शनिवार, 4 जनवरी 2020

एक नजर ताल कटोरा पर

उस प्राकृतिक कटोरेनुमा ताल के बगल में दीवारों से घिरे एक बागीचे का निर्माण मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह (1719-1748) के शासन काल में करवाया गया था। आज इसकी ज्यादातर चारदीवारी गिर चुकी है। इसके अलावा इसकी पहचान उस जगह के रूप में भी की जाती है जब 1735 में यहां मराठों की सैनिक छावनी हुआ करती थी और इसी जगह 1738 में उन्होंने मुगल सेनाओं का सामना कर उनको शिकस्त दी थी। एक और पहचान भी है पर उसे ना जानना ही बेहतर है............!  

#हिन्दी_ब्लागिंग 
हर शहर में कुछ जगहें अपनी खासियत को लेकर प्रसिद्ध होती हैं। पर अधिकांश, स्थानीय लोगों की, नजदीक ही है, कभी भी देख लेंगे, सोच के तहत अनदेखी ही रह जाती हैं। फिर दिल्ली तो प्राचीन शहर है ! इसके तो गली-गली, कूचे-कूचे में ऐसी विरासतें भरी पडी हैं, जो आज अपनी प्राकृतिक सुंदरता से लोगों का मन तो मोह ही रही हैं, साथ ही उनकी डोर कहीं दूर इतिहास से भी जुडी हुई है। ऐसी ही एक जगह है ताल कटोरा उद्यान। आज जिसकी ख्याति यहां के आधुनिक इंडोर स्टेडियम की वजह से है। जहां कई तरह के खेलों, जैसे बैडमिंटन, तैराकी, टेबल टेनिस, कबड्डी इत्यादि की प्रतिस्पर्द्धाएं आयोजित की जाती हैं। इसके अलावा इसके परिसर में कई तरह के बागवानी से संबंधित और कल्चरल प्रोग्राम भी आयोजित होते रहते हैं। बच्चों को क्रिकेट के गुर सिखाने का भी इंतजाम है। आम पब्लिक के लिए यहां के शांत वातावरण में पिकनिक की भी सुविधा उपलब्ध है।







जैसा की इसके शिला लेख में उल्लेखित है, ऐसा माना जाता है कि उस प्राकृतिक ताल के बगल में दीवारों से घिरे एक बागीचे का निर्माण मुग़ल बादशाह मुहम्मद शाह (1719-1748) के शासन काल में करवाया गया था। आज इसकी ज्यादातर चारदीवारी गिर चुकी है। सिर्फ ऊँचे तल वाले हिस्से में ही कुछ अवशेष बचे हैं। जिसके कोनों में दो छतरीनुमा मंडप तथा एक-एक मेहराबदार द्वार बचा हुआ है। 




इसके अलावा इसकी पहचान उस जगह के रूप में भी की जाती है जब 1735 में यहां मराठों की सैनिक छावनी हुआ करती थी और इसी जगह 1738 में उन्होंने मुगल सेनाओं का सामना कर उनको शिकस्त दी थी।   


दिल्ली के बेहतरीन और खूबसूरत बगीचों में से एक, यह ऐतिहासिक मुग़ल कालीन उद्यान दिल्ली के विलिंग्डन क्रेसेंट, जिसे अब मदर टेरेसा मार्ग के नाम से जाना जाता है, पर स्थित है। इसका नामकरण पहले यहां स्थित कटोरे के प्राकृतिक आकार के सरोवर के कारण पड़ा था। सरोवर तो रहा नहीं पर नाम वैसे का वैसा ही चला आ रहा है। उस जगह अब एक आधुनिक तरण-ताल बना दिया गया है। दिल्ली रिज से जुड़े इस इलाके की देख-रेख का जिम्मा NDMC के पास है जो बखूबी अपने दायित्व को निभा रही है। इसका अंदाज उद्यान में प्रवेश करते ही मिल जाता है। इसके साफ़-सुथरे पथ, तरह-तरह के फूल-पौधे, रंग -बिरंगी लाइटों से सजे अनवरत पानी उछालते फव्वारे सहसा मन मोह लेते हैं। वसंत ऋतु में तो इसकी छटा ही निराली होती है। 



इतना सब होने के बावजूद कुछ ऐसा भी है जो इस जगह से जुडी हुई भयंकर, खतरनाक, अमानवीय यादों को जेहन में ला देता है। इसका पश्चिमी गुबंद सदा अपने को दोषी मान कर पछताता होगा, जब उसने कुख्यात अपराधियों रंगा और बिल्ला को अपने यहां शरण दी होगी। रिज का यह सुनसान इलाका और यहां के खंडहर ही उन कुकर्मी, वहशियों की शरणस्थली थे।   

4 टिप्‍पणियां:

yashoda Agrawal ने कहा…

आपकी लिखी रचना ब्लॉग "पांच लिंकों का आनन्द" में रविवार 05 जनवरी 2020 को साझा की गयी है......... पाँच लिंकों का आनन्द पर आप भी आइएगा....धन्यवाद!

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

यशोदा जी,
अनेकानेक धन्यवाद ¡

Onkar ने कहा…

सुन्दर चित्र. सटीक वर्णन.

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

धन्यवाद, ओंकार जी ¡

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