मध्य प्रदेश के विदिशा जिले में एक गांव है “रावण”।
है ना आश्चर्य की बात ? यह नाम कैसे प्रचलन में आया यह तो कोई नहीं बता पाता पर करीब 600-650 सालों से यह गांव इसी नाम से जाता है। रामायण में रावण को कान्यकुब्ज ब्राह्मण बताया गया है, इस गांव की आबादी का करीब 80 प्रतिशत कान्यकुब्ज ब्राह्मण ही हैं, जो अपने इस देव की अत्यंत, अटूट श्रद्धा से पूजा-अर्चना करते हैं।
ग्राम मेँ प्रवेश करते ही तालाब के किनारे यह प्रतिमा लेटी हुई अवस्था मे है जो सफेद-लाल पत्थर से निर्मित है। अद्भुत कारीगरी वाली इस मुर्ती में रावण बहुत सौम्य, सुंदर और गरिमा-मय दर्शाया गया है। दस शीश, बीस हाथ जिनमें आयुध पकड़े हुए हैं, विशाल उदर वाली यह मुर्ती सदा फूल, अक्षत तथा रोली से सजी-संवरी रखी जाती है। किसी भी समारोह, उत्सव या शुभ कार्य का प्रारंभ इसकी पूला अर्चना के बिना शुरु नहीं किया जाता। इस गांव के अलावा आस-पास के गांवों में भी किसी के घर शादी-ब्याह हो तो वधू के गृहप्रवेश के पहले और बारात चलने के पूर्व रावण की पूजा जरूर की जाती है। कान्यकुब्ज ब्राह्मणों के अलावा भी जो लोग हैं वे भी अपना कोई भी शुभ कार्य रावण की पूजा करे बगैर नहीं शुरु करते।
अभी आजादी के बाद यहां भी दशहरे के दिन शाम को रावण के पुतले का दहन शुरु हो गया है पर सारे ग्राम वासी उस दिन सुबह पूरे विधि-विधान से पहले इस रावण की मूर्ती की पूजा करते हैं फिर शामको पुतला दहन किया जाता है। इसके अलावा रामनवमी, होली, दिवाली पर भी इस प्रतिमा की पूजा अर्चना जरूर की जाती है।
है ना अपना देश और इसकी मान्यताएं अद्भुत और विचित्र ?
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
गुरुवार, 21 अप्रैल 2011
शनिवार, 16 अप्रैल 2011
महावीर जयंती पर विशेष
भगवान महावीर की दृष्टि मे साधु :-
केवल सिर मुड़ाने से कोई श्रमण नहीं हो जाता। सिर्फ हरिनाम जपने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। जंगल में रहने मात्र से ही कोई ऋषी नहीं बन जाता। कुश या चीवर धारण कर लेने से ही कोई तपस्वी नहीं बन जाता।
बल्कि इंसान समता से श्रमण बनता है। ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण बनता है। ज्ञान से ऋषि बनता है और तप करने से ही तपस्वी बन पाता है। ये गुण ही हैं जो मनुष्य को साधु बनाते हैं और अवगुण उसी को असाधु बना देते हैं।
साधु ममत्वरहित, निरहंकारी, निस्संग, गौरवत्यागी, चर-अचर और स्थावर जीवों के प्रति समदृष्टि रखने वाला होता है। वह लाभ-हानि, सुख-दुख, जीवन-मरण, निंदा-प्रशंसा, मान-अपमान मे समभाव बनाए रखता है। वह ख्याति, दंड़, भय, हास्य, शोक जैसे बंधनों से मुक्त होता है। उस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, दु:शैया, कष्ट-सुख जैसे लौकिक, दैहिक कष्टों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसे लोक-परलोक की चिंता नहीं व्यापती। वह कभी भी हर्ष,विषाद या प्रमाद नहीं करता।
भगवान की सीख है कि हे मनुष्य सदा प्रबुद्ध और शांत रह कर ग्राम और नगर में विचरण कर सबको शांति का मार्ग दिखला। कभी भी प्रमाद ना कर। किसी भी तरह का वेष धारण मत कर। भावों की शुद्धि के लिए बाह्यपरिग्रह का त्याग कर अपना जीवन प्राणी-मात्र की सेवा में लगाए रख।
केवल सिर मुड़ाने से कोई श्रमण नहीं हो जाता। सिर्फ हरिनाम जपने से ही कोई ब्राह्मण नहीं बन जाता। जंगल में रहने मात्र से ही कोई ऋषी नहीं बन जाता। कुश या चीवर धारण कर लेने से ही कोई तपस्वी नहीं बन जाता।
बल्कि इंसान समता से श्रमण बनता है। ब्रह्मचर्य से ब्राह्मण बनता है। ज्ञान से ऋषि बनता है और तप करने से ही तपस्वी बन पाता है। ये गुण ही हैं जो मनुष्य को साधु बनाते हैं और अवगुण उसी को असाधु बना देते हैं।
साधु ममत्वरहित, निरहंकारी, निस्संग, गौरवत्यागी, चर-अचर और स्थावर जीवों के प्रति समदृष्टि रखने वाला होता है। वह लाभ-हानि, सुख-दुख, जीवन-मरण, निंदा-प्रशंसा, मान-अपमान मे समभाव बनाए रखता है। वह ख्याति, दंड़, भय, हास्य, शोक जैसे बंधनों से मुक्त होता है। उस पर भूख-प्यास, सर्दी-गर्मी, दु:शैया, कष्ट-सुख जैसे लौकिक, दैहिक कष्टों का कोई प्रभाव नहीं पड़ता। उसे लोक-परलोक की चिंता नहीं व्यापती। वह कभी भी हर्ष,विषाद या प्रमाद नहीं करता।
भगवान की सीख है कि हे मनुष्य सदा प्रबुद्ध और शांत रह कर ग्राम और नगर में विचरण कर सबको शांति का मार्ग दिखला। कभी भी प्रमाद ना कर। किसी भी तरह का वेष धारण मत कर। भावों की शुद्धि के लिए बाह्यपरिग्रह का त्याग कर अपना जीवन प्राणी-मात्र की सेवा में लगाए रख।
शुक्रवार, 15 अप्रैल 2011
१९९७ में इंद्रकुमार गुजराल और २०११ में मनमोहन सिंह, वर्षों का फासला पर ब्यान बिलकुल एक जैसे !!!
एक अजब संयोग - आज पुराने पन्ने पलटते हुए एक विचित्र जानकारी हाथ लगी, आप भी पढ कर देखें और माने कि इतिहास अपने को दोहराता है। साल 1997, अगस्त के अंतिम सप्ताह मे संसद का विशेष अधिवेशन बुलाया गया था। नेता तो हर काल मे नेता ही होता है। उस समय भी हर नेता ने लंबे-चौड़े भाषण दिए खुद को पाक-साफ बताया और कहा कि देश की यह चिंताजनक हालत रिश्वतखोरी और भ्रष्टाचार है इससे हमें मुक्ति पानी है। उस समय देश के प्रधान मंत्री थे इंद्र कुमार गुजराल साहब। उन्होंने क्या कहा था, जरा गौर फरमाएं - "देश में भ्रष्टाचार है, लेकिन मैं विवश हूँ और शर्मिंदा हूँ। लोकसभा अध्यक्ष श्री संगमा ने कहा कि "मुझे शर्म आती है कि हमारा देश रिश्वतखोरी में डूबा हुआ है।" इसके जवाब में श्री चंद्रशेखर ने जोरदार शब्दों में कहा था "जब प्रधान मंत्री और लोकसभा अध्यक्ष कहते हैं कि हम विवश हैं और हमें देश की हालत पर शर्म आती है तो उन्हें पद पर बने रहने का कोई अधिकार नहीं है।" अजीब संयोग है, बिल्कुल ऐसे ही हालात और वैसे ही ब्यान आज भी दिए जा रहे हैं। उस समय चंद्रशेखर जी ने स्पष्ट कहा था कि जब सत्ता के सर्वोच्च शिखर पर बैठे इंसान, जिसके हाथ में कानून और सुरक्षा की जिम्मेदारी है, वही यदि अपने को पाक-साफ सिद्ध करने के लिए भ्रष्टाचारियों के सामने खुद को विवश बता, आंसू बहा जनता की हमदर्दी हासिल करना चाहे तो जनता का मनोबल तो गिरेगा ही देश की अस्मिता को भी ठेस पहुंचेगी।
गुरुवार, 14 अप्रैल 2011
कीड़े-मकोड़े ही नहीं पक्षी भी जहरीले होते हैं.
जनविश्वास है कि कीडे-मकोडे ही जहरीले होते हैं। पर खोजों से पता चला है कि कुछ पक्षी भी जहरीले होते हैं। उन्हीं मे से एक है
“पिटोहुई”।

आस्ट्रेलिया के न्यूगिनी के जंगलों मे पाया जाने वाला लाल-काले रंग का यह पक्षी अपने जहरीलेपन के कारण जाना जाता है। वहां के स्थानीय लोग इस एस्लेकयाट यानि कड़वी चिड़िया के नाम से जानते हैं। इस करीब सौ ग्राम वजन तथा दस इंच की लंबाई वाले पक्षी की चोंच और पैर बहुत मजबूत होते हैं। इसकी खोज अचानक ही हो गयी थी। अपने किसी मिशन पर गये पक्षी वैज्ञानिक ड़बैचर के जाल में यह अकस्मात ही फंस गया था। उन्होंने जब इस पर ध्यान देना शुरु किया तो इसने उनकी उंगली को अपनी चोंच से घायल कर दिया, उंगली से खून निकलता देख उन्होंने उंगली को मुंह में जैसे ही रखा तो उन्हें लगा जैसे मुंह मे आग लग गयी हो। उनका शरीर घमौरियों से भर गया और शरीर में जलन सी होने लगी।
पक्षी की इस विषेशता का पता स्थानीय लोगों को है इसीसे वे इस में कोई रुची नहीं लेते हैं। पर अपने इसी गुण की खातिर यह पक्षी बहुत सारी विपदाओं से बचा भी रहता है। वैसे इसके दुश्मन कम नहीं हैं। सांपों और बाजों का यह प्रिय आहार है।
इसी तरह का एक पक्षी “इफ्राटा” है, जिसका रंग नारंगी-कालापन लिए होता है। इन पक्षियों का आहार छोटे कीड़े, चींटियां, केंचुए इत्यादि हैं। इनकी प्रजाति न्यूगिनी मे ही पाई जाती है। वहां भी विपरीत परिस्थितियों के कारण इनकी संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है।
“पिटोहुई”।

आस्ट्रेलिया के न्यूगिनी के जंगलों मे पाया जाने वाला लाल-काले रंग का यह पक्षी अपने जहरीलेपन के कारण जाना जाता है। वहां के स्थानीय लोग इस एस्लेकयाट यानि कड़वी चिड़िया के नाम से जानते हैं। इस करीब सौ ग्राम वजन तथा दस इंच की लंबाई वाले पक्षी की चोंच और पैर बहुत मजबूत होते हैं। इसकी खोज अचानक ही हो गयी थी। अपने किसी मिशन पर गये पक्षी वैज्ञानिक ड़बैचर के जाल में यह अकस्मात ही फंस गया था। उन्होंने जब इस पर ध्यान देना शुरु किया तो इसने उनकी उंगली को अपनी चोंच से घायल कर दिया, उंगली से खून निकलता देख उन्होंने उंगली को मुंह में जैसे ही रखा तो उन्हें लगा जैसे मुंह मे आग लग गयी हो। उनका शरीर घमौरियों से भर गया और शरीर में जलन सी होने लगी।
पक्षी की इस विषेशता का पता स्थानीय लोगों को है इसीसे वे इस में कोई रुची नहीं लेते हैं। पर अपने इसी गुण की खातिर यह पक्षी बहुत सारी विपदाओं से बचा भी रहता है। वैसे इसके दुश्मन कम नहीं हैं। सांपों और बाजों का यह प्रिय आहार है।
इसी तरह का एक पक्षी “इफ्राटा” है, जिसका रंग नारंगी-कालापन लिए होता है। इन पक्षियों का आहार छोटे कीड़े, चींटियां, केंचुए इत्यादि हैं। इनकी प्रजाति न्यूगिनी मे ही पाई जाती है। वहां भी विपरीत परिस्थितियों के कारण इनकी संख्या दिन-प्रतिदिन कम होती जा रही है।
बुधवार, 13 अप्रैल 2011
नेता अड़ा हुआ था कि उसका खर्च सरकार देगी
बाबा आमटे की भ्रष्टाचार विरोधी सभा से एक साथ एक ही कार मे वापस जाते हुए, एक नेता, एक अभिनेता और एक व्यापारी की एक्सीडेंट में मौत हो गयी। पर कुछ देर बाद अभिनेता को होश आ गया। वह जब थोड़ा ठीक महसूस करने लगा तो लोग पूछनै लगे कि क्या हो गया था कैसे सब हुआ। अभिनेता बोला कैसे हुआ यह तो ठीक से मालुम नहीं है पर ऊपर जो हुआ वह पूरी तरह याद है। लोगों के पूरी बात बताने के आग्रह को देख अभिनेता ने कहना शुरु किया कि जैसे ही हम ऊपर पहुंचे तो वहां एक भव्य, विशाल द्वार के सामने अपने को खड़ा पाया वहां द्वारपाल ने हमें बताया कि कहीं कुछ गड़बड़ी के कारण उनका निर्णय नहीं हो पा रहा है। सो उन्हें कुछ समय की लीज मिल सकती है। इसके लिए उन्हें एक सहस्त्र स्वर्ण मुद्राएं जमा करानी होंगी। मैंने अपने क्रेडिट कार्ड़ से तुरंत पेमेंट कर दी और वापस आ गया। लोगों ने पूछा कि आपके साथ के नेताजी और वह व्यापारी महोदय क्यों नहीं आए? अभिनेता ने जवाब दिया, व्यापारी तो मोल-भाव में जुटा था कि रकम ज्यादा है इसे कम करो और नेताजी कह रहे थे कि उनका खर्चा सरकार उठाएगी ।
मंगलवार, 12 अप्रैल 2011
होना छत्तीसगढ़ के रायपुर के गैस-कार्डों का सत्यापन, जैसे दिखा हो बुरा सपना
सभी जानते हैं कि रसोई गैस का गलत तरीकों से इस्तेमाल किया जाता रहा है। जिससे त्योहारों जैसे मौकों पर इसकी किल्लत हो जाती है। वैसे यह भी हो सकता है कि यह किल्लत कालाबाजारी के कारण कृत्रिम रूप से बनाई जाती रही हो। इसमें भी कोई बड़ी बात नहीं है। इसी बीमारी को खत्म करने के लिए एक अच्छी मंशा के साथ छत्तीसगढ की राजधानी रायपुर में रसोई गैस धारकों के कार्ड़ों के सत्यापन के लिए एक अभियान चलाया गया। जिससे असली उपभोक्ताओं की तस्वीर सामने आ सके और नकली कार्ड़ निरस्त किए जा सकें। पर पता नहीं क्यों इसके लिए जो तरीका अख्तियार किया गया वह पूरी तरह अव्यवहारिक था। इसके तहत उपभोक्ता को तरह-तरह के कागजों के साथ एक निश्चित जगह पर आ कर अपनी सत्यता को स्थापित करना था। उस पर तुक्का यह कि उसे ड़रा भी दिया गया था कि सत्यापन ना करवाने पर कार्ड़ निरस्त कर दिया जाएगा। बस शहर में हड़कंप मच गया। सीधा साधा 'मैंगोमैन' भिड़ गया कागजों को इक्कठा करने, बनवाने के चक्करों में, अपना काम-काज छोड़, दिन की तन्ख्वाह को दांव पर लगा अपनी सच्चाई पर मोहर लगवाने। विडंबना थी कि ये वही लोग थे जिन्होंने इस मुए कार्ड़ को बनवाने के लिए भी ना जाने कैसे-कैसे धक्के खाए थे। इन सब को यह भी पता था कि यह उनके साथ गलत हो रहा है क्योंकि कालाबाजारी वे नहीं करते। इसका सारा खेल शुरु तथा खत्म गैस एजेंसियों से ही होता है। पर करें क्या मजबूर जो ठहरे। क्या प्रशासन को पता नहीं है कि शहर के किसी भी कोने से 150-200 रुपये देकर बिना कार्ड़ के गैस टंकी आसानी से मिल जाती है। शहर के अंदर या बाहर के ढाबों पर घरेलू गैस की टंकियों से ही भोज्य पदार्थ बनाए जाते हैं। वह भी असली उपभोक्ता की जेब काट कर। वहां गैस टंकियों से भरा ट्रक पहले दिन गैस टंकी देता जाता है दूसरे दिन वही टंकी वापस ले नयी छोड़ जाता है। कुछ हल्की हुई पहले वाली को कार्ड़ धारी के मत्थे मढ दिया जाता है, जो जागरूकता के अभाव में जो मिल गया उसे ही मुकद्दर समझ, अंजाने में ही सही, अन्याय का शिकार बनता रहता है। पेट्रोल की बढती कीमतों के कारण यही गैस बहुतों की रसोई नहीं उनकी गाड़ियां चलाती है। शादी-ब्याहों में कितने जने पूछ-परख करते हैं कि यह गैस कहां से आई? कहानियों में वर्णित है कि पुराने समय में आश्रमों में पढने वाले धनाढ्य परिवार के बच्चों को मारा-पीटा या धमकाया नहीं जाता था। उसे डराने के लिए उसके पास बैठे गरीब परिवार के बच्चे को बिना उसकी गलती के दंड़ित किया जाता था जिससे डर के मारे वह धनीपुत्र डर जाए और आगे गलती ना करे। वैसा ही कुछ इस बार गैस कार्डों के सत्यापन को ले कर किया गया। होना तो यह चाहिए था कि काला बाजारी करने वाली गैस एजेंसियों पर कार्रवाही की जाती। एजेंसियों और अफसरों की मिली-भगत पर नजर रखी जाती, पर हुआ उल्टा। उसी मध्यम वर्ग पर गाज गिरी जो इस मुए कार्ड़ को बनवाते समय भी दसियों तरह की परेशानियों से दो-चार हो चुका था। उसी को फिर बली का बकरा बनाया गया, लंबी-लंबी लाइनों में लगने क बाद भी सत्यापन होगा कि नहीं की उहापोह में अपना रक्त-चाप बढवाने के साथ-साथ। यह सब ठीक वैसा ही था जैसे चोरी होने के बाद चोर को ढूंढने-पकड़ने की बजाए जिसके घर चोरी हुई हो उसी को हड़काया जाना शुरु कर दिया जाए। बताओ, तुम्हारा दरवाजा बंद था या खुला, आल्मारी में ताला लगा था कि नहीं, यदि नहीं तो क्यों नहीं लगाया था, घर किसका है, सामान खरीद कर लाए थे या कैसे मिला था, इतना सामान रखते ही क्यों थे इत्यादि-इत्यादि। उधर चोर की ना तो तलाश हो रही है नाहीं उसकी फिक्र है । ऐसी सोच है कि इतना सब करने पर वह अपने-आप सुधर जाएगा। फिलहाल तो सब स्थगित है। आने वाले दिनों में अब ऊंट पर नजर रहेगी। पर यह स्थगन किसी और दिशा की तरफ तो इशारा नहीं कर रहा ?
सोमवार, 11 अप्रैल 2011
युद्ध से जरूर हटे थे पर ना वे भगोड़े थे नाहीं कायर
युद्ध से भागना या पीठ दिखाना कायरता की निशानी मानी जाती है। पर यदि उस दिन पराजय सामने नजर आ रही हो, हार ना टाली जा सकने वाली हो तो क्या उस समय मैदान छोड़ देना कायरता या बेवकूफी कहलाएगी या अक्लमंदी? निश्चित रूप से यह अक्लमंदी कहलाएगी। परिस्थितियों को पूरी तौर से अपने खिलाफ होता देख, युद्ध भूमि से और तैयारी करने के लिए कुछ समय के लिए हट जाने में कोई लज्जा या संकोच की बात नहीं होती बल्कि यह चतुराई है। इस बात के पूर्ण पक्षधर थे वीर शिवाजी। जब-जब उन्हें अपना पक्ष कमजोर होता दिखा उन्होंने मोर्चे से खुद को अलग कर लिया और फिर पूरी तैयारी से वापस आकर जीत हासिल की। चाहे वह पन्हालगढ की लड़ाई हो चाहे औरंगजेब की जेल हो चाहे महावत खां के साथ युद्ध हो। वैसे उसी औरंगजेब को भी बीजापुर के युद्ध में मैदान छोड़ना पड़ा था। हुमायूं को बार-बार शेरशाह से लड़ाई के दौरान बचना पड़ा था। भागने में अंग्रेज भी पीछे नहीं रहे पर उन्होंने तैयारी कर फिर-फिर वापसी की। स्वतंत्रता की लड़ाई में वीर सावरकर अंग्रजों के चंगुल से पानी के जहाज के संड़ास के 'पोर्ट-होल' से निकल भागे थे। सुभाष चंद्र बोस अंग्रेजों को धोखा दे देश से बाहर चले गये थे। माओत्से तुंग च्यांगकाई शेक की सेना से लड़ने में असफल रहने पर लगातार महिनों लुकते-छिपते रहे थे। चीन के आक्रमण करने पर दलाई लामा भारत चले आए थे। इंसानों की तो क्या कहें खुद भगवान श्री कृष्ण को भी इस चतुराई का सहारा लेना पड़ा था जब मथुरा पर जरासंध के बार-बार आक्रमण करने के कारण वे मथुरा छोड़ द्वारका चले गये थे। इसी से उनका एक नाम 'रणछोड़' भी है। मुहम्मद पैगंबर भी मक्का छोड़ मदीना चले गये थे। पर वह दिन भी गर्व से हिजरी संवत मान कर याद किया जाता है। लड़ाई में हार-जीत तो चलती ही रहती है। लड़ते-लड़ते वीर गति को प्राप्त होना निश्चित रूप से बहादूरी होती है पर यदि उससे विजय प्राप्त ना हो तो देश को लाभ नहीं पहुंचता। समय विपरीत जान मैदान छोड़ देना कायरता कि श्रेणी में नहीं आता। समय को अपने पक्ष में करने के लिए उठाया गया ऐसा कदम बुद्धिमत्ता पूर्ण होता है। कायरता युद्ध से भाग कर फिर युद्ध ना करने में है। ये सारे महापुरुष भले ही एक समय युद्ध से निकल गये हों पर मौका मिलते ही इन्होंने अपने दुश्मनों को हरा कर ही चैन की सांस ली थी।
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