करीब दो साल पहले अन्ना हजारे के दिशा-निर्देश में शुरू हुए भ्रष्टाचार के खिलाफ आंदोलन का जो हश्र हुआ है,वह दुखदाई तो है ही साथ ही करोड़ों देश वासियों की उम्मीदों पर भी पानी फेरने वाला साबित हुआ। आम-लोगों को एक आस बंधी थी कि उनकी मेहनत की कमाई का वह हिस्सा जो टैक्स के रूप में सरकार लेती है और जिसका अच्छा-खासा प्रतिशत बेईमानों की जेब में चला जाता है, उसका जनता की भलाई में उपयोग हो सकेगा। उनको अपना हक पाने के लिए दर-दर भटकना नहीं पडेगा। भ्रष्टाचार पर रोक लगेगी और भ्रष्टाचारियों की नकेल कसी जा सके।
रोज-रोज की घोटाले की खबरों और उसमें लिप्त सफेद पोशों के काले चेहरों को देख आम आदमी पूरी तरह हताश-निराश हो चुका था। ऐसे में अन्ना के अवतरण, उनके व्यक्तित्व, उनके चरित्र, उनकी निस्पृहता से उसे अंधेरे में एक आशा की किरण दिखाई दी जिसे वह सुहानी सुबह की रोशनी समझ, उत्साह से भर आंदोलन का हिस्सा बन कभी राम-लीला मैदान तो कभी जंतर-मंतर पर जा खडा हुआ। उअसने आंधी-पानी की परवाह नहीं की। उसे पुलिस की लाठियां ना डरा सकीं, उसे जेल जाने का कौफ नहीं रहा। क्योंकि उसमें एक आशा जगी थी कि सामने वाला अपने जैसा आदमी जिसे सत्ता या धन का लोभ नहीं है वह व्यवस्था में जरूर कुछ ना कुछ फेर-बदल कर सुराज लाने में सफल होगा। कभी-कभी अन्ना के मंच पर विवादास्पद लोगों को जुटते देख एक शंका भी होती थी पर फिर अन्ना की ओजस्वी वाणी उसे आश्वस्त कर देती थी। यहां तक कि सत्तारूढ लोगों की चालों का जवाब देते हुए जब अन्ना ने चुनाव लडने की घोषणा की तब भी उस आम आदमी ने उन्हें जिताने का मन ही मन संकल्प ले लिया था। मगर जिस तरह से अन्ना हजारे और अरविंद केजरीवाल की राहें अलग हुईं हैं, जैसे इस आंदोलन के अंतर्विरोध और आपसी मतभेद उभर कर सामने आए हैं उससे भिर जन-मानस में हताशा-निराशा घर कर गयी है। क्योंकि इस आंदोलन ने सीधे सत्ता को चुन्नौती दी थी, राजनीति के सामने हुंकार भरी थी, आम इंसान जिनके सामने पडने में घबराता है उन हस्तियों को शीशा दिखलाया था।
अब केजरीवाल जो करने जा रहे हैं यदि उसमें अन्ना का साथ ना रहा तो वह कहां तक सफल होंगे, क्या वह जनता की आकांक्षाओं पर खरा उतर पाएंगे, क्या वे अपनी प्रतिबद्धताओं से जुड़े रह पाएंगे? क्या वे चुने जाने के बाद ईमानदार बने रह सकेंगे या फिर खिचडी सरकार बनने, जिसकी आशंका बहुत ज्यादा है, वे भी गठबंधन का फायदा उठा कर आज की नौटंकी की तरह नीतियों का विरोध करने के नाटक और साथ-साथ सत्ता में हिस्सा पाने के लिए कुछ भी करने को तत्पर हो मौकापरस्त बन जाएंगे यह तो समय ही बताएगा। पर अभी तो एक अच्छे उद्देश्य को लेकर शुरु हुए आंदोलन का हश्र बुरा ही रहा है।
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