pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 13 जून 2016

हमाम गायिकी यानि बाथरूम सिंगिंग के लिए भी एक अदद घराना होना चाहिए था

"पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर "बाथरूम सिंगिंग" यानि हमाम गायिकी के विषय को छुआ गया था, पर  उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी। हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-मग्गे से नहाते समय ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे  को साधने में ही अटका रहता है और सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती अनवरत जल-राशि से ही बनती है  !

बहुत दिनों से एक सोच आ-आ कर टक्करें मार रही थी कि गायकी का एक घराना और होना चाहिए था। सिर्फ गायिकी के घरानों की बात करें तो देश में ऐसे पच्चीस-तीस घराने ही तो होंगे, जहां अत्यंत उच्च कोटि का गायन सिद्धहस्त गुरुओं और उस्तादों द्वारा मनोयोग से सिखाया जाता रहा है। वहां प्रवेश मिलना तो दूर उसके लिए
ऐसे में सुर कैसे सधे 
सोचने की भी ख़ास योग्यता की जरुरत होती है। गुरु और शिष्य तन, मन और पूरी निष्ठा से सुरों को साधने में वर्षों लगा देते हैं। इसीलिए वहां से हीरे ही निकलते भी हैं। पर कितने ! पांच हज़ार, दस हज़ार, बीस हज़ार  !!  पर मुद्दा यह है कि दुनिया को सिर्फ डॉक्टर ही थोड़े चाहिए होते हैं ! सहायक, नर्सें, वार्ड-ब्वाय भी तो लगते हैं। इसीलिए यह सोच बार-बार जोर मार रही थी कि एक अदद ऐसा घराना होना चाहिए था, जो काश्मीर से कन्याकुमारी और गुजरात से आसाम तक पाए जाने वाले उन लाखों-लाख 'सुरतालयों' को, जिन्होंने अपनी संगीत साधना से गली-मौहल्ले तक को सराबोर कर रखा हो, एक जगह इकट्ठा कर उन्हें अपना नाम दे उनकी पहचान बनवा सकने में सहायक होता। 

ये सुरताले वे कलाकार हैं जो देश के हर हिस्से में पाए जाते हैं। इनमें गायन की जन्मजात प्रतिभा होती है। इनका
पंचम सुर में आलाप 
पहला क्रंदन भी सुर से भटका नहीं होता, जिसकी गवाह उस समय इनके पास खड़ी दाई या नर्स हो सकती है।ऐसे स्वयंभू गायकों में भाषा भी कोई बाधा नहीं होती। इनके अनुसार गायन की हर विधा और भाषा पर ये पकड़ रखते हैं। पर इनके साथ विडंबना यह होती है कि जैसे-जैसे इनकी उम्र बढ़ती है वैसे-वैसे इनकी प्रतिभा तो फैलती जाती है यानि उस समय का हर दिग्गज गायक इनकी नक़ल के सामने बौना होता जाता है पर इनका खुद का भौतिक दायरा छोटा होता जाता है और ये घर के एक कमरे में, जिसे स्नानागार कहते हैं, सिमट कर रह जाते हैं। जी हाँ, उन्हीं हजारों - लाखों 'बाथ रूम सिंगर' की बात हो रही है जिन्हे देश कभी पहचान नहीं पाया।

एकाध बार इन्हें पहचान दिलाने की अधकचरी कोशिश हुई भी, जैसे फिल्म "पति-पत्नी और वो" में संजीव कुमार जी द्वारा अभिनीत पात्र को सामने कर 'बाथरूम सिंगिंग' यानि  'हमाम गायिकी' के विषय को छुआ गया था, पर वह मूल मुद्दे से भटक एक हास्य दृश्य बन कर रह गया। उनका बाल्टी-लोटे से नहाना उस गाने को वह ऊंचाइयां नहीं छूने देता जिसकी वहां आवश्यकता थी।  हर साधना के कुछ नियम होते हैं जिनका पालन करना ही पड़ता है। बाल्टी-लोटे या मग्गे से नहाते समय ध्यान बाल्टी के कम होते पानी और लोटे-मग्गे को साधने में ही अटका रहता है और सुर भटकने का खतरा बन जाता है। दूसरी तरफ पानी जरूर कुछ ज्यादा लगता है पर बात शॉवर से छलकती
जल-राशि से ही बनती है। गाने और पानी का सदियों से नाता रहा है या यूं कहिए पानी की कलकल ध्वनि ने गायन की विधा को ऊंचाइयों पर पहुंचाने में अहम योगदान दिया है। अब सागर, नदियां, सरोवर तो वैसे रहे नहीं कि उनके किनारे सुर साधे जा सकें ! ले-दे कर स्नानगृह ही ऐसी जगह बची है जहां कुछ-कुछ पानी भी है, कुछ-कुछ तन्हाई भी और कुछ-कुछ फुर्सत भी जिसे दिल ढूँढ़ता रहता है। इसीलिए इसी कुछ-कुछ में बहुत कुछ ढूंढते इन अंजान कलाकारों को कोई तो ठीहा मिलना ही चाहिए ! तो लगता नहीं कि इन बहुआयामी कलाकारों को भी हक़ है अपनी पहचान बनाने का, अपनी कला को निखारने का, अपनी निश्छल सेवा भावना के बदले समाज से कुछ पाने का, अपना घराना बनवाने का !!  क्योंकि ये वे कलाकार हैं जो अपनी कला से प्यार करते हैं पर उस कला की मेहरबानी इन पर नहीं होती।         

गुरुवार, 2 जून 2016

अब बाल की खाल नहीं उतरती, उसकी कीमत वसूली जाती है

बंगाल के सैकड़ों गांवों में निर्धन परिवार की महिलाएं अपनी छोटी-बड़ी जरुरत को पूरा करने के लिए अपने खूबसूरत बालों का सौदा कर रही हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए या सोचे कि उनकी इस प्रकृति-प्रदत्त नियामत को बिचौलिए औने-पौने दामों में खरीद कर निहायत ऊंची कीमतों में बाजार में जा बेचते हैं। पर उन्हें इससे कोई मतलब नहीं, बाल घर की खेती हैं, दो-तीन महीने में फिर उतने के उतने

कोलकाता से करीब सवा सौ की.मी. दूर मिदनापुर का काननडीहि गांव। आबादी करीब दो-सवा दो सौ के लगभग। समय शाम के तीन बजे के आस-पास। एक सायकिल सवार डुग-डुगी बजाता गांव के बीचो-बीच पहुँच खड़ा हो जाता है। उसके साथ ही एक बड़े से सायकिल ठेले में घरों में काम आने वाला लोहे-अल्युमिनियम और प्लास्टिक का सामान भरा हुआ है। हर गांव में साप्ताहिक हाट की तरह इनके आने का दिन भी निश्चित होता है। तभी एक महिला अपने हाथों में लिए करीब आठ-दस इंच लम्बे बालों की लट सायकिल सवार को थमा देती है जो उसे तौल कर उसके बदले में महिला की पसंद की कोई वस्तु उसे थमा देता है। घंटे भर में कोई 12-13 महिलाएं-युवतियां अपने बालों के बदले अपने मन-मुताबिक़ जींस ले खुश-खुश घर की ओर लौट जाती हैं और क्रेता भी आधा किलो के करीब "सामान" बटोर अपनी राह लगता है। 

यह दृश्य बंगाल के किसी एक गांव का नहीं है। मुर्शिदाबाद, मिदनापुर, लालगोला, बनगाँव, बेहरामपुर जैसे दसियों जिलों के सैकड़ों गांवों में निर्धन परिवार की महिलाएं अपनी छोटी-बड़ी जरुरत को पूरा करने के लिए अपने खूबसूरत बालों का सौदा कर 
रही हैं, बिना इस बात पर ध्यान दिए या सोचे कि उनकी इस प्रकृति-प्रदत्त नियामत को बिचौलिए औने-पौने दामों में खरीद कर निहायत ऊंची कीमतों में बाजार में जा बेचते हैं। पर उन्हें इससे कोई मतलब नहीं, बाल घर की खेती हैं, दो-तीन महीने में फिर उतने के उतने। पर पैसों की चकाचौंध अधिकाँश महिलाओं को अपनी सुंदर केश राशि से जुदा करती जा रही है। जिससे उगने और काटने के गणित का फर्क साफ़ नज़र आने लगता है।  वैसे इस भारत से आयात किए जाने वाले ज्यादातर बाल इसी श्रेणी में आते हैं। ऐसे बाल अमेरिका, चीन, ब्रिटेन और यूरोप के अन्य हिस्सों में काफी लोकप्रिय भी हैं।
बाजार की सबसे बड़ी पूर्ती हमारे मंदिरों से होती है पर गांव-देहात से इकट्ठा किए गए बालों की मांग इसलिए ज्यादा होती है क्योंकि वे प्राकृतिक और बिना रंग, ट्रीटमेंट या मेंहदी लगे होते हैं। सबसे ज्यादा मांग डेढ़ से दो फुट लम्बे बालों की है जिनकी कीमत करीब 16000 रुपये किलो तक होती है।

प्रकृति के कारण तमिलनाडु, आंध्र प्रदेश और बंगाल की महिलाओं और युवतियों के बाल देश भर में सबसे मजबूत, नरम, मुलायम, घने, सुंदर और गहरे काले रंग के होते हैं। जिसकी सर्वाधिक मांग रहती है। बालों की देख-रेख यहां की प्रथा रही है। जिस तरह से दिनों-दिन विग बनानेवाली कंपनियों और ट्रांसप्लांट चिकित्सा में मांग बढ़ रही है उससे इस तरह के "कच्चे माल" की देश-विदेश में भारी मांग बनने लगी है। जो सिर्फ हमारे देश में ही 25000 करोड़ के व्यवसाय का आंकड़ा छूने लगी है। यही कारण है कि हमारे पडोसी देश, बांग्ला देश, नेपाल या म्यांमार से रोज  करीब तीन से चार हजार किलो बालों की स्मगलिंग होने लगी है। इनकी कीमत भी इनकी गुणवत्ता पर निर्भर करती है, जो 24 से 25 हजार रुपये प्रति किलो भी हो सकती है। पिछले साल भारत से लगभग
310 करोड़ रूपये के मानव बाल निर्यात किए गए थे। चीन इस खेल में भी हमसे कई गुना आगे है। बालों की पैकिंग उनकी गुणवत्ता के अनुसार की जाती है। जैसा कि हर व्यवसाय में होता है इसमें भी गलाकाट स्पर्द्धा की शुरुआत हो चुकी है।  सिर्फ कोलकाता एयर पोर्ट से ही अच्छी क्वालिटी के बालों के बंडलों, जो निर्यात होने थे की चोरी की ख़बरें लगातार आनी शुरू हो चुकी हैं। ऊंची गुणवत्ता के रॉ मेटेरियल की कमी इस मैदान के खिलाड़ियों को कुछ भी करने को मजबूर कर रही है।


पर उधर व्यवसाय में कुछ भी होता रहे पर अगली बार जब भी कटिंग करवाएं तो प्रकृति की इस नियामत को फ़िजूल की चीज ना समझें हो सकता है कुछ ही दिनों बाद आपके ये ही बाल, कुछ रूप-रंग बदल कर, अपनी कीमत वसूल, किसी जरूरतमंद के सिर की शोभा बढ़ा रहे हों। 

मंगलवार, 31 मई 2016

साधारण से काम ने जिसे असाधारण बना दिया

आज बेंगलुरु में सिर्फ पांच लोगों के पास रॉल्स रॉयस गाडी है। उनमें से एक में  चलने वाला, जिसके पास खुद का करीब 67 कारों का काफिला है, जो करोड़ों रुपयों का मालिक है, जिसके ग्राहकों में समाज के हर तबके के बड़े-बड़े नाम शामिल हैं, वह अभी भी जमीन से जुड़ा हुआ इंसान है

अपनी मेहनत, लगन, ईमानदारी से आदमी कहां से कहां पहुँच सकता है, यह देखना हो तो आपको बेंगलुरु जा कर रमेश बाबू से मिलना पडेगा। रमेश बाबू, जिनका काम है लोगों के बालों को काट-छांट कर नया रूप देना, सरल शब्दों में वे नाई का काम करते हैं। वे उस कहावत की जीती-जागती मिसाल हैं जिसमें कहा गया है कि कोई भी इंसान जो दूरदर्शी, ईमानदार और मेहनतकश हो उसे दुनिया की कोई भी ताकत सफल होने से नहीं रोक सकती। आज इन्हीं गुणों के कारण उनके साधारण से काम ने उन्हें समाज में असाधारण बना दिया है। ऐसा नहीं है कि वह इस तरह का पहला इंसान है जो गरीबी के फर्श से अमीरी के अर्श तक पहुंचा हो पर उसे आज भी अपने पुराने दिन भूले नहीं हैं। 

पर यह सब उन्हें बैठे-बिठाए नहीं मिला है। भाग्य ने उनकी पूरी परीक्षा लेने के बाद ही उन्हें अपनी नियामत अता की है। वे जब सिर्फ 7 साल के थे, तभी उनके पिता का स्वर्गवास हो गया। उसके बाद रमेश बाबू की मां ने लोगों के घरों में काम कर किसी तरह अपने बच्चों पाला-पोसा। उनके पति बेंगलुरु के चेन्नास्वामी स्टेडियम के पास अपनी नाई की दुकान चलाते थे। जिसे उनकी मौत के पश्चात उन्होंने उस दुकान को महज 5 रुपए महीने पर किराए पर दे दिया था। जब रमेश कुछ बड़े हुए तब घर के हालात के कारण  इंटरमीडिएट तक की शिक्षा के बाद उन्होंने पढ़ाई छोड़ अपना परंपरागत काम करना शुरू कर दिया। उनकी किस्मत 1994 में बदलनी शुरू हुई जब रमेश ने कारों को किराए पर देने का काम शुरू किया। मारुति ओमनी वैन से शुरू किए गए उस काम ने उन्हें पीछे मुड कर देखने का मौका नहीं दिया। पर उनका दिल बालों को तराशने में ही रमता था।  इसीलिए अपने इस पुस्तैनी काम को वे कभी भी छोड़ नहीं पाए। आज भी एक अमीर आदमी बनने के बावजूद रमेश अपनी जड़ें नहीं भूले हैं। आज वे अपनी जिंदगी के उस मुकाम पर हैं जहां वे अपनी शर्तों पर काम कर सकते हैं। वे चाहें तो अपने सैलून की दरें बढ़ा सकते हैं या फिर सैलून का काम छोड़ सकते हैं। लेकिन वे ऐसा नहीं कर रहे हैं। आज भी उनका मेहनताना सिर्फ सौ रुपये ही है। रमेश का कहना है कि यह उनका पुश्तैनी
काम है। रमेश के पैर जमीन पर किस तरह से टिके हुए हैं, इसका अंदाजा उनकी इसी बात से लग सकता है कि जिस दिन वे बाल नहीं काटेंगे, उस दिन वे सो नहीं पाएंगे। उन्हीं के शब्दों में,  "मैं उस दिन को कभी भूल नहीं पाता हूँ, जिस दिन मेरे पिताजी का देहांत हुआ था और हम पूरी तरह बेसहारा हो गए थे। इसीलिए मैंने पढ़ाई छोड़ कर अपना पुस्तैनी धंदा अपना लिया था। पर कार का मालिक बनना मेरा सपना हुआ करता था। फिर शायद भगवान को हमारे पर दया आई और जहां मेरी माँ काम करती थीं उन्हीं ने मुझे कारों को किराए पर देने का काम शुरू करने को कहा। वही मेरी जिंदगी का अहम मोड़ साबित हुआ। पर मैंने जो भी काम किया पूरी लगन और मेहनत से किया यही मेरी सफलता का राज है।"

आज बेंगलुरु में सिर्फ पांच लोगों के पास रॉल्स रॉयस गाडी है। उनमें से एक में  चलने वाला इंसान, जिसके पास खुद का करीब 67 कारों का काफिला हो, जो करोड़ों रुपयों का मालिक हो, जिसके ग्राहकों में समाज के हर तबके के बड़े-बड़े नाम शामिल हों, जो चाहे तो अपने काम की फीस कुछ भी ले सकता हो, अभी भी जमीन से जुड़ा हुआ वह इंसान है जो अपने अतीत को सदा याद रख रहा है। हालांकि उसकी आमदनी का जरिया कारों का काफिला है पर उसको अपने काम से जनून की हद तक लगाव है। 

शनिवार, 28 मई 2016

यहां ड्यूटी पर सोने वाले को थप्पड़ पड़ता है !

इमारत का रूप तो बदल गया पर यहां कार्यरत लोग अभी भी बर्टन की मौजूदगी को उसके थप्पड़ों के कारण महसूस करते हैं। 

सारे संसार में ऐसी हजारों जगहें और इमारतें हैं जिन्हें पारलौकिक शक्तियों के वशीभूत माना जाता है। इसमें कितनी सच्चाई है और कितनी अफवाह यह कभी भी परमाणित नहीं हो पाता क्योंकि दोनों पक्षों के पास अपनी बात सिद्ध करने के दसियों प्रमाण होते हैं। हमारे देश में भी ऐसी सैंकड़ों विवादित जगहें हैं जिन्हें अंजानी शक्ति के द्वारा बाधित माना जाता है। ऐसी ही एक इमारत राजस्थान के कोटा शहर में भी है जिसे बृजराज महल के रूप में जाना जाता है। 

अंग्रेजों के समय का यह सेना के अधिकारीयों का निवास स्थान, बंगाल नेटिव इन्फैंट्री के मेजर चार्ल्स बर्टन को आवंटित किया गया था। इसमें वह करीब तेरह सालों तक अपने परिवार के साथ रहा। 1857 के संग्राम में उसके दो बेटों सहित यहां उसकी हत्या कर दी गयी थी। कहते हैं उस की आत्मा अभी भी इस जगह पर निवास करती है। इस बात की पुष्टि कोटा की भूतपूर्व महारानी भी कर चुकी हैं। जिनके अनुसार उन्होंने कई बार एक वृद्ध को लकड़ी के सहारे महल में घूमते देखा था। हालांकि वह किसी को परेशान नहीं करता है पर यदि कोई पहरेदार अपनी ड्यूटी की अवहेलना कर सो जाता है या कोई भी यहां धूम्रपान करता है तो उसे एक जोरदार थप्पड़ पड़ता है। मारने वाला किसी को नज़र नहीं आता। पर ऐसे लोगों की भी कमी नहीं है जो कहते हैं कि उन्होंने किसी को अंग्रेजी में ना सोने की हिदायत देते सुना है जिसकी अवहेलना पर थप्पड़ पड़ता है। 

आजादी के बाद चंबल नदी के किनारे बना यह महल कोटा के राजपरिवार की मिल्कियत हो गया था।  पर 1970 में भारत सरकार ने इसे अपने संरक्षण में ले लिया और फिर करीब 178 साल पुरानी इस इमारत को 1980 में इतिहासिक विरासत बना एक होटल के रूप में बदल दिया गया। इमारत का रूप तो बदल गया पर यहां कार्यरत लोग अभी भी बर्टन की मौजूदगी को उसके थप्पड़ों के कारण महसूस करते हैं। 

गुरुवार, 26 मई 2016

आस्था को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं होती

पाराशर संहिता की एक कथा के आधार पर खम्मम के इस मंदिर में हनुमान जी और सुवर्चला जी की पूजा होती है और दर्शनार्थियों का मेल लगा रहता है। अब इस पर बहस हो, ना हो, वाद-विवाद हो, ना हो ! मंदिर तो है ही और वर्षों से मान्यता भी बनी हुई है। आस्था को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं होती  

अत्यधिक विचित्रताओं से भरा पड़ा है अपना देश ! और देश तो लोगों से ही बनता है ! तो जैसे लोग वैसा देश। इसका मतलब हम ही विचित्र हैं और शायद ही इतनी विचित्रता किसी और देश के लोगों में होगी ! यह गुण हमारी जीवन-शैली के हर पहलू में झलकता है, चाहे हमारा रहन-सहन हो, चाहे हमारे रीती-रिवाज, चाहे हमारे कर्म-काण्ड, चाहे हमारी मान्यताएं, चाहे हमारी पौराणिक गाथाएं। यदि कोई कश्मीर से कन्याकुमारी या गुजरात से बंगाल कहीं भी चले उसको इसका साक्षात प्रमाण मिलता चला जाएगा। हर जगह के विद्वानों ने स्थापित मान्यताओं का, जगह और परिस्थियों के अनुसार, अपनी-अपनी तरह विश्लेषण किया है। यह बात हमारे दोनों महाग्रंथों में भी नज़र आती है जिसमें समयानुसार कई-कई उपकथाएं जुड़ती चली गयी हैं। ऐसी ही एक कथानुसार देश के दक्षिणी भाग में एक मान्यता हनुमान जी के मंदिर से भी संबंधित है।

हमारे सबसे ज्यादा पूजनीय पांच देवों में से एक हनुमान जी हैं। जिन्हें देश-विदेश में शक्ति, शौर्य, धैर्य, भक्ति, निर्भयता, अमरता तथा अजेयता का पर्याय माना जाता है। देश का ऐसा कोई कोना नहीं है जहां इनकी पूजा ना होती हो, इनसे जुडी कथाएं सुनी और कही ना जाती हों। ऐसी अटूट मान्यता है कि इन्होंने बाल ब्रह्मचारी रह कर प्रभू राम के सारे कार्यों को संपन्न करवाया था। परन्तु अपने ही देश में तेलंगाना राज्य के खम्मम जिले में एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां हनुमानजी और उनकी पत्नी सुवर्चला की प्रतिमा विराजमान है। यहां की मान्यता है कि जो भी यहां आ कर भक्ति-भाव से हनुमानजी और उनकी पत्नी के दर्शन करता है, उनका वैवाहिक जीवन सदा सुखमय रहता है। इस मंदिर का आधार पाराशर संहिता की उस कथा पर आधारित है, जिसमें हनुमान जी के सूर्यपुत्री सुवर्चला से हुए विवाह का वर्णन है। 
कथा के अनुसार हनुमान जी ने सूर्य देव से उनकी नौ दिव्य विद्याओं को सीखाने के लिए प्रार्थना की थी, जिसके लिए सूर्यदेव भी इन्हें सुयोग्य पात्र मान सहर्ष राजी हो गए थे। शिक्षा के दौरान उन्होंने जब पांच विद्याओं का दान इन्हें दे दिया तो उसके बाद शेष चार विद्याओं को देते समय उनके सम्मुख एक समस्या आ खड़ी हुई। बची हुई उन चार विद्याओं का ज्ञान उसी पात्र को दिया जा सकता था, जिसका विवाह हो चुका हो ! चूँकि हनुमान जी बाल ब्रह्मचारी थे इसलिए उन्हें यह शिक्षा नहीं दी जा सकती थी पर इसे अधूरा भी नहीं छोड़ा जा सकता था ! सो सूर्यदेव ने उन्हें विवाह कर लेने की सलाह दी पर हनुमान जी इसके लिए राजी नहीं हुए। पर विद्यार्जन करना भी बहुत जरुरी था। प्रभुएच्छा से इसका हल भी निकल आया। सूर्यदेव की एक पुत्री थी, सुवर्चला, जो वर्षों से तपस्यारत थी। सूर्यदेव ने हनुमान जी को उससे विवाह करने के लिए राजी कर लिया क्योंकि सुवर्चला ने विवाह पश्चात फिर अपनी तपस्या में लीन हो जाना था। यह सब बातें जानने के बाद हनुमानजी विवाह के लिए मान गए और सूर्य देव ने दोनों का विवाह करवा दिया। जिसके बाद सुवर्चला पुन: अपनी तपस्या में लीन हो गईं इस प्रकार विवाह के बाद भी हनुमानजी ने ब्रह्मचारी बने रह कर उन चार दैवीय विद्याओं को भी प्राप्त कर लिया। 

इसी कथा के आधार पर खम्मम के इस मंदिर में हनुमान जी और सुवर्चला जी की पूजा होती है और दर्शनार्थियों का मेल लगा रहता है। अब इस पर बहस हो, ना हो, वाद-विवाद हो, ना हो ! मंदिर तो है ही और वर्षों से मान्यता भी बनी हुई है। आस्था को किसी प्रमाण की जरुरत नहीं होती।   

शुक्रवार, 20 मई 2016

किसी काम को नीचा या हेय समझना, मेहनत-मशक्क्त करने वालों की तौहीन है

दादा भाई नारौजी गरीब परिवार से थे उस पर सिर्फ चार साल की उम्र में उनके पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी माँ ने उन्हें कैसे पाला होगा इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है। हमारे पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बेहद साधारण परिवार से थे। लाल बहादुर शास्त्री को कौन नहीं जानता, पैसों की कमी की वजह से कई बार वे तैर कर नदी पार कर पढ़ने जाते थे। हमारे सबसे लायक राष्ट्रपति कलाम साहब को बचपन में अखबार का वितरण करना पड़ा था। ऐसे नाम कम नहीं हैं सरदार पटेल, गोपाल कृष्ण गोखले, जगजीवन राम, कामराज जैसे नेताओं का जन्म साधारण परिवारों में हुआ बचपन अभावों में बीता पर उन्होंने अपनी लियाकत से देश और अपना नाम ऊंचा किया 

समझ नहीं आता हम लोगों की सोच, विचार, संस्कार सब क्यों और कैसे तिरोहित हो गए हैं। वैचारिक मतभेद तो हर समय से ही रहते आए हैं पर कभी उसके लिए एक दूसरे की छीछालेदर नहीं की जाती थी। पर आज आपसी कटुता अब व्यक्तिगत रूप से निकलने लगी है। अपनी छलनी के छेदों की तरफ ध्यान देने की बजाए दूसरे के सूप की कमियां गिनाई जाने लगी हैं।  

ऐसा पहले कभी नहीं हुआ था। पक्ष-विपक्ष के लाख वैचारिक मतभेद हों, सदन के अंदर-बाहर एक-दूसरे का मान-सम्मान जरूर रखा जाता था। पंडित नेहरु के कम विरोधी नहीं थे। इंदिरा गांधी के समय विपक्ष चुप नहीं बैठता था, और तो और राजनीती से बिल्कुल अंजान राजीव गांधी पर भी विरोधियों ने कभी घटिया आक्षेप नहीं किए। एक मर्यादा हुआ करती थी, जिसका सदा ध्यान रखा जाता था। पर इधर पिछले दो साल से भी ज्यादा समय से कुछ लोग देश के बदले हालात को हजम नहीं कर पा रहे हैं। खासकर देश की सबसे पुरानी पार्टी के नए तथाकथित नेताओं का बिना कुछ समझे-बूझे, बिना अपने दल का इतिहास जाने, सिर्फ अपने आकाओं को खुश करने के लिए विपक्ष के नेता का तरह-तरह के संबोधनों और उनके व्यवसाय को लेकर मजाक बनाना रोज का काम हो गया है। उधर विपक्ष में भी संत या साधू नहीं बैठे हैं तो जाहिर है आप जैसा व्यवहार करोगे उसी तरह का जवाब भी उधर से आएगा। दोनों तरफ के जिम्मेदार लोगों को इस तरफ ध्यान दे सामने वाले की मान-मर्यादा का ख्याल रखना चाहिए। दूसरे का माखौल उड़ाने का मतलब है आप उन लाखों लोगों का मजाक बना रहे हो जिन्होंने उस शख्स को अपना मत दे कर विजयी बनाया है।

 इसमें उस पार्टी का ज्यादा फर्ज बनता है जिसने आजादी के पहले से लोगों के दिलों पर राज किया है। उस के नेताओं को अपने येन-केन-प्रकारेण दल में जगह पा गए उन महत्वाकांक्षी युवकों को समझाने का है, जिन्हें ना देश का नाहीं दल के इतिहास के बारे में कोई ख़ास इल्म है।   उन्हें बताया जाना चाहिए कि किसी की मेहनत और लियाकत को उसके परिवार या उसके व्यवसाय से जोड़ कर नहीं देखना चाहिए। देश में दसियों ऐसे लोकप्रिय नेता हुए हैं जिनका बचपन घोर अभावों  से गुजरा था। दादा भाई नारौजी गरीब परिवार से थे उस  पर सिर्फ चार साल की उम्र में उनके पिता की मृत्यु के पश्चात उनकी माँ ने उन्हें कैसे पाला होगा इसका सिर्फ अंदाज ही लगाया जा सकता है।
हमारे पहले राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद बेहद साधारण परिवार से थे। लाल बहादुर शास्त्री को कौन नहीं जानता, पैसों की कमी की वजह से कई बार वे तैर कर नदी पार कर पढ़ने जाते थे। हमारे सबसे लायक राष्ट्रपति कलाम
साहब को बचपन में अखबार का वितरण करना पड़ा था। ऐसे नाम कम नहीं हैं सरदार पटेल, गोपाल कृष्ण गोखले, जगजीवन राम, कामराज जैसे नेताओं का जन्म साधारण परिवारों में हुआ बचपन अभावों में बीता पर उन्होंने अपनी लियाकत से देश और अपना नाम ऊंचा किया। यदि कल  नितीश कुमार, लालू यादव, राम विलास पासवान, ममता, मानिक सरकार जैसे लोग देश के सर्वोच्च पद पर पहुँच जाएँ तो क्या उनका
इसीलिए मजाक उड़ाया जाएगा कि ये लोग अभावों की जिंदगी जी कर आए हैं ? फिर इस तरह के नवधनाढ्यों को यह समझना जरुरी है कि देश की संपदा को हड़पने से तो कहीं-कहीं बेहतर है चाय बेचना। काम कोई भी हो यदि उससे परिवार की गाडी चलती हो तो वह हेय नहीं है। और यदि आप उस काम को या उसके करने वाले को नीचा समझते हैं तो आप देश की उस मेहनतकश अधिकाँश आबादी की तौहीन कर रहे हैं जो मेहनत-मशक्कत से अपना और अपने परिवार का पेट पाल रहे हैं।    

सोमवार, 16 मई 2016

एक था जुबली ब्रिज ! सेवा निवृत्ति एक पुल की !!

देश में रेल चलने के करीब 34 साल के अंदर, उस समय हावड़ा-सियालदह रेल लाइनों को जोड़ने वाला, हुगली नदी पर बना यह पहला और देश के पुराने पुलों में से एक सबसे अहम रेल पुल था, जिसे 129 साल की सेवा के पश्चात इसी साल 17 अप्रैल को सेवा-मुक्त कर दिया गया है !  

पिछले दिनों एक रेल पुल, जुबली ब्रिज, को सेवानिवृत्त कर दिया गया। वैसे तो ऐसा होता ही रहता होगा पर इसके साथ मेरी कई यादें जुडी होने के कारण यह घटना मेरे लिए ख़ास बन गयी है। इस पुल के कारण अनगिनत बार मैं करीब 80 की. मी. की अतिरिक्त यात्रा से बचता रहा हूँ, जब बैंडेल स्टेशन पर दूरगामी गाडी से उतर,   लोकल ट्रेन से नैहाटी (नईहट्टी) स्टेशन होते हुए अपने घर आ जाता था  और बैंडेल से   
पुराना पुल 
हावड़ा और फिर सियालदह होते हुए घर आने के 
दो-अढ़ाई घंटों के समय और करीबअस्सी किलोमीटर के फासले को तय करने की जहमत से बच जाता था।  

वैसे तो पश्चिम बंगाल में रेल पटरियों का जाल बिछा हुआ है। पर दो लाइनें प्रमुख हैं, जो हुगली (गंगा) नदी के दोनों तरफ स्थित हैं और रोज लाखों यात्रियों को अपने गंतव्य तक पहुंचाती हैं। एक शुरु होती है हावड़ा स्टेशन से तथा दूसरी सियालदह से। इन्हीं की बदौलत बंगाल देश के दूसरे हिस्सों से जुड़ा हुआ है। सियालदह वाली लाइन दो पुलों पर से नदी पार कर हावड़ा लाइन से जुड़ती है। उनमें पहला है विवेकानंद सेतु या बाली पुल, 1932 में शुरू हुआ यह एक रेल-रोड़ पुल है। इसकी हालत को देखते हुए इसी के करीब एक और पुल का निर्माण किया गया है जिसका नाम भगिनी निवेदिता के नाम पर रखा गया है और दोनों को एक तरफा रास्ता बना दिया गया है। 

नया पुल 
आज जिसकी बात हो रही है वह है दूसरा पुल, जुबली ब्रिज, जिसका लोकार्पण 16 फरवरी 1885 को किया गया था तथा रानी विक्टोरिया के राज के पचास साल पूरे होने के उपलक्ष्य में इसका नाम जुबली ब्रिज रखा गया था। देश में रेल चलने के करीब 34 साल के अंदर, उस समय हावड़ा-सियालदह रेल लाइनों को जोड़ने वाला, हुगली नदी पर बना यह पहला और देश के पुराने पुलों में से एक सबसे अहम रेल पुल था, जिसे 129 साल की सेवा के पश्चात इसी साल 17 अप्रैल को सेवा-मुक्त कर दिया गया है। सियालदह से करीब 40 की. मी. दूर इसके एक छोर पर, नैहाटी के बाद गरिफा स्टेशन है तथा दूसरी तरफ हुगली घाट और फिर बैंडेल। दूरगामी गाड़ियों के अलावा लोकल ट्रेन की सहूलियत होने के कारण इस इलाके में रहने वाले बहुतेरे लोगों को हावड़ा ना जा कर बैंडेल स्टेशन से ही अपनी दूरगामी गाडी पकड़ने की सहूलियत मिल जाती है। जिस से अतिरिक्त यात्रा और समय दोनों की बचत हो जाती है। यह पूर्वीय रेलवे का एक बहुत ही महत्वपूर्ण और अहम पुल था। 

इस "नट-बोल्ट" की जगह "रिवेट" से जोडे गए करीब सवा सौ साल पुराने जुबली पुल से अंतिम बार गुजरने वाली गाडी तिस्ता-तोरसा एक्स. थी। जिसके बाद रेलवे ने बैंडेल-नैहाटी मार्ग को नए जुबली पुल से जोड़ दिया है। पर वर्षों पहले कठिन परिस्थियों और बेहद कम सहूलियतों के बावजूद इसके निर्माण से इस इलाके में रहने वाले लोगों का गाड़ी पकड़ने के लिए घंटों बर्बाद कर हावड़ा जाने की मजबूरी का ख़त्म होना वर्षों तक पुराने पुल की याद को दिलों में बसाए रखेगा।      

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