इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 9 अक्टूबर 2021
क्या हम लार्वा से कोकून हो गए हैं
गुरुवार, 7 अक्टूबर 2021
उपादेयता, इंसान की
हर कोई यही चाहता है कि जब तक जिंदगी है वह स्वावलंबी बना रहे ! पटाक्षेप होने तक चलायमान स्थिति में रह सके ! सच भी है, जब तक इंसान क्रियाशील रहता है उसका शरीर भी साथ देता रहता है ! उम्र को सिर्फ एक अंक मानने वाले ज्यादा देर तक गतिशील बने रहते हैं ! पर इसके बावजूद इंसान अब इंसान ना रह कर मशीन बना दिया गया है ! जब तक काम करती है, बढ़िया ! अन्यथा उठा कर "स्क्रैप" में फेंक दो ! देश में यूँही नहीं सैंकड़ों की तादाद में वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं ! वह भी वहां, जहां बचपन से ही माँ-बाप को भगवान का दर्जा देने की सीख दी जाती है ! वहां इन तनहा इंसानों को डोलते देख रूह कांप जाती है .............!!
#हिन्दी_ब्लागिंग
इस दुनिया में हर चीज की अपनी उपादेयता यानी उपयुक्तता या प्रयोज्यता है ! प्रकृति ने कोई भी वस्तु बिना किसी कारण नहीं बनाई है। सिर्फ मनुष्य की दृष्टि से ना देखा जाए तो हर जीव-जंतु, लता-गुल्म, पशु-पक्षी, पेड़-पौधे का अपना महत्व है। एक दूसरे पर निर्भरता है। जरुरत है सभी को सभी की। पर इसके साथ ही जैसे ही किसी जड़ या चेतन की उपयोगिता खत्म होने को होती है या हो जाती है तो प्रकृति स्वयमेव ही उसे चुपचाप, धीरे से मिटा देती है, दूसरों पर भार नहीं बनने देती ! पर मनुष्य पर ऐसा नियम लागू नहीं होता ! वह लाचार, निश्चेष्ट, कमजोर, रोगी, पराश्रित होने के बावजूद दुनिया में बना रहता है ! ऐसी अवस्था में कभी न कभी, किसी न किसी दिन वह एक बोझ के रूप में परिणित हो, उपेक्षित सा दूसरों की दया-माया पर निर्भर हो कर रह जाता है ! किसी द्वेष भाव या पूर्वाग्रह के चलते मैं ऐसा नहीं कह रहा हूँ ! यह प्रकृति का नियम है, सो है !
हर कोई यही चाहता है कि जब तक जिंदगी है वह स्वावलंबी बना रहे ! पटाक्षेप होने तक चलायमान स्थिति में रह सके ! सच भी है, जब तक इंसान क्रियाशील रहता है शरीर भी साथ देता रहता है ! उम्र को सिर्फ एक अंक मानने वाले ज्यादा देर तक गतिशील बने रहते हैं ! इसीलिए बहुतेरे लोग नियमों के अनुसार सेवानिवृति पा जाने के बावजूद व्यस्त रहने का कोई न कोई जरिया खोज, खुद की उपायदेयता बनाए रखने के साथ-साथ कुछ हद तक दूसरों को भी चिंता मुक्त रहने में मदद ही करते हैं ! ऐसे लोग अपने जीवन-संचित अनुभवों, दक्षता, विशेषज्ञता, का लाभ वर्तमान पीढ़ी को दे समाज-देश-जगत का उपकार ही करते हैं !
पर यह सब कहना-सुनना जितना अच्छा और आसान लगता है उतना है नहीं ! उम्र बढ़ने के साथ-साथ कार्यक्षमता प्रभावित होती ही है ! फिर हारी-बिमारी, आर्थिक परिस्थितियां, घरेलू वातावरण, मनुष्य को बहुत कुछ सह, लाचार होने को मजबूर कर देते हैं ! बदलते परिवेश, पश्चिमी जीवन शैली, जीवनोपार्जन में कठिनाइयां, हर क्षेत्र में गलाकाट स्पर्धाएं, असहिष्णुता, बढ़ते तनाव, इन सब के कारण मानवोचित कोमल भावनाएं, सहज स्नेहिल भाव, परोपकारिता, स्नेह, त्याग, दयालुता सब समय के साथ-साथ तिरोहित होती चली जा रही हैं ! इनके स्थान पर कलह, क्लेश, वैमनस्य, ईर्ष्या, द्वेष, कुंठा मानव का स्वभाव बनते चले जा रहे हैं ! इंसान अब इंसान ना रह कर मशीन बना दिया गया है ! जब तक काम करती है, बढ़िया ! अन्यथा उठा कर "स्क्रैप" में फेंक दो ! देश में यूँही नहीं सैंकड़ों की तादाद में वृद्धाश्रम खुलते जा रहे हैं ! वह भी वहां, जहां बचपन से ही माँ-बाप को भगवान का दर्जा देने की सीख दी जाती है ! वहां इन तनहा इंसानों को डोलते देख रूह कांप जाती है ! क्या हासिल है, ऐसे जीने से ! इनके सर पर तो फिर भी छत है ! उन लाखों लोगों का क्या, जो घिसट-घिसट कर अपनी जिंदगी के दिन पूरे करते हैं !
सीधी सी बात हो गई है ! जिससे कोई फ़ायदा नहीं उसका कोई मोल नहीं ! तुम्हारी कोई उपादेयता है तो बने रहो नहीं तो तुम अपनी जिम्मेदारी खुद हो ! इन बदलावों का सबसे बड़ा असर उम्रदराज व अवकाशप्राप्त लोगों पर साफ़ दिखना शुरू हो चुका है ! उनकी तमाम सेवाओं, मेहनत, समर्पण को सिरे से भुला दिया जाता है ! उन्हें सम्मान तभी मिलता है, जब उनके पिछवाड़े अभी भी कोई ''कुर्सी'' हो या फिर माथे पर कोई तमगा चिपका हो ! जरा सा गौर करेंगे तो सैलून में, मॉल में, हाट-बाजार में दसियों उदाहरण मिल जाएंगें जहां इन्हें "फॉर ग्रांटेड" ले लिया जाता है !
ऐसे लोगों से मेरा कोई द्वेष नहीं है ना ही कोई पूर्वाग्रह है ! मुझे सदा उनसे हमदर्दी और सहानुभूति रही है ! दुःख होता है उनकी विषमताओं को देख कर ! कई-कई बार कुछ देर के लिए एक ऐसी ही जगह जा उनके सूनेपन को कम करने की कोशिश करता रहा ! पर इस सबसे उनके दुःख को ख़त्म तो नहीं किया जा सकता था ! उलटे खुद का मन अवसाद से भर जाता था, वहां से लौटते हुए ! इस अवस्था में, जीवन के इस पड़ाव पर उन्हें किसी उपहार या अन्य किसी भौतिक सामग्री की चाह नहीं होती, उन्हें जरुरत होती है प्यार की, स्नेह की, अपनेपन की, किसी के साथ की, जो उन्हें कभी नहीं मिल पाता ! इसीलिए मेरी प्रकृति से शिकायत है कि क्यों नहीं उसने कुछ ऐसा सिस्टम बनाया, जिससे दूसरे जीव-जंतुओं, पेड़-पौधों, लता-गुल्मों की तरह ऐसे लोगों की भी इस जहां से अपनी पारी खेलने के पश्चात सम्मान से विदाई हो सकती।
शनिवार, 2 अक्टूबर 2021
हावड़ा स्टेशन ! टर्मिनस भी, जंक्शन भी
रेलवे की भाषा में टर्मिनस उस स्टेशन को कहा जाता है, जिसके और आगे जाने की पटरी ना हो, रास्ता वहीं खत्म हो जाता हो यानी ट्रेन जिस दिशा से आई है, उसी दिशा में उसे वापस जाना पड़ता है ! जंक्शन का मतलब होता है जिस स्टेशन से दो या उससे अधिक दिशाओं में जाने के रास्ते निकलते हों ! इसकी एक विशेष विशेषता यह भी है कि जहां और जंक्शनों में पटरियां स्टेशन से कुछ दूर जा कर अलग दिशाओं में मुड़ती हैं, वहीं हावड़ा में यह अलगाव स्टेशन से ही हो जाता है.............!
#हिन्दी_ब्लागिंग
देश और भारतीय रेल का सबसे बड़ा, खूबसूरत, भव्य, ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन है हावड़ा ! पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के दाहिने किनारे पर स्थित, एक छोटे-मोटे शहर जैसा विशाल होने के साथ-साथ यह खुद में अनेकानेक विशेषताओं को अपने में समेटे रोज लाखों लोगों को, अपने 23 प्लेटफार्मों की बदौलत, अपने गंतव्य तक पहुंचने में मदद करता है ! 1854 में इसकी स्थापना कलकत्ता शहर की बजाए ठीक उसके सामने नदी के दूसरी तरफ हावड़ा में की गई ! क्योंकि उस तरफ का भू-भाग बिना किसी जल बाधा के देश के दूसरे हिस्सों से जुड़ा हुआ था, इससे नदी पर पुल बनाने की जहमत और खर्च से बचाव हुआ ! जिस स्थान को स्टेशन के लिए चुना गया वह एक बहुत बड़ा दलदली, जंगली लता-गुल्मों से पता जोहड़ था ! जिसे बंगला भाषा में हाउर या हाओर कहा जाता है ! उसी से इस स्थान का नाम हावड़ा पड़ा। स्टेशन बनने के साथ ही यहां औद्यौगिक विकास भी पनपा जिसने शहर को कलकत्ता के एक आम से उपनगर को भारतवर्ष का एक महत्वपूर्ण औद्यौगिक केन्द्र बना दिया। 1853 में बंबई से भारत में पहली रेल गाड़ी चलने के बाद 1854 में दूसरी हावड़ा से ही चली थी !
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| स्टेशन का भीतरी भाग |
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| प्लेटफार्म के साथ रोड |
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| सब वे |
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| डबल डेकर |
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| फेरी क्वीन |
हावड़ा स्टेशन की अपनी कुछ और विशेषताएं भी हैं जो इसे देश का प्रमुख, प्रथम व खास स्टेशन होने का गौरव प्रदान करती हैं :-
* देश में पहली बिजली की ट्रेन यहीं से चली थी !
* पहली हावड़ा-दिल्ली राजधानी गाडी को रवाना करने वाला भी यही स्टेशन था !
* देश की पहली डबल डेकर ट्रेन, हावड़ा-धनबाद, यहीं से चलाई गई थी।
* यह देश का पहला स्टेशन है जहां प्लेटफार्म तक निजी वाहन ले जाने की भी सुविधा है ! यानी रेल की पटरियों के साथ ही सड़क मार्ग भी है ! जिनकी संख्या अब दो हो गई है।
* दैनिक यात्रियों की सुविधा के लिए बना, भारत का सबसे पुराना ''सब वे'' भी यहीं है।
* सबसे पहले देश के "जीरो नंबर" के प्लेटफार्म का निर्माण भी यहीं हुआ था।
* 23 प्लेटफार्मों के साथ यह देश का सबसे व्यस्त रेलवे परिसर है।
* दुनिया के व्यस्ततम रेल तंत्रों में से एक है।
* विश्व के सबसे पुराने पर अभी भी सक्रिय लोकोमोटिव इंजिन ''फेरी क्वीन'' ने अपनी यात्रा की शुरुआत यहीं हावड़ा से ही की थी।
* यात्रियों की सुविधा के लिए सर्व सुविधायुक्त "यात्री निवास" भी इसी के परिसर में बना था।
* थोड़े से वृहद नजरिए से देखें तो देश की पहली, हुगली नदी के नीचे से गुजरने वाली, मेट्रो सुरंग भी इसके आस-पास ही बन रही है !
@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से
शनिवार, 25 सितंबर 2021
यातायात ! कहीं दाएं, कहीं बाएं ! ऐसा क्यूं
एक वक्त था जब दुनिया में सड़क मार्ग पर दोनों तरह से चलने वालों की संख्या तक़रीबन बराबर थी ! पर समय के साथ दाईं ओर से चलने वालों की संख्या बढ़ती चली गई ! इसकी एक वजह ब्रिटेन भी है ! एक समय था जब यह कहा जाता था कि ''इसके साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता !'' पर इसकी गिरफ्त से जैसे-जैसे अन्य देश आजाद होते चले गए, वैसे-वैसे उन्होंने गुलामी की निशानियां मिटाने के लिए नियम-कानून भी बदलने शुरू कर दिए।उसी की जद में आ यह यातायात नियम भी बदलता चला गया
#हिन्दी_ब्लागिंग
हमारे देश में वाहन और यातायात बाईं तरफ से प्रवाहमान होता है बावजूद इसके कि दुनिया के ज्यादातर देशों में यह दाहिने हाथ की तरफ से चलता है ! इसका एक प्रमुख कारण बताया जाता है कि अंग्रेजो का जहां-जहां राज था वहां-वहां यह रवायत पड़ी, जैसे ऑस्ट्रेलया, न्यूजीलैंड, भारत, पकिस्तान या कुछ अफ़्रीकी देश ! पर मिस्र अंग्रेजी शासन के बावजूद सदा दाहिनी ओर ही चलता रहा ! इसके अलावा जापान कभी भी ब्रिटिश हुकूमत के नीचे नहीं रहा पर वहां भी बाएं हाथ पर चलने का चलन है ! पर साथ ही सवाल यह भी है कि अंग्रेज ही क्यों बाएं-बाएं चले ?
जाहिर है ! जब इंसान ने बस्तियां बनाईं, एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना शुरू किया तो भी उसे मार्ग के बाईं या दाईं ओर से ही चलने की जरुरत नहीं होती होगी ! पर जैसे-जैसे लोगों में आपसी वैमन्यस्कता, विद्वेष, झगड़े इत्यादि पनपे होंगे तो उसने मार्ग के बाईं ओर से चलना ज्यादा सुरक्षित समझा होगा, क्योंकि ज्यादाताए लोग अपने दाएं हाथ का उपयोग प्रमुखता से करते हैं और वह हाथ ही हथियार वगैरह के संचालन में ज्यादा काम आता है सो सुरक्षा और बचाव की दृष्टि से मानव ने बाएं हो कर चलना ठीक समझा होगा !
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| लाल, दाएं हाथ का चलन |
पर योरोप ने तय कर रखा था कि वह बाईं तरफ से ही आवागमन जारी रखेगा पर वहां भी दशा और दिशा बदलती चली गई, जहां-जहां नेपोलियन जीता ! हिटलर ने भी अपने शासितों को अपनी इच्छानुसार दाएं-दाएं चलवाया ! इस तरह विभिन्न परिस्थितियों, मानसिकताओं, जरूरतों या मजबूरीवश अलग-अलग देशों में परिवहन के आवागमन का परिचालन दाएं-बाएं होता रहा ! विजेता, विजित पर अपने नियम-कानून लागू करता चला गया ! कुछ मजबूरियोंवश बदले ! कुछ पूर्वाग्रहों के चलते ! कुछ देखा-देखी !
एक वक्त था जब दोनों तरह से चलने वालों की संख्या तक़रीबन बराबर थी। पर समय के साथ दाईं ओर से चलने वालों की संख्या बढ़ती चली गई ! इसकी एक वजह ब्रिटेन भी है ! एक समय था जब यह कहा जाता था कि ''इसके साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता !'' पर इसकी गिरफ्त से जैसे-जैसे अन्य देश आजाद होते चले गए, वैसे-वैसे उन्होंने गुलामी की निशानियां मिटाने के लिए नियम-कानून भी बदलने शुरू कर दिए।उसी की जद में आ यह यातायात नियम भी बदलता चला गया ! उधर अपनी आजादी के बाद बाएं से दाएं हुए अमेरिका ने सस्ती गाड़ियों से दुनिया के बाजार को पाट दिया ! जाहिर है वे सब सड़क के दाएं ओर चलने की दृष्टि से बनाई गईं थीं सो उन्होंने भी सड़क पर अपना प्रभाव दिखाया !
वैसे जो थोड़ा-बहुत बाएं हाथ वाला चलन बचा हुआ है उसमें भी इंग्लैण्ड का ही योगदान है ! भारत-जापान जैसे देशों में अंग्रेजों ने रेलवे लाइन बिछाई तो अपने देश के चलन के अनुसार ही उसका सिग्नल सिस्टम भी बनाया ! जो कि उनके यहां पटरी के बांई ओर होता है। सो इन देशों में परिवहन बाएं से ही चलता है। पर जापान में इस चलन के बावजूद ''राइट हैण्ड ड्राइव'' वाली 'मंहगी कारें भी देखने को मिल जाती हैं।
बाएं से दाएं या दाएं से बाएं होने की कुछ रोचक वजहें भी हैं :-
स्वीडन ! वहां बाईं तरफ चलने का नियम बना हुआ था। लेकिन यह चारों ओर से दाएं चलने वाले देशों से घिरा हुआ था, तो यहां लेफ्ट-राइट में से एक विकल्प को चुनने के लिए वोटिंग कराई गई जिसमें करीब 83% लोगों ने कहा कि वो बाएं चलकर खुश हैं ! पर फिर भी वहां की सरकार ने दाएं चलने का नियम बना दिया !
बर्मा ! यहां ट्रैफिक के बाईं ओर चलने का नियम था। लेकिन वहां के तानाशाह जनरल ''ने विन'' ने एक ओझा के कहने पर ट्रैफिक बाएं से दाएं कर दिया ! एक तो जनरल ऊपर से तानाशाह ! कौन विरोध करता ! पर गाड़ियां भी तो नहीं बदली जा सकतीं ! सो लोग अपनी राइट हैंड ड्राइव गाड़ी को ही दाईं ओर चलाने लग गए ! वहां आज भी अधिकतर गाड़ियां राइट हैंड ड्राइव ही हैं।
समोआ ! ऑस्ट्रेलिया के पास एक छोटा सा देश। जर्मनी की गुलामी के तहत यहां ट्रैफिक दाईं तरफ चलता था। इसलिए इसे लेफ्ट हैंड ड्राइव कारें चाहिए थीं जो आसपास बनती नहीं थीं। इसके सारे पड़ोसी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में ट्रैफिक बाईं तरफ चलता है सो इसने भी वही तरिका अपनाया जिससे देश में सस्ती कारें उपलब्ध हो सकें !
चीन ! यहां दाईं ओर से चला जाता है पर इसके आधिपत्य वाले हांगकांग और मकाऊ में यातायात बाईं तरफ से चलता है !
पाकिस्तान ! भारत से अलग दिखने की चाह में यह भी बाएं से दाएं होने जा रहा था ! पर ऊँटों ने ऐसा होने नहीं दिया ! ऊँटों को बाईं तरफ से चलने का प्रशिक्षण दिया जाता है ! रात में भले ही उनका सवार सो गया हो वे अपनी बांईं तरफ से ही चलते रहते हैं ! अब उन्हें फिर से नई पट्टी पढ़ाना टेढ़ी खीर थी सो पड़ोसी ने इरादा बदल लिया !
इन सबके बीच ब्रिटेन और उसके नागरिक, जो कुछ ज्यादा ही परंपरावादी होते हैं, अपनी छोटी-छोटी गाड़ियों और कोचवान युक्त बग्घियों से जुड़े रहे ! उन्हें बाएं से दाएं जाने की नाही जरुरत पड़ी नाहीं इच्छा ! उल्टे 18 शताब्दी में लंदन पुल पर लगे एक भीषण यातायात अवरोध के कारण पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में बाएं हाथ की तरफ से चलने का कानून पारित कर दिया गया ! जो ''हाई वे एक्ट ऑफ 1835'' के नाम से जाना जाता है ! ऐसा नहीं है कि इस बारे में वहां बात नहीं उठी ! पर इस विचार को रूढ़िवादी सरकार ने शुरू में ही दफन कर दिया ! वैसे भी इस बदलाव पर करोड़ों पाउंड्स का खर्च सबसे बड़ी चुन्नौती थी और इस बदलाव से कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला था ! सो इसे स्थगित कर दिया गया। आज योरोप के सिर्फ चार देश, यूके, माल्टा, साइप्रस और आयरलैंड ही इस बाएं हाथ चलने के चलन को थामे हुए हैं।
आज संसार के करीब 65% देशों में मार्ग पर दाईं ओर से चलने का नियम है। यानी विश्व की ज्यादातर आबादी दाईं तरफ को प्रमुखता देती है और कुछ देश आज भी अपने बाएं हाथ की तरफ से चल कर अंग्रेजी परंपरा को जीवित रख रस्में निभाए जा रहे हैं ! वैसे इसे बदलना इतना आसान भी तो नहीं है !
सोमवार, 20 सितंबर 2021
गुब्बारेवाला
इन्हीं दिनों एक बार फिर श्री रविंद्रनाथ टैगोर की कालजयी कृति ''काबुलीवाला'' पढ़ते हुए विचार आया कि यदि वह घटना आज घटी होती, तो रहमत खान जेल से छूटने पर आज जैसी विषम परिस्थितियों में अफगानिस्तान कैसे जा पाता ! अपने वतन ना लौट पाने की मजबूरी में उस जेलयाफ्ता को कहां शरण मिलती ! कौन उसे पनाह देता ! उसी महान रचना ''काबुलीवाला'' से प्रेरित है यह अदना सा प्रयास "गुब्बारेवाला"! एक भावनात्मक आदरांजलि आदरणीय गुरुदेव को
#हिन्दी_ब्लागिंग
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बाबा ! बेलून !"
बाजे जिनिश ! आमरा बॉल निए खेलबो !"
ना ss ! आमाके बेलून चाई !"
विजय बाबू, शहर के नामी-गिरामी बड़े वकील, अपनी पांच वर्षीय बिटिया मिनी के साथ शाम को टहलने निकले थे। वहीं पार्क गेट के सामने ही एक गुब्बारेवाला अपनी रेहड़ी पर गैस सिलिंडर और उस पर धागे से बंधे हवा में लहराते गैस भरे तरह-तरह के रंगीन गुब्बारों को बेचते खड़ा था। नन्हीं मिनी उन्हीं रंग-बिरंगे गुब्बारों को लेने के लिए मचल रही थी ! बिटिया की मांग पूरी होनी ही थी, हुई। मिनी अपने दोनों हाथों में एक-एक गुब्बारा पकडे उछलते-कूदते घर की ओर दौड़ पड़ी, माँ को जो दिखलानी थी यह अद्भुत चीज ! पर घर के दरवाजे तक पहुंचने के पहले ही पता नहीं कैसे, दोनों गुब्बारे नन्हें हाथों की कोमल सी गिरफ्त से फिसल ऊपर आकाश की तरफ जा आखों से ओझल हो गए ! रुआंसी मिनी सर उठाए, उन्हें तकते, वहीं जड़ हो खड़ी रह गई ! सारा उल्लास-उमंग आँसू बन आँखों से ढलकने लगा ! कल फिर दिलाएंगे, का दिलासा दे बड़ी मुश्किल से विजय बाबू उसे घर के अंदर ला सके !
फिर तो यह एक तरह से रोज की ही दिनचर्या बन गई ! शाम होते ही मिनी गुब्बारों के किए मचल उठती। पर अब गुब्बारे ले उनसे खेलने की बजाए उन्हें आकाश में आजाद उड़ते देखना उसका मुख्य शगल बन गया था ! गुब्बारेवाला शम्भू भी अब मिनी को पहचानने लगा था ! यदि काम के बोझ या और किसी कारण विजय बाबू एक-दो दिन टहलने नहीं जा पाते तो वह खुद मिनी को गुब्बारे देने पहुंच जाता और पैसे ना लेने की भी भरसक कोशिश करता ! मिनी में उसे सुदूर बिहार के गांव में माँ के साथ रहती, मिनी की उम्र की अपनी बेटी सुरसतिया की झलक दिखने लगी थी !
अस्सी के दशक में बेरोजगारी और भुखमरी से तंग आ, अपनी बीवी परवतिया और बच्ची सरस्वती को गांव में ही छोड़ काम की तलाश में शम्भू कलकत्ता चला आया था। वहां पहले से कार्यरत जान-पहचान के लोगों की मदद से उसे भी एक जूट मील में नौकरी भी मिल गई थी ! मेहनती बंदा दो-दो पालियों में काम करने लगा ! सोच रखा था कि कुछ पैसा इकट्ठा हो जाने पर सुरसतिया और उसकी माँ को यहीं बुलवा लेगा ! समय निकलता गया पर उसका परिवार के संग रहने का सपना पूरा नहीं हो पाया ! कुछ ना कुछ अड़चन आ ही जाती थी ! इसी बीच पूर्वाग्रही नेताओं, जन विरोधी विचारधाराओं और भ्रष्ट राजनीती के घालमेल के चलते फैक्ट्रियां बंद होने लगीं ! हजारों मजदूर सड़कों पर आ गए ! रहने-खाने का ठिकाना ना रहा !
गाज शम्भू पर भी गिरी ! नौकरी छूटने पर उसने बहुत हाथ-पांव मारे, बहुत कुछ कर के देखा पर सफलता नहीं मिली ! गांव जाने का कोई मतलब ही नहीं था ! वहां ज़रा सा भी उपार्जन हो पाता तो परिवार छोड़ वह शहर ही क्यों आता ! हार कर उसने रिक्शा चलाना शुरू किया ! हालांकि दौड़ती भागती जिंदगी में जल्दी पहुंचने के लिए लोग रिक्शे की बजाए ऑटो को प्राथमिकता देते थे, पर फिर भी हाड-तोड़ मेहनत से किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो ही जाता था ! पर भगवान को शायद शम्भू की निश्चिंतिता भाती ही नहीं थी ! इसी कारण उसकी प्रतिद्वंदिता में ई-रिक्शा ने सड़क पर आ उसकी कमर ही तोड़ दी ! जो बीस-पचास की आमदनी होती भी थी वह भी तक़रीबन बंद हो गई ! रिक्शे का रोज का किराया तक निकलना दूभर हो गया ! लिहाजा यह काम भी छोड़ना पड़ा ! पैसे की आवक बिलकुल ख़त्म हो गई ! एक तो गांव परिवार की चिंता दूसरे यहां खुद की जान की भी फ़िक्र ! शम्भू के लिए जीना मुहाल हो गया ! वह तो बासे में संगी-साथी किसी तरह मिल बांट कर गुजारा कर रहे थे, नहीं तो पता नहीं क्या होता !
पर हर रात का सबेरा होता ही है ! शम्भू का एक साथी सड़कों पर गुब्बारे बेचता था वह गांव चला गया और जाते-जाते अपना सारा तामझाम इसे सौंप गया ! धीरे-धीरे जिंदगी मुस्कुराने लगी ! उसी मुस्कराहट को बच्चों के मुख पर कायम रखने के लिए शम्भू ने गुब्बारे बेचने शुरू कर दिए ! हालांकि उपार्जन बहुत कम था पर उसे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान देख लगता था कि उसकी सुरसतिया उसके पास खडी मुस्कुरा रही हो ! ऐसे में ही एक दिन उसके कानों में आवाज पड़ी, बाबा ! आमाके बेलून चाई !'' और उसकी सुरसतिया का स्वरूप जैसे उसके सामने खड़ा था ! शुरू में मिनी उससे दूर-दूर रहा करती थी ! पर धीरे-धीरे उसकी शम्भू के साथ अच्छी पटने लगी ! जब वह अपनी कुछ तुतलाती सी बोली में उसे पुकारती, बेलून वाला" तो शम्भू निहाल हो उठता ! उसके उल्टे-सीधे सवालों का वह भी वैसे ही जवाब देता, तो वह हंसती हुई विजय बाबू को बतलाती, बाबा शोंभू एक्के-बारे बोका, किछु जाने ई ना !'' इधर शम्भू की तो जैसे जिंदगी ही बदल गई थी, मिनी में अपनी सुरसतिया को पा कर वह निहाल हुए जाता था ! परिवार से दूरी का गम कुछ हद तक कम हो चला था ! पर उसे क्या पता था कि उसकी जिंदगी में ऐसा उलटफेर होने वाला है, जिससे सब कुछ तहस-नहस हो जाएगा ! जिंदगी तबाह हो कर रह जाएगी !
एक दिन मिनी उससे गुब्बारे ले घर की ओर जा ही रही थी कि एक तेज रफ़्तार कार उसके सर तक आ पहुंची ! शम्भू ने तुरंत बिना देर किए छलांग लगा, मिनी को अपने सीने से चिपटा सड़क पर कलाबाजी खा, उसे सुरक्षित बचा लिया ! मिनी को जरा सी खरोंचें आईं पर शम्भू कार की जद में आ पीठ, कंधें और सर पर चोट लगवा बैठा ! इतने में कार सामने की दिवार से टकरा कर रुक गई ! चोटिल होने के बावजूद शम्भू ने युवक कार चालक को पकड़ उसकी धुनाई कर दी ! युवक राजाबाजार के बाहुबली का एकलौता बिगड़ैल बेटा था ! एकत्रित भीड़ के सामने एक सामान्य से फेरी वाले से मार खा वह बेहद अपमानित महसूस कर रहा था। आवेग में उसने पिस्तौल निकाल शम्भू पर तान दी ! इसके पहले की गोली चले शम्भू ने झपट कर उसे हाथों में उठा पटक दिया ! शम्भू की बदकिस्मती युवक का सर पत्थर से टकरा कर तरबूज की तरह खुल गया, उसने वहीं दम तोड़ दिया।
डरी, सहमी, सदमे में घिरी मिनी को गोद में उठा शम्भू ने उसके घर पहुंचाया और फिर थाने जा कर आत्मसमर्पण कर दिया ! विजय बाबू ने बाहुबली के रसूख की परवाह किए बगैर शम्भू का केस लड़ा ! कई दिनों तक जिरह चली ! तरह- तरह के प्रमाण पेश किए गए, पर अपनी लाड़ली बिटिया की जान बचाने वाले को विजय बाबू आजीवन कारावास की सजा से ना बचा पाए ! बीस साल के लिए शम्भू को अलीपुर जेल भेज दिया गया ! विजय बाबू के मन में यह अपराध बोध घर कर गया कि उनकी बेटी के कारण एक सीधे-साधे इंसान को इतनी बड़ी सजा भोगनी पड़ रही है !
समय अपनी चाल चलता रहा ! विजय बाबू की सहधर्मिणी निर्मला देवी का देहावसान हो गया उसके बाद से ही उन्होंने ने भी कोर्ट-कचहरी जाना बहुत कम कर दिया ! अब वे कुछ चुनिंदा केस ही हाथ में लेते थे ! मिनी पढ़-लिख कर बैंगलोर की एक कंपनी में, वहीं रह कर इंटर्नशिप करने लग गयी थी ! विजय बाबू और घर की सारी जिम्मेदारी अब पुराने घरेलू सहायक भोला काका पर आ पड़ी थी । मिनी तक़रीबन रोज ही विडिओ कॉल कर अपने बाबा के हाल की जानकारी ले भोला काका को जरुरी हिदायतें देती रहती थी !
एक दिन ढलती दोपहर में मुख्य द्वार की घंटी बजी ! इस समय कौन हो सकता है, ऐसा सोचते हुए भोला काका ने दरवाजा खोला तो सामने एक अजनबी को ऑटो रिक्शा में बैठे पाया ! उस आदमी ने एक कागज़ का टुकड़ा भोला काका की तरफ बढ़ाया, जिसमे इसी जगह और घर का पता लिखा हुआ था ! कुछ समझ ना पाने की दशा में भोला काका ने विजय बाबू को खबर की ! विजय बाबू बाहर आए, दो क्षण अजनबी को देखा और बोल पड़े, अरे शम्भू तुम !'' आओ, आओ !''
तब तक भोला काका के मष्तिष्क पर से भी अठ्ठारह साल की जमी धुंध छंट गई थी और चेहरे पर पहचान के भाव आ गए थे ! शम्भू को सहारा दे कर अंदर ले आया गया ! कुछ देर बाद प्रकृतिस्थ हो जाने के बाद शम्भू ने जो आपबीती सुनाई वह किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी थी ! गांव में किसी तरह मेहनत-मजदूरी कर दिन गुजारती उसकी पत्नी और बेटी पर कुदरत का कहर टूटा ! कोरोना की चपेट में आ दोनों शम्भू से सदा के लिए दूर चली गईं ! इतना ही नहीं इस बार की भयकंर बाढ़ ने पूरे इलाके को जलमग्न कर दिया ! बाढ़ की विकराल लहरों ने उसके झोपड़ीनुमा घर को मटियामेट कर डाला ! जो थोड़ी बहुत जमीन थी वह पानी से बर्बाद हो गई ! किसी भी चीज का नामोनिशान तक नहीं बचा !
अच्छे चालचलन और नेक व्यवहार के चलते शम्भू की सजा के दो साल कम कर उसे रिहा कर दिया गया ! पर रिहा होने के बाद वह कहां जाए, क्या करे, उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था ! इस महानगर में इतने साल गुजारने के उपरांत भी वह अभी भी अजनबी सा ही था ! ना किसी से जान-पहचान, ना दोस्ती ना संबंध ! बिलकुल अकेला ! केस के चलते उसे सिर्फ विजय बाबू का नाम और पता मालुम था ! सो संकोच और झिझक के बावजूद वह यहां चला आया ! इसके अलावा और कोई उपाय या रास्ता भी तो नहीं था, उसके पास ! अब जैसा वे कहें, राह दिखाएं, सलाह दें, वैसा ही वह करेगा ! विजय बाबू सर झुका, गहन चिंता में डूब, गंभीर हो गए ! सोच रहे थे, एक भले और नेक इंसान को भगवान एक के बाद एक लगातार इतने सारे कष्ट क्यूँ देता चला जा रहा है ! किसी की भलाई करने का बदला भी दंडस्वरूप मिला ! किसी की बेटी की जान बचाई तो अपना परिवार खो दिया ! किसी उदण्ड का विरोध किया तो सजा हो गई ! पूरी जिंदगी अपनों से दूर, काल कोठरी में रहने को बाध्य होना पड़ा ! हे ईश्वर ! यह तेरा कैसा न्याय है !
कुछ देर के चिंतन के पाश्चात्य विजय बाबू ने अपना सर उठाया ! भोला और शम्भू की तरफ देखा ! फिर धीर-गंभीर स्वर में अपना फैसला सुना दिया, आज से शम्भू इसी घर में रहेगा, ताउम्र, परिवार का सदस्य बन कर ! इस पर कोई ना-नुकुर नहीं ! कोई सवाल-जवाब नहीं ! यह मेरा एकमात्र और अंतिम फैसला है ! यह सुन शम्भू जरूर कुछ सकुचाया सा दिख रहा था पर भोला काका ने तुरंत उसका नहीं के बराबर जो कुछ भी असबाब था, एक कमरे में ले जा कर रख दिया ! शम्भू को मुंह-हाथ धोने के लिए भेज, विजय बाबू ने भोला काका को हिदायत दी कि इस बारे में अभी मिनी को कुछ भी ना बतलाया जाए !
विजय बाबू वर्षों से दिल पर जो एक बोझ लिए सदा तनावग्रस्त रहते हुए दिन बिता रहे थे ! उन्हें यही लगता था कि शम्भू उनकी बेटी के कारण जेल भुगत रहा है ! कहीं ना कहीं उसकी सजा में वे खुद को दोषी पाते थे ! पर कुछ ना कर पाने की स्थिति में उन्होंने अकेलापन ओढ़ लिया था ! भोला काका से भी सिर्फ मतलब और जरुरत भर की ही बात होती थी ! पूरे समय घर में चुप्पी ही पसरी रहती थी ! पर शम्भू के आ जाने से घर में थोड़ी जीवंतता आ गई थी ! विजय बाबू और भोला को भी एक और बात करने वाला मिल गया था ! आपस में बातचीत होने से घर का माहौल भी खुशनुमा रहने लगा था ! विजय बाबू को लगता था जैसे उनके दिलो-दिमाग से कोई भारी बोझ उतर ! अपने में फर्क महसूस होने लगा था ! अब वे घर में बातचीत में तो शामिल होते ही थे शाम को शम्भू को साथ ले टहलने भी जाने लगे थे ! उधर मिनी इन सब घटनाओं से अनजान काम की अत्यधिक व्यस्तता के कारण घर नहीं आ पा रही थी !
समय के पास तो कभी अपने लिए भी समय नहीं होता ! ऐसे ही दिन-हफ्ते-महीने बीतते चले गए ! और देखते-देखते दुर्गोत्सव का पर्व आ पहुंचा ! मिनी का भी संदेश आ गया था कि तीन दिन बाद वह छुट्टियों में घर आ रही है ! एक बार तो विजय बाबू आने वाले घटना चक्र का अंदाजा लगा सोच में पड़ गए ! पर अगले ही क्षण उन्होंने सब कुछ ''माँ'' पर छोड़ दिया ! जैसी जगत्जननी की इच्छा ! वह जैसा चाहेगी वैसा ही होगा ! जैसे रखना चाहेगी वैसे ही रहेंगे !
निश्चित दिन मिनी का आगमन हुआ ! प्रभुएच्छा से घर के अंदर आते ही उसका सामना शम्भू से हो गया ! पहले उसने सोचा बाजार से कोई कुछ देने आया होगा ! पर उसे वही बने रहे देख, उसने विजय बाबू से पूछा, बाबा ये कौन ?'' विजय बाबू बोले, बाहर से आई हो, पहले नहा-धो कर फ्रेश हो जाओ ! फिर डाइनिंग टेबल पर बैठ इत्मीनान से सब कुछ बताता हूँ !''
मिनी अंदर चली तो गई पर उसे गुस्सा आ रहा था कि उसके दरियादिल बाबा पता नहीं किस ऐरे-गैरे को घर ले आए हैं ! भोला काका को कितना समझाया था ! पर वह कुछ नहीं बोले ! मुझे बताया तक नहीं ! देखती हूँ उनको भी ! पता नहीं किस दुनिया में जीते हैं ये लोग ! आज का समय क्या किसी पर विश्वास करने है ! कोई कुछ भी कर चलता बना रह सकता है ! इन्हें तो समझ ही नहीं है ! इसी उधेड़बुन में नहा कर वापस आ देखा तो वही अजनबी ममत्व, वात्सल्य, स्नेहिल निगाहों से उसे तकता बाबा के साथ ही बैठा हुआ था ! एक बार तो मिनी का पारा एकदम चढ़ गया पर फिर उसने किसी तरह अपने पर काबू पा जिज्ञासा और जवाब तलब करने वाली निगाहों से अपने बाबा को देखा !
विजय बाबू बोले, आओ, बैठो ! यह शम्भू काका हैं ! प्रणाम करो !''
ना चाहते हुए भी मिनी ने हाथ जोड़ प्रणाम किया ! शम्भू ने आशीर्वाद दिया ! लम्बी उम्र की आशीष दी ! विजय बाबू बोले परिचय कहां से शुरू करुं, समझ नहीं आ रहा ! अच्छा बेटा ! तुम्हें अपने बचपन में किसी गुब्बारे वाले की याद है ?'' मिनी अंदर से कुछ चिढ सी गई, उसे लगा बाबा बात घुमाने की कोशिश कर रहे हैं ! पर प्रत्यक्ष में बोली, मुझे कुछ याद नहीं है !''
विजय बाबू ने गहरी सांस ली और धाराप्रवाह अठ्ठारह सालों का सारा विवरण मिनी को सुना दिया ! कथा के आज वर्तमान तक आते-आते विजय बाबू का गला रुंध गया था ! कमरे में पूरी तरह खामोशी फैली हुई थी ! चारों प्राणियों की आँखों से अविरल अश्रु धारा बहे चली जा रही थी ! पता नहीं कितनी देर ऐसे ही सब बैठे रहे ! फिर मिनी उठी और शम्भू काका के पैरों में झुक गई ! शम्भू अचकचा कर उठ खड़ा हुआ, बोला, ना बिटिया ना ! हमारी तरफ बेटी से पांव नहीं झुवाते !'' फिर मिनी के सर पर हाथ फेरते हुए असंख्य आशीषें दे डालीं !
छुट्टियों के बाद काम पर लौटते समय मिनी निश्चिन्त थी, अपने बाबा की तरफ से ! उसे इत्मीनान हो गया था कि उसके घर पर ना रहने पर भी बाबा की देख-भाल के लिए उनके एक बड़े भाई को भगवान ने शम्भू के रूप में भेज दिया है !
मंगलवार, 14 सितंबर 2021
हिंदी, अपनाना है तो दिल से अपनाएं
ठीक है अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। पर उसके कारण, अकारण ही हम अपनी भाषा को हीन समझते हैं, उसे दोयम दर्जे की मान लेते हैं ! दुःख तो तब होता है जब सिर्फ हिंदी के कारण विख्यात होने वाले, इसी की कमाई खाने वाले कृतघ्न, कोई मंच मिलते ही अंग्रेजी में बोलना शुरू कर देते हैं। शायद उनके कम-अक्ल दिमाग में कहीं यह हीन भावना रहती है कि हिंदी में बोलने से शायद उन्हें गंवार ही न समझ लिया जाए.............!
शिखर की दस भाषाओं ने विश्व की करीब 40 प्रतिशत आबादी को समेट रखा है। उन दस भाषाओं में हमारी हिंदी तीसरे स्थान पर है। उसके आगे सि र्फ चीन की मैंड्रीन पहले नम्बर पर तथा दूसरे नम्बर पर अंग्रेजी है। इन आंकड़ों से हिंदी की अहमियत को अच्छी तरह समझा जा सकता है
सोमवार, 13 सितंबर 2021
बाथरूम सिंगिग का भी एक घराना होना चाहिए
फिल्म "पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर "बाथरूम सिंगिंग" यानि हमाम गायिकी के विषय को छुआ गया था, पर उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी। हालांकि उस पात्र ने इस कला को जीवित रखने के लिए अपने बेटे को भी इस विधा में प्रशिक्षित करने की कोशिश की थी ! पर हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-मग्गे से नहाते समय गायक का ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे को साधने में ही अटका रहता है, जिससे सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती अनवरत जल-राशि से ही बनती है ...........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
बहुत दिनों से एक सोच आ-आ कर टक्करें मार रही थी कि हमाम गायिकी यानी बाथरूम सिंगिंग का भी एक घराना जरूर होना चाहिए था। गायिकी के घरानों की बात करें तो देश में ऐसे पच्चीस-तीस घराने ही तो होंगे, जहां अत्यंत उच्च कोटि का गायन सिद्धहस्त गुरुओं और उस्तादों द्वारा मनोयोग से सिखाया जाता रहा है। वहां प्रवेश मिलना तो दूर उसके लिए सोचने की भी ख़ास योग्यता की जरुरत होती है। गुरु और शिष्य तन, मन और पूरी निष्ठा से सुरों को साधने में वर्षों लगा देते हैं। इसीलिए वहां से हीरे ही निकलते भी हैं। पर कितने ! पांच हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार !! पर मुद्दा यह है कि दुनिया को सिर्फ डॉक्टर ही थोड़े चाहिए होते हैं ! सहायक, नर्सें, वार्ड-ब्वाय भी तो उतने ही जरुरी होते हैं ! इसीलिए यह सोच बार-बार जोर मार रही थी कि एक अदद ऐसा घराना भी होना चाहिए था, जो काश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से आसाम तक पाए जाने वाले उन लाखों-लाख 'सुरतालयों' को, जिन्होंने अपनी संगीत साधना से गली-मौहल्ले तक को सराबोर कर रखा हो, एक जगह इकट्ठा कर उन्हें अपना नाम दे उनकी पहचान बनवा सकने में सहायक होता।
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