pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 28 जनवरी 2015

भूटान में पहला दिन

कोलकाता के दूसरे स्टेशन सियालदह से रात दस बजे चल कर अगले दिन सुबह आठ बजे न्यू जलपाईगुड़ी पहुंचने वाली दार्जिलिंग मेल, घने कुहासे की वजह से डेढ़ घंटे विलंब से करीब साढ़े नौ बजे अपने गंतव्य पर अपनी उपस्थिति दर्ज करवा सकी। स्टेशन पर पूरी यात्रा की व्यवस्था संभालने वाले श्री रजत मंडल ने हमारी अगवानी की। हम कुल जमा पांच लोगों का यह पहला जत्था था। जिसमें मेरे अलावा श्री ललित शर्मा, श्री अरविंद देशपांडे, उनकी धर्मपत्नी श्रीमती अल्पना देशपांडे तथा उनकी प्यारी सी बिटिया अदिति देशपांडे थे। स्टेशन के बाहर ही रजत जी ने हमें व्रत-तोडू जलपान करवा कर अपने एक सहायक श्री दीपांकर मंडल के साथ एक टैक्सी में बैठा कर फुशलिंग जो भूटान में हमारा पहला पड़ाव था, की ओर रवाना कर दिया, इस हिदायत के साथ कि रास्ते में हमारी हर जरूरत का ध्यान रखा जाए। समय था सुबह के 10. 45 .

हल्की-हल्की कुनकुनी ठंड थी। मौसम खुशगवार था। वैसे भी नई जगह देखने के मौके ने सब में उल्लास भर रखा था। सड़क पर यातायात कम था। सड़क ऐसी सुन्दर, चिकनी, सपाट लग रहा था कि गाडी को भी उस पर चलने में खुशी की अनुभूति हो रही है। रुकते-चलते एक सौ चालीस की. मी. का सफ़र तय कर करीब तीन बजे हम भारत-भूटान के बार्डर पर फुशलिंग गेट के सामने आ पहुंचे थे। रोमांचक क्षण था वह जब हम
दूसरे देश की सीमा में प्रवेश कर रहे थे। कुछ ही मिनटों बाद आबादी से ज़रा हट कर और कुछ ऊंचाई पर स्थित हम अपनी आरामगाह होटल मिड प्वाइंट के प्रांगण में जा उतरे।

न्यू ज. गु. की व्यस्त सड़क 
सफर चाहे जैसा भी हो थकान तो थोड़ी-बहुत हो ही जाती है, उसे ही दूर करने मैं सबसे पहले नहाने के लिए स्नान कक्ष में जा घुसा।  गर्म पानी वैसे ही शरीर को आराम दे जाता है।  नहा, कपडे बदल बाहर आया तो अपने बाकी चारों साथियों का कोई अत-पता नहीं था। पूछने पर ज्ञात हुआ कि भाई लोग होटल के तरण-ताल में तैरने का आनंद उठा रहे हैं। आश्चर्य हुआ कि पहाड़ी इलाके में ठंड के मौसम में स्विमिंग पूल ?  हुआ क्या था,  कि ललित भाई रफ-टफ, मस्त-मौला इंसान।  पानी देखा और छलांग लगा दी। अरविंद भाई ने पूछा, पानी ठंडा तो नहीं है ? जवाब मिला, बिल्कुल नहीं। तो अगला भी उतर गया, डुबकी लगाने। अब जब पानी में अरविंद जी को देखा तो माँ-बेटी भी आँख मूँद कर चल दीं उनके पीछे। यह अलग बात थी कि पानी को छूते ही शरीर की ऊपर की सांस ऊपर और नीचे की नीचे रह जाती थी...…हिक्क.......। मैंने कहा भी कि भले आदमी पानी कोई दस फुट दूर तो नहीं था, छू कर देख ही लेना था ! खैर मौज-मस्ती रही। नहा-वहा कर उदर पूर्ती की गयी। तब तक दूसरे "बैच" के साथियों की कोई खबर नहीं मिल पाई थी।

अस्ताचलगामी सूर्य 

यह होटल आबादी से कुछ दूर ऊंचाई पर था और हमें छोड़ कर गाड़ी फिर स्टेशन रवाना हो चुकी थी, इसलिए मजबूरी में हमें वहीं आस-पास मंडराते रहना था। अब तक हम आपस में काफी खुल चुके थे। अचानक मेरे पीछे कुत्ते के भौंकने की आवाज आई, मुड़ कर देखा तो अरविंद जी थे ! फिर तो उन्होंने अपनी इस कला का जो प्रदर्शन किया तो आस-पास के सारे श्वान-पुत्रों में खलबली मच गयी। स्वाभाविक भी था उन्हें आवाज जरूर सुनाई पड रही थी पर अपना विदेशी भाई कहीं नज़र नहीं आ रहा था, इधर-उधर दौड़ते-भागते उनकी अजीब हालत हो रही थी। इधर शाम की चुनरी थामे रात धीरे-धीरे धरती को अपने आगोश में समेटने की तैयारी कर रही थी। सूरज के विदा होते ही ठंड ने अपना जलवा दिखाना शुरू कर दिया था। कुछ भी हो सफर की थकान तो थी ही, सो रात का भोजन ले हम सब अपने-अपने बिस्तरों में दुबक गए।

घड़ी रात के आठ बजा रही थी, स्थानीय समयानुसार। तारीख थी 13. 01. 15 .                
होटल मिडप्वाइंट 

रात के करीब दो बजे कुछ शोर-गुल से नींद उचटी, लगा कुछ लोग आ-जा रहे हैं, कमरों के खुलने-बंद होने से आभास हो गया कि लखनऊ-बाराबंकी के साथी अब पहुँच पाए हैं। पर कुछ थकान, कुछ ठंड और कुछ गहरी नींद की खुमारी की वजह से उठा नहींगया। वैसे उन्हें भी आराम की सख्त जरूरत थी और उनसे पहले परिचय भी नहीं था तो सुबह मिलना ही उचित था।

वे सब भी जल्दी-जल्दी खाना-पीना निपटा अपने-अपने गदेलन में घुस गए थके शरीर को कुछ राहत देने की इच्छा लिए।  सबेरे पता चला कि गाड़ियां घंटों देर से चल रही हैं। उन लोगों को तो ज्यादा आराम भी नसीब नहीं हो पाया, क्योंकि सुबह-सुबह साढ़े सात बजे भूटान की राजधानी "थिम्फु" के लिए रवाना जो होना था।

कल थिम्फु की ओर ………

मंगलवार, 27 जनवरी 2015

अथ भूटान यात्रा - प्रथम भाग

पिछले अक्टूबर में जब परिकल्पना द्वारा चतुर्थ अंतर्राष्ट्रीय ब्लॉगर सम्मेलन की भूटान में होने की घोषणा  हुई और उसमे मैंने अपना नाम भी पाया तो काफी ऊहापोह की स्थिति बनी हुई थी। मेरे जाने के पक्ष में अधिकतम मत थे और विपक्ष में मैं अकेला। कारण कुछ आर्थिक भी था मेरे जेहन में। काफी सोच-विचार, हाँ-ना के बाद यह तय रहा कि मुझे विदेश-भ्रमण कर ही आना चाहिए। मेरे दोस्ताने का दायरा ऐसे भी बहुत सिमित है, जो दो-तीन लोगों से थोड़ी बहुत जान-पहचान है उसी का सिरा पकड़ इस बारे में उनका कार्यक्रम जानना चाहा तो कोई ठोस जवाब नहीं मिल पाने और उनके आधे-अधूरे कार्यक्रम के कारण बनी असमंजस की स्थिति में ही मैंने रायपुर से हावड़ा और सियालदह से न्यू जलपाईगुड़ी तथा वैसे ही वापसी की टिकट करवा ही ली। 

12  जनवरी को मुंबई मेल से हावड़ा रवाना हुआ। दो दिन बाद ही गंगा-सागर का मेला था, जिसकी वजह से गाड़ी अपने हर डिब्बे की औकात से दुगने यात्रियों को लादे हांफ़ते-कांखते चल रही थी। कोलकाता पहुंच कर देखा कि हर ट्रेन उसी स्थिति से गुजरते हुए आ रही है। मेरे चलित फोन का सिम  बी. एस. एन. एल. का है। मैं पहले भी कई बार कह चुका हूँ कि इस सरकारी सिम को गुर्दे वाले लोग ही इस्तेमाल करते हैं। तो जैसी इसकी तासीर है यह कब बंद हो गया पता ही नहीं चला।  उधर छोटे भाई मनोज परेशान कि गाड़ी के अपने समय 5. 30 पर आ जाने के बावजूद भैया कहाँ रह गए। इस बार काफी समय के बाद कोलकाता जाना हुआ था इसलिए बहुत कुछ करने की सोच के कारण काफी व्यस्त सा प्रोग्राम बना हुआ था। पर मनोज ने पिछली रात की हालत जान कर मुझे आराम करने की सलाह दी क्योंकि उसी रात फिर सफर

जारी रखना था जलपाईगुड़ी के लिए। सो बंगाली मिठाईयों का लुत्फ लेते और सोते सारा दिन गुजार दिया, अच्छा भी रहा आगे की "हेक्टिक" यात्रा को मद्देनजर रखते हुए।         

शाम सात बजे के आस-पास ललित शर्मा का फोन आया कि वे सियालदह स्टेशन पर बैठे हैं और श्री अरविंद व अल्पना देशपांडे से संपर्क नहीं हो पा रहा है, जिनके पास उनका आगे की यात्रा का रेल अनुमति पत्र है। मैंने कहा आप वहीं रहें मैं आ रहा हूँ जैसा होगा देखा जाएगा। खैर सब कुछ ठीक-ठाक रहा और दार्जिलिंग मेल से दो अलग-अलग डिब्बों में यात्रा कर हम सुबह निश्चित समय से डेढ़ घंटे विलंब से न्यू जलपाई गुड़ी पहुँच गए। स्टेशन पर ही आगे की पूरी यात्रा में हमारे रहने-खाने, चलने-ठहरने, घुमाने,  हर तरह की सुविधा की जिम्मेदारी संभालने वाले श्री रजत मंडल से भेंट हुई। हमारी इस पांच सदस्यों की टोली को उन्होंने सुबह का व्रत-तोड़ जलपान संपन्न करवा भूटान के पहले पड़ाव फुशलिंग (Phuentsholing), जो वहां से करीब 110 की. मी. की दूरी पर है, रवाना कर दिया। खुद वहीं दूसरे "बैच" के स्वागत के लिए ठहर गए।      

सोमवार, 26 जनवरी 2015

26 जनवरी पर विशेष, "झंडा ऊंचा रहे हमारा"

विश्व विजयी तिरंगा प्यारा, "झंडा ऊंचा रहे हमारा" 

हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो उठता है। हर भारतीय का दिल इसके प्रति श्रद्धा विभोर हो जाता है, पर इस गीत की रचना किसने की यह शायद बहुत से लोगों को मालुम नहीं है। इस राष्ट्रीय झंडा गीत के रचनाकार थे स्वर्गीय श्री श्याम लाल गुप्त।  इनका जन्म  कानपुर के  नरवल  गांव में 16
सितंबर 1893 को हुआ था।   इनके पिता का नाम श्री विश्वेश्वर गुप्त तथा माता का नाम कौश्लया देवी था। परिवार के आर्थिक संकट से जुझने के कारण श्याम लालजी बचपन से ही पढाई के साथ-साथ पिता का हाथ भी बटाया करते थे। बड़े होने के साथ-साथ इनका रुझान पत्रकारिता की ओर होता चला गया और इनकी देश भक्ति से ओत-प्रोत कविताएं तथा लेख अखबारों इत्यादि में छपने लगे जो काफी लोक प्रिय भी होते चले गये। इसी के कारण धीरे-धीरे नेताओं का ध्यान इनकी ओर गया और श्री गणेश शंकर विद्यार्थीजी की प्रेरणा से ये कांग्रेस के सक्रीय कार्यकर्ता बन गये और अपनी मेहनत और लगन के सहारे 1920 में फतेहपुर जिला कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर पहुंच गये। उस समय तक कोई झंड़े को सम्मान देने वाला ऐसा गीत नहीं बन पाया था जिसे सुन मन उद्वेलित हो सके। गणेश शंकरजी इनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित थे सो उन्होंने ही इन्हें कोई ऐसा गीत लिखने की जिम्मेदारी सौंप दी जो सीधा दिल तक पहुंचे। श्याम लालजी के सामने बहुत बड़ी चुन्नौती थी। काफी मेहनत और लगन से आखिर उन्होंने गीत लिखा। उसे बड़े-बड़े नेताओं ने सुना, पढा और उन सब के अनुमोदन के बाद उसे गांधीजी को दिखाया गया उन्होंने गीत को कुछ छोटा करने का परामर्श दे इसे झंडा गीत बनने का गौरव प्रदान कर दिया।

फिर तो यह गीत सार्वजनिक सभाओं, जुलुसों, प्रभात फेरियों के अवसर पर गाया जाने लगा और जब 1938 में हरिपुरा के ऐतिहासिक कांग्रेस के अधिवेशन के अवसर पर नेताजी सुभाष चंद्र बोस के ध्वजारोहण करते ही वहां पांच हजार लोगों ने देश के सभी महत्वपूर्ण नेताओं की उपस्थिति में भाव-विभोर हो इसे गाया तो इसे राष्ट्रीय झंड़ा गीत होने का गौरव भी मिल गया। 

पूरा  गीत इस प्रकार है :-
विजयी विश्व तिरंगा प्यारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
सदा शक्ति सरसानेवाला
वीरों को हर्षानेवाला
मातृभूमि का तन-मन-सारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
लाल रंग भारत जननी का,
हरा अहले इस्लाम वली का,
श्वेत सभी धर्मों का टीका,
एक हुआ रंग न्यारा-न्यारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
है चरखे का चित्र संवारा,
मानो चक्र सुदर्शन प्यारा,
हरे देश का संकट सारा,
है यह सच्चा भाव हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
इस चरखे के नीचे निर्भय,
होवे महाशक्ति का संचय,
बोलो भारत माता की जय,
सबल राष्ट्र है ध्येय हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
आओ प्यारे वीरो आओ,
राष्ट्र ध्वज पर बलि-बलि जाओ
एक साथ सब मिल कर गाओ
प्यारा भारत देश हमारा,
झंडा ऊंचा रहे हमारा।
शान ना इसकी जाने पाए
चाहे जान भले ही जाए
विश्व विजय कर के दिखलाये
तब होवे प्रण पूर्ण हमारा
झंडा ऊंचा रहे हमारा।

जय हिंद।

गुरुवार, 8 जनवरी 2015

दुनिया का पहला विमान भारत में उड़ा था !

हम अपने सुनहरे अतीत पर नाज तो खूब करते हैं  पर शायद दिल से विश्वास नहीं करते।   हम बाबाओं के सपनों पर भरोसा कर खजानों की खोज में जमीन-आसमान तो एक कर सकते हैं पर अपने ग्रंथों की  विश्वसनीयता  पर शक करते रहते  हैं।

कुछ दिनों पहले सोशल मीडिया पर शिवकर बापूजी तलपडे नामक एक भारतीय के अपने बुद्धि-कौशल से एक हवाई जहाज का निर्माण कर राईट बंधुओं से करीब आठ साल पहले 1895 में ही उसका सफल परिक्षण करने की खबर पर काफी बहस हुई थी। कुछ लोग इसे गौरव की बात कह रहे थे तो कुछ मखौल भी उड़ा रहे थे। पर इंटरनेट पर तलपडे के बारे में जो जानकारी उपलब्ध है उससे यह बात सच ही मालुम पड़ती है।  पता  नही क्यूँ हमें अपने ही लोगों पर भरोसा नहीं होता।  हमें अपनी ही विरासत पर संदेह रहता है। अपने सुनहरे अतीत पर बात तो खूब करते हैं  पर शायद दिल से विश्वास नहीं करते।  
होना तो यह चाहिए था कि इस बात की तह तक जाया जाता।  ग्रंथों पर शोध किया जाता।  पर हमें अपनी लियाकत पर ही शक होने लगता है।  हम बाबाओं के सपनों पर विश्वास कर खजानों की खोज में जमीन-आसमान तो एक कर सकते हैं पर अपने ग्रंथों की विश्वसनियता पर शक करते हैं।    

शिवकर बापूजी तलपडे का जन्म 1864 में तबकी बंबई में हुआ था।  संस्कृत के विद्वान तलपडे को वैमानिक शास्त्र में गहरी दिलचस्पी थी जिसकी प्रेरणा उन्हें ऋगवेद के गहन अध्ययन से प्राप्त हुई थी।  उस समय लोगों की धारणा थी कि हवा से भारी किसी भी चीज को हवा में नहीं ठहराया जा सकता।  पर तलपडे का विचार कुछ अलग था।  जिसका संबल उन्हें ग्रंथों से मिल रहा था तथा उनके मार्ग-दर्शक थे पंडित सुब्बैया शास्त्री।  अपनी अथक मेहनत और लगन से उन्होंने एक मशीन की रुपरेखा बना उस पर काम करना शुरू किया।  उनकी मेहनत रंग लाई और दुनिया के पहले हवाई जहाज का निर्माण संभव हो पाया। तलपडे ने उसको नाम दिया "मारुतसखा".   इसकी सफल मानवरहित उड़ान का प्रदर्शन हजारों लोगों की भीड़ के सामने बंबई की चौपाटी में किया था।   इसका जिक्र "डेक्कन हेराल्ड" अखबार ने 2003 में कुछ इस तरह किया है, "भारत के मशहूर
राष्ट्रीयता वादी जज श्री गोविन-दा रानाडे और एच. एच. सियाजी राव गायकवाड़ ने मारुतसखा की मानव रहित संक्षिप्त उड़ान को देख कहा कि देश में विमानन विज्ञान का भविष्य उज्जवल है".   तलपडे के एक शिष्य पी. सातवेलकर के साथ-साथ और कई लोगों और पुस्तकों ने  भी इस ऐतिहासिक घटना की पुष्टि की है। इन के अनुसार यह मशीन जमीन पर गिरने के पहले  हवा में करीब 1500 फिट की ऊंचाई पर कई मिनटों तक रही।  इस अद्भुत परिक्षण के आठ साल बाद, 17 दिसंबर 1903 को राइट भाईयों की मशीन 120 फिट की ऊंचाई तक जा 37 सेकेण्ड तक ही हवा में रह पाई थी।   

पर तलपड़े की इस महान उपलब्धि उस समय की अंग्रेज सरकार को रास नहीं आई और उसने बड़ौदा के महाराज पर जोर डाला कि परिक्षण पर रोक लगाई जाए।  ब्रिटिश हकूमत के आगे झुकते हुए महाराज ने तलपडे को दी जाने वाली आर्थिक मदद बंद कर दी लिहाजा इस दिशा में और आगे कुछ नहीं हो पाया।  इस परिक्षण के बाद इस मशीन को तलपडे के घर में रख दिया गया। अपने ही देश में इतनी बड़ी उपलब्धि के बावजूद असम्मानित, हताश, निराश तलपडे की मृत्यु 1916 में हो गयी। वर्षों बाद उन्हें याद किया गया है। 
अब तो उन पर आधारित एक फ़िल्म  "हवाईजादा" भी बन चुकी है, जो जल्दी ही दर्शकों के सामने आने वाली है।

काफी दिनों बाद मारुतसखा के एक मॉडल का प्रदर्शन मुंबई के  "विले-पार्ले" में हुई एक प्रदर्शनी में किया गया। इससे संबंधित कागजात "हिंदुस्तान एरोनॉटिक्स लिमिटेड" ने संभाल कर अपने पास रखे हुए हैं।  इस सवाल का कि हमारे ग्रंथों में इतनी बेशुमार जानकारी होने के बावजूद क्यों नहीं उसका उपयोग किया सका, एक ही उत्तर हो सकता है कि इस विद्या के दुरुपयोग होने के डर और आम इंसान की भलाई के लिए ही हमारे महान ऋषि-मुनियों ने इसको सार्वजनिक नहीं होने दिया होगा। जैसा कि परमाणु शक्ति के बारे में किया गया।   

सोमवार, 29 दिसंबर 2014

एक तमाशा मेरे आगे

जिस तरह छोटे-छोटे चुनावों का खर्च आसमान छूने लग गया है, लगता है भविष्य में स्कूल में क्लास का मॉनिटर बनना भी किसी आम परिवार के छात्र के लिए नामुमकिन हो जाएगा। 

होना तो यह चाहिए था कि जनता जनार्दन जितनी जागरूक यानी समझदार होगी उतना ही चुनाव खर्च कम होगा पर हो उल्टा ही रहा है। अभी 36 गढ़ के नगर निगमों के चुनाव को देख लग रहा था जैसे शहर चलाने  के लिए नहीं राज्य चलाने के लिए चुनाव हो रहे हों !  बीसियों दिन पहले से घेरा बंदी, मोर्चा बंदी, व्यूह रचना ऐसे शुरू हो गयी थी जैसे नगर निगम के पार्षद का नहीं विधान सभा के सदस्य का चुनाव होना हो। कद्दावर नेताओं की प्रतिष्ठा का भी यह प्रतीक बन गया था।  जैसे-जैसे चुनाव के दिन के सूर्य के उदय का समय नजदीक आता गया वैसे-वैसे गहमा-गहमी बढ़ती चली गयी। झंडे, बैनर, पोस्टर, पैंफ्लेट जैसी पुरातन प्रचार सामग्री तो थी ही इनके साथ-साथ नचैये-गवैयों को भी तरह-तरह के लोकप्रिय गानों की धुन पर फिट किए गए सामायिक शब्दों वाले गानों पर आलाप भरते-ठुमकते देखा जा सकता था। उनकी कला का फ़ायदा उठाने की भी पुरजोर कोशिश की जा रही थी।

पहले ऐसा होता था कि भीड़ इकट्ठा करने वाले को जमा हुए लोगों के हिसाब से उनके खाने-पीने के पैसे
पकड़ा दिए जाते थे या सारा सामान बाहर से मंगवाया जाता था। पर इस बार नई रणनीति के तहत ज्यादातर प्रत्याशियों ने अपने कार्यालय में ही भंडारा खोल दिया था, जहां सुबह के चाय-नाश्ते के साथ-साथ रात के डिनर तक की व्यवस्था कर दी गयी थी। वह भी कार्यकर्ताओं की पसंद-नापसंद पूछ-जान कर, जिसमें वेज और नॉनवेज  उपलब्ध करवाए गए थे। यह सब ताम-झाम इसलिए कि कार्यकर्ता सदा उम्मीदवार के साथ और पास बना रहे,  न खिसक जाए।  उनकी रूटीन भी बना-समझा दी गयी थी। सबेरे आते ही चाय-नाश्ता कर रैली में निकालो, घूम-फिर कर दोपहर को लौट खाना खाओ। कुछ देर आराम कर फिर अपने गले और शरीर के करतब दोहराओ, फिर वापस आ  चाय लेकर निकलो और फिर आ कर रात का भोजन पाओ।  

पर जाहिर है कि आजकल कोई भी सिर्फ खाने के लिए किसी से बंधा नहीं रहता।  इसलिए हरेक के लिए उसके काम के अनुसार मेहनताना भी निश्चित कर दिया गया था। हालांकि यह गोपनीय होता है पर स्थानीय अख़बारों की मानें तो अलग-अलग कामों के लिए यह 100 रुपये से शुरू हो 1000 रुपये तक  एक-एक सिर का रोज का भुगतान था।  अब हर पार्टी की "मीटरों लम्बी, चुनावी हथियारों से सजी" रैली के ऊपर रोज कितना खर्च आता होगा इसका अंदाज लगाना बहुत मुश्किल भी नहीं है।  जो पिछले चुनावों से और नहीं तो दोगुना तो हो ही चुका है।  किसी भी चीज को नष्ट या बर्बाद कर उसे दोबारा पाना बहुत मुश्किल या ना के बराबर ही होता है।  पर शायद पैसा ही ऐसी  चीज है जिसकी बढ़ोत्तरी के लिए उसे बेरहमी से खर्च (नष्ट या बर्बाद) किया जाता है।            

जिस तरह छोटे-छोटे चुनावों का खर्च आसमान छूने लग गया है, लगता है भविष्य में स्कूल में क्लास का मॉनिटर बनना भी किसी आम परिवार के छात्र के लिए नामुमकिन हो जाएगा।  

बुधवार, 24 दिसंबर 2014

क्या अंग्रेजी में बोलने से अपशब्द स्वीकार्य हो जाते हैं ?

एक नई-नई बनी माँ अपने छुटके को जिसे शायद ही माँ या पापा तक कहना आता हो, "हगी" पहनाते समय गा-गा कर समझाती है कि पहले राइट लेग उठाओ, फिर लेफ्ट लेग उठाओ फिर अपने "बम" पर चढ़ाओ.......!

बहुत दिनों बाद ठाकुर जी का मेरे यहां आना हुआ। पर कुछ उखड़े-उखड़े लग रहे थे, ठंड के बावजूद पहले की तरह आते ही चाय की फरमाईश नहीं की। मैंने ही कहा, अच्छे वक्त पर आए चाय बन ही रही है, पर आज मूड ठीक नहीं लग रहा, क्या हो गया ? पर वे अनमने से बने रहे, लगा जैसे बात शुरू करने का कोई छोर ढूँढ रहे हों। तभी चाय आ गयी, उसने माहौल सामान्य करने में अपना पूरा योगदान दिया। तब तक वे  भी प्रकृतिस्त हो चुके थे, बोले मंदिर से आ रहा हूँ। मुझे कुछ अजीब सा लगा कि मंदिर जाने से इनका मन परेशान क्यों हो गया, पर मैं बोला कुछ नहीं, उनके बोलने का इंतजार  करता रहा। चाय खत्म कर प्याला रख मुझे देखते हुए बोले, शर्मा जी, क्या आपने कभी आजकल की बातचीत में प्रयोग होने वाली भाषा पर ध्यान दिया है ?  मुझे लगा वो 'हिंग्लिश' के बारे में बोलना चाहते हैं। पर अपनी तरफ से कुछ न कहते हुए मैंने अपनी प्रश्नवाचक दृष्टि उन पर डाले रखी। तब उन्होंने अपने दिल की बात कहनी शुरू की, बोले मंदिर से दर्शन कर निकल ही रहा था कि अंदर दाखिल होती एक कन्या की पूजा की सामग्री किसी कारणवश गिर गयी, जिसके गिरते ही उसके मुंह से निकला  "शिट"……, सोचा कि उससे पूछूं कि इस शब्द का अर्थ तुम्हें मालुम भी है, पर फिर खिन्न मन लिए आप के पास चला आया। अब आप ही बताइये कि इन अर्ध-शिक्षितों को, जो मुस्कुराते हुए कहते हैं कि उनको हिंदी नहीं आती और उनकी इस बात पर उनके अभिभावक भी गर्व करते हैं, पर क्या वे कभी ध्यान देते हैं कि उनके नौनिहाल या 'नौनिहालिनियों' की  पकड़ अंग्रेजी पर भी पच्चीस-पचास शब्दों से ज्यादा नहीं है। ऐसों को ना ढंग से हिंदी आती है नाही अंग्रेजी। खिचड़ी भाषा में बतियाते हुए अपने आप को मॉडर्न दिखाने के चक्कर में साधारण से 'ओह' की जगह जबरन 'आउच' उच्चारते ये कैसे अस्वाभाविक लगते हैं, ये इन्हें नहीं मालूम।
मैंने कहा, ठाकुर जी, क्यों परेशान होते हैं, आज का दौर ही ऐसा हो गया है। आप किसी भी प्रांत से निकलने वाले हिंदी के अखबार को उठा लें, सिनेमा को देख लें, टेलीविजन का जायजा ले लें, किसी सेमिनार में भाग ले लें,  सब जगह ऐसी ही भाषा का इस्तेमाल होने लग गया है। इसमें वैसे कोई ख़ास बुराई भी नहीं है।
ठाकुर जी बोले, मैं दूसरी भाषा के शब्दों के उपयोग पर आपत्ति नहीं उठा रहा हूँ, मेरी परेशानी बात-चीत में अपशब्दों के प्रयोग से, वह भी बिना स्थान परिवेश या सामने वाले की उपस्थिति को देख उगल देने से है।आप तो टी. वी. बहुत कम देखते है, फिर भी शायद देखा होगा कि एक नई-नई बनी माँ अपने छुटके को जिसे शायद ही माँ या पापा तक कहना आता हो, "हगी" पहनाते समय गा-गा कर समझाती है कि पहले राइट लेग उठाओ, फिर लेफ्ट लेग उठाओ फिर अपने "बम" पर चढ़ाओ.......!
अब आप ही बताइये कि यह सब क्या है ?   मैं यह भी जानता हूं  कि कुछ लोग मुझे दकियानूस समझते हैं पर क्या बिना नंगाई या बेहयाई पर उतरे बिना बातचीत संभव नहीं है ?  ख़ास कर घर-घर तक पहुँच रखने वाले दृश्य मीडिया को तो अपनी जिम्मेदारी समझनी चाहिए।  हर जगह फूहड़ता का बोल-बाला हो गया है। इस पर विडंबना ये है कि अपने को सही साबित करने के लिए ये जनता की पसंद की दुहाई देने लग जाते हैं।

तभी उनके फोन की घंटी बज उठी, भाभी जी का था, इनके अभी तक घर न पहुँचने से ज़रा चिंतित थीं। ठाकुर जी तो चले गए पर अपनी बातों से मुझे सोच में डाल गए, तो मैंने सोचा कि आपसे पूछ कर देख लूँ कि आपका क्या विचार है ? क्या यह एक अस्थाई दौर है या सचमुच कोई  सोचनीय अवस्था दस्तक दे रही है ?                






रविवार, 21 दिसंबर 2014

दिल्ली का "मजनू का टीला", ये मजनू वो मजनू नहीं है

कभी-कभी एक जैसे नाम से गलतफहमी हो जाती है। जैसे किसी अनजान से इंसान के नाम पर किसी जगह की पहचान बनी हो तो सच्चाई न जानने वालों को लगता है कि उस जगह का नाम कथा-कहानियों में प्रचलित ज्यादा मशहूर इंसान के नाम पर ही रखा गया होगा। खोज-खबर न होने पर यह धारणा मजबूत भी होती चली जाती है।

ऐसी ही एक जगह है दिल्ली में, मजनू का टीला। ज्यादातर लोगों की धारणा है कि लैला के प्रेमी मजनू के नाम पर ही इस जगह का नामकरण हुआ होगा, जबकी असलियत यह है कि वर्षों पहले चौहदवीं शताब्दी में सिकंदर लोधी की बादशाहत के समय यहां अब्दुला नाम का एक मस्त-मौला, खुदा के ख्यालों में खोया रहने वाला इंसान रहता था, जो लोगों को अपनी नाव में यमुना नदी के आर-पार बिना कोई शुल्क लिए लाया ले जाया करता था। उसका रंग-ढंग देख लोग उसे मजनू यानी बावला पुकारने लग गए। दैव-योग से एक बार गुरु नानक देव का यहां आना हुआ और अब्दुला की निष्ठा को देख वे यहां उसके पास कुछ दिन रुक गए। उनके यहां निवास के दौरान हर धर्म के लोग धर्म-चर्चा के लिए उनके पास आने लगे। इसी बीच अब्दुल्ला उनके प्रति पूर्ण रूप से समर्पित हो गया। गुरु जी ने उसकी भक्ति देख उसे आशीर्वाद दिया की तुम्हारा नाम अमर हो जाएगा। वही हुआ उनकी कृपा अब्दुला पर देख लोग इस जगह को उसके प्रचलित नाम, मजनू के नाम से जानने लग गए।      

1783 में सिख सेना नायक बघेल सिंह ने जब दिल्ली फतह कर उसे कुछ दिन अपने कब्जे में रखा, उसी दौरान उन्होंने यहां एक गुरूद्वारे का निर्माण करवाया जो मजनू का टीला गुरुद्वारा कहलाया । जिसे महाराजा रंजीत सिंह ने बाद में विस्तार दिया। यहीं छठे गुरु हरगोविन्द सिंह जी ने भी आकर निवास किया था। आज यह दिल्ली के पुराने सिख धर्मस्थलों में से एक है।
सबसे पहले सन 1900 में अंग्रेजों द्वारा दिल्ली के निर्माण में जुटे मजदूरों  यहां ला कर बसाया गया। फिर
आजादी मिलने के बाद अरुणा नगर के नाम से रिहायशी इलाका आबाद हुआ। धीर्रे-धीरे जगह-जगह से लोग यहां आकर बसते गए। फिर 1960 में भारत सरकार ने न्यू अरुणा नगर बस्ती बसा वहाँ तिब्बती शरणार्थियों को पनाह दी। धीरे-धीरे उनकी आबादी बढ़ती गयी और आज यह जगह छोटे तिब्बत के रूप में अपनी पहचान बना चुकी है। यहां का तिब्बती बाजार सदा ग्राहकों से भरा रहता है जो अपनी पसंद के शाल, जूते, घर सजाने का सामान, तिब्बती कलाकृतियां ढूंढते-ढूंढते यहां आ पहुंचते हैं। यहां एक बौद्ध मठ तथा मंदिर भी है। इसके अलावा खाने-पीने की अनेक दुकाने खुल चुकी हैं, जहां नार्थ कैम्पस के विद्यार्थी और यहां आने वाले ग्राहक उचित मूल्य पर अपनी भूख शांत कर सकते हैं।       

दिल्ली की बढ़ती आबादी ने यहां भी अपना असर, आस-पास फैली सैंकड़ों झुग्गी-झोपड़ियों के जमावडे के रूप में फैलाया है, और इन्ही तीनों रिहायशी जगहों से घिरा हुआ है यह ऐतिहासिक मजनू का टीला। जहां अंतर्राज्यीय बस अड्डे या कश्मीरी गेट मेट्रो स्टेशन से आसानी से कुछ ही मिनटों में पहुंचा जा सकता है।

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