जिसने हजारों साल पहले हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की सफल समुद्री यात्राएं ही नहीं कीं थीं, बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया में फुनान साम्राज्य, जो मेकांग डेल्टा क्षेत्र में स्थित था, की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! जिसने ऐसा अनोखा इतिहास रचने में अपना योगदान दिया था, उसी, अब तक एक तरह से अज्ञात, गुमनाम महान नाविक को सम्मान देते हुए भारतीय नौसेना ने अपने इस नये जहाज का नाम INSV कौंडिन्य रख, देशवासियों को उससे परिचित करवाया है ! इसके लिए नौसेना को साधुवाद..........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
इस साल के अंत में एक अद्भुत, सुखद घटना घटी ! जब भारतीय नौसेना ने अपना एक खास अग्रणी ''सिला हुआ पाल-पोत,'' INSV कौंडिन्य सोमवार, 29 दिसंबर को गुजरात के पोरबंदर से ओमान के मस्कट तक भारत की प्राचीन समुद्री परंपराओं के परीक्षण तथा प्राचीन समुद्री व्यापार मार्ग का पता लगाने के लिए रवाना किया। 19.6 x 6.5 x 3.3 आयामी इस जहाज में 17 नाविक सवार हैं, जिनका नेतृत्व कमांडर विकास सोरेन तथा उनके सहायक कमांडर वाई हेमंत कुमार संभालेंगे। कौंडिन्य उन 1400 की.मी. लंबे ऐतिहासिक समुद्री मार्गों का प्रतीकात्मक पुनरावलोकन करेगा, जिन्होंने सहस्राब्दियों तक भारत को व्यापक हिंद महासागर क्षेत्र से जोड़े रखा था।
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| इतिहास रचने की तैयारी |
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| नौसेना का हिस्सा |
कौंडिन्य की विशेषता यह है कि यह आज के आधुनिक नौसैनिक जहाजों से बिलकुल अलग है। कौंडिन्य में ना कोई इंजन है, नाहीं आधुनिक प्रोपल्शन तकनीक। इसे अजंता की गुफाओं में दर्शाए गए एक जहाज के चित्र के आधार पर, लकड़ी के तख्तों से, 2000 साल से भी अधिक पुरानी जहाज निर्माण पद्धति के अनुसार बनाया गया है। इसमें लोहे या धातु की कीलों का प्रयोग ना कर, नारियल के रेशों, उसकी रस्सियों, मछली के तेल, प्राकृतिक राल, और लाल ईंटों के चूर्ण का उपयोग किया गया है। एक तरह से यह एक सिला हुआ जहाज है। यह समुद्र की लहरों, हवा और अपने पाल के सहारे ही अपनी यात्रा पूरी करेगा !
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| कौंडिन्य |
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| पूर्णतया सिला हुआ |
इसका नाम रखा गया है कौंडिन्य ! कौन थे ये ? जिनके नाम पर इस जहाज का नाम रखा गया ! तो यह उस भारतीय व्यक्ति का नाम है, जिसने हजारों साल पहले हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की सफल समुद्री यात्राएं ही नहीं की थीं बल्कि दक्षिण पूर्व एशिया में फुनान साम्राज्य, जो मेकांग डेल्टा क्षेत्र में स्थित था, की स्थापना में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी ! पर जिसके बारे में हमारे छद्म इतिहासकारों ने कभी बताया ही नहीं ! हम तो अब तक कोलंबस, वास्कोडिगामा आदि को ही साहसी नाविक मानते रहे थे !
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| गर्व के पल |
कौंडिन्य का जन्म कलिंग राज्य के एक ब्राह्मण परिवार हुआ था ! वे एक महान विद्वान तथा निडर साहसिक नाविक थे। जो हिंद महासागर से दक्षिण पूर्व एशिया तक की अपनी यात्राओं के लिए जाने जाते रहे हैं। उनकी कहानी ऐतिहासिक तथ्य और पौराणिक कथाओं का मिश्रण है, जो भारत और दक्षिण पूर्व एशिया के बीच गहरे सांस्कृतिक और समुद्री संबंधों का प्रतीक है। एक कुशल नाविक के रूप में अपनी उपलब्धियों के अलावा, कौंडिन्य वैदिक ज्ञान में और मार्शल आर्ट में भी पारंगत थे। जो हमारे प्राचीन खोजकर्ताओं की बहुआयामी विलक्षणता को दर्शाता है !
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| तब कितनी कठिन रही होगी यात्रा |
कौंडिन्य का विस्तृत विवरण प्राचीन चीनी अभिलेखों में उपलब्ध है, जिनके अनुसार, कौंडिन्य ने बंगाल की खाड़ी के पार, दिव्य स्वप्न द्वारा निर्देशित हो एक यात्रा शुरू की। मेकांग डेल्टा में कौंडिन्य और उनके चालक दल पर समुद्री लुटेरों, जिसका नेतृत्व एक नागा (सर्प) कबीले के मुखिया की बेटी रानी सोमा कर रही थी, ने हमला कर दिया। जिसमें इन्होंने सोमा की सेनाओं को हराया। कौंडिन्य के साहस और कौशल से प्रभावित हो कर रानी सोमा ने उनसे विवाह का प्रस्ताव रखा, जिसे कौंडिन्य ने स्वीकार कर लिया।
समय के साथ कौंडिन्य ने फुनान साम्राज्य की स्थापना कर, व्याधपुरा (वर्तमान कंबोडिया) में बा फनोम को अपनी राजधानी के रूप में स्थापित किया। कौंडिन्य और रानी सोमा के विवाह को व्यापक रूप से भारतीय और स्थानीय खमेर संस्कृतियों के संबंधों की सुदृढ़ता के रूप में माना जाता है। इस सांस्कृतिक एकीकरण ने एक संपन्न सभ्यता की नींव रखी। समय के साथ, फुनान समुद्री व्यापार के एक प्रमुख केंद्र के रूप में विकसित हुआ।
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| सन्नद्ध |
जिसने ऐसा इतिहास रचने में अपना योगदान दिया था, उस, अब तक एक तरह से, अज्ञात, गुमनाम महान नाविक को सम्मान देते हुए भारतीय नौसेना ने अपने इस नये जहाज का नाम INSV कौंडिन्य रख, देशवासियों को उससे परिचित करवाया है ! इसके लिए नौसेना का हार्दिक आभार और साथ ही साधुवाद !
@चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
5 टिप्पणियां:
ज्ञानवर्धक
यह पढ़कर सच में गर्व महसूस होता है। हम अक्सर अपने समुद्री इतिहास को भूल जाते हैं, जबकि हमारे पूर्वज हजारों साल पहले खुले समुद्र नापते थे। कौंडिन्य की कहानी रोमांचक भी है और आंखें खोलने वाली भी। अच्छा लगा कि भारतीय नौसेना ने सिर्फ आधुनिक ताकत नहीं दिखाई, बल्कि इतिहास से जुड़कर सम्मान भी दिया।
आभार, सुशील जी 🙏
Admin ji
अपनी यात्रा वृतांत में वास्कोडिगामा ने स्वयं लिखा है कि अफ्रीका के समीप उसकी मुलाकात एक समृद्ध भारतीय व्यापारी से हुई थी। उस व्यापारी का जहाज मेरे जहाज से लगभग चार गुना अधिक बड़ा था जो कीमती सामान से भरा हुआ था। जबकि वास्को का जहाज तब तक के यूरोपीय जहाजों में सबसे बड़ा था ! वास्कोडिगामा उसी भारतीय व्यापारी के साथ चलता हुआ भारत पंहुचा था।
17 दिन की ऐतिहासिक यात्रा के बाद बुधवार 14 जनवरी को ओमान पहुंच गया। मस्कट के पोर्ट सुल्तान काबूस पर पानी की बौछार कर स्वागत किया गया 🤗
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