pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 10 जनवरी 2020

पंजाब के नीम-पंडत

इन सब आयोजनों में जैसे खाना-पीना और चाय वगैरह होता है, वैसे ही घंटे भर के लिए ''पंडत जी'' का प्रवचन ! पंजाब भी विदेश बन गया है ! जैसे विदेशों में बसे प्रवासियों को अपने धार्मिक कार्यों के लिए एक अदद संस्कृत उवाचने वाले की जरुरत पड़ती है और उसके लिए कई ''रसूख'' वाले यहां से निर्यात हो चुके हैं, वैसे ही पंजाब के भीतरी हिस्सों में बसे इलाकों में तथाकथित पंडित आयात हो चुके हैं। जो अपनी वाक्पटुता से वहां के लोगों को प्रभावित कर लेते हैं .................! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हिंदू धर्म में किसी की मृत्युपरांत भी बहुत से कर्मकांडों का निर्वाह किया जाता है। जैसे चौथा, पगड़ी, सोलहवां इत्यादि। इन सब का अपना-अपना महत्व तो है ही पर जहां अन्य रस्मों पर सिर्फ परिवार के सदस्यों के होने से ही काम हो जाता है। वहीं पगड़ी रस्म, जो मृत्यु के दसवें दिन निभाई जाती है, पर नाते-रिश्तेदारों, कुटुम्बियों और मित्रजनों की उपस्थिति आवश्यक होती है। यदि दिवंगत घर का मुखिया रहा हो तो उन्हीं की उपस्थिति और साक्षी में मृतक के पश्चात घर के बड़े सदस्य को पगड़ी बांध कर परिवार का मुखिया घोषित किया जाता है। सारी कार्यवाई किसी पंडित जी के मार्गदर्शन में ही की जाती है, जिसके लिए करीब एक घंटे का समय तय रहता है।   

इसी तरह की एक पगड़ी रस्म पर पंजाब के एक शहर बनते गांव में जाना हुआ। अब जैसा की चलन है, पगड़ी बांधने से पहले पंडित जी द्वारा कुछ प्रवचन, उपदेश तथा दिवंगत के बारे में जानकारी और श्रद्धांजलि दी जाती है। तयशुदा समय में पंडित जी नेअपना रटा-रटाया प्रवचन सुनाना शुरू कर दिया। उनके दो-चार वाक्यों के बाद ही अंदाज हो गया कि ये जनाब पंजाब के नहीं हैं। उनके उच्चारण किसी पहाड़ी या बंगाली से मिलते-जुलते थे। फिर उसमें व्याकरण और शाब्दिक अशुद्धियां भी महसूस हो रही थीं। हालांकि बीच-बीच में वे पंजाबी का भी भरपूर उपयोग कर रहे थे। मैं भी कोई संस्कृत का विद्वान नहीं हूँ, नाहीं इसका पूरा ज्ञान है, फिर भी गायत्री मंत्र, गणेश स्तुति या त्वमेव माता च पिता त्वमेव जैसे बेहद सरल, आम व बहु प्रचलित श्लोक में भी कुछ खटक सा गया ! वहां उपस्थित अढ़ाई-तीन सौ लोगों को इन सबसे कोई मतलब नहीं था। पूर्णतया पंजाबी भाषी इलाके में जहां हिंदी पर ही ध्यान नहीं दिया जाता वहां ऐसी बातों पर कौन ध्यान देता ! खैर, कार्यक्रम की समाप्ति पर मैं पंडित जी से मुखातिब हुआ और बिना लाग-लपेट के पूछ लिया कि आप कहां से हो ? 
उन्होंने कहा, यहीं से !
मैंने कहा, लगता तो नहीं !
उन्होंने गौर से एक बार मुझे देखा और कहा, मैं नेपाल से हूँ। 
ना चाहते हुए भी मैंने कह ही दिया कि भाषा पर और ध्यान देने की जरुरत है !
तब तक कुछ लोग उत्सुकता पूर्वक इकट्ठा हो गए थे, इसलिए वार्तालाप को वहीं ख़त्म कर पंडित जी को राहत की सांस लेने का मौका दे दिया। 

सारे वाकये का लब्बो-लुआब यह है कि इस तरह के धार्मिक कार्यक्रमों का संचालन किसी योग्य, ज्ञानी और जानकार इंसान के द्वारा होना चाहिए। इस तरह के नीम पंडित अपने अधूरे ज्ञान, अधूरी जानकारी और बिना भाषा पर नियंत्रण के, लोगों की निरपेक्षता, धर्मभीरुता और कुछ-कुछ अज्ञानता का लाभ उठाते हुए अपना काम बदस्तूर चलाए जा रहे हैं। अब कहां नेपाल और कहां पंजाब का एक सुदूर गांव ! गांव के लोग, जिनके लिए विदेश में बसे आपनजन की खबर और अपना जीविकोपार्जन ही सबसे बड़ा लक्ष्य हो उनके लिए यह सब बातें कोई मायने नहीं रखतीं ! चूँकि यह कर्मकांड करने जरुरी माने जाते हैं, इसी धारणा के तहत इन्हें निपटा दिया जाता है ! उनके लिए इन सब आयोजनों में जैसे खाना-पीना और चाय वगैरह होता है, वैसे ही घंटे भर के लिए ''पंडत जी'' का प्रवचन ! अब कैसे-कब-किस तरह ये पंडित जी यहां आए, कैसे लोगों को प्रभावित किया, कैसे स्थापित हो गए, वह एक अलग विषय है। यह कहानी पंजाब के अधिकांश ग्रामों की है, जहां ऐसे पंडत अपना अड्डा बना चुके हैं। पंजाब भी विदेश बन गया है ! जैसे विदेशों में बसे प्रवासियों को अपने धार्मिक कार्यों के लिए एक अदद संस्कृत उवाचने वाले की जरुरत पड़ती है और उसके लिए कई ''रसूख'' वाले यहां से निर्यात हो चुके हैं, वैसे ही पंजाब के भीतरी हिस्सों में बसे इलाकों में तथाकथित पंडित आयात हो चुके हैं। उनका भी शायद यही लक्ष्य है कि यहां लोगों के सामने प्रैक्टिस कर उनके प्रभाव से किसी तरह विदेश गमन हो सके !  

शनिवार, 4 जनवरी 2020

एक नजर ताल कटोरा पर

उस प्राकृतिक कटोरेनुमा ताल के बगल में दीवारों से घिरे एक बागीचे का निर्माण मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह (1719-1748) के शासन काल में करवाया गया था। आज इसकी ज्यादातर चारदीवारी गिर चुकी है। इसके अलावा इसकी पहचान उस जगह के रूप में भी की जाती है जब 1735 में यहां मराठों की सैनिक छावनी हुआ करती थी और इसी जगह 1738 में उन्होंने मुगल सेनाओं का सामना कर उनको शिकस्त दी थी। एक और पहचान भी है पर उसे ना जानना ही बेहतर है............!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हर शहर में कुछ जगहें अपनी खासियत को लेकर प्रसिद्ध होती हैं। पर अधिकांश, स्थानीय लोगों की, नजदीक ही है, कभी भी देख लेंगे, सोच के तहत अनदेखी ही रह जाती हैं। फिर दिल्ली तो प्राचीन शहर है ! इसके तो गली-गली, कूचे-कूचे में ऐसी विरासतें भरी पडी हैं, जो आज अपनी प्राकृतिक सुंदरता से लोगों का मन तो मोह ही रही हैं, साथ ही उनकी डोर कहीं दूर इतिहास से भी जुडी हुई है। ऐसी ही एक जगह है ताल कटोरा उद्यान। आज जिसकी ख्याति यहां के आधुनिक इंडोर स्टेडियम की वजह से है। जहां कई तरह के खेलों, जैसे बैडमिंटन, तैराकी, टेबल टेनिस, कबड्डी इत्यादि की प्रतिस्पर्द्धाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा इसके परिसर में कई तरह के बागवानी से संबंधित और कल्चरल प्रोग्राम भी आयोजित होते रहते हैं। बच्चों को क्रिकेट के गुर सिखाने का भी इंतजाम है। आम पब्लिक के लिए यहां के शांत वातावरण में पिकनिक की भी सुविधा उपलब्ध है।







जैसा की इसके शिला लेख में उल्लेखित है, ऐसा माना जाता है कि उस प्राकृतिक ताल के बगल में दीवारों से घिरे एक बागीचे का निर्माण मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह (1719-1748) के शासन काल में करवाया गया था। आज इसकी ज्यादातर चारदीवारी गिर चुकी है। सिर्फ ऊँचे तल वाले हिस्से में ही कुछ अवशेष बचे हैं। जिसके कोनों में दो छतरीनुमा मंडप तथा एक-एक मेहराबदार द्वार बचा हुआ है। 




इसके अलावा इसकी पहचान उस जगह के रूप में भी की जाती है जब 1735 में यहां मराठों की सैनिक छावनी हुआ करती थी और इसी जगह 1738 में उन्होंने मुगल सेनाओं का सामना कर उनको शिकस्त दी थी।   


दिल्ली के बेहतरीन और खूबसूरत बगीचों में से एक, यह ऐतिहासिक मुग़ल कालीन उद्यान दिल्ली के विलिंग्डन क्रेसेंट, जिसे अब मदर टेरेसा मार्ग के नाम से जाना जाता है, पर स्थित है। इसका नामकरण पहले यहां स्थित कटोरे के प्राकृतिक आकार के सरोवर के कारण पड़ा था। सरोवर तो रहा नहीं पर नाम वैसे का वैसा ही चला आ रहा है। उस जगह अब एक आधुनिक तरण-ताल बना दिया गया है। दिल्ली रिज से जुड़े इस इलाके की देख-रेख का जिम्मा NDMC के पास है जो बखूबी अपने दायित्व को निभा रही है। इसका अंदाज उद्यान में प्रवेश करते ही मिल जाता है। इसके साफ़-सुथरे पथ, तरह-तरह के फूल-पौधे, रंग -बिरंगी लाइटों से सजे अनवरत पानी उछालते फव्वारे सहसा मन मोह लेते हैं। वसंत ऋतु में तो इसकी छटा ही निराली होती है। 



इतना सब होने के बावजूद कुछ ऐसा भी है जो इस जगह से जुडी हुई भयंकर, खतरनाक, अमानवीय यादों को जेहन में ला देता है। इसका पश्चिमी गुबंद सदा अपने को दोषी मान कर पछताता होगा, जब उसने कुख्यात अपराधियों रंगा और बिल्ला को अपने यहां शरण दी होगी। रिज का यह सुनसान इलाका और यहां के खंडहर ही उन कुकर्मी, वहशियों की शरणस्थली थे।   

सोमवार, 30 दिसंबर 2019

नव-वर्ष अनंत, नव-वर्ष कथा अनंता

आने वाले साल के 366 दिन सब के लिए सुख-शांति और निरोगिता ले कर आएं। सभी को आने वाले समय की शुभकामनाएं !
नए साल पर अमेरिका के न्यूयार्क में टाइम्स स्क्वायर पर 1907 से चले आ रहे दुनिया के सबसे बड़े और मंहगे नव-वर्ष के जश्न पर, जहां एक युगल पर कम से कम 1200 डॉलर का खर्च बैठने के बावजूद,  इस ''बॉल ड्रॉप'' आयोजन को देखने लाखों लोग इकट्ठा हो जाते हैं। कुछ लोग तो टॉयलेट्स की कमी को ध्यान में रख ''डायपर्स'' पहन कर ही इस उत्सव में शरीक होते हैं...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग
देखते-देखते सर्वमान्य क्रिश्चियन कैलेंडर की दौड़ का समय तक़रीबन पूरा हो गया। एक-दो दिन बाद उसने अपना ''बैटन'' अपने उत्तराधिकारी को पकड़ा देना है। यह दौड़ अनादिकाल से चली आ रही है, अनवरत ! पर ऐसा भी नहीं है कि समय यूँही रीतता, बीतता, खर्च हो जाता हो ! या सिर्फ कैलेंडर, संवत, नाम, अंक आदि ही आते-जाते-बदलते रहते हों ! इस सतत चलने वाली प्रक्रिया के साथ संसार के कुछ अनूठे प्रसंग भी जुड़ते चले जाते हैं, जिनकी जानकारी अपने आप में अनोखी और मजेदार भी है -
1, प्रशांत महासागर में स्थित रिपब्लिक ऑफ किरीबाती नामक द्वीप को यह सौभाग्य प्राप्त है कि वहां दुनिया में सबसे पहले नव-वर्ष का स्वागत किया जाता है।

2, कहते हैं कि करीब चार हजार साल पहले मेसोपोटामिया में पहली बार नए साल का उत्सव मनाया गया था।

3, कई देशों में अलग-अलग नव-वर्ष की शुरुआत मानी जाती है। पर क्रिश्चियन नव-वर्ष की मान्यता सबसे अधिक है और यह तक़रीबन सारे संसार में मान्य है।

4, हमारा नया साल अंग्रेजी माह के मार्च - अप्रैल में पड़ता है। ग्रंथों के अनुसार जिस दिन सृष्टि का चक्र प्रथम बार विधाता ने प्रवर्तित किया, उस दिन चैत्र शुदी 1, रविवार था। उसी दिन से हमारे यहां नए साल की शुरुआत होती है। जब कहीं धूल-धक्कड़ नहीं, गंदगी-कीच नहीं, बाहर-भीतर जमीन-आसमान सब जगह स्नानोपरांत जैसी शुद्धता। शायद इसीलिए हमारे ऋषि-मुनियों ने किसान को भी सबसे ज्यादा सुहाते इस मौसम से कल गणना की शुरूआत की होगी। भारत मे सभी शासकीय और अशासकीय कार्य तथा वित्त वर्ष भी अप्रैल (चैत्र) मास से प्रारम्भ होता है। 
5, सम्राट जूलियस सीजर ने 46 ईसा पूर्व एक जनवरी को साल का पहला दिन घोषित किया था।

6, प्राचीन योरोप में दो विपरीत दिशाओं के सर वाले भगवान जानुज को खुशहाली का प्रतीक माना जाता था। इन्हीं के नाम पर जनवरी माह का नामकरण किया गया था।
 
7, इथोपिया में साल में तेरह महीने होते हैं। इसलिए वहां अभी 2006 ही चल रहा है। वे अपना नव-वर्ष 11 सेप्टेम्बर को मनाते हैं।

8, जापान और कोरिया जैसे कुछ एशियन देशों में बच्चे के जन्म होते ही उसको एक साल का माना जाता है।

9, नए साल पर अमेरिका के न्यूयार्क में टाइम्स स्क्वायर पर 1907 से चले आ रहे दुनिया के सबसे बड़े और मंहगे नव-वर्ष के जश्न पर, जहां एक युगल पर कम से कम 1200 डॉलर का खर्च बैठने के बावजूद,  इस ''बॉल ड्रॉप'' आयोजन को देखने लाखों लोग इकट्ठा हो जाते हैं। जबकि तक़रीबन दो करोड़ अमेरिकन इस उत्सव को अपने घरों में बैठ कर देखते हैं, जबकि संसार भर में इसमें रूचि लेने वाले तो अनगिनत हैं।

10, दसियों लाख लोगों की भीड़ को संभालने के लिए हजारों पुलिस तथा सैंकड़ों सफाई कर्मी मुस्तैद रहते हैं। टाइम्स स्क्वायर को पूरी तरह साफ़ करने में 15-16 घंटे का समय लग जाता है।

11, टॉयलेट्स की कमी को ध्यान में रख कुछ लोग तो ''डायपर्स'' पहन कर ही इस उत्सव में शरीक होते हैं।

12, अमेरिका के समोया द्वोप में सबसे आखिर में नए साल का आगाज हो पाता है।

अब इस बदलती तारीखों के बारे में तो यही कहा जा सकता है कि नव-वर्ष अनंत, नव-वर्ष कथा अनंता ! आने वाले साल के 366 दिन सब के लिए सुख-शांति और निरोगिता ले कर आएं। सभी को आने वाले समय की शुभकामनाएं।

@संदर्भ अंतरजाल 

बुधवार, 25 दिसंबर 2019

25 दिसंबर को ही तुलसी पूजन दिवस ??

हमारे त्यौहार किसी ना किसी प्रयोजन से जुड़े होते हैं, उनका कुछ ना कुछ महत्व भी जरूर होता है और उनका उल्लेख हमारे वेद-शास्त्रों में भी जरूर मिलता है। लेकिन 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस की कोई कथा या जिक्र कहीं नहीं मिलता ! इसलिए ऐसी आशंका उठनी स्वाभाविक है कि सिर्फ विरोध करने की खातिर कोई ऐसा दिवस तो नहीं गढ़ दिया गया है ..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग 
आज क्रिसमिस के त्यौहार के साथ ही सोशल मीडिया पर जहां-तहां तुलसी दिवस होने का भी उल्लेख किया जा  रहा है। हमारे त्यौहार किसी ना किसी प्रयोजन से जुड़े होते हैं, उनका कुछ ना कुछ महत्व भी जरूर होता है और उनका उल्लेख हमारे वेद-शास्त्रों में भी जरूर मिलता है। लेकिन 25 दिसंबर को तुलसी पूजन दिवस की कोई कथा या जिक्र कहीं नहीं मिलता। इसका कारण भी है कि यह प्रथा विवादित आसाराम बापू द्वारा 2014 में ही शुरू की गयी है !

ऐसा क्यों है यह समझना भी कोई बड़ी बात नहीं है ! पर क्या ऐसा कर के हम खुद को या अपने त्योहारों को कमतर तो नहीं कर रहे ! सभी जानते हैं कि हमारे त्योहारों के समय की गणना विक्रमी संवत के अनुसार होती है जो ईसवी संवत से बिल्कुल अलग है। चूँकि दुनिया में क्रिश्चियन कैलेण्डर चलन में है इसीलिए हमारे तीज-त्योहारों का समय हर वर्ष अलग-अलग होता है, तो फिर यह कैसे संभव है कि तुलसी दिवस हर बार 25 दिसंबर को ही पड़े ! इसलिए ऐसी आशंका उठनी स्वाभाविक है कि तुलसी जैसे बहुउपयोगी, गुणकारी, लोगों की भावना और आस्था से गहराई तक जुड़े इस पौधे की आड में सिर्फ किसी अन्य उत्सव का विरोध करने की खातिर कोई ऐसा दिवस गढ़ दिया गया हो !

मानव सदा से ही उत्सव प्रिय रहा है। पर्व, त्यौहार, उत्सव आनंद और खुशहाली का प्रतीक होते हैं, फिर वे चाहे किसी भी धर्म-समाज या पंथ के हों। आज के तनाव भरे समय में इंसान सकून  के दो पल मिलते ही अपने तनाव को भुलाना चाहता है। इसलिए जब कभी, जैसा भी मौका मिलता है वह लपक लेता है। यह स्वयं-स्फूर्त भावना है, खासकर आजकी युवा पीढ़ी की, जो बिना किसी भेदभाव के उत्पन्न होती है। यह भी सही है कि कहीं-कहीं अतिरेक भी हो जाता है। शायद इसी कारण कुछ लोगों को विदेशी त्योहारों को अपनाने पर अपने त्योहारों की अवहेलना होते नजर आती है। पर क्या हमारी परंपराऐं, संस्कृति, आस्था इतनी कमजोर हैं ?

विडंबना देखिए कि आज तकरीबन हर भारतीय की ख्वाहिश होती है कि वे खुद या उनके बच्चे विदेश जा कर अपना जीवन निर्वाह करें ! इसमें कोई बुराई भी नहीं है पर जब वहां जा कर उनकी हर अच्छी-बुरी बात या चलन का अनुसरण करना है तो उनके त्योहारों का यहां रह कर विरोध क्यों ? ध्यान सिर्फ इतना रखना है कि उसकी अच्छाईयों को ही ग्रहण करें ना कि समय के साथ उसके साथ जुड गयीं बुराईयों को भी आंख बंद कर अपना लें। 

हमारा सनातन धर्म अपने नाम के अनुसार सनातनी है। कितने उतार-चढ़ाव आए ! कितनी ही विपरीत परिस्थितियां रहीं ! कितने ही अलग-अलग मतावलंबियों ने इसके विरुद्ध प्रचार कर इसे बदनाम करने, ख़त्म करने का कुप्रयास किया ! सैंकड़ों हजारों वर्षों तक अन्य धर्मावलंबी शासकों ने हम पर राज किया ! कुछ लोग उनके बहकावे में आए भी, पर इस महान वैदिक धर्म को मिटा नहीं सके। तो फिर वसुधैव कुटुंबकंम की सोच रखने वाली हमारी सोच आज इतनी संकुचित कैसे हो गयी ? हम क्यों इतने शंकित रहने लगे इसके अस्तित्व को ले कर ? क्यों देश, समाज, व्यक्ति के प्रति हमारा दृष्टिकोण इतना संकीर्ण हो गया ? सोचने की और ध्यान देने की बात है !  

शुक्रवार, 13 दिसंबर 2019

हौसला और उत्साह हो तो कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता

फ़ुटबाल में तो वह माहिर था पर उसे क्रिकेट खेलना ज्यादा भाता था; कारण, फ़ुटबाल में क्लास से कुछ ही घंटों की मुक्ति मिलती थी, वहीं क्रिकेट में दिन भर की मोहलत तो मिलती ही थी साथ में अच्छा खेलने पर एक-दो दिनों के लिए मास्साब की डांट से भी छुटकारा मिल जाता था। यह रहस्योघाटन बड़े होने पर खुद उसने ही किया था  ! कौन है वह ? जो क्रिकेट पिच पर कभी भी रन आउट नहीं हुआ !अपनी फिटनेस के कारण कभी भी खेल से बाहर नहीं हुआ ! जिसके रनों और विकेटों का रेकार्ड तोड़ना अभी भी दूभर बना हुआ है...............! 
   
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डीएवी सीनियर सेकेंडरी स्कूल चंडीगढ़ में पढ़ने वाला एक लड़का, जिसे स्कूल के नाम से ही बुखार चढ़ जाता था। उसका दिमाग सदा क्लास में न जाने और पढ़ाई से बचने के बहाने ढूंढा करता था। उस जमाने में सामान्यता हर अभिभावक यही चाहता था कि उसके बच्चे पढ़ाई में ही ध्यान दें जिससे उनका भविष्य सुरक्षित हो सके ! पर यहां लाख समझाने का भी कोई असर नहीं हो  रहा था। वैसे पढ़ाई में वह चाहे जैसा भी था, पर खेलों में सदा अव्वल रहने वाला वह किशोर स्कूल में फ़ुटबाल और क्रिकेट दोनों खेला करता था। फ़ुटबाल में तो वह माहिर था पर उसे क्रिकेट खेलना ज्यादा भाता था; कारण फ़ुटबाल में क्लास से कुछ घंटों की ही मुक्ति मिलती थी, वहीं क्रिकेट में दिन भर की मोहलत तो मिलती ही थी साथ में अच्छा खेलने पर एक-दो दिनों के लिए मास्साब की डांट से भी छुटकारा मिल जाता था। यह रहस्योघाटन बड़े होने पर खुद उसने किया।
   
अब जब यह पक्का हो गया कि क्रिकेट खेलने में ही ज्यादा भलाई है, तो उसने इस खेल में नियमित भाग लेना शुरू कर दिया। उसके खेल से उसकी उम्र को देखते हुए उसके सीनियर्स भी काफी प्रभावित थे। प्रोत्साहन मिलने पर उस युवक की प्रतिभा को पंख लग गए। उसने बॉलिंग और बैंटिंग दोनों में हाथ आजमाए और महारत हासिल कर ली। भाग्य की देवी मुस्कुराई और उसका चयन हरियाणा की टीम में हो गया। अपने पहले ही मैच में छह विकेट ले उसने अपनी टीम को पंजाब पर विजय दिलाई। यह तो शुरुआत थी, इसके बाद जम्मू-कश्मीर वाले मैच में आठ विकेट पैंतीस रन फिर बंगाल के विरुद्ध सात विकेट और बीस रन, फिर दिल्ली के खिलाफ 193 की नाबाद पारी ने उसे लोगों की नज़रों में ला खड़ा किया। अब उसका एकमात्र लक्ष्य देश के लिए खेलना था। जिसमें हौसला और उत्साह होता है उसका कोई भी सपना अधूरा नहीं रहता। सो उसने भी अपनी क़ाबलियत के दम पर 1978 में भारत की टेस्ट टीम में स्थान बना कर अपना पहला मैच पकिस्तान के साथ खेल ही लिया ! फिर उसके बाद कभी पीछे मुड कर नहीं देखा।  उसकी ख्याति देश की सीमा फलांग विदेशों में जा पहुंची।
  
हरियाणा तूफान के नाम से पहचाने जाने वाले इस क्रिकेटर को क्रिकेट पिच पर कभी भी रन आउट होते हुए नहीं देखा गया। अपनी फिटनेस पर इसका इतना ध्यान था कि सेहत की वजह से यह कभी भी खेल से बाहर नहीं हुआ। इसका पांच हजार रन और चार सौ से ऊपर विकेटों का रेकार्ड अभी तक कोई भी आलराउंडर छू तक नहीं पाया है। आज उसके नाम को दुनिया के क्रिकेट में उच्च एवं सम्मानीय दर्जा प्राप्त है। भारत के क्रिकेट के इतिहास में इस शख्स ने वह कारनामा कर दिखाया जिसको किसी ने सपने में भी नहीं सोचा था। 


क्या क्रिकेट टीम के कप्तान और कोच रहे, अर्जुन पुरस्कार, पद्मश्री, पद्मभूषण, विज्डन, आईसीसी क्रिकेट हॉल ऑफ फेम, भारतीय सेना का लेफ्टिनेंट कर्नल का पद फिर एनडीटीवी द्वारा भारत में 25 सबसे महान वैश्विक जीवित महापुरूष का खिताब पाने वाले इस इंसान का नाम बताना अभी भी जरुरी है ? यदि है; तो वे हैं कपिल देव रामलाल निखंज।  


संदर्भ, श्री रघुरामन, दैनिक भास्कर

बुधवार, 11 दिसंबर 2019

प्याज बिना स्वाद कहां रे !

इस लिहाज से प्याज को सब्जी रूपी ''बाबा'' भी कहा जा सकता है। जैसे आजकल के फर्जी बाबे, लोगों की मति फेर, उनको अपने वाग्जाल में उलझा कहीं का नहीं छोड़ते; ठीक वैसे ही यह ''प्याजिबाबा'' भी लोगों को स्वाद के मायाजाल में उलझा कर उनका आर्थिक शोषण करने से बाज नहीं आ रहा है। और इधर हम हैं कि सौ-पचास रुपये के लिए अपनी कोमलांगी, रसप्रिया जिह्वा को उसके सुख से विमुख करने को कतई राजी नहीं हैं...................!   

#हिन्दी_ब्लागिंग 
ज्ञानी, गुणी, विवेकशील लोग कह गए हैं कि क्या स्साला खाने के लिए जीता है; अरे ! सिर्फ थोड़ा-बहुत जीने के लिए खा लिया कर ! अब उनको क्या बताएं कि दोनों अवस्थाओं में खाना तो खाना ही पडेगा और खाना तभी हितकर होगा जब रसना को रस आएगा। अब यह तीन इंची इंद्रिय बस देखने-कहने को ही छोटी है, कारनामे इसके बड़े-बड़े होते हैं। ये चाहे तो महाभारत करवा दे ! यह चाहे तो घास-पात को अनमोल बनवा दे। बोले तो, पूरी की पूरी मानवजाति इसके इशारों पर नाचती है। भले ही इसके लिए कुछ भी, कोई भी कीमत चुकानी पड़े। 
पढ़े-लिखे को फारसी क्या ! अब देख लीजिए, प्याज बिना खुद को छिलवाए लोगों के आंसू निकलवा रहा है कि नहीं ! किसके कारण ? सिर्फ जीभ के कारण ! जी हाँ, वही प्याज जिसके सेवन के लिए ऋषि-मुनियों ने बहुत पहले ही मनाही कर दी थी। क्योंकि शायद उन्हें इसका अंदाज हो गया था कि यह नामुराद, जिसका ना तो कोई ईमान है ना हीं धर्म ! एक ना एक दिन लोगों की मुसीबत का कारण बनेगा। आज देख लीजिए ! कुछ ही दिनों पहले जिसको कोई दो रुपये किलो तक लेने को तैयार नहीं था ! किसान जिसकी उपज को नष्ट करने पर मजबूर हो गए थे, उसी शैतान की आंत की जुर्रत कुछ ही दिनों में सात सौ गुना उछाल मार आज दो सौ का आंकड़ा छूने की हो रही है। कारण सिर्फ इंसान की वही तीन इंची इंद्री, जिसे बिना प्याज भोजन, भोजन नहीं लगता। वही प्याज जिसे छीलो तो परत दर परत सिर्फ छिलका ही हाथ आता है, यानी निल बटे सन्नाटा ! पर वही सन्नाटा आज ज्वालामुखी का शोर साबित हो रहा है। 
ठीक है कि इसमें कुछ गुण भी जरूर हैं, तो गुण तो रावण में भी थे ! उनको नजरंदाज कर यदि लोग बिना प्याज के खाना बनाने लग जाएं तो इसे दो दिनों में अपनी औकात नजर आ जाए ! पर नहीं ! इसने लोगों की मति ऐसे मार रखी है कि इसके चहेते इसको हासिल करने के लिए सरकार तक उलटने को तैयार हो जाते हैं। इस लिहाज से प्याज को सब्जी रूपी ''बाबा'' भी कहा जा सकता है। जैसे आजकल के फर्जी बाबे, लोगों की मति फेर, उनको अपने वाग्जाल में उलझा कहीं का नहीं छोड़ते; ठीक वैसे ही यह प्याजिबाबा भी लोगों को स्वाद के मायाजाल में उलझा कर उनका आर्थिक शोषण करने से बाज नहीं आ रहा है। और इधर हम हैं कि सौ-पचास रुपये के लिए अपनी कोमलांगी को उसके सुख से विमुख करने को कतई राजी नहीं हैं। देखना है कि यह कांदा और कितने कांड करेगा ! अभी तो आलम यह है कि ''उठाए जा उनके सितम और जिए जा, यूँ ही मुस्कुराए जा और पैसे खर्च किए जा ! (आंसू पिए जा !) 

शनिवार, 7 दिसंबर 2019

"फैंटम" के निवास की याद दिलाती, देहरादून की गुच्चुपानी गुफा

किसी किले जैसी दुर्गम बनावट वाली गहरी प्राकृतिक गुफा में दस मीटर की ऊंचाई से एक झरना गिरते हुए एक अद्भुत दृश्य की रचना करता है। इसे देख कर बचपन में पढ़ी कॉमिक्स में ''फैंटम'' और उसके निवास की याद आ जाती है, बीहड़ का वैसा ही रहस्यमयी वातावरण, उसी से मिलती-जुलती गुफा, वैसा ही झरना..............! 

#हिन्दी_ब्लागिंग  
गुच्चुपानी ! नाम सुन कर ऐसा लगता है जैसे गुपचुप यानी पानीपुरी के चटपटे पानी की बात हो रही हो। पर यह नाम है देहरादून के प्रसिद्ध पिकनिक स्पॉट का। मसूरी मार्ग पर देहरादून चिड़िया घर के पास, शहर से सात-आठ की.मी. की दूरी पर स्थित इस 650 मीटर, किले जैसी बनावट वाली गहरी प्राकृतिक गुफा में दस मीटर की ऊंचाई से एक झरना गिरते हुए एक अद्भुत दृश्य की रचना करता है। इसे देख कर बचपन में पढ़ी कॉमिक्स में ''फैंटम'' और उसके निवास की याद आ जाती है। इस जगह प्रकृति का एक अनोखा कारनामा भी घटित होता है जिसके तहत पानी की एक लहर उठती है और फिर गायब हो कुछ दूर जा कर फिर दिखने लगती है शायद इसी वजह से इसका नाम गुपचुप पानी पड़ा होगा जो समय के साथ बदल गुच्चुपानी हो गया होगा।



अंग्रेजों के समय में लुटेरे शासन से बचने के लिए इस जगह को खुद और अपने लूट के सामान को छिपाने के काम में लाते थे। इसके रास्तों का खतरनाक और बीहड़ होने के कारण वे पुलिस से बच निकलने में कामयाब हो जाते थे। इसीलिए इसे गुच्चुपानी के अलावा रॉबर्स केव यानी डाकुओं की गुफा के नाम से भी जाना जाता है। यह आज भी उतनी ही रहस्यमय है जितनी तब थी पर अब यह एक पर्यटन स्थल का रूप ले चुकी है जहां सैंकड़ों लोग रोज तफरीह करने आते हैं।





गाड़ियों के स्टैंड के पास पानी की धारा के साथ ही सीढ़ियों के साथ एक चबूतरा सा बना हुआ है जिसके आगे पानी में जूते ले जाने की मनाही है। वहीं से पानी में होते हुए करीब सौ मीटर की दूरी पर गुफा का प्रवेश मार्ग है। दूर से यह अहसास होता है कि सामने की पहाड़ियां जुडी हुई हैं, जबकि ऐसा नहीं है। उन्हीं के बीच से निकल उस झरने के अद्भुत दृश्य के दर्शन होते हैं। पानी में चलते हुए सावधानी आवश्यक है। छोटे-छोटे पत्थर के टुकड़े, फिसलन और जलीय जंतुओं का ध्यान रख कर बिना जल्दीबाजी के आगे बढ़ना ही ठीक रहता है। 



धीरे-धीरे यहां भी व्यवसायिकता अपने पैर पसारने लगी है जिसके तहत खाने-पीने की दुकानों के साथ-साथ किराए पर स्लीपर और कपडे भी मिलने लगे हैं। और तो और गीले कपडे बदलने के लिए ''बूथ'' जैसी जगहें भी किराए पर दी जाने लगी हैं। डर यही है कि कहीं सहस्त्र धारा की तरह ही इस जगह का प्राकृतिक सौंदर्य भी कहीं नष्ट ना कर दिया जाए।        

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