रविवार, 22 फ़रवरी 2015

भूटान यात्रा का समापन - भाग 7

कोई भी चीज स्थाई नहीं होती।  जो शुरू हुआ है उसका अंत भी अवश्यंभावी है। इस भूटान यात्रा को ही लें, जो अपने भागग्राहियों के जीवन में मंद-सुगंध समीर की तरह आ उन्हें आनंदित कर रही थी, उसका भी समापन होने वाला था। फिर सबने अपने-अपने ठियों पर जा उसी नून-तेल-लकड़ी के चक्कर में पड़ जाना था। पर अभी भी डेढ़ दिन बचे हुए थे और कोई भी इस समय को बेकार जाने देने के मूड में नहीं था।                   

17 जनवरी 15 :   
आज का दिन थिम्फु भर्मण के बाद उससे विदा लेकर रात्रि विश्राम "पारो" में करना था।   सुबह-सबेरे चाक-चौबंद हो दो बसों में लद कर निकल पड़े सब जने इन अविस्मरणीय क्षणों का लुत्फ़ उठाने। सबसे पहले शहर
में ही स्थित चंगखा ल्हखंग पहुंचे, यहां स्थानीय लोग संतान की कामना और अपने बच्चों की सुरक्षा की कामना लेकर आते हैं। मंदिर अपनी  प्राचीनता का बखान खुद ही कर रहा था। वैसे भूटान में भिखारी नहीं होते पर इस मंदिर की सीढ़ियों पर एक याचक नज़र आया
वह भी आगे बढ़ कर मांग नहीं रहा था लोग अपनी इच्छा से कुछ न कुछ देते जाते थे। माला फेरते नागरिक तो आम परिलक्षित हो जाते थे।    खासकर मंदिरों और स्तूपों में तो कई ध्यानमग्न, अपने-आप में सिमटे लोग नज़र आते रहे। पूरे भूटान में आध्यात्म का वातावरण छाया हुआ है।

संरक्षित वन का प्रवेश द्वार 
यहां के दर्शनोंपरांत हम सब को थिम्फु के मोतिथंग इलाके में स्थित "टाकिन संरक्षण वन" ले जाया गया जहां भूटान के राष्ट्रीय पशु टाकिन को संरक्षित कर उसकी नस्ल को बढ़ाने के उपाय किए जाते हैं। ऐसा अजूबा जानवर विश्व में शायद ही कहीं मिलता हो। इसका मुंह बकरी जैसा और शेष भाग गाय के समान होता है। जंगल से घिरी पहाड़ी में इनके प्रजनन को बढ़ावा दे इनकी नस्ल को बढ़ाने और सुरक्षित रखने के लिए इनको प्राकृतिक माहौल उपलब्ध करवाया गया है। फिर भी नतीजे अभी उत्साहवर्धक नहीं हो पाए हैं।

यहां से निकल कर हम सीधे पहुंचे 1974 में  भूटान के तृतीय नरेश, जिग्मे दोरजी वांग्चुक की याद में बने स्तूप को देखने, जो यहां का राष्ट्रीय स्मारक है, जिसे पर्यटकों द्वारा सर्वाधिक देखे जाने वाले धार्मिक स्थल का गौरव प्राप्त है। इसकी ख़ास बात यह है कि इसमें दूसरे स्तूपों की तरह शरीर के अवशेष न रख कर राजा की फोटो को हॉल में रखा गया है।  अंदर जाते ही हरी घास से घिरे प्रांगण में ,   जहां
कबूतरों की भरमार थी, सुंदर, कलात्मक स्तूप जैसे मुस्कुरा कर स्वागत कर रहा हो। नीले, निरभ्र गगन तले भवन की शोभा देखते ही बनती थी।
 

समय कम था, सो उसे कंजूस के धन की तरह बचा-बचा कर ज्यादा से ज्यादा जगहों को देखने की कामना हमें ले आयी निर्माणाधीन "बुद्ध प्वायंट".धरती पर विद्यमान मानव निर्मित एक अद्भुत स्थल।
कुंसल फोदरंग पहाड़ी पर बनी 51.5 मीटर ऊंची, सोने की परत चढ़ी, कांसे की बनी शाक्य मुनि बुद्ध की दक्षिण-मुखी, राजधानी थिम्फु को निहारती, अद्भुत, विशाल, सजीवता की हद छूती प्रतिमा। जो दुनिया में विशाल बुद्ध प्रतिमाओं में से एक है। इसके गर्भ गृह में बुद्ध की आठ इंच की सोने                                                      
की परत चढ़ी एक लाख, और बारह इंच ऊंची पच्चीस हजार प्रतिमाएं स्थापित होनी हैं। पूरी परियोजना पर करीब सौ मिलियन डॉलर के खर्च का अंदाज है। यहां आ कर लग रहा था जैसे किसी दूसरे लोक में आ गए
हों, जहां प्रभु साक्षात हमें अपना आश्रय प्रदान कर रहे हों। जाने की इच्छा न होने पर भी जाना तो था ही, अपने अगले पड़ाव "राष्ट्रीय सांस्कृतिक संग्रहालय" की ओर।

भूटान के तीसरे नरेश जिग्मे दोरजी वांग्चुक के निर्देशानुसार 1968 में ता-जोंग नामक पुरानी ईमारत का जीर्णोद्धार कर इस संग्रहालय की स्थापना की गयी। इसमें भूटान की संस्कृति, इतिहास, पर्यावरण, रीति -रिवाजों के साथ-साथ यहां की कलाकृतियों, मूर्तियों, चित्रों, अस्त्र-शस्त्रों, जीव-जंतुओं, तथा पौराणिक आख्यानों तक को बेहतरीन ढंग से दर्शाया गया है। इसमें करीब डेढ़ हजार साल को समेटती तीन
हजार कलाकृतियां और वस्तुएं संग्रहित हैं। इन सब चीजों को देखने के लिए इफ़रात समय की जरुरत थी और वही हमारे पास नहीं था। सो जल्दी-जल्दी सब पर सरसरी नज़र डाल वहां से निकल लिए।

अब पारो शहर के रास्ते में अपने अंतिम दर्शनीय स्थान की ओर हमारा काफिला रवाना हुआ। यह था एक अति प्राचीन बौद्ध मंदिर क्यिचु ल्हाखंग, इसे क्येर्चु मंदिर के नाम से भी जाना जाता है। सातवीं सदी में इस मंदिर का निर्माण तिब्बत के राजा सोंगसांन गम्पो ने करवाया था। ऐसी मान्यता है कि पद्मसंभव जी ने यहां अपने पड़ाव के दौरान यहां काफी आध्यात्मिक शक्तियों का सृजन किया था। अभी भी यहां गुप्त शक्तियों का वास माना जाता है। 1971 में राजा जिग्मे दोरजी वांग्चुक की पत्नी केसंग चोडेन वांग्चुक ने इस मंदिर के साथ ही गुरु मंदिर का निर्माण करवाया। तबसे हर साल वज्रसत्व देव, पाचेन हेरुका तथा वज्रकिल्य देव की वार्षिक पूजा का अनुष्ठान देश की सुख-समृद्धि तथा शांति के लिए यहीं संपन्न किया जाता है। मंदिर के प्रांगण
में दो संतरे के वृक्ष हैं, जिनमें साल भर फल आते रहते हैं। मंदिर के अंदर आते ही एक दैवीय वातावरण की अनुभूति होती है।    

धरा को छूने उतरते बादल  
अब शाम गहराने लगी थी, जिसके साथ-साथ तापमान भी काम होना शुरू हो गया था।  सो तत्काल सभी लोग बस में बैठ अपने रात्रि विश्राम स्थल होटल प्लेरी कॉटेज की ओर अग्रसर हो चले। कहने की बात ही नहीं है कि सारा पहाड़ी रास्ता अपने- आप में प्रकृति की अनुपम छटा समेटे दिल मोहे जा रहा था, जिससे शरीर को थकान का एहसास करने का कोई भी मौका ही नहीं मिल  रहा था।

प्लेरी कॉटेज होटल थोड़ी ऊंचाई पर स्थित हैं,  जिसका रास्ता पारो की हवाई - पट्टी के पास से गुजरता है। पारो-छू नदी के  किनारे स्थित यह हवाई पट्टी, दुनिया की सबसे खतरनाक दस हवाई पट्टियों में शरीक है। दो किलो मीटर (6500 ft.) से भी कुछ कम लंबाई और 18000 ft. ऊंची पहाड़ियों से घिरी इस पट्टी से उड़ान भरने के लिए सिर्फ आठ प्रशिक्षित पायलट ही अधिकृत हैं। यहां से भूटान की ड्रुक हवाई सेवा ही उड़ान भरती है। इसे
देखना भी अपने-आप में एक अनोखा अनुभव है और इस अनुभव को प्राप्त करने का मौका भी हमें मिल गया जब दूसरे दिन सुबह हम न्यूजलपाईगुड़ी के लिए बस में इधर से गुजर रहे थे तभी पारो से एक हवाई जहाज ने कोलकता के लिए उड़ान भरी। उस क्षण का बयान करना मुश्किल है, सभी चित्र-लिखित से उस उड़ान को देख रहे थे, लग रहा था जैसे किसी फ़िल्म का दृश्य देख रहे हों।

अपनी-अपनी निर्धारित कॉटेजों में शरण लेने के बाद, बढ़ती ठंड के कारण, वहां से निकलना मुश्किल हो गया। वहीं चाय वगैरह ले, बिस्तर पर के गद्दों को हीटर से गर्म कर रजाई ओढ़े टी. वी. को ताकते लेटे रहे। मेरे साथ कमरे में श्री बजरंगी प्रसाद दुबे जी थे। विचारों की समानता के कारण हमें एक-दूसरे का साथ रास
आ गया था। तभी कुछ देर बाद श्री अरविंद देशपाण्डे जी भी ठंड के कारण हाथ मलते हुए कमरे में आ गए। रजाईयों में घुस बैठ कर बातचीत का सिलसिला जो शुरू हुआ वह तभी थमा जब रात्रि भोजन का बुलावा आ गया।  खाने के बाद थका शरीर कब नींद के आगोश में चला गया पता ही नहीं चला।

यह भूटान में हमारी आखिरी रात थी। कल फिर सबने अपनी-अपनी नीड़ों की ओर विभिन्न साधनों से रुख कर लेना था। देखने की बात यह है कि इस यात्रा के साथ-साथ कोई हमयात्रियों को कितना याद रख पाता है।       

मंगलवार, 17 फ़रवरी 2015

महाशिव रात्रि पर विशेष

श्री गणेशजी के जन्म से सम्बंधित कथा सब को कमोबेश मालुम है कि कैसे अपने स्नान के वक्त माता पार्वती ने अपने उबटन से एक आकृति बना उसमें जीवन का संचार कर द्वार की रक्षा करने हेतु कहा और
शिवजी ने गृह-प्रवेश ना करने देने के कारण उसका मस्तक काट दिया फिर माता के कहने पर पुन: ढेर सारे वरदानों के साथ जीवन दान दिया। इसके बाद ही वह गणनायक बने, गणपति कहलाए और सर्वप्रथम पूजनीय हुए।



शिवजी तो देवों के देव हैं। महादेव हैं। भूत - वर्तमान - भविष्य सब  उनकी  इच्छानुसार घटित होता है। वे त्रिकालदर्शी हैं, भोले-भंडारी हैं, योगी हैं, दया के सागर हैं।  उन्होंने बड़े-बड़े पापियों, असुरों को क्षमा-दान दिया है। उनकी इच्छा में परमार्थ ही रहता है। उनके निष्काम व निस्वार्थ भाव से किए गए हर कार्य तात्कालिक औचित्य से भरे होते हैं। वे सिर्फ एक बालक के हठ के कारण उसका अंत नहीं कर सकते। जरूर कोई और वजह इस घटना का कारण होगी।  उन्होंने जो कुछ किया होगा वह जगत की भलाई के लिए ही किया होगा।    


माता पार्वती ने भगवान शिव से  अनुरोध किया  कि वे  उनके  द्वारा रचित  बालक को देव लोक में उचित    सम्मान  दिलवाएं। शिवजी पेशोपेश में पड़ गये। उन्होंने उस छोटे से बालक के यंत्रवत व्यवहार में इतना  गुस्सा,  दुराग्रह और हठधर्मिता देखी थी जिसकी वजह से उन्हें उसके भविष्य के स्वरूप को ले चिंता हो गयीथी। उन्हें लग रहा था कि ऐसा बालक बड़ा हो कर देवलोक और पृथ्वी लोक के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकताहै। पर पार्वतीजी का अनुरोध भी वे टाल नहीं पा रहे थे इसलिए उन्होंने उस बालक के पूरे व्यक्तित्व को ही बदल  देने का निर्णय किया होगा।


 भगवान शिव तो वैद्यनाथ हैं। उन्होंने बालक के मस्तक यानि दिमाग में ही आमूल-चूल परिवर्तन कर ड़ाला। एक  उग्र,  यंत्रवत,  विवेकहीन,  मष्तिष्क  के  स्थान पर  एक  धैर्यवान,  विवेक-शील,  शांत,  
विचारशील, तीव्रबुद्धी, न्यायप्रिय, प्रत्युत्पन्न, ज्ञानवान, संयमित मेधा का प्रत्यारोपण कर उस बालक को एक अलग  पहचान दे दी। उसको बुद्धिमान, ज्ञानवान, विचारवान बना इतना सक्षम कर दिया कि महर्षि वेदव्यास को भी अपना वृहद, महान और जटिल महाकाव्य की रचना करते समय उस बालक की सहायता लेनी पड़ी।
सरल ह्रदय, तुरंत प्रसन्न हो जाने, सदा अपने भक्तों के साथ रह उनके विघ्नों का नाश करने के कारण ही आज श्री गणेश अबाल-वृद्ध, अमीर-गरीब, छोटे-बड़े सब के दिलों में समान रूप से विराजते हैं। शायद ही इतनी लोक प्रियता किसी और देवता को प्राप्त हुई हो और यह सब संभव हो पाया देवाधिदेव महादेव की कृपा से।        

शनिवार, 14 फ़रवरी 2015

सेमीनार का सफल समापन, भूटान यात्रा वृतांत - 6

सार्क समिति की महिला विंग तथा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्ष श्रीमती थिनले ल्हाम, जो इस सम्मेलन की विशेष अतिथि थीं वे भी आ गयीं। भूटान का प्रतिनिधित्व करता एक और  सरल और खुशमिजाज चेहरा। परिकल्पना (Provide Authentic Reliable Initial Knowledge And assign Literary Programme And Network Analysis) का उद्देश्य जान-समझ कर उन्होंने इसकी काफी प्रशंसा की और चाहा कि भूटान में भी ब्लागरों की संख्या में इजाफा हो।

लोगों से ही तो देश बनता है। जैसे लोग वैसा देश, वैसी ही उसकी पहचान। लोग सरल, सौम्य, हंसमुख, खुशहाल हैं तो संसार में उनका देश भी उसी रूप से जाना जाता है। भूटान की पहचान ऐसे ही नहीं दुनिया के आठवें खुशहाल देश के रूप में की जाती। जबकि एशिया में वह इस मामले में पहले नंबर पर है।    

16 जनवरी 2015,         
सुबह से ही गहमागहमी थी। सभी लोग अपनी-अपनी तैयारियों में लगे हुए थे। ख़ासकर महिला सदस्य कुछ ज्यादा ही व्यस्त थीं,
दोहरा काम जो करना पड़ रहां था, खुद को और अपने प्रेजेन्टेशन को समय पर तैयार करने के लिए। सभा-गृह पास ही था कोई सौ मीटर दूर, ज़रा सी ऊंचाई पर। रह-रह कर मनोज जी वहां की व्यवस्था का जायजा ले रहे थे।   किसी भी तरह की कोर-कसर रह न जाए सबका इसी पर ध्यान था। भूटान में समय हमारे भारतीय समय से आधा घंटा आगे चलता है, इसका सदा ध्यान रखना पड़ता था। अभी मुख्य अतिथि के आने में कुछ समय था तो सुमन जी, दास जी, गुलशन जी तथा मैं होटल से कुछ दूरी पर स्थित एक पुराने बौद्ध मंदिर की तरफ बढ़ लिए। मंदिर में ताला लगा हुआ था पर वहाँ के छोटे लामा ने हमारे लिए उसे खोल दर्शन करवा दिए। इस जगह का इतिहास में साफ उल्लेख नहीं है, इतना ही पता चलता है कि  किसी राजा का एक विशाल महल था जो एक अग्निकांड में पूर्णतया नष्ट हो गया था, उसी की याद में उस जगह के मध्य में इस मंदिर को बनवाया गया था। 

घड़ी किसी चीज की परवाह या इंतजार करे बिना चली जा रही थी, उसी से पता चला कि सेमीनार का वक्त आ पहुंचा है। हम चारों जाने जल्दी से सभा-कक्ष की ओर बढ़ लिए। वहां सारी तैयारियां हो चुकी थीं। देशपांडे परिवार ने भी कक्ष के एक तरफ अपने रूमालों और कार्डों के संकलन को सजा दिया था। कार्यक्रम के शुभारंभ के पहले गणेश वंदना फिर स्वागत गीत के उपरांत विभिन्न पुस्तकों के साथ-साथ "परिकल्पना समय" के जनवरी अंक का विमोचन भी होना था। तभी मुख्य अतिथि श्री फूप श्रृंग, जो भूटान चैंबर ऑफ कॉमर्स के मुख्य सचिव हैं, निर्धारित समय पर आ उपस्थित हुए। इतने बड़े पद पर होने के बावजूद कोई ताम-झाम नहीं, कोई फूं-फां नहीं, समय का पाबंद, सीधा-साधा हंसमुख बंदा, इतना विनम्र कि स्नेह उमड़ पड़े। उनके अनुसार भूटान का हर नागरिक अपनी संस्कृति, अपनी धरोहर, अपने पर्यावरण को बचाने के लिए अलिखित रूप से वचन-बद्ध है। राजा और प्रजा इस बारे में कटी-बद्ध हैं कि संसार के दूसरे देशों की तरह
आर्थिक संपन्नता को हासिल करने के चक्कर में कहीं आने वाली पीढ़ी अपनी मासूमियत, अपना चैन, अपना संतोष न खो बैठे। इसीलिए पर्यटन पर ज्यादातर टिकी अर्थ व्यवस्था के बावजूद हर साल सिमित पर्यटकों को ही भूटान आने की अनुमति दी जाती है और इस बात का ख़ास ख्याल रखा जाता है कि कोई अवैध रूप से यहां रहने न लग जाए। वैसे भारतीयों के लिए यहां के लोगों में खासा मैत्री भाव है हो भी क्यों न, देश को सबसे बड़ा सहारा भारत ही तो प्रदान करता है।

सार्क समिति की महिला विंग तथा इंटरनेशनल स्कूल ऑफ भूटान की अध्यक्ष श्रीमती थिनले ल्हाम, जो इस सम्मेलन की विशेष अतिथि थीं वे भी आ गयीं। भूटान का प्रतिनिधित्व करता एक और सरल और खुशमिजाज चेहरा। परिकल्पना (Provide Authentic Reliable Initial Knowledge And assign Literary Programme And Network Analysis) का उद्देश्य जान-समझ कर उन्होंने इसकी काफी प्रशंसा की और चाहा कि भूटान में भी ब्लागरों की संख्या में इजाफा हो।  इन दोनों अतिथियों का स्वभाव और सरलपन देख अपने यहां के अकड़ू व्ही.आई पियों. की याद आ गयी जो आते बाद में हैं पर माहौल के लिए तनाव पहले भिजवा देते हैं। खैर कुछ अति-उत्साहित सदस्यों के जोश के बावजूद सब कुछ बिलकुल बढ़िया तरीके से निपट गया। अब पेट-पूजा तदोपरांत शहर-दर्शन की बारी थी।
ठंड से राहत दिलाती धुप 


इस बार शहर घुमाने-दिखाने की जिम्मेदारी ली होटल के केयर-टेकर सुपुत्र श्रृंग देधूप ने, जीभ को अच्छी-खासी कसरत करवाने के बावजूद नाम का सही उच्चारण न होता देख उस छोटे पर अक्लमंद, युवा-वस्था की ओर अग्रसर, बालक ने अपने-आप को छोटू कहने की गुजारिश कर दी जो सभी को रास भी आ गयी। बाजार पहुंच सब तितर-बितर हो गए, अपने-अपने हाथों में तोते लिए हुए। देश में पीछे छूटे अपनों के लिए कुछ न कुछ उपहार जो ले जाने थे। पर अधिकांश लोगों के हाथों के तोते तब उड़ गए, आँखें कुछ ज्यादा ही चौड़ी हो गयीं जब कानों में साधारण सी चीजों की कीमत असाधारण वस्तुओं के मूल्यों से भी ज्यादा
भारत के ताज ग्रुप का होटल ताज 
सुनाई दीं। आधों ने वहीं मैदान छोड़ दिया, कुछेक ने हिम्मत कर अपनी जेब ढीली की। अब क्या करें देश में पीछे इंतज़ार करते हुओं के लिए कुछ तो ले जाना ही था। अब सब तो सुनीता यादव तो थे नहीं, जिन्होंने भारतीय महिलाओं का परचम फहराते हुए भूटान के दुकानदार को भी मजबूर कर दिया अपनी "बार्गेनिंग" से।  चाहे खरीदारी में भूटानियों ने निराश किया हो पर उनके व्यवहार ने मन जीत लिया। मैं अकेला हंड्याते हुए सड़क पार करने जेब्रा क्रासिंग पर उधर आती कारों को देख खड़ा हो गया पर उस समय सुखद आश्चर्य हुआ जब कारें आ वहां रुक गयीं और पहले मुझे सड़क पार करने का इशारा किया गया। अपने देश के किसी भी हिस्से में क्या ऐसा अनुभव संभव है ?           

मंगलवार, 10 फ़रवरी 2015

पहुंचना फुशलिंग से थिम्फु - भूटान यात्रा भाग - 5

भूटान के चतुर्थ ब्लॉगर सम्मेलन की एक ख़ास बात यह थी, जिसका जिक्र कहीं नहीं आ पाया है, कि इसके सबसे छोटे और वरिष्ठ सदस्य के बीच तकरीबन साठ साल का फर्क था। पर इस फर्क को किसी ने फर्क न मानते हुए माहौल पर फर्क नहीं पड़ने दिया। 

पता नहीं क्यों ऐसा होता है कि जब कहीं जाने का मौका दरवाजे पर दस्तक देता है तो परिस्थिति रूपी कंबल शरीर को इस तरह जकड लेता है कि दरवाजा खोलने का अवसर ही निकल जाता है। पर इस बार भूटान यात्रा का प्रस्ताव मिलने पर मैंने निश्चय किया कि कंबल उतार फेकना है.......और आश्चर्य !  वह बड़ी आसानी से अलग हो एक अविस्मरणीय यात्रा का अनुभव लेने का संयोग दे गया।     

सबसे छोटी सदस्य अदिति 
भूटान के चतुर्थ ब्लॉगर सम्मेलन की एक ख़ास बात यह थी, जिसका जिक्र कहीं नहीं आ पाया है, कि इसके सबसे छोटे और वरिष्ठ सदस्य के बीच तकरीबन साठ साल का फर्क था। पर इस फर्क को किसी ने फर्क न मानते हुए माहौल पर फर्क नहीं पड़ने दिया। सबने हमउम्रों की तरह भूटान के इन चार दिनों को अपने जीवन के अमोल क्षणों की तरह संजोया।  

नए जलपाईगुड़ी शहर से भूटान के फुशलिंग (Phuentsholing) को एक द्वार जोड़ता है। यदि दरवाजे के बीच खड़े हो जलपाईगुड़ी की तरफ देखें तो भारत के दूसरे शहरों की तरह का नजारा ही नजर आएगा, भीड़ भरी सड़कें, धक्कम-पेल, दो-तीन-चौ पहिए एक दूसरे को ठेलियाते हुए, ठेले वाले, मुसाफिर, उन्हीं के बीच सांड, कुत्ते, गाएं पगुराते हुए, परेशान पुलिस वाला, हार्नों का शोर, धुंआ। दूसरी तरफ एक शांत, साफ-सुथरा इलाका, न शोर न ही भीड़-भाड़ नही अफरा-तफरी। जाहिर है हमारी समस्याओं का एक अच्छा- खासा प्रतिशत बेकाबू जनसंख्या के कारण भी है। खैर अपना देश है जैसा भी है अपना है, गर्व है इस पर हम सब को। 

होटल वांग्चुक 
फुशलिंग में सुबह नाश्ते बाद 36 गढ़ और उत्तर-प्रदेश के अनदेखे अपनों का परिचय थिम्फु की ओर बस में रवाना होने पर ही ठीक से हो पाया। क्योंकि यह यात्रा तकरीबन 6-7 घंटों की थी सो इस अवधि का भरपूर उपयोग किया गया। बस में एक से एक दिग्गज थे, जिन्हें अपने-अपने क्षेत्र में महारत हासिल थी। ऐसे में कविता, गीत, हास्य-व्यंग्य, का जो समा बंधा कि पता ही नहीं चला कि कब हंसते-गाते-खाते-पीते थिम्फु पहुंच गए। पर इस बीच सब ऐसे घुल-मिल गए थे जैसे सबका वर्षों पुराना परिचय हो। दोपहर बाद करीब तीन बजे बस ने होटल वांग्चुक उतारा जहां पहले से मौजूद श्री रविन्द्र प्रभात ने खुले दिल से सबका स्वागत किया। ऐसी पहाड़ी यात्राओं में समय का पता नहीं चलता, ऊपर से यहां सूर्य देवता को भी अस्ताचल जाने की जल्दी रहती है, जिससे पर्यटकों को कुछ तो हड़बड़ाहट हो ही जाती है। आज भी समय कम था, थिम्फु पहुंच शहर घूमने की बात थी, सो सभी लोग अपने-अपने निर्धारित कमरों में जा जल्दी-जल्दी "फ्रेश" हो लिए। कुछ खा-पी कर शहर देखने निकल पड़े
होटल का अंदरुनी भाग 

पर कुछ ने कल की थकान मिटाने के लिए विश्राम करना उचित समझा। कुछेक घंटों के बाद फिर एक बार सब रात के भोजन पर भोजन-कक्ष में इकट्ठा हुए, समा बंधा, गोष्ठी हुई पर सिर्फ कुछ देर के लिए, थकावट सब पर भारी पड रही थी। दूसरे दिन की तैयारी भी करनी थी। सेमीनार जो था।

समय था रात के पौने दस का, तारीख थी 15 जनवरी, दिन था गुरुवार।
              

रविवार, 1 फ़रवरी 2015

गुमनाम लोग, जिनके बिना भूटान यात्रा की सफलता संदिग्ध थी

श्री रजत मंडल 
भूटान में शाकाहारी भोजन मिलना नामुमकिन तो नहीं कुछ मुश्किल जरूर है। इसलिए यह परिकल्पना सम्मलेन के संयोजकों की दूरदर्शिता ही कहलाएगी कि उन्होंने खान-पान की व्यवस्था शुरू से ही अपने साथ कर रखी थी। जिसका भार श्री रजत मंडल, श्री सुमंत वसु उनके मैनेजर श्री दीपांकर मंडल तथा दो सहयोगियों ने, जो बिहार से थे, बड़ी कुशलता-पूर्वक संभाल रखा था। जरूरत का सामान भारत से ही लेकर चला गया था। रोज की आवश्यक वस्तुएं यथा दूध, फल, सब्जी वगैरह के लिए ही भूटान के बाजारों का रुख किया जाता था। वैसे भी भारत की तुलना में भूटान में मंहगाई काफी ज्यादा है। 

थिम्फु का भोजन-कक्ष 
उतनी ठंड के बावजूद, जब हाथ-पैर जमते से लगते हों, गर्म कमरे से बाहर आना दंड-स्वरुप हो, वैसे परिस्थितियों में भी सुबह की चाय होटल के एक-एक  कमरे में उपलब्ध करवाई जाती रही। जल्दी यात्रा आरंभ होने की सूरत में भी कभी नाश्ते में विलंब नहीं होने दिया गया। कैसा भी "हेक्टिक" सफर हो दिन का खाना अपने समय पर हाजिर होता रहा। कहीं पहुंचने में कैसी भी देर हो जाए इस पूरी टीम ने रात के खाने को समय पर उपलब्ध करवाया। इस के अलावा रोज अलग-अलग सुरुचि-पूर्ण व्यंजन, वह भी ऐसे कि सभी को रास आ जाएं। इसी कारण अनजानी जगह, अनजाने वातावरण, अनजाने हवा-पानी के बावजूद सारे सदस्य पूरी तरह स्वस्थ व प्रसन्न रह सके। किसी की
तबियत ज़रा सी भी नासाज नहीं हो पाई।

इस टीम के बिना इस भूटान यात्रा की सफलता संदिग्ध ही रहती। ये सब ऐसे नींव के पत्थर साबित हुए, जिन पर बनी इमारत की तो सभी प्रशंसा करते रहे, पर इनकी मुसीबतों, इनकी तकलीफों, विपरीत परिस्थितियों में भी बिना किसी शिकायत के अपने काम को अंजाम देते रहने के बावजूद इनके कार्य को  यथोचित सराहना नहीं मिल पाई। जबकि ये लोग ऐसे प्रदेशों से आए थे जहां भूटान जैसी ठंड की कल्पना भी नहीं की जाती। फिर भी किसी को इन्होंने शिकायत का मौका नहीं दिया।                
        

शनिवार, 31 जनवरी 2015

इसके पहले कि "थिम्फु" पहुंचें..........

vth king, JKN Wangchuk
भूटान, दक्षिणी एशिया में एक तरफ चीन और तीन तरफ से भारत से घिरा धरती पर स्वर्ग का एक टुकड़ा। इतिहासकारों के अनुसार  भूटान शब्द  संस्कृत के भोट-अंत,   यानी जहां तिब्बत की सीमा  ख़त्म होती हो या फिर भू-उत्तान, यानी ऊंचाई वाली जगह के पहचान स्वरूप बना है। इसका सबसे बड़ा शहर और राजधानी "थिम्फु" है। भूटानी में भूटान का नाम Druk Yul है जिसका अर्थ है थंडर ड्रैगन का स्थल। 
नीला पॉपी 

करीब आठ लाख की आबादी वाला यह देश भगवान बुद्ध को सर्वोपरि मानता है। विश्व में यह अकेला देश है जो बौद्ध वज्रयान धर्म को अपनाए हुए है। यहां के लोग हंसमुख, शांति-प्रिय, मृदुभाषी, मिलनसार तथा अपने राजा के प्रति पूरी तरह समर्पित हैं। यहां की प्रजा अपने राजा को  पिता समान मानती है और यहां आने वाले पर्यटकों से भी उम्मीद करती है कि वे उनका सम्मान करें। राजाज्ञा ही उनके लिए कानून है। हो भी क्यों न !  गरीबी के बावजूद यहां शिक्षा और स्वास्थय सेवा मुफ्त है। राजा की
राष्ट्रीय पशु ताकिन 
तरफ से हर घर से एक सदस्य को नौकरी 
उपलब्ध करवाई जाती है। सरकारी नौकरी में लगे हर स्त्री-पुरुष को राष्ट्रीय पोशाक पहनना आवश्यक है। परुषों का परिधान 'घो' और स्त्रियों की पोषक 'किरा' कहलाती है। बेटियों को यहां बेटों से ज्यादा अधिकार प्राप्त हैं। समाज का नजरिया "खुला" है। यह एशिया का प्रथम और विश्व का आठवां  सबसे खुशहाल देश है। इसीलिए पर्यटकों के लिए यह शायद विश्व का सबसे सुरक्षित देश माना जाता है।   भूटानी अपने पूजा स्थलों के प्रति भी बहुत संवेदनशील होते हैं। यहां पवित्र स्थलों ढक कर जाना अच्छा नहीं समझ जाता।   
नीला पॉपी, जो एक दुर्लभ फूल है, यहां का राष्ट्रीय पुष्प है। इनके राष्ट्रीय पशु का नाम ताकिन है। इसका मुंह
बकरी के सामान तथा बाक़ी शरीर गाय के जैसा होता है। राष्ट्रिय पक्षी का दर्जा तीन आँखों वाले दुर्लभ पक्षी को प्राप्त है। भूटान के ऊपरी हिस्से में नीली भेड़ें पाई जाती हैं. 
यहां की भाषा भूटानी है जिसे Dzongkha कहा जाता है। तीरंदाजी यहां का राष्ट्रीय खेल है, वैसे फूटबाल और क्रिकेट भी काफी लोकप्रिय हैं। यहां की करेंसी Ngutrum है जो हमारे रुपये के बराबर मूल्य रखती है। रुपये का लेन - देन आम है। सिगरेट-तंबाखू तथा पॉलीथिन को पूरी तरह बैन करने वाला यह विश्व का एकमात्र देश है। ध्वनि प्रदूषण रोकने के लिए यहां गाड़ियों के हार्न बजाना भी मना है। अपनी यात्रा के चार दिनों में कहीं भी कर्कश शोर सुनाई नहीं पड़ा। विश्व में सिर्फ दो देशों की राजधानियां ऐसी हैं जहां सडकों पर कोई ट्रैफिक लाइट्स
साफ-सुथरा शहर 
नहीं हैं। पहली प्रशांत सागर में स्थित Palau की राजधानी Ngerulmud तथा दूसरी भूटान की राजधानी थिम्फू, इसके बावजूद यहां यातायात संबधित कोई परेशानी नहीं दिखाई दी।  


विज्ञापनों में कई बार दिखा होगा, मुस्कुराइए कि आप फलानी जगह हैं, यहां बिना कहे ही आपके होटों पर मुस्कराहट तिर जाएगी। यदि जिंदगी कभी मौका दे तो स्वर्ग के इस छोटे से टुकड़े को अपनी यात्रा में जरूर शामिल करें। 

यहां एक ही दिक्कत हुई इन चार दिनों में किसी भी एक इंसान का नाम ना ठीक से समझ पाए ना ही उच्चारित किया जा सका।  :-)  

बुधवार, 28 जनवरी 2015

भूटान में पहला दिन

कोलकाता के दूसरे स्टेशन सियालदह से रात दस बजे चल कर अगले दिन सुबह आठ बजे न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचने वाली दार्जिलिंग मेल, घने कुहासे की वजह से डेढ़ घंटे विलंब से करीब साढ़े नौ बजे अपने गंतव्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकी। स्टेशन पर पूरी यात्रा की व्यवस्था संभालने वाले श्री रजत मंडल ने हमारी अगवानी की। हम कुल जमा पांच लोगों का यह पहला जत्था था। जिसमें मेरे अलावा श्री ललित शर्मा, श्री अरविंद देशपांडे, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अल्पना देशपांडे तथा उनकी प्यारी सी बिटिया अदिति देशपांडे थे। स्टेशन के बाहर ही रजत जी ने हमें व्रत-तोडू जलपान करवा कर अपने एक सहायक श्री दीपांकर मंडल के साथ एक टैक्सी में बैठा कर फुशलिंग जो भूटान में हमारा पहला पड़ाव था, की ओर रवाना कर दिया, इस हिदायत के साथ कि रास्ते में हमारी हर जरूरत का ध्यान रखा जाए। समय था सुबह के 10. 45 .

हल्की-हल्की कुनकुनी ठंड थी। मौसम खुशगवार था। वैसे भी नई जगह देखने के मौके ने सब में उल्लास भर रखा था। सड़क पर यातायात कम था। सड़क ऐसी सुन्दर, चिकनी, सपाट लग रहा था कि गाडी को भी उस पर चलने में खुशी की अनुभूति हो रही है। रुकते-चलते एक सौ चालीस की. मी. का सफ़र तय कर करीब तीन बजे हम भारत-भूटान के बार्डर पर फुशलिंग गेट के सामने आ पहुंचे थे। रोमांचक क्षण था वह जब हम
दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर रहे थे। कुछ ही मिनटों बाद आबादी से ज़रा हट कर और कुछ ऊंचाई पर स्थित हम अपनी आरामगाह होटल मिड प्वाइंट के प्रांगण में जा उतरे।

न्यू ज. गु. की व्यस्त सड़क 
सफर चाहे जैसा भी हो थकान तो थोड़ी-बहुत हो ही जाती है, उसे ही दूर करने मैं सबसे पहले नहाने के लिए स्नान कक्ष में जा घुसा।  गर्म पानी वैसे ही शरीर को आराम दे जाता है।  नहा, कपडे बदल बाहर आया तो अपने बाकी चारों साथियों का कोई अत-पता नहीं था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि भाई लोग होटल के तरण-ताल में तैरने का आनंद उठा रहे हैं। आश्चर्य हुआ कि पहाड़ी इलाके में ठंड के मौसम में स्विमिंग पूल ?  हुआ क्या था,  कि ललित भाई रफ-टफ, मस्त-मौला इंसान।  पानी देखा और छलांग लगा दी। अरविंद भाई ने पूछा, पानी ठंडा तो नहीं है ? जवाब मिला, बिल्कुल नहीं। तो अगला भी उतर गया, डुबकी लगाने। अब जब पानी में अरविंद जी को देखा तो माँ-बेटी भी आँख मूँद कर चल दीं उनके पीछे। यह अलग बात थी कि पानी को छूते ही शरीर की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती थी...…हिक्क.......। मैंने कहा भी कि भले आदमी पानी कोई दस फुट दूर तो नहीं था, छू कर देख ही लेना था ! खैर मौज-मस्ती रही। नहा-वहा कर उदर पूर्ती की गयी। तब तक दूसरे "बैच" के साथियों की कोई खबर नहीं मिल पाई थी।

अस्ताचलगामी सूर्य 

यह होटल आबादी से कुछ दूर ऊंचाई पर था और हमें छोड़ कर गाड़ी फिर स्टेशन रवाना हो चुकी थी, इसलिए मजबूरी में हमें वहीं आस-पास मंडराते रहना था। अब तक हम आपस में काफी खुल चुके थे। अचानक मेरे पीछे कुत्ते के भौंकने की आवाज आई, मुड़ कर देखा तो अरविंद जी थे ! फिर तो उन्होंने अपनी इस कला का जो प्रदर्शन किया तो आस-पास के सारे श्वान-पुत्रों में खलबली मच गयी। स्वाभाविक भी था उन्हें आवाज जरूर सुनाई पड रही थी पर अपना विदेशी भाई कहीं नज़र नहीं आ रहा था, इधर-उधर दौड़ते-भागते उनकी अजीब हालत हो रही थी। इधर शाम की चुनरी थामे रात धीरे-धीरे धरती को अपने आगोश में समेटने की तैयारी कर रही थी। सूरज के विदा होते ही ठंड ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया था। कुछ भी हो सफर की थकान तो थी ही, सो रात का भोजन ले हम सब अपने-अपने बिस्तरों में दुबक गए।

घड़ी रात के आठ बजा रही थी, स्थानीय समयानुसार। तारीख थी 13. 01. 15 .                
होटल मिडप्वाइंट 

रात के करीब दो बजे कुछ शोर-गुल से नींद उचटी, लगा कुछ लोग आ-जा रहे हैं, कमरों के खुलने-बंद होने से आभास हो गया कि लखनऊ-बाराबंकी के साथी अब पहुँच पाए हैं। पर कुछ थकान, कुछ ठंड और कुछ गहरी नींद की खुमारी की वजह से उठा नहींगया। वैसे उन्हें भी आराम की सख्त जरूरत थी और उनसे पहले परिचय भी नहीं था तो सुबह मिलना ही उचित था।

वे सब भी जल्दी-जल्दी खाना-पीना निपटा अपने-अपने गदेलन में घुस गए थके शरीर को कुछ राहत देने की इच्छा लिए।  सबेरे पता चला कि गाड़ियां घंटों देर से चल रही हैं। उन लोगों को तो ज्यादा आराम भी नसीब नहीं हो पाया, क्योंकि सुबह-सुबह साढ़े सात बजे भूटान की राजधानी "थिम्फु" के लिए रवाना जो होना था।

कल थिम्फु की ओर ………

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