गुरुवार, 17 दिसंबर 2015

गुफा, प्रकृति का एक अद्भुत कारनामा

किसी भी गुफा को बनने में सैंकड़ों साल का समय लग जाता है। प्रकृति का यह एक अद्भुत कारनामा है। समय की मार तो इन पर पड़ती ही है साथ ही कुछ गैर जिम्मेदाराना लोग अपनी बेजा हरकतों से इसकी भव्यता और बनावट को खतरे में डालते रहते हैं 

प्राचीन काल से ही मनुष्य को गुफाओं की जानकारी रही है l हमारे वेद, पुराण, धार्मिक ग्रंथों तथा कथाओं में भी इनका विशद वर्णन मिलता है। बहुत सारी गुफाओं की तो कथाओं की प्रगति में अहम भूमिका भी रही है। जैसे शिव जी की अमर कथा, रामायण में किष्किंधा कांड में बाली और स्वयंप्रभा प्रसंग आदि कंदराऐं, हमारे ऋषि-मुनियों की पहली पसंद हुआ करती थीं, अपनी तपस्या और                   
साधना को पूरा करने के लिए। हिमालय में तो ऐसी अनगिनत गुफाएं हैं जिनका संबंध ऋषि-मुनियों से जुड़ा हुआ है। 
 
पाषाण युग में मानव और पशु ठण्ड और बरसात से बचने के लिए इन्हीं की शरण लिया करते थे। हो सकता है ऐसी ही किसी प्राकृतिक आपदा के दौरान मनुष्य ने समय काटने के लिए गुफाओं की दीवारों पर अपनी कला रचनी शुरू की हो और फिर धूप, ठण्ड, बरसात और अवांछनीय तत्वों से अपनी कलाकृतियों को बचाने के लिए गुफाओं को सुरक्षित पा वहाँ अपनी कल्पना की छटा बिखेरी हो। ऐसी ही दुनिया भर में फैली, बड़ी-बड़ी सुन्दर गुफाएं पर्यटकों के लिए आज आकर्षण का केन्द्र बनी हुई हैं l 

प्राकृतिक गुफाओं का निर्माण कई तरह से होता है। समुंद्र से आने वाली पानी कि लहरें जब चट्टानों से टकरातीहैं, तो चट्टानों के बीच में स्थित मुलायम पत्थर घिसते चले जाते हैं और फिर सालों-साल चलने वाले इस क्रम के परिणाम स्वरुप पहाड़ के अन्दर की काफी जगह खोखली हो गुफा का रूप ले लेती है। यही क्रिया तेज हवाओं द्वारा भी अंजाम दी जाती है। जमीन के नीचे मिलने वाली गुफाओं का निर्माण धरती के अंदर बहने वाली पानी कि धाराओं के बहने के कारण होता है l पानी की ये धाराएं चट्टानों में से चूने का क्षरण कर खोखले हिस्से का निर्माण कर देती हैं। कई बार पानी के झरनों के गिरने से भी चट्टानों के कटाव से चट्टानें खोखली हो गुफा बन जाती हैं l पृथ्वी की सतह में होने वाले ज्वालामुखीय परिवर्तनों से भी गुफाओं का निर्माण होता है l
 
इनकी बनावट इनके कारकों पर निर्भर करती है। कुछ गुफाएं लम्बी होती हैं, तो कुछ ऐसी होती हैं, जिनकी गहराई अधिक होती है l कुछ सर्पाकार होती हैं तो कुछ सुरंग जैसी। चाहे जैसे भी इनका निर्माण हुआ हो, हैं तो ये प्रकृति का एक अजूबा। अपने देश की बात करें तो सबसे पहले महाराष्ट्र के अौरंगाबाद में विश्व धरोहर का दर्जा पाई, अजंता-एलोरा की गुफाओं का नाम याद आता है, जिनमें बने चित्र आज भी सजीव लगते हैं। इनके अलावा भीमबैठका, एलीफेंटा की गुफा, कुटुमसर, कन्हेरी,  बाघ, उदयगिरि, खण्डगिरि जैसी अनेकों ऐसी गुफाएं हैं जिनको देखना अपने आप में एक उपलब्धि है। 

किसी भी गुफा को बनने में सैंकड़ों साल का समय लग जाता है। प्रकृति का यह एक अद्भुत कारनामा है। समय
की मार तो इन पर पड़ती ही है साथ ही कुछ गैर जिम्मेदाराना लोग अपनी बेजा हरकतों से इसकी भव्यता और बनावट को खतरे में डालते रहते हैं। इसीलिए कुछ को छोड़ कुछ बेशकीमती धरोहरें असामाजिक तत्वों का डेरा बन अपना अस्तित्व खोने की कगार पर आ खड़ी हुईं हैं। इसके प्रति आम-जन को तो सजग होने की जरूरत तो है ही, राज्य सरकारों को भी कम से कम अपने राज्य में उपलब्ध गुफाओं को राष्ट्रीय स्मारकों की तरह संरक्षण देने की पहल करनी चाहिए। 

3 टिप्‍पणियां:

Manoj Kumar ने कहा…

डायनामिक
सुन्दर विवरण

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

मनोज जी,
स्वागत है।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (19-12-2015) को "सुबह का इंतज़ार" (चर्चा अंक-2195) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

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