pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 29 नवंबर 2012

उत्तर की तलाश में एक सवाल

आज कल भारतीय क्रिकेट की दुनिया में तूफान मचा हुआ है। जिसे देखो वही लठ्ठ लेकर सचिन तेंदुलकर के पीछे पडा हुआ है। आज आस्ट्रेलियाई  पूर्व कप्तान रिची पोंटिंग के रिटायरमेंट से तो जैसे उन्हें और शह मिल गयी है।  टीवी के चैनल पर कुछ स्वयंभू क्रिकेट विशेषज्ञ, जिन्हें पूरे खेल का ज्ञान तो दूर खेल के दौरान खिलाडियों के खडे होने की विभिन्न जगहों के पूरे नाम भी शायद ही पता हों, वे भी इस महान बल्लेबाज को नसीहत देने से नहीं चूक रहे। बार-बार गावस्कर या अभी-अभी रिटायर हुए तीनों दिग्गजों, गांगुली, लक्ष्मण और द्रविड़  का उदाहरण देते नहीं थकते पर उनके अवकाश ग्रहण करने के कारणों और परिस्थितियों को सिरे से नजरंदाज कर अपने चैनल को ओछी खुराक देने के चक्कर में ये भूल जाते हैं कि इस जीवट वाले इंसान ने बार-बार वापसी की है।  

 यह सच है कि सचिन अब चालीस के होने जा रहे हैं और दो दशकों से अधिक का समय उन्हें मैदान पर उतरे हो चुका है। यह भी सच है कि वे अब ना पैसे के लिए ना नाम के लिए मैदान पर उपस्थित हैं सिर्फ इस खेल के प्रति उनका लगाव और प्रेम ही उन्हें ज्यादा से ज्यादा खेलने की प्रेरणा दिए जा रहा है। यह भी कटु सत्य है कि वे दो-चार पारियां अच्छी खेल भी जाएं पर पूर्णतया वापसी  कुछ मुश्किल है क्योंकि इस भाग-दौड और तनाव भरे खेल के लिए चालीस की उम्र बहुत होती है। संसार में  शायद ही कोई और ऐसा खिलाडी हो जो लगातार इतने लम्बे समय तक शीर्ष के करीब रहते हुए खेल पाया हो। पर सचिन ने अपने खेल कौशल और मेहनत से जो स्थान अर्जित किया है उसके चलते वे भारत के ही नहीं विदेशों में भी खेल प्रेमियों के चहेते बन गये हैं। करोंडों लोगों को उन्होंने अपने खेल और सौम्य व्यवहार से अपना मुरीद बना डाला है। लोगों की भावनाएं उनसे जुडी हुई हैं। इसीलिए उनकी विदाई की बात करना लोगों की भावनाओं को आहत करना है।

 हर देश की हर टीम के साथ ऐसा दौर आता है कि उसके तीन चार दिग्गज खिलाडी एक के बाद एक अवकाश
प्राप्त करने लगते हैं और उनका विकल्प तुरंत मिलना आसान नहीं होता जिसका खामियाजा टीम की अवनति से मिलता है। अपने यहां भी सौरव गांगुली, लक्ष्मण और द्रविड रिटायर हो चुके हैं, उनकी जगह आए नए खिलाडी प्रतिभावान जरूर हैं पर उनकी अभी और कडी परीक्षा होनी बाकी है। वैसे भी हमारे इन तीनों दिग्गजों ने इस खेल को जिस उचाईयों तक पहुंचाया उसे ध्यान में रखते हुए उन्हें वह सम्मान नहीं मिल पाया जिसके वे हकदार थे। फिर भी इनकी विदाई सही समय पर ही हुई है, चाहे कारण कुछ भी हों। सचिन के साथ ऐसा नहीं होना चाहिए। वे समय की नजाकत और अपने प्रदर्शन को समझते हैं। खेल के प्रति उनका समर्पण किसी भी कीमत पर खेल का अहित होते नहीं देख सकता इसी लिए जैसा कि गावस्कर ने कहा है उनके साथ बीसीसीआई को मंत्रणा कर भविष्य की योजना पर विचार करना चाहिए। इससे खेल प्रबंधन को भी विकल्प चुनने के लिए समय मिल जाएगा। इस तरह इस अप्रतिम खेल-योद्धा की विदाई भी पूरे आदर और सम्मान के साथ हो पाएगी। सचिन सौभाग्यशाली हैं कि पूरा देश तथा खेल प्रबंधन उनके साथ है तथा किसी भी तरह के विवाद या खेल राजनीति से भी वे निर्लिप्त हैं। इसलिए उनके शानदार, गौरवशाली, अनोखे, किंवदंती  बन चुके करियर का समापन भी उतना ही यादगार होना चाहिए।  

गुरुवार, 22 नवंबर 2012

आंसू तो दिल की जुबान हैं

वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इससे  छह हजार गुना ज्यादा  जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है। एक चम्मच आंसू, सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है।

दुनिया में शायद ही कोइ ऐसा इंसान होगा जिसकी आँखों से कभी आंसू न बहे हों। जीवन के विभिन्न  हालातों, परिस्थितियों, घटनाओं  से इनका अटूट संबंध रहता है। समय कैसा भी हो, दुख का, पीड़ा का, ग्लानी का, परेशानी का, खुशी का, यह नयन जल नयनों का बांध तोड़ खुद को उजागर कर ही देते हैं। 

 मन की विभिन्न अवस्थाओं पर शरीर की प्रतिक्रिया के फलस्वरुप आंखों से बहने वाला, जब भावनाएं बेकाबू हो जाती हैं तो मन को संभालने वाला, दुःख के समय मन को  हल्का करने वाला, सुख के अतिरेक में भावनाओं की अभिव्यक्ति का माध्यम, शरीर का साथी है यह  "अश्रु"। इतना ही नहीं सामान्य अवस्था में  यह हमारी आंखों को साफ तथा कीटाणुमुक्त भी  रखता है। 

इसके सामान्यतया तीन रूप होते हैं। पहला आँखों में नमी बनाए रखता है जिससे आँख साफ रहती है और आखों का सूखेपन से होने वाले नुक्सान से बचाव होता है। दूसरा कभी धूल कण या कोइ कीट वगैरह के आँख में पड़ जाने से आँखें जल से भर जाती हैं जिससे अवांछित  वस्तु  बाहर आ जाती है और तीसरा सबसे अहम् है इसका रुदन-समय पर बहने वाला रूप। वैसे  बीमारी तथा भोज्य पदार्थ की तीक्ष्णता  इत्यादि के कारण भी आँखों से पानी निकल आता है।    

आंसू का उद्गम "लैक्रेमेल सैक" नाम की ग्रन्थी से होता है। भावनाओं की तीव्रता आंखों में एक रासायनिक क्रिया को जन्म देती है, जिसके फलस्वरुप आंसू बहने लगते हैं। इसका रासायनिक परीक्षण बताता है कि इसका 94 प्रतिशत पानी तथा बाकी का भाग रासायनिक तत्वों का होता है। जिसमें कुछ क्षार और लाईसोजाइम नाम का एक यौगिक रहता है, जो कीटाणुओं को नष्ट करने की क्षमता रखता है। इसी के कारण हमारी आंखें जिवाणुमुक्त रह पाती हैं।

वैज्ञानिकों के अनुसार आंसूओं में इतनी अधिक कीटाणुनाशक क्षमता होती है कि इससे  छह हजार गुना ज्यादा  जल में भी इसका प्रभाव बना रहता है। एक चम्मच आंसू, सौ गैलन पानी को कीटाणु रहित कर सकता है।
ऐसा समझा जाता है कि कभी ना रोनेवाले या कम रोनेवाले मजबूत दिल के होते हैं। पर डाक्टरों का नजरिया अलग है, उनके अनुसार ऐसे व्यक्ति असामान्य होते हैं। उनका मन रोगी हो सकता है। ऐसे व्यक्तियों को रोने की सलाह दी जाती है। तो जब भी कभी आंसू बहाने का दिल करे (प्रभू की दया से मौके खुशी के ही हों) तो झिझकें नहीं।
_______________________________________________
वैधानिक चेतावनी : आंसू की इस परिभाषा का भी ध्यान रखें -
It is a hydrolic force through which Masculine WILL POWER defeated by Feminine WATER POWER.

सोमवार, 19 नवंबर 2012

सत्य रूपी बीज पनपता जरूर है।


  सत्य  रूपी बीज, उसे चाहे कितना भी नीचे क्यों न  दबाया गया हो,  सतह कितनी भी कठोर क्यों ना हो उसे फोड कर पनपता जरूर है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों। समय कितना भी लग जाए।

जीवन को तरह तरह से परिभाषित किया गया है। कोई इसे प्रभू की देन कहता है, कोई सांसों की गिनती का खेल, कोई भूल-भुलैया, कोई समय की बहती धारा तो कोई ऐसी पहेली जिसका कोई ओर-छोर नहीं। कुछ लोग इसे पुण्यों का फल मानते हैं तो कुछ ऐसे भी हैं जो इसे पापों का दंड समझते हैं। 

कोई चाहे कितना भी इसे समझने और समझाने का दावा कर ले, रहता यह अबूझ ही है। यह एक ऐसे सर्कस की तरह है जो बाहर से सिर्फ एक तंबू नज़र आता है पर जिसके भीतर अनेकों हैरतंगेज कारनामे होते रहते हैं। ऐसा ही एक कारनामा है इंसान का सच से आंख मूंद अपने को सर्वोपरि समझना।

इंसान जब पैदा होता है तो अजब-गजब भविष्य-वाणियों के बावजूद कोई नहीं जानता कि वह बडा होकर क्या बनेगा या क्या करेगा, पर यह निर्विवादित रूप से सबको पता रहता है कि उसकी मौत जरूर होगी। इतने बडे सत्य को जानने के बाद भी इंसान इस छोटी सी जिंदगी में तरह-तरह के हथकंडे अपना कर अपने लिए सपनों के महल और दूसरों के लिए कंटक बीजने में बाज नहीं आता। कभी कभी अपने क्षण-भंगुर सुख के लिए वह किसी भी हद तक गिरने से भी नहीं झिझकता। लोभ, लालच, अहंकार, ईर्ष्या उसके ज्ञान पर पर्दा डाल देते हैं। वह अपने फायदे के लिए किसी का किसी भी प्रकार का अहित करने से नहीं चूकता। वह भूल जाता है कि बंद कमरे में बिल्ली भी अपनी जान बचाने के लिए उग्र हो जाती है। मासूम सी चिडिया भी हाथ से छूटने के लिए चोंच मार देती है। नीबूं से ज्यादा रस निकालने की चाहत उसके रस को कडवा बना डालती है। यहां तक कि उसे भगवान की उस लाठी का डर भी नहीं रह जाता जिसमें आवाज नहीं होती। उस समय उसे सिर्फ और सिर्फ अपना हित नजर आता है। असंख्य ऐसे उदाहरण हैं कि ऐसे लोगों को उनके दुष्कर्म का फल मिलता भी जरूर है पर विडंबना यह है कि उस समय उन्हें अपनी करतूतें याद नहीं आतीं।     

ऐसे लोगों के कारण मानव निर्मित न्याय व्यवस्था भी अब निरपेक्ष नहीं रह गयी है। कोई कितना भी कह ले कि हम मानव न्याय का सम्मान करते हैं तो सम्मान भले ही करते हों मानते नहीं हैं। उसमें इतने छल-छिद्र बना दिए गये हैं कि आदमी कभी-कभी बिल्कुल बेबस, लाचार हो जाता है अन्याय के सामने। न्याय को पाने के लिए समय के साथ-साथ पैसा पानी की तरह बहता तो है पर मिली-भगत से उसका हश्र भी वैसा ही होता है जैसे शुद्ध पीने का पानी गटर में जा गिरे। यूंही किस्से-कहानियों में या फिल्मों में न्याय व्यवस्था का मजाक नहीं बनाया जाता। ज्यादातर झूठ तेज तर्रार वकीलों की सहायता से सच को गलत साबित करने में सक्षम हो जाता है। सच कहीं दुबक जाता है झूठ के विकराल साये में। सामने वाला इसे अपनी जीत समझने लगता है, भूल जाता है समय चक्र को, भूल जाता है इतिहास को, भूल जाता है अपने ओछेपन को। पर सत्य  रूपी बीज, उसे चाहे कितना भी नीचे क्यों न  दबाया गया हो,  सतह कितनी भी कठोर क्यों ना हो उसे फोड कर पनपता जरूर है। चाहे परिस्थितियां कितनी भी विपरीत हों। समय कितना भी लग जाए, असत्य को अपनी करनी का फल भोगना जरूर पडता है। इसमें कोई शको-शुबहा नहीं है।
और फिर कुछ ऐसा होता है कि !!!!!

शुक्रवार, 16 नवंबर 2012

दीपावली फिर आने का वायदा कर गई।


दीपावली आई, खुशियां, उल्लास और फिर आने का वायदा कर चली गई। इस पारंपरिक त्यौहार से हम आदिकाल से जुड़े हैं। यह अपने देश के सारे त्योहारों से एक अलग और अनोखे तरह का उत्सव है। रोशनी के त्योहार के रूप में तो यह अलग है ही, इसे सबसे ज्यादा उल्लास से मनाए जाने वाले त्योहारों में भी गिना जा सकता है। इसे चाहे किसी भी कथा, कहानी या आख्यान से जोड लें पर मुख्य बात असत्य पर सत्य की विजय की ही है। प्रकाश के महत्व की है। तम के नाश की है। उजाले के स्वागत की है।  इसीलिए इसके आते ही सब अपने अपने घरों इत्यादि की साफ-सफाई करने, रौशनी करने मे मशगूल हो जाते हैं। साफ-सफाई के अलावा इस त्योहार मे एक बात और है कि यह अकेला ऐसा त्योहार है, जिसमें हर आदमी, हर परिवार समृद्धि की कामना करता है। यह त्योहार हमें रूखी-सूखी खाकर ठंडा पानी पीने या जितनी चादर है उतने पैर पसारने की सलाह नहीं देता। इन उपदेशों का अपना महत्व जरूर है पर यह त्योहार यह सच्चाई भी बताता है कि भौतिक स्मृद्धि का भी जीवन में एक अहम स्थान है, इसका भी अपना महत्व है। 

धन की, सुख की आकांक्षा हरेक को होती है इसीलिए इस पर्व पर अमीर-गरीब अपनी-अपनी हैसियत के अनुसार दीए जला, पूजा-अर्चना कर अपनी मनोकामना पूरी होने की प्रार्थना करते हैं। हां यह जरूर है कि अमीरों के ताम-झाम और दिखावे से यह लगने लगता है जैसे यह सिर्फ अमीरों का त्योहार हो।  

हमारे वेद-पुराणों में सर्व-शक्तिमान से यह प्रार्थना की गई है कि वे हमारे अंदर के अंधकार को दूर करें, हमें अंधकार से प्रकाश की ओर ले जाएं जिससे हमें ज्ञान और शांति प्राप्त हो जिसका उपयोग दूसरों की भलाई में किया जा सके। इसी बात को, इसी संकल्प को हमें अपने जेहन में संजोए रखना है पर यह उद्देश्य तब तक पूरा नहीं हो पाएगा जब तक इस पर्व को मनाने की क्षमता, समृद्धि का वास देश के हर वासी, हर गरीब-गुरबे के घर-आंगन में नहीं हो जाता। 

बुधवार, 14 नवंबर 2012

स्वर्ण मोह


 धक्का-मुक्की का हमारा हिंदुस्तानी "कल्चर" वहां अपने पूरे जोशो-खरोश के साथ उपस्थित था। कहीं से भी, किसी कोण से भी नहीं लग रहा था कि यह वही भारत है जहां दिन रात मंहगाई का रोना रोया जाता है। जहां की आधी आबादी को पेट भर भोजन नसीब नहीं होता। उल्टे यहां तो अमीरी भी किसी कोने में दुबकी खडी लग रही थी। 

पिछली धनतेरस पर सरकारी कंपनी MMTC के विज्ञापनों से प्रेरित हो दिल्ली के मशहूर अशोक होटल में चल रहे स्वर्ण-उत्सव को देखने का मन बना लिया। जिज्ञासा यह थी कि अखबारों में हर साल देश के विभिन्न शहरों में टनों सोने की बिक्री और अरबों के कारोबार का जो लेखा-जोखा पढ़ने को मिलता है  शायद उसका  एक छोटा सा जायजा मिल ही जाए।   

रात के आठ बज रहे थे। अशोक के सजे-धजे गलियारों से होते हुए, वहीं चल रही एक शादी के समारोह के मूक दर्शक बने हुए जब इस भव्य होटल के कंवेंशन हाल में दाखिल हुए तो आंखें खुली की खुली रह गयीं। विशाल हाल हर उम्र के लोगों से अटा पडा था। छोटे शहरों, गांवों में होने वाले मेलों-ठेलों जैसी भीड इक्ट्ठा थी।  लगा कहीं ऐसा तो नहीं कि सरकार ने दो रुपये कीलो गेंहू और चावल बांटने की तर्ज पर सोना भी रियायती  दर पर लोगों को उपलब्ध करवा दिया हो या फिर लोग एवंई मेले-ठेले की तर्ज पर घूमने चले आए हों? पर ये दोनों ही ख्याल गलत निकले क्योंकि ना तो सोना रियायती मुल्य पर बिक रहा था नाहीं लोग सिर्फ घूमने और अशोक की भव्यता देखने आए थे। 36000 रुपये का दस ग्राम की कीमत  वाला  सोना वहाँ  चने-मुरमुरे की तरह बिक रहा था। हालांकि वहां चांदी भी उपलब्ध थी पर भूसे के ढेर में सूई की मानींद। लोगों की रुचि सोने में ज्यादा थी। किसी को कीमत की या दर की परवाह नहीं थी। चिंता थी तो इस बात की कि कहीं उनकी पसंदीदा वस्तु उनके लेने के पहले ही खत्म ना हो जाए। हर स्टाल पर लोग उमडे पडे थे। धक्का-मुक्की का हमारा हिंदुस्तानी "कल्चर" वहां अपने पूरे जोशो-खरोश के साथ उपस्थित था। करीब-करीब हर स्टाल में  चीजें खात्मे की ओर थीं। कहीं से भी, किसी कोण से भी नहीं लग रहा था कि यह वही भारत है जहां दिन रात मंहगाई का रोना रोया जाता है। जहां गरीबी मुंह बाए खडी रहती है। जहां की आधी आबादी को पेट भर भोजन नसीब नहीं होता। उल्टे यहां तो अमीरी भी किसी कोने में दुबकी खडी लग रही थी। सभी यहां निश्फिक्र, चिंता विहीन, खुश-हाल ही नजर आ रहे थे। टेंशन में कोई था तो यहां के कर्मचारी। दस दिनों का तनाव और थकावट उनके चेहरों से साफ झलक रही थी। 

मैं हाल के एक कोने में बने खाली हो चुके ऊंचे स्टाल पर खडा सारा नजारा देख रहा था बिना इस बात की आशंका या  आभास के  कि इस सामुहिक खरीदी का जादू श्रीमती जी पर भी अपना असर डाल चुका है और वे अपने बेटों के साथ चांदी की लक्ष्मी-गणेश की मूर्ती लेने का मन बना चुकी हैं। इसके पहले की  इसकी भनक लगने पर मैं उनके पास जा किसी तरह का विघ्न डालूं वहां काम "डन" हो चुका था। 

सोमवार, 12 नवंबर 2012

"अनदेखे अपनों" को ज्योति पर्व की दिल से बधाई।


इस दीपोत्सव के पावन पर्व पर मेरी ओर से आप सब को सपरिवार हार्दिक शुभ कामनाएं। आने वाला समय हम सब के लिए मंगलमय हो, सभी सुखी, स्वस्थ एवं प्रसन्न रहें, प्रभू से यही प्रार्थना है।  


इस विधा यानि ब्लागिंग के माध्यम से जितना स्नेह, अपनापन तथा हौसला आप सब की तरफ से मुझे मिला है उससे रोमांचित और अभिभूत हूँ। कितनी अजीब सी बात है कि खुद भले ही 'जाल' पर उपस्थिति दर्ज ना करवाई जा सके पर एक-दो दिनों में जब तक सबके नाम दिख न जाएं तो खाली-खाली सा महसूस होता है। यदि खुदा न खास्ता किसी की उपस्थिति चार-पांच दिनों तक न दिखे तो मन बरबस उसकी ओर खींचा सा रहता है, हाल जानने के लिए। 

इस "अनदेखे अपनों" से हुए लगाव को क्या नाम दिया जाए? जबकि अपनी कूपमंडूकता के कारण बहुत कम लोगों से आमने-सामने मुलाक़ात हो पाई है। चाह कर, मौका रहते हुए भी वैसा नहीं हो पाया, इसका खेद रहता है, पर आपसी स्नेह ऐसा ही सब से बना रहे यही कामना है। 

फिर एक बार सब को ज्योति पर्व की दिल से बधाई।

मंगलवार, 6 नवंबर 2012

बारह सालों से चला आ रहा एक संघर्ष


बहुत कम लोगों को पता होगा कि अपने ही देश के एक राज्य मणिपुर में बारह सालों से एक महिला भूख हडताल पर बैठी हुई है। पर इसका  ना तो  प्रशासन और नहीं सरकार अब तक कोई हल निकाल पाए हैं।

2 नवम्बर 2000, मणिपुर की इम्फाल घाटी में स्थित मालोम शहर के एक बस स्टैंड पर अर्द्ध सैनिक बल के जवानों ने अंधाधूंध गोलियां चलाई थीं जिसके फलस्वरूप छात्र तथा महिलाओं समेत दस लोगों की मौके पर ही मृत्यु हो गयी थी। दूसरे दिन वहां के अखबारों में मृत लोगों की फोटो भी छपी थी जिसमें एक वयो-वृद्ध महिला और दो 1988 में अपनी बहादुरी के लिए सम्मानित छोटे बच्चों की तस्वीरें भी थीं। अखबारों ने इस घटना को "Malom Massacre" का नाम दिया था। इस घटना से आक्रोशित हो कर इरोम ने 5 नवम्बर 2000 को सशस्त्र बल विशेष अधिकार अधिनियम को हटाने की मांग को ले कर जो अनशन शुरु किया था वह आज तक जारी है। पिछली पांच तारीख को इस आंदोलन को शुरु हुए पूरे बारह साल हो चुके हैं। इरोम को जबर्दस्ती नाक में नली डाल कर तरल पदार्थों से उनकी जीवन रक्षा की जा रही है। इस अधिनियम का कई बार व्यापक विरोध हुआ है पर सरकार सुरक्षा बलों के दवाब के कारण इसे हटा नहीं पा रही है।

अपनी भूख हडताल के कारण सुर्खियों में आई इरोम शर्मिला चनु का जन्म 14.3.1974 में इंफाल में हुआ था। आम आदमी के अधिकारों की सुरक्षा के लिए लडने वाली यह कवियित्री मणिपुर और उत्तरीपूर्व में अर्द्ध सैंनिक बलों को अशांत इलाकों में विशेष अधिकार देने वाले अधिनियम के खिलाफ वर्षों से आवाज उठा रही हैं और अपने इसी अनथक प्रयास के कारण इन्हें अब "लौह महिला" के नाम से भी जाना जाने लगा है।          

उपवास शुरु होने के तीसरे दिन उन्हें आत्महत्या के जुर्म में गिरफ्तार कर लिया गया था। अनशन के कारण गिरते स्वास्थ्य को देख उन्हें तभी से नाक द्वारा भोजन दिया जा रहा है। अब तो उनकी ख्याति देश की सीमाओं को भी पार कर चुकी है और देश-विदेश की कई हस्तियां उनसे मुलाकात कर चुकी हैं। इसी दौरान उन्हें कई पुरस्कारों से भी नवाजा जा चुका है।   

इरोम का नाम एक संघर्ष का प्रयाय ही नहीं है वह यह भी इंगित करता है कि हमारे इस विशाल लोकतंत्र के कई पक्ष विवादास्पद भी हैं। इसके अलावा इरोम के प्रति देश के लोगों की आधी-अधुरी जानकारी इस बात को भी सामने लाती है कि शेष भारत के लोगों में सीमावर्ती प्रदेशों के बारे में ना तो ज्यादा जानकारी है नही वहां की समस्यायों के प्रति वहां के लोगों से सहानुभूति। जिस दि सारे देश वासी सारे देश को और वहां के वाशिंदों की तकलीफों  को अपना समझने लगेंगे तो फिर इस तरह के किसी कानून की जरूरत ही नहीं रह जाएगी।

विशिष्ट पोस्ट

सोनम चौबे ->छब्बे = दुबे

यह तथाकथित वैज्ञानिक जिसका अपने नाम का एक भी पेंटेंट नहीं है ! जिसने सरकार से सवा सौ एकड़ से ज्यादा जमीन हथिया रखी है ! जो पर्यावरण के नाम पर...