pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 8 दिसंबर 2015

सनातन हैं, विश्वास और विश्वासघात

आम आदमी सब समझता है, जानता है, गुनता भी है पर पता नहीं क्यों मौका आने पर फिर झांसे में आ, विश्वास कर धोखा खा जाता है। जब तक होश संभालता है, तब तक तो काम हो चुका होता है और वह रह जाता है अपनी भूल की कीमत चुकाने को.......        

इंसान ने एक-दूसरे पर विश्वास, भरोसा या यकीन करना शायद अपने आभिर्भाव के साथ ही अपना लिया होगा। जिसकी शुरुआत उसके जीवन में शैशवावस्ता से ही हो जाती रही है। इसका उल्लेख हजारों साल से होता भी चला आ रहा है। फिर चाहे वह पौराणिक काल हो, प्राचीन काल हो, ऐतिहासिक काल हो या फिर वर्तमान काल लोग एक दूसरे की बातों को सहज भाव से लेते रहे, उन्हें गुनते रहे एक दूसरे पर भरोसा करते रहे, विश्वास करते रहे, क्योंकि इसके बिना जिंदगी सुगम नहीं रह पाती। उसका आधार ही आपसी प्रेम और विश्वास है।  पर जैसे हर काल में हर तरह के लोग होते रहे हैं, अच्छे भी बुरे भी, चंट भी चालाक भी तो ऐसे ही कुछ लोगों ने दूसरों के भोलेपन का लाभ ले इस पारस्परिक समझ का हर काल में गलत फ़ायदा भी उठाया। जिसका उल्लेख, किस्से-कहानियों से लेकर साक्षात भी, हमें मिलता रहा है। फिर भी यह भावना कभी ख़त्म नहीं हुई। 

अनादिकाल से ऐसा होता आया है कि अपने स्वार्थ के लिए किसी ने दूसरे का भरोसा तोड़ उसके साथ विश्वासघात कर अपने दुष्कर्म को अंजाम ना दिया हो। फिर चाहे वह रावण हो जिसने सीता का भरोसा याचक बन तोड़ा या फिर इंद्र का छल हो, या फिर महाभारत की बात हो। आधुनिक इतिहास तो इससे भरा पड़ा है। चाहे देश हो या विदेश अधिकांश राजे-रजवाड़ों, बादशाहों-बेगमों, मठों-धर्माधिकारियों, आम जनों को विश्वासघात से दो-चार होना ही पड़ता रहा है। इतने सारे उदाहरणों, सबूतों के बावजूद इंसान के मन से यह भावना कभी ख़त्म नहीं हुई यह तो अच्छी बात है पर साथ ही विश्वासघातिये भी तो बने रहे। हालांकि उनकी संख्या नगण्य सी होती थी। पर वर्तमान समय में तो लगता है कि सब कुछ उलट-पुलट हो कर रह गया है। बुराई पर अच्छाई की जीत, भले का बोलबाला, दोषी को उसके कर्मों का फल, यह सब अब गुजरे जमाने की बातें लगती हैं। झूठ-मक्कारी-विश्वासघात का बोलबाला हो रहा है। देश-भक्ति, ईमान, धर्म, इंसानियत, परोपकार सब को पीछे छोड़ किसी भी कीमत पर अपने फायदे को हासिल किया जा रहा है। राजनीती तो इसका अखाड़ा बन कर रह गयी है। जनता से उलटे-सीधे, सच्चे-झूठे वादे कर सत्ता प्राप्त कर अपना उल्लू सीधा करने का जैसे चलन ही चल पड़ा है। आम आदमी सब समझता है, जानता है, गुनता भी है पर पता नहीं क्यों मौका आने पर फिर झांसे में आ, विश्वास कर धोखा खा जाता है। जब तक होश संभालता है, तब तक तो काम हो चुका होता है और वह रह जाता है अपनी भूल की कीमत चुकाने को।    विश्वास और विश्वासघात      

ऐसा भी नहीं है कि सब बुरा ही बुरा है पर जो भी अच्छाई बची है लगता है वह तटस्त है, बिखरी हुई है, दिग्भर्मित है, उसमें एकजुटता नहीं है या फिर हिम्मत नहीं जुटा पाती बुराई पर पुरजोर हमला करने की। ऐसा जब तक रहेगा तब तक अधिकांश लोग कुढ़ने के सिवाय और कुछ कर भी नहीं सकेंगे !!    

सोमवार, 7 दिसंबर 2015

खामियां नहीं खूबियां खोजिए

विडंबना है कि हमारी, हमारे परिवार की, हमारे बच्चों की सेहत की हिफाजत के लिए, उनकी जान को जोखिम से बचाने के लिए पुलिस को हमारे पीछे पड़ना पड़ता है, हमारे लिए दंड निर्धारित करना पड़ता है। चाहे बात सिगरेट की हो, शराब की हो, स्पीड की हो या हेल्मेट की हो, या फिर इस नए नियम की, हम अपनी ही परवाह कहां  करते हैं ! हमें तो मज़ा आता है नियम तोड़ने या फिर उसका विरोध करने में !!

प्रदूषण, एक जानलेवा समस्या, जो वर्षों से दिल्लीवासियों को त्रस्त करती रही है। सरकारें आती रहीं, जाती रहीं पर कभी भी किसी ने इसे गंभीरता से नहीं लिया। हर बार ज़रा थोड़ी सी हाय-तौबा मचती फिर समय के साथ सब वैसे ही चलने लगता। इस बार भी प्रदूषण स्तर जहां एक क्यू. मी. में 60 माइक्रो ग्राम के बाद ही खतरनाक माना जाता है वह सर्दियों की शुरुआत के साथ ही 400 के आंकड़े पर जा अटक गया और तकलीफों को बेकाबू होता देख कोर्ट के डंडे से सहमी सरकार ने हड़बड़ी में बिना ज्यादा सर खपाए जबरन अपने सर आ पड़ी विपदा से बचने के लिए कुछ कदम उठाने का निश्चय किया।  तो जैसा कि हमारा रिवाज है चारों ओर से विरोध की सुगबुगाहट भी शुरू हो गयी। खामियां चुन-चुन कर निकाली जाने लगीं। ऐसा लगने लगा जैसे यह किसी के व्यक्तिगत लाभ के लिए उठाया गया कदम हो।  जबकि इतना हो-हल्ला तब भी नहीं मचा था जब कुछ समय पहले अपने चुनावी वादों के खिलाफ जा सत्तारूढ़ दल ने उल्टी-सीधी सफाई देते हुए अपने लत्ते-भत्ते सैकड़ों गुना ज्यादा बढ़ा लिए थे। जबकि वह तो सिर्फ कुछ लोगों के व्यक्तिगत फायदे की बात थी।  

सबसे बड़ी बात जागरूकता की है। अपने भले के लिए तो हमें खुद ही पहल करनी चाहिए। पर विडंबना है कि हमारी, हमारे परिवार की, हमारे बच्चों की सेहत की हिफाजत के लिए, उनकी जान को जोखिम से बचाने के लिए पुलिस को हमारे पीछे पड़ना पड़ता है।  हमारे लिए दंड निर्धारित करना पड़ता है। चाहे बात सिगरेट की हो, शराब की हो, स्पीड की हो, हेल्मेट की हो, या फिर इस नए नियम की।  हम अपनी ही परवाह कहां करते हैं ! हमें तो मज़ा आता है नियम तोड़ने या फिर उसका विरोध करने में !!  इसी बात पर दिल्ली पुलिस भी झिझक रही है इस फैसले के लागू होने पर।  क्योंकि अंत में गाज उसी के सर पर गिरती है। उसे ही ठीक से प्रबंध ना कर पाने का दोषी मान लिया जाता है। इस पर शायद ही किसी का ध्यान जाता हो कि पांच-छः हजार की फ़ोर्स में से आधे तो हमारे महा-महानुभावों की रक्षा और तीमारदारी में जुटे रहते हैं। बचे हुए जवानों को और ढेरों काम के साथ ही लाखों वाहन-चालकों को सलीका सिखाने की जिम्मेदारी भी निभानी पड़ती है।           

इस फैसले को किसी सरकार या राजनितिक दल का ना मान कर जन-हित में, भविष्य में साफ़-सुथरे वातावरण के लिए, नागरिकों के, खासकर बच्चों के स्वास्थ्य को मद्दे-नज़र रख उठाए गए कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। हमें खुद आगे बढ़ कर पहल करनी चाहिए।  हो सकता है इस नियम में कई खामियां हों, इसे लागू करने में ढेरों परेशानियां हों, रसूखदारों की तरफ से अड़चने आ रही हों ! पर प्रदूषण के दैत्य को खत्म तो करना ही
होगा। इस उपाय को परखा जाए सफल न रहे तो दूसरी विधि को आजमाया जाए वह भी सफल ना हो तो कोई तीसरा रास्ता अख्तियार किया जाए। कुछ भी हो अब यह प्रयास रुकना नहीं चाहिए।  बेहतर हो कि हम खामियां गिनाने की जगह इसमें और सुधार लाने के सुझाव दें या फिर कोई और रास्ता सुझाएं जिससे प्रकृति की इस  नायाब देन को साफ़ और सुरक्षित कर और रख सकें। नहीं तो वह दिन भी दूर नहीं जब साफ़ हवा के नाम पर विदेशी कंपनियां हमसे अनाप-शनाप मूल्य वसूलना शुरू कर देंगी,  ठीक उसी तरह जैसे आज पानी को लेकर सबकी जेब पर डाका डाला जा रहा है।  

शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

छींक, कुछ जाने-अनजाने तथ्य

आ..आक्..छींईंईं       

लो, कर लो बात, अभी पढ़ना शुरू किया ही नहीं कि छींक पड गयी :-)      

सर्दियां शुरू हो गयीं साथ ही छींकों का भी खाता भी खुल गया है। 

छींक, शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया, जिसके कई कारण हो सकते हैं जैसे किसी अवांछित बाहरी पदार्थ के नाक में चले जाने से, एलर्जी, धूल, धुंआ, अचानक तेज रौशनी का पड़ना, तापमान में गिरावट, ठंडी हवा के झोंके, तेज गंध, वर्षा, पशुओं की महक, पराग कण इत्यादि। जैसे ही इनका प्रभाव पड़ता है वैसे ही शरीर उसे निकालने के लिए मुंह और नाक के रास्ते बहुत तेजी से हवा को बाहर फेंकता है जिसके साथ ही वह पदार्थ भी बाहर निकल जाता है। पर इस साधारण क्रिया के लिए हमारे पेट, छाती, फेफडों, गले और आंखों को भी योगदान देना पड़ता है। कभी-कभी एक छींक से काम नहीं चलता तो एक के बाद एक कई छींके आती हैं। 
सर्दियों और बरसात के मौसम में छींक एक सामान्य क्रिया है जिससे घबराने की कोई बात नहीं है। पर यदि इनका आना कुछ ज्यादा ही लग रहा हो तो अदरक या काली मिर्च का उपयोग किया जा सकता है। पर ज़ुकाम के कारण आने वाली छींकें कष्टदायी हैं। ये इसलिए आती हैं क्योंकि ज़ुकाम की वजह से हमारी नाक के भीतर की झिल्ली में सूजन आ जाती है और उससे ख़ुजलाहट होती रहती है और शरीर उसके लिए अपनी प्रतिक्रिया दोहराता रहता है। जिसमें बेचारी नाक की ऎसी की तैसी हो जाती है। इसके लिए डाक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए।  

छींक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्रिया का एक  हिस्सा है जो हमें स्वस्थ रखने की चेष्टा करता है। इंसान ही नहीं जानवरों, जैसे कुत्ता, बिल्ली, बंदर, मुर्गे यहां तक कि पानी में रहने वाली मछलियों को भी छींक आती है। इसके कुछ रोचक पहलू भी हैं -  
* यदि छींक आने की क्रिया शुरू हो जाए तो यह रुकती नहीं है। रोकना चाहिए भी नहीं क्योकि इसको रोकना खतरनाक हो सकता है। जिसका असर आँखों, कान और फेफड़े पर पड सकता है।
* छींक लाने में करीब-करीब सारा शरीर क्रियारत हो जाता है। जिसमें नाक, कान , आँख, मष्तिष्क, फेफड़े, पेट
सब का योगदान होता है।
* एक छींक में करीब 40000 तक जलकण हो सकते हैं।
* छींक के समय नाक -मुंह से निकलने वाली हवा की गति 30 से 35  की.मी. की होती है। जो पांच फीट के दायरे में 15 से 20 फुट दूर तक जा सकती है। इसीलिए इसके आने पर मुंह पर रुमाल या अपनी हथेली जरूर रख लेनी
चाहिए जिससे इसका असर दूसरों पर ना पड़े।
* सोते समय छींक नहीं आती क्यों की इसके कारक स्नायु भी सुप्तावस्ता में होते हैं।
* छींकते समय आँखें बंद हो जाती हैं। आँखें खुली रख कर छींका नहीं जा सकता।
* छींक के दौरान दिल की धड़कन रुकती नहीं है, जैसी की धारणा है, कुछ धीमी जरूर हो जाती है, जो शायद छींक के आने के पहले ली गयी गहरी सांस के कारण होता है।

* छींक को तो रोकना नहीं चाहिए पर इसके आने की क्रिया जब महसूस होने लगे तो नाक को मल कर या ऊपर के होंठ को नाक के नीचे वाली जगह पर दबा कर या गहरी सांस ले इसे रोका जा सकता है। 

जहां तक समझ आता है कि छींक वातावरण के बदलाव के कारण भी आती है, इसलिए घर के बाहर कदम रखने पर यदि छींक आती है तो अंदर और बाहर के वातावरण के अनुसार शरीर को ढलने तक कुछ देर रुक जाने की बात सुझाई गयी होगी। जिसका बाद में अर्थ ही बदल गया होगा और शरीर की इस स्वाभाविक और लाभदायक क्रिया को कार्य में विलंब पैदा करने के कारण या फिर इसकी तेज, चौंकाने वाली आवाज के कारण इसे अपशकुन-सूचक मान लिया गया होगा। जबकि खांसी, डकार और अपानवायु जैसी दोयम दर्जे की ध्वनियों पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं की जाती। 

मंगलवार, 1 दिसंबर 2015

मुंगेरी का सपना देश हित के लिए

वे कहते कुछ हैं. होता कुछ है, मतलब कुछ और ही निकलता है। इधर हम लकीर के फ़क़ीर बने बेमतलब आपस में उलझते रहते हैं। उधर महानुभाव लोग खुश होते रहते हैं अपनी कारस्तानियों पर। खेद इसी बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव हमारी फितरत में बदलाव नहीं आ पाया है....   

कभी-कभी एक बेहद बचकाना सा सवाल मन में उठता है कि जब समयानुसार किसी राज्य में घोर प्रतिद्वंद्वी  आपस में हाथ मिला सकते हैं (भले ही अपना हित साधने के लिए), जब दुनिया की भलाई के लिए धूर विरोधी ध्रुव मिल कर काम कर सकते हैं तो फिर हमारे देश के दो सबसे बड़े राजनीतिक दल एकाकार हो देश की अच्छाई के लिए काम क्यों नहीं कर सकते। अगर ऐसा हो जाता है तो कितना बदलाव आ सकता है पूरे देश में। टुच्ची राजनीति के दिन लद जाएंगे। मौका-परस्तों की दुकानें बंद हो जाएंगी। भयादोहन का नामोनिशान मिट जाएगा। पूर्ण बहुमत के नाते देश हित में ऐसे फैसले लिए जा सकेंगे। जो आज ओछी राजनीती के कारण टलते चले जाते हैं। आजादी की शुरुआत में कुछ-कुछ ऐसा माहौल था भी पर पता नहीं क्यों शायद अहम के कारण नए-नए दल बनते गए देश पिछड़ता गया। आज तो यह विचार मुंगेरी लाल के सपने की तरह है क्योंकि दोनों ही दलों में ऐसे लोग शोभायमान हैं जो अपने मतलब के लिए किसी को ऐसा सोचने भी नहीं दे सकते। चलिए ऐसा ना भी हो पर कम से कम यदि ऐसा ही हो जाए कि विपक्षी दल के अनुभवी व निष्णात सदस्यों का देश हित के लिए सत्तारूढ़ दल सलाह ही ले सकें, जैसा कि सरकारें बदलने पर भी कुछ लायक अफसर अपना पद संभाले रहते हैं। पर यह और भी मुश्किल लगता है क्योंकि सत्तारूढ़ दल के अच्छे काम के चलते विरोधी दल के सत्ता में आने के अवसर कम हो जाने का खतरा खड़ा हो सकता है और फिर दल-बदल को भी नज़रंदाज़ नहीं किया जा सकता। फिर आजकल तो चलन ही हो गया है किसी के अच्छे काम में भी बुराई ढूंढना, मौका तलाशते रहना दूसरे की टांग खिंचाई की चाहे इसके चलते खुद ही की स्थिति हास्यास्पद क्यों ना हो जाए। उनकी देखा-देखी यह लत देशवासियों में भी घर करती जा रही हैं।           

आज ही एक खबर छपी थी कि ट्रेन में एक बीमार व्यक्ति के बेटे द्वारा रेल मंत्री को किए गए 'एस एम एस' के कारण ट्रेन को निश्चित समय से ज्यादा रोक, रोगी को उतारने और बाहर तक ले जाने में पूरी सहायता पहुंचाई गयी। रोज-रोज की नकारात्मक खबरों के बीच ऐसी खबर पढ़ कर अच्छा लगा। पर इस खबर की प्रतिक्रिया के रूप में किसी सज्जन ने फेस-बुक पर टिप्पणी चेप दी कि यह खबर प्रायोजित है और रेल मंत्रालय ने वाह-वाही लूटने के लिए छपवाई है। अब क्या कहा जाए वैसे तो हम चिल्लाते रहते हैं कि सरकार और उसके लोग काम नहीं करते पर जब कोई ऐसा सकूनदायी समाचार आता है तो उसको शक के दायरे में ला उसकी बखिया उधेड़ने में कोई कसर नहीं छोड़ते।       

नेताओं की तो छोड़ें उनकी पर्दे के आगे और उसके पीछे की भूमिकाएं अलग-अलग होती हैं। कहते कुछ हैं. होता कुछ है, मतलब कुछ और ही निकलता है। इधर हम लकीर के फ़क़ीर बने बेमतलब आपस में उलझते रहते हैं, खासकर सोशल मीडिया पर। एक ने कुछ कहा तो दूसरा उसका तोड़ खोजना शुरू कर देता है। फिर उसकी बात का कुछ और अर्थ लगा बतंगड़ बना दिया जाता है। उधर महानुभाव लोग खुश होते रहते हैं अपनी कारस्तानियों पर। खेद इसी बात का है कि जागरूकता बढ़ने के बावजूद हमारे स्वभाव हमारी फितरत में फर्क नहीं आ पाया है।

शुक्रवार, 27 नवंबर 2015

ट्रक और लॉरी में फर्क होता है

बहुतेरे शब्द ऐसे होते हैं जिन्हें हम एक ही चीज का नाम समझ धड़ल्ले से उपयोग करते रहते हैं। जब की वह दो अलग-अलग चीजों के नाम होते हैं। ऐसे ही दो शब्द हैं ट्रक और लॉरी। इन्हें आमतौर पर सामान ढोने वाले वाहन के लिए प्रयुक्त किया जाता है।  वैसे कहने को तो ब्रिटेन में जिसे लॉरी कहा जाता है उसी को अमेरिका में ट्रक कहते हैं। दोनों करीब-करीब एक जैसे होते हैं पर फिर भी उनके काम में फर्क तो है ही। ये फर्क मुझे भी तब पता चला जब अपने सामान की शिफ्टिंग के लिए मैंने एक ट्रांसपोर्टर की सेवाएं लीं। बातों-बातों में उन्होंने यह जानकारी मुझे दी तो मैंने भी उसे शेयर कर लिया।

सुनने में ट्रक शब्द भारी-भरकम लगता है पर मजेदार बात यह है कि ट्रक की गिनती हल्के और भारी दोनों श्रेणियों में, अपनी क्षमता के अनुसार होती है पर लॉरी की गिनती सिर्फ भारी वाहनों में ही होती है। इस तरह ट्रक को लॉरी का छोटा भाई कहा जा सकता है। जो घरेलू सामान वगैरह को लाने ले जाने में, रेलवे स्टेशनों पर और हवाई अड्डों पर ज्यादातर काम में लाया जाता है। वहीँ लॉरी भारी-भरकम चीजों जैसे बड़ी मशीनरी इत्यादि को सड़क के रास्ते परिवहन में काम में लाई जाती है। एक फर्क यह भी है कि ट्रक को कोई भी वाहन चालक चला सकता है पर लॉरी के चालक को ज्यादा सक्षम और कुशल होना जरूरी होता है।  

बुधवार, 25 नवंबर 2015

आमिर जी, हर जगह ऐसा मान-सम्मान नहीं मिल पाएगा

सदा के लिए नहीं, पर एक बार दो-चार साल बाहर काट कर उन्हें अपने मन की हसरत पूरी कर लेने देनी चाहिए। इससे उन्हें दो फायदे होंगे, एक तो उन्हे अपनी अौकात की वास्तविकता का पता चल जाएगा दूसरे किसी भी अन्य देश की सहिष्णुता, सहनशीलता और भाई-चारे का भी आकलन हो जाएग। वैसे एकाधिक तुर्रमखानों को विदेश में अपनी हैसियत का अंदाजा लग भी चुका है।


एक लड़का अपनी माँ को बहुत तंग किया करता था। जब भी कोई बात उसकी ना मानी जाती तो वह धमकाता कि छत से कूद जाऊंगा। माँ डर के मारे उसकी जायज-नाजायज हर बात मान तो लेती पर मन ही मन परेशान भी रहा करती थी। एक दिन अपने घर आई सहेली से उसने सारी बात बताई तो सहेली ने सुझाव दिया कि अगली बार जब उसका लड़का ऐसी धमकी दे तो उसकी बात ना मानते हुए उसे कह देना कि जो करना है कर ले। पहले तो महिला घबड़ाई पर सहेली के आश्वस्त करने पर उसने सुझाव मान लिया। उसी शाम लडके ने फिर अपनी मांग रखी तो महिला ने अनसुना कर दिया। लड़का जब छत से कूदने की धमकी देने लगा तो माँ ने कहा जो करना है कर ले। लड़का भौचक्का रह गया, समझ गया कि अब उसकी गीदड़-भभकी नहीं चलने वाली.  



कुछ ऐसा ही आमिर खान के बयानों को सुन कर महसूस होता है कि इसी जगह से बचपन से बुढ़ापे तक
पहुँचने, नाम, दाम, सम्मान, यश, ऐश्वर्य सब कुछ पाने के बाद भी इन्हें इस देश की सहनशीलता, सहिष्णुता, भाई-चारे, शांतिप्रियता, क्षमाशीलता पर संदेह है। जबकि उनसे किसी तरह का भेद-भाव कभी नहीं बरता गया, लोगों ने सदा अपने सर-आँखों पर बिठाए रखा। अपने पारिवारिक सदस्य सरीखा समझा। उसी आदमी को अपना घर-परिवार-बच्चे असुरक्षित नजर आने लगे। हो सकता है कि यह एक आम लोगों की तरह हल्के-फुल्के तौर पर रोज-रोज की असामाजिक खबरों के कारण उकताए एक परिवार का वार्तालाप हो, पर ऐसी व्यक्तिगत बातों को किसी मंच से सार्वजनिक करना क्या उचित था? जबकि समारोह किसी और बात का तथा माहौल खुशनुमा था। इससे आमिर की छवि तो बिगड़ी ही मीडिया ने उसे ऐसा रंग दे दिया जैसे उनका बयान उनकी नासमझी के साथ-साथ अपने प्रति सहानुभूति जुगाड़ने की ओछी हरकत हो। आमिर की छवि समझदार तथा सुलझे इंसान की है, पर यदि सचमुच उनकी मंशा अपने बयान जैसी है तो उन्हें भी पता ही होगा कि इस देश के और कलाजगत से जुड़े होने के कारण ही उनका मान-सम्मान-पहचान है। जहां लोगों ने भुलाया तो देश या विदेश कहीं भी, कितना ही बड़ा तोपचंद हो उसकी अौकात कौड़ी की तीन रह जाती है। एकाधिक तुर्रमखानों को विदेश में अपनी हैसियत का अंदाजा लग भी चुका है। कहने का मतलब यह नहीं है कि वे सपरिवार यहां से चले जाएं पर एक बार दो-चार साल बाहर काट कर उन्हें अपने मन की हसरत पूरी कर लेनी चाहिए। इससे उन्हें दो फायदे होंगे, एक तो उन्हे अपनी अौकात की वास्तविकता का पता चल जाएगा दूसरे किसी भी अन्य देश की सहिष्णुता, सहनशीलता और भाई-चारे का भी आकलन हो जाएगा। वैसे भी उनके चले जाने से देश या फिल्म जगत का कोई नुक्सान नहीं होने वाला। उनका जो भी योगदान रहा है उसके बदले यहां के वाशिंदों ने उसका हजार गुना बढ़ा कर ही उन्हें लौटाया है। यदि किसी को मुगालता है कि अब चीन-जापान जैसे देशों में भी मेरी फिल्म मुनाफ़ा कमाने लगी है तो उसे जान लेना चाहिए कि पहले फिल्म की गुणवत्ता और कथावस्तु ने अपनी जगह बनाई फिर उसमें काम करने वालों को पहचाना गया ऐसा नहीं है कि पहले ही किसी के नाम से फिल्म चल गयी हो। 

कुछ लोगों का तर्क है कि बाहर जा रहने की इच्छा में बुराई क्या है जबकि विदेशों में लाखों की संख्या में भारतवासी रहते हैं जो किसी भी देशवासी की तरह अपने देश को प्यार करते हैं। पर उनके जाने में और इस तरह जाने में फर्क है। वे लोग अपनी आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाने वहां गए थे जबकि इस तरह जाना देश की सहनशीलता और असहिष्णुता पर सवाल खड़ा करता है।
यदि किसी को देशवासी अग्रिम श्रेणी में ला खड़ा करते हैं तो उसकी भी कुछ जिम्मेदारियां बन जाती हैं। लोग उसको आदर्श मान बैठते हैं। फिर चाहे वह नेता हो, अभिनेता हो या संत हो, उसकी हर बात, हर काम, हर आचरण पर लोगों की नजर रहती है। इसीलिए ऐसे महानुभावों को हर बात सोच-समझ कर ही कहनी-बोलनी चाहिए। जिससे जबरन किसी बात का बतंगड़ ना बन जाए।

रविवार, 22 नवंबर 2015

रेत की नदी का सच

नदी की ढलान के कारण बर्फ पर सवार होकर रेत ने इस अद्भुत दृश्य को अंजाम दिया। इस तरह की घटना पहले कभी भी देखी या सुनी नहीं गयी थी, इसीलिए  लोगों की उत्सुकता चरम पर पहुँच गयी थी। जो  भी हो प्रकृति का यह करिश्मा अपने-आप में अद्भुत, अनोखा,  विस्मयकारी, रोमांचक और रहस्यमय तो है ही... 

पिछले कुछ दिनों से जगह-जगह रेत की एक बहती हुई नदी के विडिओ देखे-दिखाए जा रहे हैं। 16 नवंबर को चलन में आने वाले विडिओ में दिखने वाला कौतुक पहली  नजर में अद्भुत लगता भी है। पर खोज-खबर लेने पर पता चलता है कि सच्चाई कुछ और ही है। दरअसल दुनिया के सूखे इलाकों में शुमार ईराक के इस हिस्से पर मौसम के एक अद्भुत करिश्मे ने एक  भयंकर बर्फीले तूफान को जन्म दिया जिसने कहर बरपा कर रख दिया था। यहां बरसने वाले "ओलों" का आकार गोल्फ बाल के बराबर था। ईराक के साथ-साथ इसने इजिप्ट, इज़रायल, जॉर्डन और सऊदी अरब में भी जानो-माल को भारी नुक्सान पहुंचाया है।  हालात इतने बेकाबू हो गए थे कि वहां सरकार को आपातकाल लागू करना पड़ा।  
"वायरल" होने वाली विडिओ क्लिप में ऐसा लगता है जैसे रेत की नदी पूरे जोशो-खरोश से बही जा रही हो। इसी को देखते हुए इसका नामकरण भी "रेत की नदी" के रूप में कर दिया गया। इतना ही नहीं उसके किनारे बैठे एक इंसान को भी दर्शाया जा रहा है जो मजे ले लेकर रहस्य को और भी बढ़ा रहा है। जबकि असल में यह बर्फ के टुकड़ों और रेत का घालमेल है। जहां यह करिश्मा हुआ वह एक नदी का रास्ता है, उस नदी का नाम "रब-अल खाली" है, जो ज्यादातर खाली यानी सूखी रहती है। उसी नदी की ढलान के कारण बर्फ पर सवार होकर रेत ने इस अद्भुत दृश्य को अंजाम दिया।इस तरह की घटना पहले कभी भी देखी या सुनी नहीं गयी थी, इसीलिए  लोगों की उत्सुकता चरम पर पहुँच गयी थी।  
जो  भी हो प्रकृति का यह करिश्मा अपने-आप में अद्भुत, अनोखा,  विस्मयकारी, रोमांचक और रहस्यमय तो है ही, उसे सलाम है। 

विशिष्ट पोस्ट

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...