pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शनिवार, 2 अक्टूबर 2021

हावड़ा स्टेशन ! टर्मिनस भी, जंक्शन भी

रेलवे की भाषा में टर्मिनस उस स्टेशन को कहा जाता है, जिसके और आगे जाने की पटरी ना हो, रास्ता वहीं खत्म हो जाता हो यानी ट्रेन जिस दिशा से आई है, उसी दिशा में उसे वापस जाना पड़ता है ! जंक्शन का मतलब होता है जिस स्टेशन से दो या उससे अधिक दिशाओं में जाने के रास्ते निकलते हों ! इसकी एक विशेष विशेषता यह भी है कि जहां और जंक्शनों में पटरियां स्टेशन से कुछ दूर जा कर अलग दिशाओं में मुड़ती हैं, वहीं हावड़ा में यह अलगाव स्टेशन से ही हो जाता है.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

देश और भारतीय रेल का सबसे बड़ा, खूबसूरत, भव्य, ऐतिहासिक रेलवे स्टेशन है हावड़ा ! पश्चिम बंगाल में हुगली नदी के दाहिने किनारे पर स्थित, एक छोटे-मोटे शहर जैसा विशाल होने के साथ-साथ यह खुद में अनेकानेक विशेषताओं को अपने में समेटे रोज लाखों लोगों को, अपने 23 प्लेटफार्मों की बदौलत, अपने गंतव्य तक पहुंचने में मदद करता है ! 1854 में इसकी स्थापना कलकत्ता शहर की बजाए ठीक उसके सामने नदी के दूसरी तरफ हावड़ा में की गई ! क्योंकि उस तरफ का भू-भाग बिना किसी जल बाधा के देश के दूसरे हिस्सों से जुड़ा हुआ था, इससे नदी पर पुल बनाने की जहमत और खर्च से बचाव हुआ ! जिस स्थान को स्टेशन के लिए चुना गया वह एक बहुत बड़ा दलदली, जंगली लता-गुल्मों से पता जोहड़ था ! जिसे बंगला भाषा में हाउर या हाओर कहा जाता है ! उसी से इस स्थान का नाम हावड़ा पड़ा। स्टेशन बनने के साथ ही यहां औद्यौगिक विकास भी पनपा जिसने शहर को कलकत्ता के एक आम से उपनगर को भारतवर्ष का एक महत्वपूर्ण औद्यौगिक केन्द्र बना दिया। 1853 में बंबई से भारत में पहली रेल गाड़ी चलने के बाद 1854 में दूसरी हावड़ा से ही चली थी ! 


स्टेशन का भीतरी भाग 

हावड़ा स्टेशन की एक सबसे बड़ी विशेषता है कि यह टर्मिनस होने के बावजूद जंक्शन कहलाता है ! रेलवे की भाषा में टर्मिनस उस स्टेशन को कहा जाता है, जिसके और आगे जाने की पटरी ना हो, रास्ता वहीं खत्म हो जाता हो यानी ट्रेन जिस दिशा से आई है उसी दिशा में उसे वापस जाना पड़ता है ! जंक्शन का मतलब होता है जिस स्टेशन से दो या उससे अधिक दिशाओं में जाने के रास्ते निकलते हों ! हावड़ा, टर्मिनस होते हुए भी जंक्शन इस लिए कहलाता है क्योंकि यहां से कई दिशाओं में जाने की सुविधा है ! एक तो सीधे बैंडल-वर्धमान होते हुए पटना-दिल्ली-पंजाब से कश्मीर तक ! दूसरे तकियापारा-सांतरगाझी होते हुए भुवनेश्वर, फिर वहां से भी आगे ! तीसरा खडगपुर-रायपुर होते हुए मुंबई ! चौथी एक लाइन हावड़ा से डानकुनी होते हुए इसे सियालदह, यानी कोलकाता से भी जोड़ती है ! इस जंक्शन की एक विशेष विशेषता यह भी है कि जहां और जंक्शनों में पटरियां स्टेशन से कुछ दूर जा कर अलग दिशाओं में मुड़ती हैं, वहीं हावड़ा में यह अलगाव स्टेशन से ही हो जाता है ! ऐसा उदाहरण और कहीं नहीं मिलता ! इसके अलावा जलपथ भी है जिससे स्टीमर द्वारा हावड़ा से कोलकाता कुछ ही मिनटों में पहुंचा जा सकता है। इसे भी जंक्शन की तरह ही लिया जा सकता है। इससे हावड़ा पुल का भी कुछ बोझ हल्का हुआ है !

प्लेटफार्म के साथ रोड 

सब वे 
एक और भी कारण है जो इसको जंक्शन कहलवाता है ! शुरू में जब हुगली नदी पर पुल नहीं था तब लोग फेरी या नौका से नदी पार कर हावड़ा पहुंचते थे ! उस जल-पथ और रेल-पथ के जंक्शन के कारण भी इसे हावड़ा स्टेशन जंक्शन कहा जाने लगा था।

डबल डेकर 

फेरी क्वीन 

हावड़ा स्टेशन की अपनी कुछ और विशेषताएं भी हैं जो इसे देश का प्रमुख, प्रथम व खास स्टेशन होने का गौरव प्रदान करती हैं  :-

* देश में पहली बिजली की ट्रेन यहीं से चली थी ! 

* पहली हावड़ा-दिल्ली राजधानी गाडी को रवाना करने वाला भी यही स्टेशन था ! 

* देश की पहली डबल डेकर ट्रेन, हावड़ा-धनबाद, यहीं से चलाई गई थी। 

* यह देश का पहला स्टेशन है जहां प्लेटफार्म तक निजी वाहन ले जाने की भी सुविधा है ! यानी रेल की पटरियों के साथ ही सड़क मार्ग भी है ! जिनकी संख्या अब दो हो गई है। 

* दैनिक यात्रियों की सुविधा के लिए बना, भारत का सबसे पुराना ''सब वे'' भी यहीं है। 

* सबसे पहले देश के "जीरो नंबर" के प्लेटफार्म का निर्माण भी यहीं हुआ था। 

* 23 प्लेटफार्मों के साथ यह देश का सबसे व्यस्त रेलवे परिसर है। 

* दुनिया के व्यस्ततम रेल तंत्रों में से एक है।   

* विश्व के सबसे पुराने पर अभी भी सक्रिय लोकोमोटिव इंजिन ''फेरी क्वीन'' ने अपनी यात्रा की शुरुआत यहीं हावड़ा से ही की थी। 

* यात्रियों की सुविधा के लिए सर्व सुविधायुक्त "यात्री निवास" भी इसी के परिसर में बना था। 

* थोड़े से वृहद नजरिए से देखें तो देश की पहली, हुगली नदी के नीचे से गुजरने वाली, मेट्रो सुरंग भी इसके आस-पास ही बन रही है !


@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से 

शनिवार, 25 सितंबर 2021

यातायात ! कहीं दाएं, कहीं बाएं ! ऐसा क्यूं

एक वक्त था जब दुनिया में सड़क मार्ग पर दोनों तरह से चलने वालों की संख्या तक़रीबन बराबर थी ! पर समय के साथ दाईं ओर से चलने वालों की संख्या बढ़ती चली गई ! इसकी एक वजह ब्रिटेन भी है ! एक समय था जब यह कहा जाता था कि ''इसके साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता !'' पर इसकी गिरफ्त से जैसे-जैसे अन्य देश आजाद होते चले गए, वैसे-वैसे उन्होंने गुलामी की निशानियां मिटाने के लिए नियम-कानून भी बदलने शुरू कर दिए।उसी की जद में आ यह यातायात नियम भी बदलता चला गया 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

हमारे देश में वाहन और यातायात बाईं तरफ से प्रवाहमान होता है बावजूद इसके कि दुनिया के ज्यादातर देशों में यह दाहिने हाथ की तरफ से चलता है ! इसका एक प्रमुख कारण बताया जाता है कि अंग्रेजो का जहां-जहां राज था वहां-वहां यह रवायत पड़ी, जैसे ऑस्ट्रेलया, न्यूजीलैंड, भारत, पकिस्तान या कुछ अफ़्रीकी देश ! पर मिस्र अंग्रेजी शासन के बावजूद सदा दाहिनी ओर ही चलता रहा ! इसके अलावा जापान कभी भी  ब्रिटिश हुकूमत के नीचे नहीं रहा पर वहां भी बाएं हाथ पर चलने का चलन है ! पर साथ ही सवाल यह भी है कि अंग्रेज ही क्यों बाएं-बाएं चले  ?

जाहिर है ! जब इंसान ने बस्तियां बनाईं, एक जगह से दूसरी जगह आना-जाना शुरू किया तो भी उसे मार्ग के बाईं या दाईं ओर से ही चलने की जरुरत नहीं होती होगी ! पर जैसे-जैसे लोगों में आपसी वैमन्यस्कता, विद्वेष, झगड़े इत्यादि पनपे होंगे तो उसने मार्ग के बाईं ओर से चलना ज्यादा सुरक्षित समझा होगा, क्योंकि ज्यादाताए लोग अपने दाएं हाथ का उपयोग प्रमुखता से करते हैं और वह हाथ ही हथियार वगैरह के संचालन में ज्यादा काम आता है सो सुरक्षा और बचाव की दृष्टि से मानव ने बाएं हो कर चलना ठीक समझा होगा !


फिर एक समय आया संयुक्त राज्य अमेरिका में “टीमस्टर्स” की शुरुआत हुई थी। यह एक बड़ा वैगन होता था, जिसे घोड़ों की एक टीम खींचती थी। इन वैगनों पर चालकों के बैठने हेतु सीट नहीं होती थी। अतः इसका संचालन करने वाला सबसे बाईं तरफ वाले घोड़े पर बैठता था और दाएं हाथ में चाबुक ले कर सभी घोड़ों को नियंत्रित करता था। इन भारी गाड़ियों के कारण ही अमेरिकी लोगों को सड़क पर बायीं ओर चलने के नियम में बदलाव करना पड़ा और वे सड़क पर दायीं ओर चलने के नियम का अनुसरण करने लगे इस बदलाव का एक कारण यह भी था कि इससे सामने से आने वाले वाहन इत्यादि से टकराव से बचाव हो जाता था। यही नियम रेवड़ों को हांकते समय भी काम में आता था, सो इस तरह दाईं ओर से चलने का चलन शुरू हुआ ! इस तरह अपनी-अपनी जरुरत के हिसाब से और अलग-अलग वजहों से मार्ग पर चलने के दो-दो तरीके चलन में आ गए। 

लाल, दाएं हाथ का चलन 

फिर दुनिया की बढ़ती आबादी के कारण परिवहन में आने वाली समस्याओं से निपटने के लिए अलग-अलग देशों में अपनी सुविधानुसार नियम बनाए जाने लगे ! जैसे रूस में सड़क के दाहिनी ओर चलना सुनिश्चित किया गया ! वहीं फ्रांस में कुछ और ही कहानी बनी ! वहां अभिजात्य वर्ग सड़क के बाईं ओर चला करता था जबकि सर्वहारा वर्ग को मार्ग के सिर्फ दाईं ओर से ही चलने की इजाजत थी ! पर फ्रांस की क्रांति के दौरान जब वहां अभिजात्य वर्ग के लोगों का बड़े पैमाने पर कत्लेआम हुआ तब वहां के धनी-मानी, रसूखदार लोगों ने भी अपनी जान बचाने की खातिर, कहीं आने-जाने के लिए सड़क की दाईं ओर चलना शुरू कर दिया, जिससे सफर के दौरान वे आम आदमी की भीड़ में मिल कर खुद को सुरक्षित रख सकें। क्रांति के बाद फ्रांस में दाईं तरफ से चलने का नियम ही बना दिया गया।  

पर योरोप ने तय कर रखा था कि वह बाईं तरफ से ही आवागमन जारी रखेगा पर वहां भी दशा और दिशा बदलती चली गई, जहां-जहां नेपोलियन जीता ! हिटलर ने भी अपने शासितों को अपनी इच्छानुसार दाएं-दाएं चलवाया ! इस तरह विभिन्न परिस्थितियों, मानसिकताओं, जरूरतों या मजबूरीवश अलग-अलग देशों में परिवहन के आवागमन का परिचालन दाएं-बाएं होता रहा ! विजेता, विजित पर अपने नियम-कानून लागू करता चला गया ! कुछ मजबूरियोंवश बदले ! कुछ पूर्वाग्रहों के चलते ! कुछ देखा-देखी ! 

एक वक्त था जब दोनों तरह से चलने वालों की संख्या तक़रीबन बराबर थी। पर समय के साथ दाईं ओर से चलने वालों की संख्या बढ़ती चली गई ! इसकी एक वजह ब्रिटेन भी है ! एक समय था जब यह कहा जाता था कि ''इसके साम्राज्य में सूरज कभी नहीं डूबता !'' पर इसकी गिरफ्त से जैसे-जैसे अन्य देश आजाद होते चले गए, वैसे-वैसे उन्होंने गुलामी की निशानियां मिटाने के लिए नियम-कानून भी बदलने शुरू कर दिए।उसी की जद में आ यह यातायात नियम भी बदलता चला गया ! उधर अपनी आजादी के बाद बाएं से दाएं हुए अमेरिका ने सस्ती गाड़ियों से दुनिया के बाजार को पाट दिया ! जाहिर है वे सब सड़क के दाएं ओर चलने की दृष्टि से बनाई गईं थीं सो उन्होंने भी सड़क पर अपना प्रभाव दिखाया ! 

वैसे जो थोड़ा-बहुत बाएं हाथ वाला चलन बचा हुआ है उसमें भी इंग्लैण्ड का ही योगदान है ! भारत-जापान जैसे देशों में अंग्रेजों ने रेलवे लाइन बिछाई तो अपने देश के चलन के अनुसार ही उसका सिग्नल सिस्टम भी बनाया ! जो कि उनके यहां पटरी के बांई ओर होता है। सो इन देशों में परिवहन बाएं से ही चलता है। पर जापान में इस चलन के बावजूद ''राइट हैण्ड ड्राइव'' वाली 'मंहगी कारें भी देखने को मिल जाती हैं। 

बाएं से दाएं या दाएं से बाएं होने की कुछ रोचक वजहें भी हैं :-       

स्वीडन ! वहां बाईं तरफ चलने का नियम बना हुआ था।  लेकिन यह चारों ओर से दाएं चलने वाले देशों से घिरा हुआ था, तो यहां लेफ्ट-राइट में से एक विकल्प को चुनने के लिए वोटिंग कराई गई जिसमें करीब 83% लोगों ने कहा कि वो बाएं चलकर खुश हैं ! पर फिर भी वहां की सरकार ने दाएं चलने का नियम बना दिया !

बर्मा ! यहां ट्रैफिक के बाईं ओर चलने का नियम था। लेकिन वहां के तानाशाह जनरल ''ने विन'' ने एक ओझा के कहने पर ट्रैफिक बाएं से दाएं कर दिया ! एक तो जनरल ऊपर से तानाशाह ! कौन विरोध करता ! पर गाड़ियां भी तो नहीं बदली जा सकतीं ! सो लोग अपनी राइट हैंड ड्राइव गाड़ी को ही दाईं ओर चलाने लग गए ! वहां आज भी अधिकतर गाड़ियां राइट हैंड ड्राइव ही हैं। 

समोआ ! ऑस्ट्रेलिया के पास एक छोटा सा देश। जर्मनी की गुलामी के तहत यहां ट्रैफिक दाईं तरफ चलता था। इसलिए इसे लेफ्ट हैंड ड्राइव कारें चाहिए थीं जो आसपास बनती नहीं थीं।  इसके सारे पड़ोसी, जापान, ऑस्ट्रेलिया और न्यूजीलैंड जैसे देशों में ट्रैफिक बाईं तरफ चलता है सो इसने भी वही तरिका अपनाया जिससे देश में सस्ती कारें उपलब्ध हो सकें ! 

चीन ! यहां दाईं ओर से चला जाता है पर इसके आधिपत्य वाले हांगकांग और मकाऊ में यातायात बाईं तरफ से चलता है !  

पाकिस्तान ! भारत से अलग दिखने की चाह में यह भी बाएं से दाएं होने जा रहा था ! पर ऊँटों ने ऐसा होने नहीं दिया ! ऊँटों को बाईं तरफ से चलने का प्रशिक्षण दिया जाता है ! रात में भले ही उनका सवार सो गया हो वे अपनी बांईं तरफ से ही चलते रहते हैं ! अब उन्हें फिर से नई पट्टी पढ़ाना टेढ़ी खीर थी सो पड़ोसी ने इरादा बदल लिया !

इन सबके बीच ब्रिटेन और उसके नागरिक, जो कुछ ज्यादा ही परंपरावादी होते हैं, अपनी छोटी-छोटी गाड़ियों और कोचवान युक्त बग्घियों से जुड़े रहे ! उन्हें बाएं से दाएं जाने की नाही जरुरत पड़ी नाहीं इच्छा ! उल्टे 18 शताब्दी में लंदन पुल पर लगे एक भीषण यातायात अवरोध के कारण पूरे ब्रिटिश साम्राज्य में बाएं हाथ की तरफ से चलने का कानून पारित कर दिया गया ! जो ''हाई वे एक्ट ऑफ 1835'' के नाम से जाना जाता है ! ऐसा नहीं है कि इस बारे में वहां बात नहीं उठी ! पर इस विचार को रूढ़िवादी सरकार ने शुरू में ही दफन कर दिया ! वैसे भी इस बदलाव पर करोड़ों पाउंड्स का खर्च सबसे बड़ी चुन्नौती थी और इस बदलाव से कोई फर्क भी नहीं पड़ने वाला था ! सो इसे स्थगित कर दिया गया। आज योरोप के सिर्फ चार देश, यूके, माल्टा, साइप्रस और आयरलैंड ही इस बाएं हाथ चलने के चलन को थामे हुए हैं।

आज संसार के करीब 65% देशों में मार्ग पर दाईं ओर से चलने का नियम है। यानी विश्व की ज्यादातर आबादी दाईं तरफ को प्रमुखता देती है और कुछ देश आज भी अपने बाएं हाथ की तरफ से चल कर अंग्रेजी परंपरा को जीवित रख रस्में निभाए जा रहे हैं ! वैसे इसे बदलना इतना आसान भी तो नहीं है !

सोमवार, 20 सितंबर 2021

गुब्बारेवाला

इन्हीं दिनों एक बार फिर श्री रविंद्रनाथ टैगोर की कालजयी कृति ''काबुलीवाला'' पढ़ते हुए विचार आया कि यदि वह घटना आज घटी होती, तो रहमत खान जेल से छूटने पर आज जैसी विषम परिस्थितियों में  अफगानिस्तान कैसे जा पाता ! अपने वतन ना लौट पाने की मजबूरी में उस जेलयाफ्ता को कहां शरण मिलती ! कौन उसे पनाह देता ! उसी महान रचना ''काबुलीवाला'' से प्रेरित है यह अदना सा प्रयास "गुब्बारेवाला"! एक भावनात्मक आदरांजलि आदरणीय गुरुदेव को  

#हिन्दी_ब्लागिंग

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बाबा ! बेलून  !"   

बाजे जिनिश ! आमरा बॉल निए खेलबो !"

ना ss ! आमाके बेलून चाई  !"

विजय बाबू, शहर के नामी-गिरामी बड़े वकील, अपनी पांच वर्षीय बिटिया मिनी के साथ शाम को टहलने निकले थे। वहीं पार्क गेट के सामने ही एक गुब्बारेवाला अपनी रेहड़ी पर गैस सिलिंडर और उस पर धागे से बंधे हवा में लहराते गैस भरे तरह-तरह के रंगीन गुब्बारों को बेचते खड़ा था। नन्हीं मिनी उन्हीं रंग-बिरंगे गुब्बारों को लेने के लिए मचल रही थी ! बिटिया की मांग पूरी होनी ही थी, हुई। मिनी अपने दोनों हाथों में एक-एक गुब्बारा पकडे उछलते-कूदते घर की ओर दौड़ पड़ी, माँ को जो दिखलानी थी यह अद्भुत चीज ! पर घर के दरवाजे तक पहुंचने के पहले ही पता नहीं कैसे, दोनों गुब्बारे नन्हें हाथों की कोमल सी गिरफ्त से फिसल ऊपर आकाश की तरफ जा आखों से ओझल हो गए ! रुआंसी मिनी सर उठाए, उन्हें तकते, वहीं जड़ हो खड़ी रह गई ! सारा उल्लास-उमंग आँसू बन आँखों से ढलकने लगा ! कल फिर दिलाएंगे, का दिलासा दे बड़ी मुश्किल से विजय बाबू उसे घर के अंदर ला सके ! 

फिर तो यह एक तरह से रोज की ही दिनचर्या बन गई ! शाम होते ही मिनी गुब्बारों के किए मचल उठती। पर अब गुब्बारे ले उनसे खेलने की बजाए उन्हें आकाश में आजाद उड़ते देखना उसका मुख्य शगल बन गया था ! गुब्बारेवाला शम्भू भी अब मिनी को पहचानने लगा था ! यदि काम के बोझ या और किसी कारण विजय बाबू एक-दो दिन टहलने नहीं जा पाते तो वह खुद मिनी को गुब्बारे देने पहुंच जाता और पैसे ना लेने की भी भरसक कोशिश करता ! मिनी में उसे सुदूर बिहार के गांव में माँ के साथ रहती, मिनी की उम्र की अपनी बेटी सुरसतिया की झलक दिखने लगी थी ! 

अस्सी के दशक में बेरोजगारी और भुखमरी से तंग आ, अपनी बीवी परवतिया और बच्ची सरस्वती को गांव में ही छोड़ काम की तलाश में शम्भू कलकत्ता चला आया था। वहां पहले से कार्यरत जान-पहचान के लोगों की मदद से उसे भी एक जूट मील में नौकरी भी  मिल गई थी ! मेहनती बंदा दो-दो पालियों में काम करने लगा ! सोच रखा था कि कुछ पैसा इकट्ठा हो जाने पर सुरसतिया और उसकी माँ को यहीं बुलवा लेगा ! समय निकलता गया पर उसका परिवार के संग रहने का सपना पूरा नहीं हो पाया ! कुछ ना कुछ अड़चन आ ही जाती थी ! इसी बीच पूर्वाग्रही नेताओं, जन विरोधी विचारधाराओं और भ्रष्ट राजनीती के घालमेल के चलते फैक्ट्रियां बंद होने लगीं ! हजारों मजदूर सड़कों पर आ गए ! रहने-खाने का ठिकाना ना रहा ! 

गाज  शम्भू पर भी गिरी ! नौकरी छूटने पर उसने बहुत हाथ-पांव मारे, बहुत कुछ कर के देखा पर सफलता नहीं मिली ! गांव जाने का कोई मतलब ही नहीं था ! वहां ज़रा सा भी उपार्जन हो पाता तो परिवार छोड़ वह शहर ही क्यों आता ! हार कर उसने रिक्शा चलाना शुरू किया ! हालांकि दौड़ती भागती जिंदगी में जल्दी पहुंचने के लिए लोग रिक्शे की बजाए ऑटो को प्राथमिकता देते थे, पर फिर भी हाड-तोड़ मेहनत से किसी तरह दो वक्त की रोटी का जुगाड़ हो ही जाता था ! पर भगवान को शायद शम्भू की निश्चिंतिता भाती ही नहीं थी ! इसी कारण उसकी प्रतिद्वंदिता में ई-रिक्शा ने सड़क पर आ उसकी कमर ही तोड़ दी ! जो बीस-पचास की आमदनी होती भी थी वह भी तक़रीबन बंद हो गई ! रिक्शे का रोज का किराया तक निकलना दूभर हो गया ! लिहाजा यह काम भी छोड़ना पड़ा ! पैसे की आवक बिलकुल ख़त्म हो गई ! एक तो गांव परिवार की चिंता दूसरे यहां खुद की जान की भी फ़िक्र ! शम्भू के लिए जीना मुहाल हो गया ! वह तो बासे में संगी-साथी किसी तरह मिल बांट कर गुजारा कर रहे थे, नहीं तो पता नहीं क्या होता ! 

पर हर रात का सबेरा होता ही है ! शम्भू का एक साथी सड़कों पर गुब्बारे बेचता था वह गांव चला गया और जाते-जाते अपना सारा तामझाम इसे सौंप गया ! धीरे-धीरे जिंदगी मुस्कुराने लगी ! उसी मुस्कराहट को बच्चों के मुख पर कायम रखने के लिए शम्भू ने गुब्बारे बेचने शुरू कर दिए ! हालांकि उपार्जन बहुत कम था पर उसे बच्चों के चेहरों पर मुस्कान देख लगता था कि उसकी सुरसतिया उसके पास खडी मुस्कुरा रही हो ! ऐसे में ही एक दिन उसके कानों में आवाज पड़ी, बाबा ! आमाके बेलून चाई !'' और उसकी सुरसतिया का स्वरूप जैसे उसके सामने खड़ा था ! शुरू में मिनी उससे दूर-दूर रहा करती थी ! पर धीरे-धीरे उसकी शम्भू के साथ अच्छी पटने लगी ! जब वह अपनी कुछ तुतलाती सी बोली में उसे पुकारती, बेलून वाला" तो शम्भू निहाल हो उठता ! उसके उल्टे-सीधे सवालों का वह भी वैसे ही जवाब देता, तो वह हंसती हुई विजय बाबू को बतलाती, बाबा शोंभू एक्के-बारे बोका, किछु जाने ई ना !'' इधर शम्भू की तो जैसे जिंदगी ही बदल गई थी, मिनी में अपनी सुरसतिया को पा कर वह निहाल हुए जाता था ! परिवार से दूरी का गम कुछ हद तक कम हो चला था ! पर उसे क्या पता था कि उसकी जिंदगी में ऐसा उलटफेर होने वाला है, जिससे सब कुछ तहस-नहस हो जाएगा ! जिंदगी तबाह हो कर रह जाएगी ! 

एक दिन मिनी उससे गुब्बारे ले घर की ओर जा ही रही थी कि एक तेज रफ़्तार कार उसके सर तक आ पहुंची ! शम्भू ने तुरंत बिना देर किए छलांग लगा, मिनी को अपने सीने से चिपटा सड़क पर कलाबाजी खा, उसे सुरक्षित बचा लिया ! मिनी को जरा सी खरोंचें आईं पर  शम्भू कार की जद में आ पीठ, कंधें और सर पर चोट लगवा बैठा ! इतने में कार सामने की दिवार से टकरा कर रुक गई ! चोटिल होने के बावजूद शम्भू ने युवक कार चालक को पकड़ उसकी धुनाई कर दी ! युवक राजाबाजार के बाहुबली का एकलौता बिगड़ैल बेटा था ! एकत्रित भीड़ के सामने एक सामान्य से फेरी वाले से मार खा वह बेहद अपमानित महसूस कर रहा था। आवेग में उसने  पिस्तौल निकाल शम्भू पर तान दी ! इसके पहले की गोली चले  शम्भू ने झपट कर उसे हाथों में उठा पटक दिया ! शम्भू की बदकिस्मती युवक का सर पत्थर से टकरा कर तरबूज की तरह खुल गया, उसने वहीं दम तोड़ दिया। 

डरी, सहमी, सदमे में घिरी मिनी को गोद में उठा शम्भू ने उसके घर पहुंचाया और फिर थाने जा कर आत्मसमर्पण कर दिया ! विजय बाबू ने बाहुबली के रसूख की परवाह किए बगैर  शम्भू का केस लड़ा ! कई दिनों तक जिरह चली ! तरह- तरह के प्रमाण पेश किए गए, पर अपनी लाड़ली बिटिया की जान बचाने वाले को विजय बाबू आजीवन कारावास की सजा से ना बचा पाए !  बीस साल के लिए शम्भू को अलीपुर जेल भेज दिया गया ! विजय बाबू के मन में यह अपराध बोध घर कर गया कि उनकी बेटी के कारण एक सीधे-साधे इंसान को इतनी बड़ी सजा भोगनी पड़ रही है !

समय अपनी चाल चलता रहा ! विजय बाबू की सहधर्मिणी निर्मला देवी का देहावसान हो गया उसके बाद से ही उन्होंने ने भी कोर्ट-कचहरी जाना बहुत कम कर दिया ! अब वे कुछ चुनिंदा केस ही हाथ में लेते थे ! मिनी पढ़-लिख कर बैंगलोर की एक कंपनी में, वहीं रह कर इंटर्नशिप करने लग गयी थी ! विजय बाबू और घर की सारी जिम्मेदारी अब पुराने घरेलू सहायक भोला काका पर आ पड़ी थी । मिनी तक़रीबन रोज ही विडिओ कॉल कर अपने बाबा के हाल की जानकारी ले भोला काका को जरुरी हिदायतें देती रहती थी ! 

एक दिन ढलती दोपहर में मुख्य द्वार की घंटी बजी ! इस समय कौन हो सकता है, ऐसा सोचते हुए भोला काका ने दरवाजा खोला तो सामने एक अजनबी को ऑटो रिक्शा में बैठे पाया ! उस आदमी ने एक कागज़ का टुकड़ा भोला काका की तरफ बढ़ाया, जिसमे इसी जगह और घर का पता लिखा हुआ था ! कुछ समझ ना पाने की दशा में भोला काका ने विजय बाबू को खबर की ! विजय बाबू बाहर आए, दो क्षण अजनबी को देखा और बोल पड़े, अरे शम्भू तुम !'' आओ, आओ !''

तब तक भोला काका के मष्तिष्क पर से भी अठ्ठारह साल की जमी धुंध छंट गई थी और चेहरे पर पहचान के भाव आ गए थे ! शम्भू को सहारा दे कर अंदर ले आया गया ! कुछ देर बाद प्रकृतिस्थ हो जाने के बाद शम्भू ने जो आपबीती सुनाई वह किसी का भी दिल दहला देने के लिए काफी थी ! गांव में किसी तरह मेहनत-मजदूरी कर दिन गुजारती उसकी पत्नी और बेटी पर कुदरत का कहर टूटा ! कोरोना की चपेट में आ दोनों शम्भू से सदा के लिए दूर चली गईं ! इतना ही नहीं इस बार की भयकंर बाढ़ ने पूरे इलाके को जलमग्न कर दिया ! बाढ़ की विकराल लहरों ने उसके झोपड़ीनुमा घर को मटियामेट कर डाला ! जो थोड़ी बहुत जमीन थी वह पानी से बर्बाद हो गई ! किसी भी चीज का नामोनिशान तक नहीं बचा ! 

अच्छे चालचलन और नेक व्यवहार के चलते शम्भू की सजा के दो साल कम कर उसे रिहा कर दिया गया ! पर रिहा होने के बाद वह कहां जाए, क्या करे, उसे कुछ भी समझ नहीं आ रहा था ! इस महानगर में इतने साल गुजारने के उपरांत भी वह अभी भी अजनबी सा ही था ! ना किसी से जान-पहचान, ना दोस्ती ना संबंध ! बिलकुल अकेला ! केस के चलते उसे सिर्फ विजय बाबू का नाम और पता मालुम था ! सो संकोच और झिझक के बावजूद वह यहां चला आया ! इसके अलावा और कोई उपाय या रास्ता भी तो नहीं था, उसके पास ! अब जैसा वे कहें, राह दिखाएं, सलाह दें, वैसा ही वह करेगा ! विजय बाबू सर झुका, गहन चिंता में डूब, गंभीर हो गए ! सोच रहे थे, एक भले और नेक इंसान को भगवान एक के बाद एक लगातार इतने सारे कष्ट क्यूँ देता चला जा रहा है ! किसी की भलाई करने का बदला भी दंडस्वरूप मिला ! किसी की बेटी की जान बचाई तो अपना परिवार खो दिया ! किसी उदण्ड का विरोध किया तो सजा हो गई ! पूरी जिंदगी अपनों से दूर, काल कोठरी में रहने को बाध्य होना पड़ा ! हे ईश्वर ! यह तेरा कैसा न्याय है !  

कुछ देर के चिंतन के पाश्चात्य विजय बाबू ने अपना सर उठाया ! भोला और शम्भू की तरफ देखा ! फिर धीर-गंभीर स्वर में अपना फैसला सुना दिया, आज से शम्भू इसी घर में रहेगा, ताउम्र, परिवार का सदस्य बन कर ! इस पर कोई ना-नुकुर नहीं ! कोई सवाल-जवाब नहीं ! यह मेरा एकमात्र और अंतिम फैसला है ! यह सुन शम्भू जरूर कुछ सकुचाया सा दिख रहा था पर भोला काका ने तुरंत उसका नहीं के बराबर जो कुछ भी असबाब था, एक कमरे में ले जा कर रख दिया ! शम्भू को मुंह-हाथ धोने के लिए भेज, विजय बाबू ने भोला काका को हिदायत दी कि इस बारे में अभी मिनी को कुछ भी ना बतलाया जाए ! 

विजय बाबू वर्षों से दिल पर जो एक बोझ लिए सदा तनावग्रस्त रहते हुए दिन बिता रहे थे ! उन्हें यही लगता था कि शम्भू उनकी बेटी के कारण जेल भुगत रहा है ! कहीं ना कहीं उसकी सजा में वे खुद को दोषी पाते थे ! पर कुछ ना कर पाने की स्थिति में उन्होंने अकेलापन ओढ़ लिया था ! भोला काका से भी सिर्फ मतलब और जरुरत भर की ही बात होती थी ! पूरे समय घर में चुप्पी ही पसरी रहती थी ! पर शम्भू के आ जाने से घर में थोड़ी जीवंतता आ गई थी ! विजय बाबू और भोला को भी एक और बात करने वाला मिल गया था ! आपस में बातचीत होने से घर का माहौल भी खुशनुमा रहने लगा था ! विजय बाबू को लगता था जैसे उनके दिलो-दिमाग से कोई भारी बोझ उतर ! अपने में फर्क महसूस होने लगा था ! अब वे घर में बातचीत में तो शामिल होते ही थे शाम को शम्भू को साथ ले टहलने भी जाने लगे थे ! उधर मिनी इन सब घटनाओं से अनजान काम की अत्यधिक व्यस्तता के कारण घर नहीं आ पा रही थी !   

समय के पास तो कभी अपने लिए भी समय नहीं होता ! ऐसे ही दिन-हफ्ते-महीने बीतते चले गए ! और देखते-देखते दुर्गोत्सव का पर्व आ पहुंचा ! मिनी का भी संदेश आ गया था कि तीन दिन बाद वह छुट्टियों में घर आ रही है ! एक बार तो विजय बाबू आने वाले घटना चक्र का अंदाजा लगा सोच में पड़ गए ! पर अगले ही क्षण उन्होंने सब कुछ ''माँ'' पर छोड़ दिया !  जैसी जगत्जननी की इच्छा ! वह जैसा चाहेगी वैसा ही होगा ! जैसे रखना चाहेगी वैसे ही रहेंगे ! 

निश्चित दिन मिनी का आगमन हुआ ! प्रभुएच्छा से घर के अंदर आते ही उसका सामना शम्भू से हो गया ! पहले उसने सोचा बाजार से कोई कुछ देने आया होगा ! पर उसे वही बने रहे देख, उसने विजय बाबू से पूछा, बाबा ये कौन ?'' विजय बाबू बोले, बाहर से आई हो, पहले नहा-धो कर फ्रेश हो जाओ ! फिर डाइनिंग टेबल पर बैठ इत्मीनान से सब कुछ बताता हूँ !''

मिनी अंदर चली तो गई पर उसे गुस्सा आ रहा था कि उसके दरियादिल बाबा पता नहीं किस ऐरे-गैरे को घर ले आए हैं ! भोला काका को कितना समझाया था ! पर वह कुछ नहीं बोले ! मुझे बताया तक नहीं ! देखती हूँ उनको भी ! पता नहीं किस दुनिया में जीते हैं ये लोग ! आज का समय क्या किसी पर विश्वास करने है ! कोई कुछ भी कर चलता बना रह सकता है ! इन्हें तो समझ ही नहीं है ! इसी उधेड़बुन में नहा कर वापस आ देखा तो वही अजनबी ममत्व, वात्सल्य, स्नेहिल निगाहों से उसे तकता बाबा के साथ ही बैठा हुआ था ! एक बार तो मिनी का पारा एकदम चढ़ गया पर फिर उसने किसी तरह अपने पर काबू पा जिज्ञासा और जवाब तलब करने वाली निगाहों से अपने बाबा को देखा ! 

विजय बाबू बोले, आओ, बैठो ! यह शम्भू काका हैं !  प्रणाम करो !''

ना चाहते हुए भी मिनी ने हाथ जोड़ प्रणाम किया ! शम्भू ने आशीर्वाद दिया ! लम्बी उम्र की आशीष दी ! विजय बाबू बोले परिचय कहां से शुरू करुं, समझ नहीं आ रहा ! अच्छा बेटा ! तुम्हें अपने बचपन में किसी गुब्बारे वाले की याद है ?'' मिनी अंदर से कुछ चिढ सी गई, उसे लगा बाबा बात घुमाने की कोशिश कर रहे हैं ! पर प्रत्यक्ष में बोली, मुझे कुछ याद नहीं है !'' 

विजय बाबू ने गहरी सांस ली और धाराप्रवाह अठ्ठारह सालों का सारा विवरण मिनी को सुना दिया ! कथा के आज वर्तमान तक आते-आते विजय बाबू का गला रुंध गया था ! कमरे में पूरी तरह खामोशी फैली हुई थी ! चारों प्राणियों की आँखों से अविरल अश्रु धारा बहे चली जा रही थी ! पता नहीं कितनी देर ऐसे ही सब बैठे रहे ! फिर मिनी उठी और शम्भू काका के पैरों में झुक गई ! शम्भू अचकचा कर उठ खड़ा हुआ, बोला, ना बिटिया ना ! हमारी तरफ बेटी से पांव नहीं झुवाते !''  फिर मिनी के सर पर हाथ फेरते हुए असंख्य आशीषें दे डालीं ! 

छुट्टियों के बाद काम पर लौटते समय मिनी निश्चिन्त थी, अपने बाबा की तरफ से ! उसे इत्मीनान हो गया था कि उसके घर पर ना रहने पर भी बाबा की देख-भाल के लिए उनके एक बड़े भाई को भगवान ने शम्भू के रूप में भेज दिया है !

मंगलवार, 14 सितंबर 2021

हिंदी, अपनाना है तो दिल से अपनाएं

ठीक है अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। पर उसके कारण, अकारण ही हम अपनी भाषा को हीन समझते हैं, उसे दोयम दर्जे की मान लेते हैं ! दुःख तो तब होता है जब सिर्फ हिंदी के कारण विख्यात होने वाले, इसी की कमाई खाने वाले कृतघ्न, कोई मंच मिलते ही अंग्रेजी में बोलना शुरू कर देते हैं। शायद उनके कम-अक्ल दिमाग में कहीं यह हीन भावना रहती है कि हिंदी में बोलने से शायद उन्हें गंवार ही न समझ लिया जाए.............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 
14 सितम्बर, हिंदी दिवस। अपनी राष्ट्र भाषा को संरक्षित करने के लिए, उसकी बढ़ोत्तरी, उसके विकास के लिए मनाया जाने वाला दिन। पर मेरे लिए इस दिन की शुरुआत ही बड़ी अजीब रही ! अभी अपने संस्थान पहुंचा ही था कि एक छात्रा सामने पड़ गयी। छूटते ही बोली, हैप्पी हिंदी डे सर  ! मैं भौंचक, क्या बोलूँ क्या न बोलूँ ! सर हिला कर आगे बढ़ गया। पर दिन भर दिमाग इसी में उलझा रहा कि क्या हम सचमुच अपनी भाषा का आदर करते हैं ? क्या हमारी दिली ख्वाहिश है की हिंदी आगे बढे ! इसे विश्व परिदृश्य में सम्मान मिले ! इसकी एक समृद्ध भाषा के रूप में पहचान बने ? या फिर इस एक दिन की नौटंकी सिर्फ औपचारिकता पूरी करने के लिए वातानुकूलित कमरों में बैठ सिर्फ सरकारी पैसे का दुरुपयोग करने के लिए की जाती है ?  
शिखर की  दस भाषाओं  ने विश्व की करीब 40 प्रतिशत आबादी  को समेट रखा है। उन दस  भाषाओं  में  हमारी हिंदी  तीसरे स्थान पर  है। उसके  आगे  सि र्फ चीन की मैंड्रीन पहले नम्बर पर तथा दूसरे नम्बर पर अंग्रेजी है। इन आंकड़ों से हिंदी की अहमियत  को अच्छी तरह समझा जा सकता है
संसार भर में करीब 7000 भाषाएं बोली जाती हैं। जिनमें करीब 1700 को बोलने वाले 1000 से भी कम लोग हैं। कुछ तो ऐसी भाषाएं भी हैं जिन्हें 100 या उससे भी कम लोग बोलते हैं। करीब 6300 अलग-अलग भाषाओं को एक लाख या उससे अधिक लोग बोलते हैं।  जिसमें शिखर की 150-200 ही ऐसी भाषाएं हैं जिन्हें दस लाख या उससे ज्यादा लोग प्रयोग करते हैं। ऐसा कहा जा सकता है की 7000 में से सिर्फ 650-700 भाषाओं को पूरे विश्व की 99.9 प्रतिशत आबादी बोलती है। इसमें भी शिखर की दस भाषाओं ने विश्व की करीब 40 प्रतिशत आबादी को समेट रखा है। उन दस भाषाओं में हमारी हिंदी तीसरे स्थान पर है। उसके आगे सिर्फ चीन की मैंड्रीन पहले नम्बर पर तथा दूसरे नम्बर पर अंग्रेजी है। इन आंकड़ों से हिंदी की अहमियत अच्छी तरह समझी जा सकती है। 

हिंदी हमारी संस्कृति की संवाहक है ! अंदाजन जिसे 45 से 50 करोड़ लोग आपस में संपर्क करने के लिए काम में लाते हैं। अपने देश में कुछ हठधर्मिता, कुछ राजनीतिक लाभ के कारण इसके विरोध को छोड़ दें, तो यह पूरे देश की संपर्क भाषा है। यह हमारा दुर्भाग्य ही कहा जाएगा कि ऐसी भाषा के संरक्षण के लिए हमारे देश में दिन निर्धारित किया जाता है। हम उसके लिए सप्ताह या पखवाड़ा मना, अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेते हैं। वह भी तब जबकि इसका "ग्रामर" पूर्णतया तर्कसम्मत है। बोलने में जीभ को कसरत नहीं करनी पड़ती। इसकी विशेषता है कि इसे जैसा लिखा जाता है वैसा ही पढ़ा भी जाता है। इतना सब होते हुए भी हमारी मानसिकता ऐसी हो गयी है कि हम इसे इसका उचित स्थान और सम्मान नहीं दिला पा रहे। विडंबना है की इतनी समृद्ध भाषा के लिए भी हमें दिन निश्चित करना पड़ता है। जबकि तरक्कीशुदा देशों में इसकी अहमियत पहचान, इसे सम्मान का दर्जा दिया जा रहा है।
ठीक है अंग्रेजी का महत्व अपनी जगह है। पर उसके कारण, अकारण ही हम अपनी भाषा को हीन समझते हैं, उसे दोयम दर्जे की समझते हैं। दुःख तो तब होता है जब सिर्फ हिंदी के कारण विख्यात होने वाले, इसी की कमाई खाने वाले कृतघ्न कोई मंच मिलते ही अंग्रेजी में बोलना शुरू कर देते हैं। शायद उनके कम-अक्ल दिमाग में कहीं यह हीन भावना रहती है कि हिंदी में बोलने से शायद उन्हें गंवार ही न समझ लिया जाए।

दुनिया के दूसरे देशों रूस, चीन, जापान, फ्रांस, स्पेन आदि से हमें सबक लेना चाहिए जिन्होंने अपनी तरक्की के लिए दूसरी भाषा को सीढी न बना अपनी भाषा पर विश्वास रखा और दुनिया में अपना स्थान बनाया। 

@सभी चित्र अंतर्जाल के सौजन्य से   

सोमवार, 13 सितंबर 2021

बाथरूम सिंगिग का भी एक घराना होना चाहिए

फिल्म  "पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर "बाथरूम सिंगिंग" यानि हमाम गायिकी के विषय को छुआ गया था, पर  उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी।  हालांकि उस पात्र ने इस कला को जीवित रखने के लिए अपने बेटे को भी इस विधा में प्रशिक्षित करने की कोशिश की थी ! पर हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-मग्गे से नहाते समय  गायक का ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे  को साधने में ही अटका रहता है, जिससे सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती अनवरत जल-राशि से ही बनती है ...........!


#हिन्दी_ब्लागिंग  
बहुत दिनों से एक सोच आ-आ कर टक्करें मार रही थी कि हमाम गायिकी यानी बाथरूम सिंगिंग का भी एक घराना जरूर होना चाहिए था। गायिकी के घरानों की बात करें तो देश में ऐसे पच्चीस-तीस घराने ही तो होंगे, जहां अत्यंत उच्च कोटि का गायन सिद्धहस्त गुरुओं और उस्तादों द्वारा मनोयोग से सिखाया जाता रहा है। वहां प्रवेश मिलना तो दूर उसके लिए सोचने की भी ख़ास योग्यता की जरुरत होती है। गुरु और शिष्य तन, मन और पूरी निष्ठा से सुरों को साधने में वर्षों लगा देते हैं। इसीलिए वहां से हीरे ही निकलते भी हैं। पर कितने ! पांच हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार  !! पर मुद्दा यह है कि दुनिया को सिर्फ डॉक्टर ही थोड़े चाहिए होते हैं ! सहायक, नर्सें, वार्ड-ब्वाय भी तो उतने ही जरुरी होते हैं ! इसीलिए यह सोच बार-बार जोर मार रही थी कि एक अदद ऐसा घराना भी होना चाहिए था, जो काश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से आसाम तक पाए जाने वाले उन लाखों-लाख 'सुरतालयों' को, जिन्होंने अपनी संगीत साधना से गली-मौहल्ले तक को सराबोर कर रखा हो, एक जगह इकट्ठा कर उन्हें अपना नाम दे उनकी पहचान बनवा सकने में सहायक होता। 
ये सुरताले वे कलाकार हैं जो देश के हर हिस्से में पाए जाते हैं। इनमें गायन की जन्मजात प्रतिभा होती है। इनका पहला क्रंदन भी सुर से भटका नहीं होता, जिसकी गवाह उस समय इनके पास खड़ी दाई या नर्स हो सकती है। ऐसे स्वयंभू गायकों के लिए भाषा भी कोई बाधा नहीं होती। ये गायन की हर विधा और भाषा पर अपनी पकड़ बना लेते हैं। पर इनके साथ विडंबना यह होती है कि जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ती है, वैसे-वैसे इनकी प्रतिभा तो फैलती जाती है यानि उस समय का हर दिग्गज गायक इनकी नक़ल के सामने बौना होता जाता है ! पर इनका खुद का भौतिक दायरा छोटा होता जाता है और ये घर के एक कमरे में, जिसे स्नानागार कहते हैं, सिमट कर रह जाते हैं। जी हाँ, उन्हीं हजारों-लाखों 'बाथ रूम सिंगर' की बात हो रही है जिन्हें देश कभी पहचान नहीं पाया। इसीलिए इनको एक ऐसे मंच की जरुरत है जो इन्हें दरवाजे की कड़ी-चिटकनी के लगे होने ना होने की आशंका और उस पर बाहर इंतजार करते लोगों की थपथपाहट को नजरंदाज कर सिर्फ अपने आलाप को पूरी कॉलोनी में प्रसारित करने की फिक्र हो ! सुर तो इनका हर देशी-विदेशी धुन को साधने में सिद्धहस्त होता है, इनको तो सिर्फ यह सिखाने की जरुरत है कि नहाते समय पानी कहाँ और कैसे डालें जिससे आरोह-अवरोह में सामंजस्य बना रहे !
एकाध बार इन्हें पहचान दिलाने की अधकचरी कोशिश हुई भी, जैसे फिल्म "पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार जी द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर 'बाथरूम सिंगिंग' यानि  'हमाम गायिकी' के विषय को छुआ गया था, पर वह मूल मुद्दे से भटक एक हास्य दृश्य बन कर रह गया। उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी। हालांकि उस पात्र ने इस कला को जीवित रखने के लिए अपने बेटे को भी इस विधा में प्रशिक्षित करने की कोशिश की थी !  पर हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-लोटे या मग्गे से नहाते समय गायक का ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे-मग्गे को साधने में ही अटका रहता है ! जिससे सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती जल-राशि से ही बनती है।  
गाने और पानी का सदियों से नाता रहा है या यूं कहिए पानी की कलकल ध्वनि ने गायन की विधा को ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान दिया है। अब सागर, नदियां, सरोवर तो वैसे रहे नहीं कि उनके किनारे सुर साधे जा सकें ! ले-दे कर स्नानगृह ही ऐसी जगह बची है जहां कुछ-कुछ पानी भी है, कुछ-कुछ तन्हाई भी और कुछ-कुछ फुर्सत भी, जिसे दिल ढूँढ़ता रहता है। इसीलिए इसी कुछ-कुछ में बहुत कुछ ढूंढते इन अंजान कलाकारों को कोई तो ठीहा मिलना ही चाहिए ! तो क्या ऐसा लगता नहीं कि इन बहुआयामी कलाकारों को भी हक़ है अपनी पहचान बनाने का, अपनी कला को निखारने का, अपनी निश्छल सेवा भावना के बदले समाज से कुछ पाने का, अपना घराना बनवाने का !!  क्योंकि ये वे कलाकार हैं जो अपनी कला से प्यार करते हैं पर उस कला की मेहरबानी इन पर कभी नहीं होती।  

सोमवार, 6 सितंबर 2021

आसान नहीं है, किसी अवतार का अवतरित होना

प्रभु का मनुष्य रूप धारण करना प्रकृति की कोई छोटी-मोटी घटना नहीं होती ! हजारों-लाखों साल में कभी एक बार धरा को संतुलित करने के लिए परमेश्वर को इस तरह का गंभीर उपक्रम करना पड़ता होगा ! बहुत सारे नियम-कायदे-नीतियों-रीतियों के विश्लेषण के उपरांत, ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण सुरक्षा-व्यवस्था, वर्तमान-भविष्य का आंकलन, समय के हर पल का हिसाब करने और पता नहीं कितने अनगिनत उपक्रमों को अंजाम देने के बाद, अवतरण का शुभ मुहूर्त बनता होगा ! परलौकिकता, अलौकिकता और लौकिकता का मेल इतना आसान तो नहीं हो सकता..........! 

#हिन्दी_ब्लागिंग  

मान्यता और विश्वास है कि निरीह, संकटग्रस्त भक्तों की करुण पुकार पर, उनकी रक्षा हेतु प्रभु दौड़े चले आते हैं ! आएं भी क्यूँ ना ! सारा संसार उनकी ही कृति है, प्राणिमात्र उन्हीं की संतान है ! तो पिता अपने बच्चे को कष्ट में कैसे देख सकता है ! हाँ, पुकार सच्ची होनी चाहिए ! निष्कपट, छल-फरेब से दूर, सरल हृदय की ! पर कभी-कभी जड़बुद्धि मानव मष्तिष्क में जिज्ञासा उठ खड़ी होती है कि प्रभु आते कहां से हैं ? क्या एक जीव की पुकार पर करोड़ों-अरबों मील दूर देवलोक से चल कर आते हैं या फिर धरती पर ही सूक्ष्म रूप में सदा विद्यमान रहते हैं ! यदि सूक्ष्म रूप से हमारे पास रहते हैं (मान्यता भी है कण-कण में भगवान) तो हमारी आकाशगंगा और उसके बाहर इस धरा जैसे हजारों-लाखों विश्व और भी बताए जाते हैं, तो क्या सभी जगह उनकी उपस्थिति होती होगी ? हालांकि उनके लिए कुछ भी असंभव नहीं है ! प्रभु के अस्तित्व, उनकी अप्रमेय शक्ति, उनकी अनिर्वचनीय, अगाध, अज्ञेय क्षमता पर किसी भी प्रकार का सवाल या शंका नहीं है ! किसी को होनी भी नहीं चाहिए ! पर फिर भी इतने बड़े ब्रह्मांड के संचालक का जब-तब कहीं भी, सब कुछ छोड़ कर आ जाना, क्या इतना आसान होता होगा ? एक भक्त की करुण पुकार पर व तक पहुंचने के लिए कितना कुछ समायोजित करना पड़ता होगा ! भले ही उनका एक सूक्ष्म पल हमारे सैंकड़ों वर्षों के बराबर ही क्यों ना हो ! 

वर्षों-वर्ष में घटने वाली छोटी-बड़ी घटनाऐं, उनके परिणाम, उनके द्वारा उत्पन्न परिस्थितियां सब एकजुट एक बहुत बड़ा कारण बन जाती हैं, प्रभु के अवतरण का  

हाथी और चींटी की तुलना फिर भी हो जाए पर भगवान और इंसान की तुलना का तो सोचना ही बेमानी और नादानी है ! दिव्य शक्तियों के सामर्थ्य के आंकलन में हमारी कल्पना भी भोथरी हो जाती है ! गति के परिपेक्ष्य में ही देखा जाए तो अभी तक दुनिया में सबसे तेज रफ़्तार प्रकाश की, लगभग एक सेकेण्ड में तीन लाख किमी., ज्ञात है ! हमारे लिए तो वही अद्भुत और सपने में भी अप्राप्य गति है ! मानव यंत्रों की अधिकतम चाल अभी तक सिर्फ सोलह किमी प्रति सेकंड तक ही पहुंच पाई है ! अपनी आकाशगंगा के नजदीकी ग्रहों तक पहुंचने में ही हमें महीनों लग जाते हैं ! यदि मानव अपने सबसे करीबी तारे अल्फा सेंटौरी तक ही जाना चाहे तो अब तक की रफ्तार से वह वहां 6000 साल में पहुंच पाएगा ! 

उधर हमारे ग्रंथों और पुराणों में दिव्य लोकों का जो विवरण है वह तो और भी अद्भुत है ! जिसमें ब्रह्मांड में दस लोकों का विवरण निम्नानुसार दिया गया है ! सबसे ऊपर सत्य लोक उसके बारह करोड़ योजन नीचे तपोलोक इसके आठ करोड़ योजन नीचे महर लोक फिर उसके बाद स्वर्गलोक जो पृथ्वी के बीचोबीच मेरु पर्वत पर अस्सी हजार योजन की ऊंचाई पर स्थित है ! इसके बाद मेहर लोक सेएक करोड़ योजन नीचे ध्रुव लोक फिर उससे एक लाख करोड़ योजन नीचे सप्तऋषियों के रहने का स्थान सप्त ऋषि लोक फिर भूलोक और फिर पाताललोक ! इतनी-इतनी दूरियों को वहां के वासी कैसे नापते होंगे इसका तो हमें दूर-दूर तक कोई अनुमान नहीं है ! फिर भी आना-जाना तो लगा ही रहता होगा ! बिना आपसी तालमेल के इतने बड़े ब्रह्मांड का संचालन कैसे संभव होगा ! कितनी तेजी से चलते होंगे वे लोग ? कितनी रफ़्तार होगी उनकी ? क्या मन की गति से भी तेज ?

प्रभु के ही अनुसार जब-जब धर्म की हानि और अधर्म का उत्थान हो जाता है, तब-तब सज्जनों के परित्राण और दुष्टों के विनाश के लिए मैं विभिन्न युगों में माया का आश्रय लेकर उत्पन्न होता हूँ। ग्रंथों, कथाओं, मान्यताओं या सीधी, सरल दृष्टि से देखा जाए तो प्रभु का सप्तम अवतार श्री राम के रूप में इस धरा पर रावण के संहार के लिए ही हुआ था। पर गहराई से देखा जाए तो बात इतनी सी ही नहीं लगती ! प्रभु का मनुष्य रूप धारण करना प्रकृति की कोई छोटी-मोटी घटना नहीं होती ! हजारों-लाखों साल में कभी एक बार धरा को संतुलित करने के लिए परमेश्वर को इस तरह का गंभीर उपक्रम करना पड़ता होगा ! बहुत सारे नियम-कायदे-नीतियों-रीतियों के विश्लेषण के उपरांत, ब्रह्माण्ड की सम्पूर्ण सुरक्षा-व्यवस्था, वर्तमान-भविष्य का आंकलन, समय के हर पल का हिसाब करने और पता नहीं कितने अनगिनत उपक्रमों को अंजाम देने के बाद, अवतरण का शुभ मुहूर्त बनता होगा ! परलौकिकता, अलौकिकता और लौकिकता का मेल इतना आसान तो नहीं हो सकता !

आम इंसान को अपने देश में ही कहीं छोटे-बड़े प्रवास पर जाना हो तो दस तरह के इंतजाम करने पड़ते हैं ! उसी में वह पस्त हो जाता है। विदेश की तीन-चार हजार की यात्रा के दौरान दो-तीन दिन तो इंसान को ''जेट लैग'' से उबरने में ही लग जाते हैं। निकटतम ग्रह तक जाने में महीनों की मेहनत-मशक्कत, गुणा-भाग करना पड़ता है ! तो लाखों-करोड़ों मीलों का फैसला तय करने में कितनी सावधनियां, एहतियात, पूर्वोपाय व पुर्वोधान करने पड़ते होंगे, उसकी तो हम कल्पना भी नहीं कर सकते ! माना कि वह ईश्वर है ! सक्षम है ! उसके लिए कुछ भी असंभव या अप्राप्य नहीं है ! पर वे भी मर्यादित हैं ! प्रकृति भी उन्हीं की बनाई हुई है ! कायनात के नियम-कानून भी उन्हीं ने तय किए हैं ! तो फिर वे भी उसी के अनुसार ही चलते होंगे !


रामावतार को ही देखें ! यदि रावण वध ही एकमात्र ध्येय होता तो उस समय बहुत से पराक्रमी, महाबली, दुर्धर्ष महावीर योद्धा धरती पर विद्यमान थे ! राजा बलि, सहस्त्रार्जुन, किष्किंधा नरेश बाली तो उसे हरा कर जीवनदान भी दे चुके थे ! इनके अलावा  भगवान परशुराम और हनुमान भी थे जो रावण पर भारी पड़ते थे ! पर यदि ध्यान से प्रभु के धरा पर गुजरे समय का मनन किया जाए तो रावण और उसके साथियों के वध के अलावा अनगिनत ऐसे कार्य संपन्न हुए जिनका परिमार्जन सिर्फ प्रभु द्वारा ही संभव था ! चाहे वह दशरथ जी या अहिल्या को श्राप मुक्त करना हो ! चाहे शबरी का इंतजार खत्म करना हो ! चाहे बाली का उद्धार करना हो ! चाहे सम्पाती और जटाऊ की मुक्ति हो ! चाहे केवट और रीछ-वानरों का सहयोग ले समाज में व्याप्त ऊँच-नीच के भेद-भाव का समापन हो ! चाहे दो विभिन्न संस्कृति के देशों में आपसी भाईचारा और सांमजस्य स्थापित करना हो ! चाहे हनुमानजी और विभीषण के जीवन को सार्थकता प्रदान करनी हो या फिर संसार को पिता-माता के आदर और भातृ प्रेम का संदेश देना हो ! राम ना आते तो कैसे यह सब पूरा होता ! ये मेरे अपने विचार हैं कि वर्षों-वर्ष में घटने वाली छोटी-बड़ी घटनाऐं, उनके परिणाम, उनके द्वारा उत्पन्न परिस्थितियां सब एकजुट एक बहुत बड़ा कारण बन जाती हैं, प्रभु के अवतरण का !

पता नहीं मैं अपनी बात और विचार कहां तक स्पष्ट कर पाया हूँ ! पर जब धरती पर परिस्थितियां अत्यंत जटिल, बेकाबू और प्राणिमात्र के लिए घातक हो उठती हैं ! अभिमान, घमंड, लोभ, भ्रष्टाचार की अति के साथ हैवानियत अपने चरम पर पहुंच जाती है ! मनुष्य खुद को ही भगवान समझने लगता है ! तब धरा का संतुलन बनाए रखने और साथ ही पुण्यात्माओं-धर्मात्माओं को लंबित न्याय दिलाने, उनके कष्टों का परिमार्जन करने हेतु सर्वशक्तिमान को इस धरा पर अवतार लेने के लिए कुछ पलों का समय निकालना ही पड़ता है ! 

गुरुवार, 2 सितंबर 2021

शबरी, जिसने पूरा जीवन प्रभु के इंतजार में गुजार दिया

अपने पिता स्वरूप गुरु के देहावसान के समय शबरी अपने भविष्य को ले कर जब चिंतित हो गईं, तब मतंग ऋषि ने उन्हें समझाया और कहा कि तुम चिंता मत करो, प्रभु खुद श्री राम के रूप में आकर तुम्हारा उद्धार करेंगे ! तुम उनका यहीं पर इंतज़ार करना ! वे तुम्हें खुद ही पहचान लेंगे ! किसी के एक कथन पर अखंड विश्वास कर वर्षों टिके रहना कोई सरल या आसान बात नहीं होती ना ही सबके वश का होता है ! पर वह शबरी ही थी, जिसने अपने पितृतुल्य गुरु पर दृढ विश्वास रखते हुए अपना पूरा जीवन प्रभु का इंतजार करते गुजार दिया............!! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 

एक बार देवराज इंद्र के एक समारोह में भगवान विष्णु भी आमंत्रित थे। जब वे सभा में पधारे तो उनके अप्रतिम तेजोमय रूप को देख सभा की एक अप्सरा अपना आपा भूल, उनको अपलक निहारती ही रह गई ! हांलाकि अप्सराओं के लिए पारिवारिक जीवन निषेद्ध माना गया है पर उसके मन में भगवान विष्णु को ले कर ममता जाग उठी ! उसकी इस अन्यमनस्कता और अपने काम के प्रति लापरवाही को देख देवराज इंद्र ने क्रोध में आ उसे धरती पर मनुष्य योनि में जन्म लेने का श्राप दे दिया ! कालांतर में वह धरती पर जन्म ले एक राजा की परमहिषी नाम की रानी बनी ! पर पूर्व जन्म के सद्कर्मों के कारण वह प्रभु के प्रति अनुराग नहीं त्याग पाई ! उधर उसका पति सत्संग, भजन-कीर्तन और ऋषि-मुनियों की संगत से बहुत दूर रहता था। चिढ थी उसे इन कर्म-कांडों से ! ऐसे में ही एकबार कुंभ के मेले में राजा-रानी दोनों का जाना हुआ ! वहां रानी ने सत्संगों में होते भजन-कीर्तन को सुन, राजा से वहां जा कर ऋषि-मुनियों के प्रवचन सुनने की इच्छा प्रकट की ! राजा ने यह कहते हुए मना कर दिया कि आप इतने बड़े कुल की रानी हैं, आपका इस तरह आम लोगों में उठाना-बैठना उचित नहीं है ! जब काफी बहस के बाद भी राजा ने इजाजत नहीं दी तो रानी परमहिषी ने दुखी हो, रात में नदी तट पर जा माँ गंगा से प्रार्थना की कि मुझे अगले जन्म में सामान्य और निर्धन ही बनाना जिससे मैं प्रभु की भक्ति कर उनकी कृपा पा सकूँ ! इतना कह उन्होंने जल समाधि ले ली !

शबरी धाम दक्षिण-पश्चिम गुजरात के डांग जिले के आहवा गांव से 33 किलोमीटर और सापुतारा नगर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर सुबीर गांव के पास स्थित है। माना जाता है कि शबरी धाम वही जगह है जहां शबरी और श्री राम की भेंट हुई थी

समय बीतता गया ! अभी रामावतार में कुछ समय शेष था ! तभी रानी परमहिषी का जन्म भील जाति के शबर नामक एक कबीले के मुखिया के घर में हुआ। उनके पिता का नाम अज और माता का नाम इंदुमती था। कन्या का नाम श्रमणा रखा गया। शबर कबीले की होने के कारण उसे शबरी भी कहा जाने लगा। बचपन से ही श्रमणा को पशु-पक्षियों का सानिध्य बहुत भाता था। वह उनसे बहुत प्रेम करती थी। उनकी किसी भी तरह की दुःख-तकलीफ से व्यथित हो जाती थी। उसकी बातों में कभी-कभी वैराग्य की झलक भी मिल जाती थी ! माता-पिता के लिए यह चिंता और भीलों के लिए यह कुछ आश्चर्य की बात थी।

शबरी के बड़े होने पर उसका विवाह एक भील कुमार से तय कर दिया गया। विवाह के इंतजाम के तहत, उस समय की भील प्रथा के अनुसार, राजा अज और भीलरानी इन्दुमति ने विवाह भोज के लिए बहुत सारे पशु-पक्षियों को एकत्र कर एक बाड़े में बंद कर दिया। इतने जानवरों को एक साथ देख शबरी के जिज्ञासावश इसका कारण पूछने पर उसे बताया गया कि सब तुम्हारे विवाह की दावत के लिए हैं ! तुम्हारे विवाह के दिन इनकी बलि दे भोजन तैयार किया जाएगा ! 

नवधा भक्ति उपदेश 
शबरी (श्रमणा) को यह बात बिल्कुल ठीक नहीं लगी। उसने निश्चय कर लिया कि यदि मेरे विवाह के लिए इतने जीवों को प्राण त्यागने पड़ेंगे तो मैं विवाह ही नहीं करुंगी ! उसने रात्रि में सभी पशु-पक्षियों को बाड़ा खोल कर आजाद कर दिया। पर उसे ऐसा करते एक रखवाले ने देख लिया ! कहीं वह सबको यह बात बता ना दे इस आशंका से शबरी डर गई और वहां से भाग गई। चलते-चलते वह ऋष्यमूक पर्वत तक जा पहुंची, जहां हजारों ऋषियों का निवास था। शबरी बात खुलने के डर और कुछ संकोच के कारण वहां छुप कर रहने लगी। इसी दौरान वह ऋषियों के आने-जाने वाले मार्ग को कंटक विहीन कर, चुपचाप उनके लिए हवन की सूखी लकड़ियों का भी इंतजाम कर देती। पहले तो ऋषियों को इस परिवर्तन का कोई कारण समझ नहीं आया पर एक दिन उन्होंने शबरी को पकड़ ही लिया ! पर उसकी सरलता, सेवा भावना और दयालुता से प्रभावित हो मतंग ऋषि ने उसे अपनी बेटी स्वरूप मान अपने आश्रम में रहने का स्थान दे दिया।

शबरी धाम 
समय अपनी चाल चलता रहा ! मतंग ऋषि बूढ़े हो गए और एक दिन उन्होंने अपनी देह छोड़ने की इच्छा जाहिर कर दी ! यह सुनते ही अपने भविष्य को ले शबरी चिंतित और दुखी हो गई ! उसने अपने पितृ स्वरूप ऋषि मतंग से कहा कि आप मुझे छोड़कर चले जाएंगे तो मेरा क्या होगा ! ऋषि ने उसे समझाते हुए कहा कि जो भी प्राणी इस नश्वर संसार में आता है उसे एक ना एक दिन जाना ही पड़ता है ! वैसे तुम किसी भी तरह की चिंता मत करो, तुम्हारा ख्याल प्रभु राम रखेंगे ! तब तक शबरी को श्री राम के बारे में कुछ पता नहीं था ! उसने पूछा श्री राम कौन हैं और मैं उन्हें कहां खोजूंगी ? ऋषि ने उसे सांत्वना दी और कहा, तुम्हें कहीं जाने की आवश्यकता नहीं है। तुम यहीं रह कर उनकी प्रतीक्षा करो। वे स्वयं तुम्हारे पास चल कर आएंगे ! कब आएंगे यह नहीं बता सकता पर आएंगे जरूर इसका विश्वास रखना !

शबरीनारायण मंदिर, 36गढ़ 
शबरी को अपने पितातुल्य गुरु पर पूर्ण और अटल विश्वास था ! उसी दिन से वह श्री राम का इंतजार करने लगी ! प्रभु कब आ जाएं इसका पता नहीं था, इसलिए वह रोज ही फल-फूल ले उनके स्वागत के लिए तैयार रहती। पर प्रतीक्षा ख़त्म होने को ही नहीं आती थी ! प्रभु की बाट जोहते-जोहते शबरी बूढी हो गई ! फिर एक दिन अचानक शबरी के वर्षों का इंतजार खत्म हुआ ! सीता जी की खोज में निकले श्री राम और लक्ष्मण दोनों उसकी कुटिया पर पधारे ! शबरी भावविह्वल हो समझ ही नहीं पा रही थी कि उनका स्वागत कैसे करे ! शरीर सिहर-सिहर जा रहा था ! आँखें आसुओं से धुंधली हुए जा रहीं थी ! उस दिन वह प्रभु के भोग के लिए बेर लाई हुई थी ! उसे डर था कि कहीं बेर खट्टे ना हों सो वह उन्हें चख-चख कर दोनों भाइयों को अर्पण किए जा रही थी ! अपने वात्सल्य और सरलता के वशीभूत उसे फलों के जूठा होने का गुमान भी नहीं हो रहा था। प्रभु भी उसके ममतामय मातृभाव प्रेम में भीगते हुए बेर खाते चले जा रहे थे। इस प्रकार सैंकड़ों वर्ष पूर्व कहीं दूर, दूसरे संसार में अपने भक्त के मन में उपजी एक कामना को भक्तवत्सल प्रभु ने इस धरा पर आ पूरा किया ! क्या इसी के लिए तो प्रभु ने मानवातार नहीं लिया था ? क्या रावणवध एक निमित मात्र तो नहीं था शबरी के उद्धार हेतु ? जो भी हो शबरी के वर्षों का इंतजार खत्म हुआ ! वह धन्य हुई ! तत्पश्चात श्री राम को पंपा सरोवर का मार्गदर्शन और हनुमान जी से मिलवाने का कर्तव्य पूर्ण कर योगाग्नि द्वारा अपना शरीर त्याग, प्रभु के चरणों में ही लीन हो गई !

पंपा सरोवर 
शबरी धाम दक्षिण-पश्चिम गुजरात के डांग जिले के आहवा गांव से 33 किलोमीटर और सापुतारा नगर से लगभग 60 किलोमीटर की दूरी पर सुबीर गांव के पास स्थित है। माना जाता है कि शबरी धाम वही जगह है जहां शबरी और श्री राम की भेंट हुई थी। शबरी धाम अब एक धार्मिक पर्यटन स्थल का रूप लेता जा रहा है। देश के अन्य भागों में भी शबरी माता के स्मृति चिन्ह उपलब्ध हैं। उनकी याद में फाल्गुन माह के कृष्ण पक्ष की सप्तमी तिथि को शबरी जयंती के रूप में भक्ति और मोक्ष के प्रतीक का पर्व मानकर बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। मान्यता है कि इसी दिन माता शबरी को उनकी भक्ति के परिणामस्वरूप मोक्ष मिला था। 

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