों के लिए ही उपलब्ध नहीं हो पा रहा

सवाल यह उठ रहा है कि मंदिरों की यह अकूत धन-सम्पदा कब और किस काम आएगी ? किस  ख़ास आयोजन के लिए इसे संभाल कर रखा जा रहा है ? क्या समय के साथ यह सब जमींदोज हो जाने के लिए है ? मंदिरों में जमा यह धन का पहाड़ देश की अमानत है ! यह अकूत, बेशुमार दौलत साधारण लोगों के द्वारा दान करने पर ही इकट्ठा हो पाई है ! तो आज जब वही आम इंसान मुसीबत में है, पूरा देश चिंताग्रस्त है, तो फिर इस बेकार पड़े, भगवान के नाम के धन का उपयोग भगवान के बंदों के लिए क्यों नहीं किया जा रहा  है  ?

#हिन्दी_ब्लागिंग
इस साल आई केरल की आपदा शायद स्वतंत्र भारत की सबसे बड़ी आपदा है। जैसा कि होता आया है, हमारी परंपरा ही कह लीजिए, इस परीक्षा की घडी में सारा देश एकजुट हो गया। हर कोई बिना किसी भेद-भाव, धर्म, भाषा, जाति, संप्रदाय, अमीरी-गरीबी, छोटे-बड़े, बच्चे-बूढ़े, जिससे जितना संभव हो सका, सारे देश ने अपना योगदान करने की कोशिश की।  रोज ही खबर मिलती है कि कैसे बच्चे अपनी गुल्लकें फोड़ अपनी छोटी सी धन राशि अर्पित कर रहे हैं ! सक्षम तो एक तरफ आर्थिक रूप से अक्षम लोग भी इस संकट की घडी में अपना योगदान देने से पीछे नहीं हट रहे ! कोई अपने एक दिन की कमाई दे रहा है तो कोई सामूहिक प्रयास से एकत्रित की गयी धन राशि पहुंचा रहा है ! कोई धन से नहीं तो  वस्तुएं प्रदान कर रहा है ! बहुतेरे जांबाज युवक वहां खुद जा हर तरह की मदद कर रहे हैं !  बाहरी और सरकारी धन भी आया है।

पर इस सब के बावजूद लोगों के मन में एक सवाल भी उठा (व्हाट्सएप पर बंगला भाषा में ऐसा ही एक सवाल कई दिनों से घूम रहा है) कि देश के बाकी हिस्सों को तो छोड़िए; दक्षिण भारत के मंदिरों में ही अकूत सम्पदा कोठरियों के अंदर तालों के पहरे में बंद, बेकार पड़ी है, और प्राकृतिक कहर भी उधर ही टूटा है, फिर भी किसी भी बड़े मंदिर ने अपनी तरफ से कोई पहल करते हुए सहायता क्यों नहीं की ? वह विश्व प्रसिद्ध पद्मनाभ जी का मंदिर भी तो केरल में ही है ना; जो अपने सोने के भंडार के लिए दुनिया में चर्चा में बना रहता है ! फिर सबसे धनाढ्य पूजा स्थल तिरुपतिनाथ जी का मंदिर ! मीनाक्षी मंदिर ! श्रृंखला है, ऐसे अरबों-खरबों का धन संजोए, मंदिरों की ! इनके कर्ता-धर्ता क्यों चुप हैं ? जबकि कुछ छोटे मंदिरों ने तथा अन्य धर्मों के पूजा स्थलों ने अपने धर्म गुरुओं की अपील पर बिना भेद-भाव के सहायता राशि भिजवाई है !

सवाल है; यह धन-सम्पदा और किस काम आएगी ? किस ख़ास आयोजन के लिए इसे संभाला जा रहा है ? क्या समय के साथ यह सब जमींदोज हो जाने के लिए है ? मंदिरों में जमा यह धन का पहाड़ देश की अमानत है ! यह अकूत, बेशुमार दौलत साधारण लोगों के द्वारा दान करने पर ही इकट्ठा हुई है ! तो जब वही इंसान मुसीबत में है, पूरा देश चिंताग्रस्त है, तो फिर इस बेकार पड़े, भगवान के नाम के धन का उपयोग भगवान के बंदों के लिए क्यों नहीं किया जा रहा ? क्या प्रभू खुद आकर इन्हें आदेश देंगे ? या प्रबंधकों ने यह राशि अपनी संपत्ति मान ली है और जहां चाहेंगे वहीं खर्च करेंगे ? या इसके लिए भी हर बात की तरह न्यायालय का दरवाजा खटखटाना पड़ेगा ? जबकि सच्चाई यह है कि इन विशाल मंदिरों की अकूत सम्पति का एक छोटा सा भाग ही बहुत बड़ी राहत, राहत तो क्या सारी समस्या को ही दूर कर सकता है !  ऐसा नहीं हो सकता कि जिम्मेवार लोगों ने इस बारे में कुछ सोचा ही नहीं हो ! पर चुप्पी का कोई कारण ! कोई जवाब ! कोई सफाई !  

मंगलवार, 4 सितंबर 2018

मेरे बचपन की पुस्तकें-पत्रिकाएं, जो आज भी मुझे संजोए हुए हैं

पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मेरे लिए भी उस समय का बाल साहित्य घर आने लगा। सारी बाल पत्रिकाओं के नाम तो मुझे आज भी याद हैं; मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू जिनमें फिर पराग का नाम भी जुड़ गया। इसके अलावा पाठ्य पुस्तकों के इतर, तरह-तरह की देसी-विदेशी बाल साहित्य की रोचक पुस्तकें भी मेरे लिए लाते-मंगवाते रहते थे, फिर वह चाहे पंचतंत्र हो, ईसप की कथाएं हों, अलादीन हो, एलिस हो या फिर हमारे महान ग्रंथों का बाल संस्करण हो। उन दिनों बच्चों के सर्वांगीण विकास और उनके चरित्र निर्माण, उनके बचपन का बहुत ध्यान रखा जाता था, इसीलिए हर पुस्तक-पत्रिका में ज्ञान-विज्ञान के साथ-साथ पौराणिक-इतिहासिक कहानियों का समावेश  भी जरूर हुआ करता था, हाँ आज की तरह अपने गुरुवरों या बड़ों का मजाक, खिल्ली उड़ाने वाली ना कथाएं होती थीं ना हीं चुटकुले..........  

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पिताजी का कार्य-क्षेत्र कलकत्ता (आज का कोलकाता) होने के कारण मेरा बचपन भी वहीं बीता। ददिहाल व ननिहाल पंजाब में थे। उस लिहाज से जैसा कहते हैं ना कि छुटपन में दादी-नानी की पौराणिक, ऐतिहासिक, परियों की कथा-कहानियां सुनी-सुनाई जाती थीं, वैसा मेरे साथ नहीं हो पाया। पर इस मामले में मैं सौभाग्यशाली रहा ! पिताजी को पढ़ने का बहुत शौक था। घर पर दो कांच की आलमारियां तरह-तरह की पुस्तकों से भरी पड़ी थीं। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो मेरे लिए भी उस समय का बाल साहित्य घर आने लगा। सारी बाल पत्रिकाओं के नाम तो मुझे अभी भी याद हैं, मनमोहन, बालक, चंदामामा, चुन्नू-मुन्नू जिनमें फिर पराग का नाम भी जुड़ गया। इसके अलावा पाठ्य पुस्तकों के इतर, तरह-तरह की देसी-विदेशी बाल पुस्तकें भी लाते-मंगवाते रहते थे। फिर वह चाहे पंचतंत्र हो, ईसप की कथाएं हों, अलदीन हो या फिर हमारे महान ग्रंथों का बाल संस्करण हो। 

उन्होंने कभी पढ़ने पर ना जोर दिया नाहीं दवाब बनाया ! पता नहीं कैसे उन्हें मेरे इस रुझान का अंदाज लग गया ! शायद अपने संकलन में मेरी ताक-झाँक को परख कर। इसी के चलते पुस्तकों के बहुमूल्य खजाने का द्वार मेरे लिए खोल दिया गया। इतना ही नहीं जिस पुस्तकालय ने उन्हें आग्रह कर अपना सदस्य बनाया था, वहाँ से भी मुझे सद्साहित्य की प्राप्ति होने लगी। सस्ती का जमाना था पर लोगों की आमदनी भी वैसी ही होती थी सो मेरे तक़रीबन सभी संगी-साथी इस अवर्चनीय सुख से वंचित रहते थे, पाठ्य-पुस्तकों के अलावा किसी और किताब की कल्पना किसी-किसी घर में ही हो पाती थी वह भी इक्का-दुक्का ! मेरे पास तो भंडार था और दिल दरिया ! फिर क्या था, हरेक के लिए हर पुस्तक उपलब्ध, जो उनके परिवार के बड़े भी पढ़ा करते थे। पर शर्त यही रहती थी कि संभाल कर पढ़ा जाए और सही सलामत, बिना कटे-फटे वापस की जाए। क्योंकि वे पुस्तकें मुझे निर्जीव नहीं सजीव लगा करती थीं, अपने परिवार के सदस्यों की तरह। 

दैनिक अखबार ''अमृत बाज़ार पत्रिका", जिसका प्रकाशन 1991 में 123 साल के बाद किन्हीं कारणों से बंद हो गया, के साथ-साथ साप्ताहिक हिन्दुस्तान तथा धर्मयुग नियम से आते थे। कभी-कभार माया, सरिता, मनोरमा या फ़िल्मी-पत्रिका फिल्म फेयर हावड़ा स्टेशन के A. H. Wheeler के स्टाल से आ जाए तो आ जाए, पर किसी हल्के या सतही पुस्तक या पत्रिका को कभी भी घर में प्रवेश नहीं मिला ! अपने समय की सर्वाधिक बिक्री वाली मनोहर कहानियां को तो कभी भी नहीं। 

पिताजी की कृपा से ही उन सब बातों का असर आज दिख रहा है। पढ़ने की भूख, जिज्ञासु प्रवृत्ति, हर क्षेत्र के बारे में कुछ ना कुछ जानकारी प्राप्त करने की इच्छा अभी भी अपने चरम पर है। आज की पीढ़ी को और उनके
भी छोटे बच्चों को अपनी पौराणिक, ऐतिहासिक, सामयिक कथा कहानियों की जानकारी प्रदान करना बहुत सुहाता है। किसी भी लोकप्रिय कथा-साहित्य-पुस्तक के मुख्य मार्ग से हट कर जब उसके गली-कूचों की बात बताई जाती है तो उनके मुख खुले के खुले रह जाते हैं। क्योंकि आज की शिक्षा पद्यति में उन सब बातों को सम्मलित करना फिजूल माना जाता है, जिनको पहले स्वस्थ मन, दृढ चरित्र, विकसित मस्तिष्क और मानव धर्म के लिए जरुरी समझा जाता था। आज ज्ञान नहीं सिर्फ जानकारी को आगे रख, रोजगार प्राप्ति को ही सर्वोपरि बना सारे मापदंड तय किए जाते हैं, पर विडंबना है कि फिर भी बेरोजगारी बढ़ती जा रही है ! याने ना माया मिली ना राम !

शनिवार, 1 सितंबर 2018

ताश, कुछ जाने-अनजाने रोचक तथ्य !

ताश, अच्छी है या बुरी यह बहस का विषय हो सकता है। पर सैंकड़ों वर्षों से यह आदमी का मनोरंजन करती आ रही है इसमें दो राय नहीं है। इसके  बावन पत्तों में बारह पत्ते, तीन पात्रों, बादशाह, बेगम और गुलाम को तो सभी जानते हैं पर अपने-अपने वर्ग के अनुसार उनकी खासियत और उनके अलग-अलग स्वभाव तथा चरित्र के बारे में कम ही जानकारी प्रचलित है। अच्छी ताशों की गड्डी बनाते समय इनके स्वरूप का पूरा ध्यान रखा जाता है...... ! 
  
#हिन्दी_ब्लागिंग 
ताश एक ऐसा खेल है जो दुनिया भर में प्रचलित है। इसका उल्लेख 9वीं सदी के चीन में भी पाया गया है। जिसके बाद इसने 14वीं सदी के योरोप में प्रवेश करने के बाद सारी दुनिया को अपना बना लिया। ऐसा मानना है कि ''गंजिफा'' के रूप में 16वीं सदी में इसने भारत में प्रवेश किया। ताश जैसे इस खेल का धार्मिक और नैतिक महत्व था। इसके पत्ते गोलाकार होते थे। ये हैसियत के अनुसार कागज़, कडक कपडे, हाथी दाँत, हड्डी या सीप के बने होते थे। जिनमें 12 कार्ड होते थे जिन पर पौराणिक चित्र बने होते थे। इसका एक अन्य रूप भी होता था जिसमें 108 कार्डों 9 गड्डियों में रखा जाता था, प्रत्येक गड्डी सौर मण्डल के नव ग्रहों को दर्शाती थी। इसे नवग्रह-गंजिफा कहा जाता था। 


ताश की लोकप्रियता इसी से आंकी जा सकती है कि इसे तक़रीबन हर छोटा-बड़ा, व्यक्ति, भले ही खेलता न हो पर इसके बारे में थोड़ा-बहुत जानता जरूर है। यहां तक कि दृष्टि-बाधित लोगों के लिए ब्रेल लिपि के कार्ड भी मिलने लगे हैं। जैसे-जैसे इसकी लोकप्रियता बढ़ी वैसे-वैसे इसकी गुणवत्ता में भी बढ़ोत्तरी होती चली गयी। इन्हें विशेष कार्ड, प्लास्टिक या बहुत विशिष्ट प्रकार की शीट पर छापा जाने लगा फिर इसके रंग और चमक बढ़ाने के लिए इन पर वार्निश, लिनन, कैलेंडरिंग जैसे उपचार किए गए, जिससे इनके टूट-फूट और रख-रखाव में भी बढ़ोत्तरी हुई। इसके कोनों को आकार दिया गया। खेलते समय पकड़ने की सुविधा के लिए इनका आकार करीब-करीब हथेली के बराबर रखा जाता है। आज बड़े-बड़े होटलों, रईसों, शौकीनों द्वारा काम में लाई जाने वाली ताश बेशकीमती होती है।
  
मोटे-भारी कागज, गत्ते, या पतले प्लास्टिक से विशेष रूप से बने इसके हिस्सों को कार्ड या पत्ता कहा जाता है। एक गड्डी में इनकी संख्या बावन की होती है, जिसे पैक या डेक कहा जाता है। हर डेक के पीछे की ओर हरेक पत्ता एक ही रंग और डिजाइन का होता है। दूसरी तरफ उन्हें चार भागों, हुकुम, पान, ईंट और चिड़ी (Spade, Heart, Diamond and Club) में बांटा गया होता है। उनका इस्तेमाल खेल में एक सेट के रूप में किया जाता है। हर सेट में तेरह-तेरह पत्ते होते हैं। जिन पर एक से दस तक अंक और उस हिस्से के निशान बने होते हैं और ग्यारह-बारह-तेरह नंबरों की जगह गुलाम-बेगम-बादशाह की तस्वीरें बनी होती हैं। इन पत्तों से दुनिया भर में अनगिनत तरह के खेलों के साथ अन्य तरह का यथा जादूगरों द्वारा हाथ की सफाई, भविष्यवाणी, बोर्ड गेम, ताश के घर बनाने जैसे मनोरंजन के साथ-साथ जुआ भी बुरी तरह शामिल है।

इस बावन पत्तों के खेल में, जैसा कि माना जाता है, आज के समय में सबसे ज्यादा लोकप्रिय खेल ब्रिज, रमी और फ्लैश के हैं।रही पत्तों की बात तो इसके इक्के से लेकर बादशाह तक को तो सभी जानते हैं पर यह कम ही लोगों को पता होगा कि दहले के बाद की तीन तस्वीरें अपने आप में कुछ अलग जानकारी भी रखती हैं। इन पर योरोपीय संस्कृति का प्रभाव अभी भी है। ध्यान से देखें तो ये चारों अपने-आप में बिल्कुल जुदा, अलग और विभिन्न विशेषताएं लिए नजर आएंगे।
    
"हुकुम
बादशाह :- यह क़ानून का पालक, सख्त मिजाज, काले रंग को पसंद करने वाला और तलवार से न्याय करने वाला राजा है, जो इसकी तनी हुई तलवार बताती है। इसकी मूंछें इसके स्वभाव को प्रगट करती हैं। इसे इज़राईल के राजा, किंग डेविड को ध्यान में रख बनाया जाता है। 

बेगम :- अपने राजा के कृत्यों से यह दुखी रहती है, जो इसके चेहरे और काले कपड़ों से साफ झलकता है। इसके साथ जलती हुई शमा होती है जो बताती है कि यह रानी भी उसी की तरह घुल-घुल कर मिट जाएगी। इसके साथ एक फूल जरूर है पर वह भी मुर्झाया हुआ और पीछे की तरफ जो इसके दुख को ही प्रगट करता है।

गुलाम :- हुकुम का गुलाम। जैसा मालिक वैसा गुलाम। अपने मालिक के हुक्म का ताबेदार काले कपड़े और हाथ में हंटर धारण करने वाला। सख्त चेहरे वाला, किसी के बहकावे में ना आने वाला और सारे काम अक्ल से नहीं हंटर से करने वाला होता है। इसे कोई फुसला नहीं सकता।  

"पान"
बादशाह :- पान यानि दिल यानि कोमल ह्रदय का स्वामी। इसीलिये यह मूंछे भी नहीं रखता। यह मानवता का पूजारी, अहिंसक, धार्मिक और शांतिप्रिय स्वभाव का होता है। ऐसा होने पर भी बहुत सतर्क और कुशल नेतृत्व प्रदान करने वाला है। यह तलवार से नहीं बुद्धि से काम करता है। इसीलिये इसकी तलवार पीछे की ओर रहती है। इसे एलेक्जेंडर की खासियत दी जाने की कोशिश की जाती है। यह फ्रैंक्स के राजा शारलेमेन का प्रतिरूप माना जाता है। 

बेगम :- यह बहुत सुंदर, संतोषी स्वभाव, विद्वान पर कोमल ह्रदय तथा शांत स्वभाव वाली रानी है। इसके चेहरे से इसकी गंभीरता साफ झलकती है। हाथ का फूल भी इस बात की गवाही देता है। कोमल स्वभाव के बावजूद यह विदुषि है।

गुलाम :- पान का गुलाम भी अपने मालिकों की तरह शांत और नम्र स्वभाव वाला होता है। सादा जीवन बिताने वाला और प्रकृति प्रेमी है जो इसके हाथ में पकड़ी गयी पत्ती से स्पष्ट है। अनुशासन बनाए रखने के लिये छोटी-छोटी मूंछें रखता है।


"चिडी"
बादशाह :- यह तीन पत्तियों वाला, समझदार और अपने अधिकारों की रक्षा करने वाला राजा है। यह अपने को राजा नहीं सेवक मानता है। रौबदार मूंछों वाले इस राजा का भेद कोई नहीं जान पाता है। इसमें राजा अगस्तस या सीजर की खूबियों का ध्यान रखा जाता है। 

बेगम :- यह एक चतुर, चालाक तथा तीव्र बुद्धिवाली रानी है। तड़क-भड़क से दूर फूलों की शौकीन यह समस्याओं को साम, दाम, दंड़, भेद किसी भी तरह सुलझाने में विश्वास रखती है।

गुलाम :- चिड़ी का गुलाम यह सबसे चर्चित गुलाम है। गंवारों सा दिखने वाला, पगड़ी में पत्ती लटकाए सदा अपने बादशाह की चापलूसी करने में लगा रहता है। साधारण से कपड़े और गोलमटोल मूंछों को धारण करने वाला एक घटिया इंसान है।


"ईंट"
बादशाह :- यह राजा के साथ-साथ हीरों का व्यापारी भी है। हर समय धन कमाने की फिराक में रहता है। जिसके लिये कुछ भी कर सकता है। हाथ जोड़ कर ईमानदारी का दिखावा करता है, पर मन से साफ नहीं है। इसे हिंसा पसंद नहीं है पर एशो-आराम से रहना पसंद करता है।

बेगम :- यह भी अपने राजा की तरह धन-दौलत से प्रेम करने वाली, किसी के बहकावे में ना आनेवाली, कीमती कपड़े और गहनों से लगाव रखने वाली सदा पैसा कमाने की धुन में रहने वाली बेगम है।

गुलाम :- रोनी सूरतवाला तथा बिना मूछों वाला यह गुलाम सदा इसी गम में घुलता रहता है कि कहीं राजा से कोई और पुरस्कार या दान ना ले जाए। अमीर राजा का गुलाम है सो इसके कपड़े भी कीमती होते हैं। यह अपना काम बड़ी चतुराई से करता है।


भले ही ताश को मनोरंजन के लिए बनाया गया हो पर धीरे-धीरे इस पर जुआ हावी होता चला गया और इसकी बदनामी का मुख्य कारण तो बना ही इस खेल को इतना बदनाम कर गया कि समाज में इसे और इसको खेलने वालों को हिकारत की नजर से देखा जाने लगा। यह तो भला हो ब्रिज जैसे खेल का जिसे अंतराष्ट्रीय स्पर्द्धाओं में सम्मिलित होने के गौरव के साथ उसे खेलने वालों को भी सम्मान की दृष्टि से देखा जाता है। 

बुधवार, 22 अगस्त 2018

दिल्ली का अंधा मुग़ल

रोशनआरा बेहद खूबसूरत थी। कई मुग़ल-गैर मुग़ल शहजादे, राजकुमार, राजे, नवाब मन ही मन उसका ख्वाब देखा करते थे। ऐसा ही एक युवक, जो था तो बाबर का वंशज पर वह और उसका परिवार वर्षों से सत्ता से दूर गुमनामी का जीवन जी रहे थे, रोज वहाँ आ शहजादी को देखा करता था...!

#हिन्दी_ब्लागिंग    
पुरानी दिल्ली में ढेरों ऐसे मोहल्ले, बाड़े, कूचे, गलिया हैं, जिनके नाम लोगों की जुबान पर चढ़े होने की वजह से अजीब नहीं लगते पर यदि ध्यान से उन पर गौर किया जाए तो उनकी ''अजीबो-गरीबियत'' पर आश्चर्य होता है, ऐसी ही एक जगह है, पुरानी दिल्ली के दिल चांदनी चौक के पास बसंत नगर और प्रताप नगर का इलाका, जिसे अंधा मुग़ल के नाम से भी जाना जाता है। कौन था वह मुग़ल जिसके नाम से इस इलाके का ऐसा विचित्र नामकरण हो गया ? इस कथानक का विस्तृत विवरण तो नहीं मिलता ! पर बिखरी कड़ियों को जोड़ा जाए तो एक-दो हल्की सी तस्वीरें उभर कर सामने आती हैं। इसके बारे में दो जन-श्रुतियाँ प्रचलित हैं। 
रोशनआरा बाग़ 
पहली, जब औरंगजेब ने अपने भाई दारा शिकोह की ह्त्या करने के पहले उसकी आँखें निकाल उसे दरिद्रता भरे जीवन में धकेल दिया था तो वह यहां आ कर रहने लगा था, इसीलिए इस जगह का नाम अंधा मुग़ल पड़ गया ! बाद में अवाम की उसके प्रति बढती सद्भावना और सहानुभूति के कारण उसका सर काट कर यहां घुमाया गया था।   
रोशनआरा 

रोशनआरा की कब्र 
दूसरी, जब शाहजहां अपने सपनों का शहर शाहजहांनाबाद बनवा-बसवा रहा था तभी उसने अपनी लाड़ली बेटी रोशनआरा के नाम पर एक नायब और बेहतरीन बगीचे, रोशनआरा बाग़, का भी निर्माण करवाया था। जो आज भी उत्तरी दिल्ली के कमला नगर इलाके में अपनी भव्यता के साथ स्थित है। रोशनआरा बाग़ इतना सुंदर बन पड़ा था कि शहजादी रोशनआरा तकरीबन रोज ही वहां घूमने और मन बहलाने आया करती थी। रोशनआरा बेहद खूबसूरत थी। कई मुग़ल-गैर मुग़ल शहजादे, राजकुमार, राजे, नवाब मन ही मन उसका ख्वाब देखा करते थे। ऐसा ही एक युवक, जो था तो बाबर का वंशज पर वह और उसका परिवार वर्षों से सत्ता से दूर गुमनामी का जीवन जी रहे थे, रोज वहाँ आ शहजादी को देखा करता था। इस एक तरफा लगाव को निरुत्साहित करने के प्रयासों का जब कोई असर नहीं हुआ तो रोशनआरा के अंगरक्षकों ने इसकी शिकायत बादशाह से कर दी; यह सुनते ही बादशाह का क्रोध सातवें आसमान तक जा पहुंचा और फिर वही हुआ, जो उन दिनों की  रिवायत थी ! राजाज्ञा से उस युवक की दोनों आँखें निकाल, उसे अँधा बना छोड़ दिया गया ! धीरे-धीरे जिस जगह वह रहता था वह स्थान अंधा मुग़ल के नाम से जाना जाने लगा। 

सोमवार, 20 अगस्त 2018

इसमें बच्चों का नहीं तंत्र का दोष है !

पिछले हफ्ते ब्लॉग पर रामायण के एक अहम पात्र सम्पाती पर दो आलेख डाले थे। उस समय ऐसे ही विचार आया कि क्या ''सम्पाती'' को कोई जानता भी है ? पहले आस-पास के लोगों से, फिर जान-पहचान वालों से फिर पार्क में सैर करते वक्त चार-पांच लोगों से पूछा ! अंजाम वही हुआ जिसका अंदेशा था ! एक भी जवाब ठीक नहीं मिला ! सम्पाती तो दूर कुछ लोग तो सिलसिलेवार दशरथ पुत्रों और उनकी माताओं के नाम भी ठीक से नहीं बता पाए ! इसमें बच्चों का दोष नहीं है, जब उन्हें किसी के बारे में बताया-पढ़ाया-सिखाया ही नहीं जाएगा, तो उसकी जानकारी कैसे होगी ! और जब बताने-सिखाने-पढ़ाने वाला ही  उजबक हो तो ! गुलिस्तां को बर्बाद करने के लिए तो एक ही उल्लू काफी होता है ! यहां तो हर शाख पे माननीय विराजमान हैं...........!

#हिन्दी_ब्लागिंग
आज सुबह की अखबार में छपी एक खबर ने मेरी बक-झक को और हवा दे दी जब पढ़ा कि प. बंगाल की एक पाठ्य-पुस्तक में मिल्खा सिंह की फोटो के बदले उन पर बनी फिल्म ''भाग मिल्खा भाग'' में उनका किरदार निभाने वाले फरहान अख्तर की फोटो छपी हुई है, जिसका किसी कोई इल्म नहीं है, सब वही पढ़-पढ़ा रहे थे ! 
यह जान-बूझ कर की गयी गलती नहीं है यह अज्ञानता का प्रतीक है ! कोई किताब यूं ही नहीं छप जाती ! दसियों लोगों की आँखों-हाथों से गुजरने के बाद लेखों को पुस्तक का रूप मिलता है ! वह तो पता नहीं कैसे फरहान को इसकी जानकारी मिली; उन्होंने आपत्ति दर्ज कराई; तो जिम्मेदारों के कान पर जूँ रेंगी ! पर क्या ऐसे दोष के लिए किसी सजा का प्रावधान है ? कौन है ऐसे लोगों का सरपरस्त ?

ऐसे ''हादसों'' का कारण साफ़ है। आज समय के साथ-साथ जीवन-पद्यति, रहन-सहन, सोच सब कुछ बदल गया है ! ज्ञान को पीछे कर जानकारी को अहमियत दी जाने लगी है ! शिक्षा का हर केंद्र ज्ञान नहीं सिर्फ जानकारी प्रदान कर किरानियों की एक बड़ी जमात का विनिर्माण करने लगा है ! इसी जमात से निकले लोग येन-केन-प्रकारेण जब जिम्मेदारी से भरे पदों पर काबिज होते या कर दिए जाते हैं, जिनके बारे में उनका ज्ञान निल बटे सन्नाटे से ज्यादा नहीं होता, तो फिरअंजाम भी वैसा ही होता है ! गुलिस्तां को बर्बाद करने के लिए तो एक ही उल्लू काफी होता है ! यहां तो हर शाख पे माननीय विराजमान हैं और विडंबना है कि हम बेहतरी की उम्मीद लगाए बैठे रहते हैं !

याद आता है ! कुछ महीनों पहले एक चैनल ने दिल्ली में कुछ युवाओं से रामायण से संबंधित कुछ सरल से प्रश्न पूछे थे, जिनका पूरा जवाब अधिकतर लोग नहीं दे पाए थे ! उन्हीं प्रश्नों में एक सवाल था, रामायण का रचयिता कौन है ? "नहीं मालुम'' तो आम जवाब था; कइयों ने रामानंद सागर का नाम लिया ! बहुतेरे बगलें झांकते नजर आए ! यह सब देख-सुन कर खेद-रोष-तकलीफ तो होती है पर सवाल यह उठता है ऐसा क्यों है ? यह तो एक ऐसे ग्रंथ के बारे में  था, जिसका प्रचार-प्रसार-लोकप्रियता दुनिया के कई-कई देशों में है ! बाकी हमारी संस्कृति, हमारे रीती-रिवाज, प्राचीन पौराणिक ग्रंथ, उनके चरित्र, शिक्षा, ज्ञान, महान ऋषि-मुनि, लेखक, चिंतक, वैज्ञानिक, चिकित्सक जैसे न जाने कितने अनगिनत योद्धा, संत महापुरुष हैं जिनके बारे में आज की पीढ़ी कुछ भी नहीं जानती ! नाही कोई कोशिश की जाती है उन सब के बारे में बताने की। कुछ पहले बात अलग थी; संयुक्त परिवारों में दादा-दादी, नाना-नानी, बड़े बुजुर्गों द्वारा बच्चों को संस्कारी, चरित्रवान, सहनशील, गुणवान, एक अच्छा इंसान बनाने के लिए किस्से-कहानियों का उपयोग किया जाता था। पर सभी जानते हैं कि समय के बदलाव के साथ क्या-क्या हुआ है ! बच्चों का बचपन छीन लिया गया, उनसे तरह-तरह के क्षेत्रों में काबिल होने का दवाब डाला गया, परिजनों के अपने खुद के दबे-ढके-अपूर्ण सपनों को पूरा करने की लालसा के साथ-साथ ज्यादा से ज्यादा अंक प्राप्त करने की अंधी दौड़ में शामिल कर उन्हें मशीन बना दिया। इस सब में अब कहां उन किस्से-कहानियों का रूहानी-रूमानी कल्पना संसार !

जब तक पूरी गंभीरता, निष्पक्षता, निष्ठा से इस समस्या का निदान नहीं निकाला जाता तब तक ऐसे हादसे होते रहेंगे और कोई आश्चर्य नहीं कि यदि इसी तरह का ही रवैया रहा, तो आने वाले पच्चीस-पचास वर्षों में ऐसी ही गलतियों को सच्चाई मान लिया जाएगा !

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गर्व है अपने युवाओं पर

हमारे देश की यह बदनसीबी है कि यहां अपने स्वार्थ, अपने वर्चस्व, स्वहित के लिए किसी भी हद तक जाने वालों की कभी कमी नहीं रही है !  अभी कुछ दि...