pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 2 अक्टूबर 2013

आज तीनों बंदर भी हैरान हैं


 उन तीनों  बंदरों  की साख, उनके आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

मिजारु, मिकाजारु, मजारु, तीन बंदर, पर कितने बुद्धिमान, बुरा कहने, सुनने  और देखने की मनाही करने वाले। गांधीजी को ये इतने भाए और उन्होंने तीनों को ऐसे अपनाया कि  वे गांधीजी के बंदर ही कहलाने लग गए। ये तीनों भी जापान से ऐसे ही भारत नहीं चले आए थे। वे आए थे यहाँ की संस्कृति, यहाँ का ज्ञान, यहाँ का पांडित्य, यहाँ की मर्यादा, यहाँ के सर्व-धर्म समभाव का गुणगान सुन कर। यहाँ की क्षमा शीलता की, मानवता की, भाई-चारे की,  माता-पिता-गुरु जनों के सम्मान की गाथाएं सुन कर। यहाँ के रहवासियों के  प्रकृति-पशु-पक्षियों के प्रति प्रेम की कहानियां सुन कर।   यहाँ आकर शरण भी ली तो ऐसे इंसान के यहाँ जो सदा  दूसरों के प्रति समर्पित रहा और फिर तीनो  यहीं के हो कर रह गए।

शीर्ष पर पहुँचने  के बाद हर मार्ग अवनति की ओर  ही जाता है। यह उन तीनों ने भी सुन रखा था पर इतनी जल्दी मूल्यों का ह्रास हो जाएगा वह भी भारत में, यह तो किसी ने भी नहीं सोचा था। समय चलायमान है, उसके साथ हर चीज बदलती जाती है। यहाँ भी वैसा ही हुआ, समय बदला, ज़माना बदला, परिस्थितियाँ बदलीं, साथ ही साथ नेता भी बदले और उन्होंने  अपने मतलब के तहत हर चीज की परिभाषा भी बदल डाली।

गांधीजी हमारे मार्गदर्शक रहे, झंझावातों के बावजूद उनके दिखाए रास्ते पर चल कर देश आजाद हुआ। पर अब उनके आदर्शों,  उनकी बातों का लोग अपनी सुविधानुसार उपयोग कर अपना मतलब निकालने में जुटे हुए हैं। बेचारे बंदर भी वैसी ही  कुटिल चालों का शिकार हो गए।  बंदर वही हैं उनकी सीखें भी वही हैं पर कुछ मौका-परस्त, चंट  लोगों ने  उनका अलग अर्थ निकाल कर  आम इंसान की मति  भ्रष्ट करनी  शुरू कर दी  है।  

पहले मजारु  के संकेत का अर्थ बुरा न कहने से लिया जाता था। अब उसका अर्थ निकाला जाता है कि कुछ भी होता रहे, देखते रहो, सुनते रहो पर बोलो मत कुछ भी। लाख अन्याय हो अपना मुंह फेर लो। मजलूमों पर जुल्म होता रहे तुम अनदेखा कर अपनी राह चलते रहो।  एक  चुप हजार नियामत। 

पहले मिजारु  के संकेत का अर्थ समझा जाता था कि बुरा मत देखो। अब उसका अर्थ हो गया है कि कुछ देखो ही  मत। बस बिना सोचे-समझे जो मुंह में आए  बोलते रहो। जितना हो सके दूसरों की बुराई करते हुए हदें पार कर दो।  किसी को नेक नामी मिलते ही उसकी बखिया उधेड़ दो। किसी के अच्छे काम को भी मीन-मेख निकाल कर निकृष्ट सिद्ध कर दो। वादे करो, सब्ज बाग़ दिखाओ और भूल जाओ। 

उसी तरह पहले मिकाजारु  के संकेत का अर्थ बुरा ना सुनने में किया  जाता था पर आज उसके अर्थ का भी  अनर्थ कर दिया गया है। अब उससे यह समझाया जाता है कि अपने स्वार्थ के लिए किसी की भी मत सुनो। कोइ लाख चिल्लाता रहे तुम अपनी रेवड़ियां बाँटते रहो, जनता के खून-पसीने की कमाई से अपने घर भरते रहो। कोइ विरोध करे तो उसकी ऐसी की तैसी करवा दो। कोइ कुछ भी बोले, कुछ भी कहे तुम अपने कानों पर जूँ मत रेंगने दो।

तीनों बंदर भी  हैरान हैं कि क्या यह वही देश है जिसकी किसी समय संसार भर में तूती बोला करती थी। जो ज्ञान और शिक्षा में जगत-गुरु कहलाता था। जिसके ऋषि-मुनियों के उपदेश दुनिया को राह दिखाते थे।  क्या  हो गया है यहाँ के गुणी जनों को, वीरों को, देश भक्तों को। क्यों मुट्ठी भर पथ भ्रष्ट लोगों के कारनामों पर पूरा देश चुप्पी साधे बैठा है?  क्यों  देश को रसातल की और जाते देख भी आक्रोश नहीं उमड़ता? क्यों महिलाओं की, दलितों की चीखों पर भी कान बंद किए हुए हैं लोग?

औरों की तो क्या कहें उन तीनों की अपनी साख, उनके अपने आदर्श भी तो दाँव पर लगे हुए हैं। इस कठिन समय में उन्हें राह दिखाने  वाले गांधी भी तो नहीं रहे।  पर यदि होते तो क्या आज के हैवानियत भरे माहौल में जाहिल-जालिम लोग उनकी बात मानते, इसमें भी तो शक है !!!  

बुधवार, 25 सितंबर 2013

बंगाल का रोशोगोल्ला यानी हम सबका रसगुल्ला

"नोवीन दा किछू  नोतून कोरो, डेली ऐक रोकोमेर मिष्टी आर भालो लागे ना."
"हेँ, चेष्टा कोच्ची (कोरची), दैखो की होय."

1866, कलकत्ता के बाग बाजार इलाके की एक मिठाई की दुकान। शाम का समय, रोज की तरह ही दुकान पर युवकों की अड्डेबाजी जमी हुई थी। मिठाईयों के दोनो के साथ तरह-तरह की चर्चाएं, विचार-विमर्श चल रहा था। तभी किसी युवक ने दुकान के मालिक से यह फर्माइश कर डाली कि नवीन दा कोई नयी चीज बनाओ। (नोवीन दा किछू नुतून कोरो)।
नवीन बोले, कोशिश कर रहा हूं। उसी कुछ नये के बनाने के चक्कर में एक दिन उनके हाथ से छेने का एक टुकड़ा चीनी की गरम चाशनी में गिर पड़ा। उसे निकाल कर जब नवीन ने चखा तो उछल पड़े, यह तो एक नरम और स्वादिष्ट मिठाई बन गयी थी। उन्होंने इसे और नरम बनाने के लिए छेने में "कुछ" मिलाया, अब जो चीज सामने आयी उसका स्वाद अद्भुत था। खुशी के मारे नवीन को इस मिठाई का कोई नाम नहीं सूझ रहा था तो उन्होंने इसे रशोगोल्ला यानि रस का गोला कहना शुरु कर दिया। इस तरह रसगुल्ला जग में अवतरित हुआ।

कलकत्ता वासियों ने जब इसका स्वाद चखा तो जैसे सारा शहर ही पगला उठा। बेहिसाब रसगुल्लों की खपत रोज होने लग गयी। इसकी लोकप्रियता ने सारी मिठाईयों की बोलती बंद करवा दी। हर मिठाई की दुकान में रसगुल्लों का होना अनिवार्य हो गया। जगह-जगह नयी-नयी दुकानें खुल गयीं। पर जो खूबी नवीन के रसगुल्लों में थी वह दुसरों के बनाये रस के गोलों में ना थी। इस खूबी की वजह थी वह  "चीज"  जो छेने में मिलाने पर उसको और नरम बना देती थी। जिसका राज नवीन की दुकान के कारिगरों को भी नहीं था।

नवीन और उनके बाद उनके वंशजों ने उस राज को अपने परिवार से बाहर नहीं जाने दिया। आज उनका परिवार कोलकाता के ध्नाढ्य परिवारों में से एक है, पर कहते हैं कि रसगुल्लों के बनने से पहले परिवार का एक सदस्य आज भी अंतिम "टच" देने दुकान जरूर आता है। इस गला काट स्पर्द्धा के दिनों में भी इस परिवार ने अपनी मिठाई के स्तर को गिरने नहीं दिया है।

बंगाल के रसगुल्ले जैसा बनाने के लिये देश में हर जगह कोशिशें हुईं, पर उस स्तर तक नहीं पहुंचा जा सका। हार कर अब कुछ शहरों में बंगाली कारिगरों को बुलवा कर बंगाली मिठाईयां बनवाना शुरु हो चुका है। पर अभी भी बंगाल के रसगुल्ले का और वह भी नवीन चंद्र की दुकान के "रशोगोल्ले" का जवाब नहीं।

कभी कोलकाता आयें तो बड़े नामों के विज्ञापनों के चक्कर में ना आ बाग बाजार के नवीन बाबू की दुकान का पता कर, इस आलौकिक मिठाई का आनंद जरूर लें।

* छेना :- दूध को फाड़ कर प्राप्त किया गया पदार्थ।
*  रोशोगोल्ला :- रसगुल्ले का बंगला में उच्चारण।

मंगलवार, 24 सितंबर 2013

आडंबरों का प्रभामंडल

कैमरे के बहुत छिपाने पर भी आप देख पायेंगे, कि यह पागलपन का दौरा सिर्फ सामने की एक दो कतारों पर ही पड़ता है, पीछे बैठे लोग निर्विकार बने रहते हैं। क्योंकि सिर्फ सामने वालों का ही जिम्मा है आप पर डोरे डालने का। उनका काम ही है मौके के अनुसार हंसना, उदास होना, अचंभित दिखना या नकली आंसू बहाना। आज कल लोग बहुत कुछ समझने लगे हैं पर यह भी एक तरह की संक्रामकता है जिससे दर्शक अछूते नहीं रह सकते।

आज चाहे जिधर नज़र उठ जाए सारा समाज आडंबर ग्रस्त नजर आता है। लगता है जैसे अपने को सफल, बेहतरीन, सबल दिखाने की होड सी लगी हुई है। फिर चाहे वह कोई बाबा हो, नेता हो, अभिनेता हो या फिर कोई संस्थान, आयोजन या प्रयोजन सभी अपने मुंह मियां मिट्ठू बने अपनी-अपनी ढपली उठा सुरा या बेसुरा राग आलापते अपनी सफलता का ढोल पीटे जा रहे हैं, फिर चाहे ऐसे कालीरामों के ढोल फट कर उनकी असफलता के कर्कश स्वर से लोगों के कानों के पर्दे को ही विदीर्ण ना कर दे रहे हों।

इन दिनों छोटे पर्दे पर सबसे ज्यादा "अनरीयल रियल्टी शो" का बोलबाला है। वैसा ही कुछ अब आप अपने टी वी पर होता हुआ पाते हैं। आज कल इस छोटे सिनेमा यंत्र पर बच्चों, युवाओं, अधेडों, युवतियों, माताओं को लेकर अनगिनत तथाकथित प्रतिभा खोजी "रियल्टी शो" की बाढ सी आई हुई है। ऐसे किसी कार्यक्रम को ध्यान से देखें जिसमें लोग बहुत खुश, हंसते या तालियां बजाते नजर आते हों। कैमरे के बहुत छिपाने पर भी आप देख पायेंगे, कि यह पागलपन का दौरा सिर्फ सामने की एक दो कतारों पर ही पड़ता है, पीछे बैठे लोग निर्विकार बने रहते हैं। क्योंकि सिर्फ सामने वालों का ही जिम्मा है आप पर डोरे डालने का। उनका काम ही है मौके के अनुसार हंसना, उदास होना, अचंभित दिखना या नकली आंसू बहाना। आज कल लोग बहुत कुछ समझने लगे हैं पर यह भी एक तरह की संक्रामकता है जिससे दर्शक अछूते नहीं रह सकते। पश्चिम जर्मनी के दूरदर्शन वालों ने 'एन शैला' नामक एक महिला को दर्शकों के बीच बैठ कर हंसने के लिये अनुबंधित किया था। कहते हैं उसकी हंसी इतनी संक्रामक थी कि सारे श्रोता और दर्शक हंसने के लिये मजबूर हो जाते थे। कुछ-कुछ वैसा ही रूप आप स्तरहीन होते जा रहे "लाफ्टर शो" का संचालन करती अर्चना पूरण सिंह में पा सकते हैं।

आज तो अपनी जयजयकार करवाना, तालियां बजवाना अपने आप को महत्वपूर्ण होने, दिखाने का पैमाना बन गया है। इस काम को अंजाम देने वाले भी सब जगह उपलब्ध हैं। तभी तो लच्छू सबेरे तोताराम जी का गुणगान करता मिलता है तो दोपहर को गैंडामल जी की सभा में उनकी बड़ाई करते नहीं थकता और शाम को बैलचंद की प्रशंसा में दोहरा होता चला जाता है। आप तो उसे ऐसा करते देख एक विद्रुप मुस्कान चेहरे पर ला चल देते हैं पर उसे और उस जैसे हजारों को इसका प्रतिफल मिलता जरूर है और तब आपके आश्चर्य का ठिकाना नहीं रहता जब आप उसे किसी निगम का सदस्य, पार्षद, किसी सरकारी संस्थान का प्रमुख और कभी तो राज्य सभा का मेम्बर तक बना पाते हैं। वैसे चाहे आप  इसे चाटुकारिता या कुछ भी कह लें, यह सब अभी शुरु नहीं हुआ है, यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। हमारे यहां अधिकांश शासकों के यहां चारण और भाट ये काम करते आये हैं।

रोम के सम्राट नीरो ने अपनी सभा में काफी संख्या में ताली बजाने वालों को रोजी पर रखा हुआ था। जो सम्राट के मुखारविंद से निकली हर बात पर करतलध्वनी कर सभा को गुंजायमान कर देते थे। 

ब्रिटेन में किराये के लोग बैले नर्तकों के प्रदर्शन पर तालियों की शुरुआत कर दर्शकों को एक तरह से मजबूर कर देते थे प्रशंसा के लिये। पर इस तरह के लोगों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। ब्रिटेन में ही एक थियेटर में ऐसी हरकत करने वाले के खिलाफ एक दर्शक ने 'दि टाईम्स' पत्र में शिकायत भी कर दी थी। पर उसका असर उल्टा ही हो गया, लोगों का ध्यान इस कमाई वाले धंधे की ओर गया और बहुत सारे लोगों ने यह काम शुरु कर दिया। जिसके लिये बाकायदा ईश्तिहारों और पत्र लेखन द्वारा इसका प्रचार शुरु हो गया।

इटली में भी यह धंधा खूब चल निकला। धीरे-धीरे इसकी दरें भी निश्चित होती चली गयीं। जिनमें अलग-अलग बातों और माहौल के लिये अलग-अलग कीमतों का प्रावधान था। बीच-बीच में इसका विरोध भी होता रहा पर यह व्यवसाय दिन दूनी रात अठगुनी रफ्तार से बढता चला गया।

इसलिए यदि आप किसी को किसी के लिए बिछते देखें, कदम बोसी करते देखें, अकारण किसी का स्तुति गान करते पाएं तो उस महानुभाव को हिकारत की दृष्टि से ना देखें हो सकता है कल आपको ही उसे सम्मान देना पड जाए।  

शुक्रवार, 20 सितंबर 2013

दिल्ली के तीन मूर्ति भवन की तीन मूर्तियां

 तीन मूर्ति भवन के सामने के चौराहे पर तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का एक स्मारक है, उन्हीं के कारण इस भव्य भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड गया. यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है.

दिल्ली का तीन मूर्ति भवन. देश के स्वतंत्र होने के बाद भारत के प्रधान मंत्री का सरकारी निवास स्थान. पर प्रधान मंत्री का घोषित निवास स्थान होने के बावजूद इसमें देश के पहले प्रधान मंत्री जवाहर लाल नेहरू ही रहे.
तीन मूर्ति भवन
उनके निधन के बाद इसे नेहरू स्मारक तथा संग्रहालय बना दिया गया. इस इमारत के सामने चौराहे पर तीन सैनिकोँ की खडी मूर्तियों का एक स्मारक है, उन्हीं के कारण इस भव्य भवन का नाम तीन मूर्ति भवन पड गया. यहाँ से हजारों लोग रोज गुजरते हैं, बाहर से दिल्ली दर्शन को आने वाले पर्यटक भी इस भवन को देखने आते हैं पर इन मूर्तियों के बारे में लोगों को अधिक जानकारी नहीं है.

शिकारगाह के अवशेष 

वर्षों पहले इस जगह बीहड़ जंगल हुआ करता था. शाम ढलते ही किसी की इधर आने की हिम्मत नहीं पड़ती थी. पूरा वन-प्रदेश जंगली जानवरों से भरा पडा था. करीब छह सौ साल पहले जब दिल्ली पर मुहम्मद तुगलक का राज्य था तब  यह जगह उसकी प्रिय शिकार गाह हुआ करती थी. शिकार के लिए उसने पक्के मचानों का भी निर्माण करवाया था जिनके टूटे-फूटे अवशेष अभी भी वहाँ दिख जाते हैं।


तीन मूर्ति स्मारक 
समय ने पलटा खाया। देश पर अंग्रजों ने हुकूमत हासिल कर ली. 1922 में इस तीन मूर्ति स्मारक की स्थापना हुई. उसके सात साल बाद 1930 में राष्ट्रपति भवन के दक्षिणी हिस्से की तरफ उसी जगह राबर्ट रसल द्वारा एक भव्य भवन का निर्माण, ब्रिटिश "कमांडर इन चीफ" के लिए किया गया. उस समय इसे "फ्लैग-स्टाफ़-हाउस" के नाम से जाना जाता था। जिसे  आजादी के बाद  सर्व-सम्मति से भारत के प्रधान मंत्री का  निवास  बनने का गौरव प्राप्त हुआ और उसका नया नाम बाहर बनी तीन मूर्तियों को ध्यान में रख तीन मूर्ति भवन रख दिया गया.

हालांकि इन मूर्तियों का परिचय उनके नीचे लगे शिला लेख में अंकित है, फिर भी अधिकाँश लोगों ने मूर्तियों को भवन का एक अंग समझ कभी उनके बारे में  जानकारी लेने की जहमत नहीं उठाई।  अंग्रेजों ने अपने आधीन राज्यों से सैनिकों को चुन कर 'लांसरों'  की टुकड़ियां बनाई थीं।उन्हीं टुकड़ियों ने  1914 के प्रथम विश्व युद्ध में अंग्रेजों की तरफ से स्वेज नहर, गाजा और येरुशलम की लड़ाई में भाग लिया था, जिसे हैफा की लड़ाई के रूप में याद किया जाता है. इसी युद्ध में इन भारतीय सैनिकों की  अभूतपूर्व वीरता और युद्ध कौशल के कारण अंग्रेजों को विजय प्राप्त हुई थी.  उसी युद्ध में  शहीद हुए, जोधपुर, मैसूर तथा हैदराबाद के 'लांसरों' की याद में ये कांसे की आदमकद, सावधान की मुद्रा में हाथ में झंडा थामे तीन मूर्तियां आज भी खडी हैं.           

बुधवार, 18 सितंबर 2013

हिंदी को दिल से अपनाएं

१४ सितम्बर, हिंदी दिवस। अपनी राष्ट्र भाषा को संरक्षित करने के लिए, उसकी बढ़ोत्तरी, उसके विकास के लिए मनाया जाने वाला दिन। दिन की शुरुआत ही बड़ी अजीब रही। अभी संस्थान पहुंचा ही था कि एक छात्रा सामने पड़ गयी। छूटते ही बोली, हैप्पी हिंदी डे सर। मैं भौंचक, क्या बोलूँ क्या न बोलूँ, सर हिला कर आगे बढ़ गया। पर दिन भर दिमाग इसी में उलझा रहा कि क्या हम सचमुच अपनी भाषा का आदर करते हैं ? क्या हमारी दिली ख्वाहिश है की हिंदी आगे बढे, इसे विश्व परिदृश्य में सम्मान मिले, इसकी पहचान हो? या फिर यह सब नौटंकी सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए वातानुकूलित कमरों में बैठ सिर्फ सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने के लिए की जाती है?  

संसार भर में करीब 7000 भाषाएं बोली जाती हैं। जिनमें करीब 1700 को बोलने वाले 1000 से भी कम लोग हैं। कुछ तो ऐसी भाषाएं भी हैं जिन्हें 100 या उससे भी कम लोग बोलते हैं। करीब 6300 अलग-अलग भाषाओं को एक लाख या उससे अधिक लोग बोलते हैं।  जिसमें शिखर की 150-200 ही ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें दस लाख या उससे ज्यादा लोग प्रयोग करते हैं। ऐसा कहा जा सकता है की 7000 में से सिर्फ 650-700 भाषाओं को पूरे विश्व की 99।9 प्रतिशत आबादी बोलती है। इसमें भी शिखर की दस भाषाओं ने विश्व की करीब 40 प्रतिशत आबादी को समेट रखा है। उन दस भाषाओं में हमारी हिंदी तीसरे स्थान पर है। उसके आगे सिर्फ  चीन की मैंड्रीन पहले नम्बर पर तथा दूसरे नम्बर पर अंग्रेजी है। अन्दाजतन हिंदी को 45 से 50 करोड़ लोग आपस में संपर्क करने के लिए काम में लाते हैं। अपने देश में कुछ हठधर्मिता, कुछ राजनीतिक लाभ के कारण इसके विरोध को छोड़ दें तो यह पूरे देश की संपर्क भाषा है। यह हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ऐसी भाषा के संरक्षण के लिए हमारे देश में दिन निर्धारित किया जाता है। हम उसके लिए सप्ताह या पखवाड़ा मना अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। वह भी तब जबकि इसका "ग्रामर" पूर्णतया तर्कसम्मत है। बोलने में जीभ को कसरत नहीं करनी पड़ती। इसकी विशेषता है कि इसे जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा भी जाता है। इतना सब होते हुए भी हमारी मानसिकता ऐसी हो गयी है कि हम इसे इसका उचित स्थान और सम्मान नहीं दिला पा रहे। विडंबना है की इतनी समृद्ध भाषा के लिए भी हमें दिन निश्चित करना पड़ता है। जबकि तरक्कीशुदा देशों में इसकी अहमियत पहचान इसे सम्मान का दर्जा दिया जा रहा है। 

ठीक है अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। पर उसके कारण, अकारण ही हम अपनी भाषा को हीन समझते हैं, उसे दोयम दर्जे की समझते हैं। दुःख तो तब होता है जब सिर्फ हिंदी के कारण विख्यात होने वाले, इसी की कमाई खाने वाले कृतघ्न कोई मंच मिलते ही अंग्रेजी में बोलना शुरू कर देते हैं। शायद उनके कम-अक्ल दिमाग में कहीं यह हीन भावना रहती है कि हिंदी में बोलने से शायद उन्हें गंवार ही न समझ लिया जाए।   

दुनिया के दूसरे देशों रूस, चीन, जापान, फ्रांस, स्पेन आदि से हमें सबक लेना चाहिए जिन्होंने अपनी तरक्की के लिए दूसरी भाषा को सीढी न बना अपनी भाषा पर विश्वास रखा और दुनिया में अपना स्थान बनाया।   

शनिवार, 14 सितंबर 2013

लगता है चुनावी मौसम आसन्न है

प्रकृति के निश्चित मौसमों के अलावा भी हमारे देश में एक मौसम होता है, चुनावी मौसम। हालांकी यह हर साल नहीं आता और होता भी अल्पकालीन ही है पर इसका समग्र प्रभाव दीर्घकालिक होता है। इसके आने के पहले इसके लक्षण प्रकट होने लगते हैं जिससे इसके आगमान की पूर्व सूचना मिलने लग जाती है। जैसे नेता रूपी शेर जनता रूपी बकरी के सर पर अपना वात्सल्य भरा हाथ फेरने लगता है। उसकी सारी क्रूरता, अक्खडता, तानाशाही तिरोहित हो जाती है। मुखारविंद से शब्द रूपी फूल टपकने लगते हैं। अचानक सर्वहारा के प्रति उसका ममत्व, अपनत्व, प्रेमत्व सब झरने की तरह प्रवाहित होने लगता है। आमजन के परोपकार की भावनाएं उसके मन में उछालें मारने लगती हैं, जिसके चलते वह मंच पर खडा हो अत्यंत विश्वास के साथ धारा प्रवाह वादों की ऐसी झडी लगा देता है कि ऊपर बैठा भगवान भी भौंचक्का रह जाता है क्योंकि इतने वादे पूरे करना शायद उसके भी वश में नहीं होता। कुछ ऐसा ही समा बधने लगा है इसीलिए लग रहा है कि चुनावी मौसम आसन्न है।  

चुनावी भाषणों में बेधडक सत्य की आड लेकर सत्य की ही हत्या की जाती है। 'टेनिसन' ने भी एक बार कहा था कि युद्ध में तलवार, प्रेम में छल और चुनाव में जीभ ये सबसे पहले सत्य की ही हत्या करते हैं। दसियों बार ऐसे धोखे खाने के बावजूद भी जनता बार-बार ऐसे लोगों का विश्वास करती है और बार-बार धोखा खा कर हाथ मलती रह जाती है। 

फिर भी चाहे जो हो हमारे प्रजातंत्र में यह चुनाव अति आवश्यक हैं। जरूरत है चंद मुट्ठी भर लोगों के बहकावे में ना आकर अपने तर्क, बुद्धि तथा विवेक के सहारे आमजन को, जिसके भरोसे, जिसके बलबूते पर ही हिमालय की तरह अडिग हमारा गणराज्य खडा है, नितिगत सही फैसले लेने होंगे। उसे सामने वाले तथाकथित नेता के आभामंडल से बिना प्रभावित या दिग्भ्रमित हुए यह समझ लेना होगा कि सभी बोली गयी बातें मान लेने के लिए नहीं होतीं और ना ही सामने वाला हर मनुष्य अनुकरण करने लायक होता है। उल्टे बकौले गालिब उसे सामने वाले को यह एहसास करवा देना होगा कि “तेरे कसमों वादों का एतबार नहीं हमें”। 

यह भी कटु सत्य है कि आज के माहौल में जनता के पास भी कोई ज्यादा विकल्प नहीं होते। घूम-फिर कर वही चेहरे अलग-अलग “पोशाकें” पहने नाटक करते नज़र आते हैं। इसलिए भले ही विकल्प ना हो पर अपने तेवरों से सामने वाले को मौका देने के साथ-साथ यह एहसास दिला देना बहुत जरूरी है कि एक बार हाथ जोड कर वर्षों के राशन-पानी का इंतजाम कर लेने वाले दिन लद गये। यदि गद्दी सौंपी है तो उसे वहां से झटके से बेदखल भी किया  जा सकता है। ऐसा नहीं है कि येन-केन-प्रकारेण कुर्सी हासिल हो गयी तो वह बपौती बन गयी। पद की मर्यादा, जनता का ख्याल और अपना उत्तरदायित्व भूलते ही कभी भी अर्श से फर्श पर लाया जा सकता है। यह खौफ यदि सर्वहारा नेताओं के दिलो-दिमाग में भर सके तभी देश और उसकी जनता खुशहाल होकर  चैन की सांस ले पाएगी।

गुरुवार, 12 सितंबर 2013

गणेश जी का मोरेश्वर मंदिर

गणेश जी. देश में सबसे ज्यादा पूजे जाने वाले, अबाल-वृद्ध सबके चहेते, सबके सखा, निर्विवाद रूप से सबके प्रिय। देश-विदेश में स्थापित अनगिनित मंदिरों की तरह ही उनके बारे में असंख्य कथाएं भी जन-जन में प्रचलित हैं। जो पूजा स्थलों के साथ-साथ ही अभिन्नरूप से गुंथी हुई हैं। उनका ऐसा ही एक पावन स्थल है पुणे का मयूरेश्वर मंदिर। 

गणेश पुराण के अनुसार त्रेता युग में उस समय मिथिला के राजा चक्रपाणी की रानी उग्रा ने सूर्य देव द्वारा पुत्र पाने की इच्छा की थी। पर सूर्य देवता के तेज और ताप को सहन ना कर पाने के कारण उसने अविकसित बच्चे को सागर के हवाले कर दिया। पर बच्चा बच गया और सागर ने उसे वापस राजा चक्रपाणी को सौंप दिया। चुंकि शिशु को सागर ने लौटाया था इसलिए उसका नामकरण सिंधू कर दिया
गया। सूर्य देव ने अपने इस अंश को अमृत कुंभ प्रदान किया था, जो उसके शरीर के अंदर स्थित था। अमर होने की भावना के कारण वह अपने मार्ग से भटक उच्श्रृंखल और आताताई बन गया। सारी प्रकृति उससे कांपने लगी। तब देवताओं ने उसके संहार के लिए प्रभू शिव और माता पार्वती की शरण ली. माँ ने जगत हित के लिए गणेश जी को पुत्र रूप में पाने के लिए लेंयाद्री की गुफाओं में कठोर तप किया। जिसके फलस्वरूप गणेश जी ने अवतार लिया और प्रभू शिव ने उनका नाम गुनेशा रखा। शुभ्र रंग तथा छह हाथों वाले गणेश जी ने अपने वाहन के रूप में मोर को चुना जिससे उनका नाम मोरेश्वर भी पडा।  

गुनेशा जी ने सिंधू की सेना उसके सेनापति कमलासुर को नाश किया। फिर सिंधू दानव के दो टुकडे कर उसके अंदर स्थित अमृत कुंभ को खाली कर उसका भी संहार कर डाला।   

परम पिता ब्रह्मा ने खुश हो सिद्धि और बुद्धि का विवाह गुनेशा जी के साथ कर दिया। अपने कार्य को संम्पन्न कर अपना वाहन अपने भाई कार्तिकेय को सौंप कर प्रभू फिर वापस अपने लोक को लौट गये।

गणेश पुराण के अनुसार गणेश जी के तीन प्रमुख स्थान हैं। जिनमें से मोरगांव धरती पर अकेला है। बाकि के दोनों स्थान शिवलोक तथा पाताल लोक में स्थित हैं। इसलिए भी इसकी महत्ता बहुत बढ जाती है। मोरगांव पुणे शहर से 80 किलोमीटर दूर स्थित है। मोरेश्वर मंदिर के निर्माण की निश्चित तिथि का तो पता नहीं चलता पर इसे पेशवा राज्य काल में भव्य रूप प्रदान किया गया था। 

कुछ लोगों का मानना है कि जिस जगह गणेश जी ने अवतार लिया था वहां मोर बहुतायत में पाए जाने के कारण वहां का नाम मोरगांव पड गया था, इसलिए वहां अवतार लेने के कारण उनका नाम मोरेश्वर पडा।

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