रविवार, 20 दिसंबर 2015

उपजना क्षणिक बैराग का



हमारे बाद भी समय ऐसे ही चलता रहेगा, कायनात यूँ ही कायम रहेगी। हफ़्तों-महीनों-सालों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं" !!!  

पिछले दिनों एक समागम में सम्मलित होने का मौका मिला था। उत्तराखंड से कुछ प्रबुद्ध लोगों का आगमन हुआ था, सभी पढ़े-लिखे ज्ञानी जन थे। बात चल रही थी कि सभी यह जानते हैं कि एक दिन सब को जाना ही है और वह भी खाली हाथ। फिर भी संचय की लालसा नहीं मिटा पाता कोई भी।  यही दुनिया का सबसे बड़ा आश्चर्य है !

प्रवचन जारी था, "सोचने की बात है कि दिन-रात मेहनत कर हम अपना कमाया हुआ धन शादी-ब्याहों में पानी की तरह बहाते हैं, आप खुद ही सोच कर बताइये कि क्या आपको याद है कि आपने जो पिछली दो शादियों में शिरकत की थी वहां क्या खाया था ? अपनी जरुरत से कहीं ज्यादा जमीं-जायदाद खरीद कर हम किसे प्रभावित करना चाहते हैं ? जानवरों की तरह मेहनत-मश्शकत कर हम कितनी पीढ़ियों के सुरक्षित भविष्य के लिए कमाते हैं ? क्या हमें अपनी आने वाली नस्लों की लियाकत के ऊपर भरोसा नहीं है कि वे भी अपने काम में सक्षम होंगे ? आजकल ज्यादातर घरों में दो या तीन बच्चे होते हैं, किसी-किसी के तो एक ही संतान होती है फिर भी लोग लगे रहते हैं अपनी सेहत को दांव पर लगा कमाने में। कितना चाहिए एक इंसान को जीवन-यापन करने के लिए? जिनके लिए हम कमाते हैं वह उनके काम आएगा कि नहीं यह भी पता नहीं पर उन्हीं के लिए, उन्हीं से दो बातें करने के लिए, उनके साथ कुछ समय गुजारने का भी हमारे पास वक्त नहीं होता। सारा जीवन यूँ ही और-और-और सिर्फ और इकट्ठा करने में गुजर जाता है और वह भी कैसी संपत्ति जो सिर्फ कागजों के रूप में हमारे पास होती है। विडंबना यह है कि उस कमाई का पांच-दस प्रतिशत भी हम अपने ऊपर खर्च करने से कतराते हैं, यह सोच कर कि बुरे दिनों में काम आएगा ! 

धनी होना कोई बुरी बात नहीं है पर धन को अपने ऊपर हावी होने देना ठीक नहीं होता। समय चक्र कभी रुकता नहीं है। जो आज है वह कल नहीं रहता, जो कल होगा वह भी नहीं रहेगा। एक न एक दिन हम सबको जाना है, एक दूसरे से बिछुड़ना है। हमारे बाद भी समय ऐसे ही चलता रहेगा, कायनात यूँ ही कायम रहेगी। हफ़्तों-महीनों-सालों के बाद हमारी आगामी पीढ़ी हमारी ही फोटो देख पूछेगी, यह लोग कौन थे ? तब उन्हें हमारे संबंध में बतलाया जाएगा और ऊपर बैठे हम अपने आंसू छिपाए यह सोचेंगे, क्या इन्हीं के लिए हमने अपनी जिंदगी खपाई जो हमें पहचानते ही नहीं" !!!     

प्रवचन चल रहा था, लोग दत्तचित्त हो सुन रहे थे। यह भी एक प्रकार का बैराग ही था। पर इसकी मौजूदगी तभी तक रहती है जब तक श्रवण क्रिया चलती है। उस माहौल से बाहर आते ही इंसान फिर दो और दो के चक्कर में फंस जाता है। यही तो माया है, प्रभू की लीला है। नहीं तो यह संसार कभी का ख़त्म हो गया होता। फिर भी ऐसे समागम हमें कभी-कभी आईना तो दिखा ही जाते हैं। कभी-ना कभी कुछ गंभीरता से सोचने को मजबूर तो कर ही देते हैं।      

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