pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

गुरुवार, 28 जुलाई 2011

नाम, जो अपने धारक से भी लम्बा है।


कल की पोस्ट में न्यूजीलैंड की एक पहाड़ी का जिक्र किया था, जिसका नाम दुनिया के किसी भी स्थान के सबसे लम्बे नाम के रूप में दर्ज है। आज उसी के बारे में कुछ         
तफसील से -
न्युजीलैंड के  दक्षिणी हिस्से    में एक   305 मी.   ऊंची पहाड़ी    को दुनिया  के किसी भी स्थान के सबसे लम्बे नाम वाली जगह होने का गौरव प्राप्त है। न्यूजीलैंड की Maori भाषा में    बोला जाने वाला   यह नाम कुछ इस प्रकार है -

“Taumatawhakatangihangakoauauotamateahaumaitawhitiurehaeaturipukakapikimaungahoronukupokaiwhenuakitanatahu”

पूरे 105 शब्दों वाले नाम को  बोलने की   आसानी के लिए संक्षिप्त कर पहले 57 शब्दों का बनाया  गया पर फिर                                                                                            

और छोटा कर उसे Taumata कर दिया गया। ऐसा माना जाता है कि इस जगह की खोज वर्षों पहले किसी "तामाटी" नाम के व्यक्ति ने की थी।

अब नाम है तो जाहिर है उसका कुछ अर्थ भी होगा। तो इस लम्बे से शब्द समूह का अर्थ है :- वह पहाड़ी जहां बैठ कर या परिक्रमा करते हुए तामाटी नामक बड़े घुटनों वाला, घुमक्कड पर्वतारोही अपनी प्रेयसी के लिए नाक से बजाई जाने वाली बांसुरी बजाता था। कैसा लगा, अंतरजाल की सहायता से मिला यह लम्बा सा बांसुरी वादन :-)

बुधवार, 27 जुलाई 2011

अजीब जरूर हैं, पर गरीब बिल्कुल नहीं हैं।

कुछ बातें ऐसी होती हैं जो हमारे आस-पास होती रहती हैं, हम उपयोग में भी लाते हैं पर उनकी "अजीबोगरीबियत" का हमें अंदाजा भी नहीं लग पाता। ऐसे ही कुछ नमूने पेश हैं :-

1, बताईये यह क्या लिखा गया है -
Taumatawhakatangihangakoauauotamateapokaiwhenuakitanatahu
यह न्यूजीलैंड की एक पहाड़ी का नाम है, जो संसार के किसी भी स्थान का सबसे लम्बा नाम है।

2, अंग्रेजी का 15 अक्षरों का अकेला शब्द uncopyrightable है जिसमें कोई भी अक्षर दोहराया नहीं जाता।

3, धन-दौलत-पैसा, जैसे शब्द सुनने में मधुर तथा कर्ण प्रिय लगते हैं। पर कर्ण प्रियता यानि संगीत का बाजार विश्व भर में करीब 40 खरब डालर का है।

4, आजकल नोट सिर्फ कागज के ही नहीं बनते बल्कि उनमें सूती और लिनेन जैसे कपडों की कतरने भी मिलाई जाती हैं।

5, अंग्रेजी भाषा के "set' शब्द के सबसे ज्यादा अर्थ मिलते हैं।

6, अमेरिकन और यूरोपियन लोग हर साल अपने पालतुओं पर करीब 17 बिलियन डालर खर्च कर डालते हैं।

7, " i " शब्द के ऊपर की बिंदी tittle कहलाती है।

सोमवार, 25 जुलाई 2011

"महामृत्युंजय मंत्र" में खरबूजे की महिमा का गुणगान

आज सावन मास का दूसरा सोमवार है। भगवान शिव का प्रिय दिन। "महामृत्युंजय मंत्र" उन्हीं देवों के देव श्री शंकर भगवान का अत्यंत शक्तिशाली मंत्र है

हमारे मंत्र और श्लोक इत्यादि अपने में गुढार्थ लिए होते हैं। इनका उपयोग करने की शर्त होती है कि इनका उच्चारण शुद्ध और साफ होना चाहिए। बहुत कम लोग ऐसे मिलते हैं जो मंत्रों या श्लोंकों को पढने या जाप करने के साथ-साथ उसका अर्थ भी पूरी तरह जानते हों, नहीं तो मेरे जैसों को जैसा रटवा दिया गया या पढ-सीख लिया उसका वैसे ही परायण कर लेते हैं। मंत्रों में सबसे शक्तिशाली मंत्र शिवजी का "महामृत्युंजय मंत्र" है। आस्था है कि इसका जाप करने से अकाल मृत्यु टल जाती है।

"ओ3म् त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय माsमृतात्।।"

भावार्थ :- हम लोग, जो शुद्ध गंधयुक्त शरीर, आत्मा, बल को बढाने वाला रुद्र्रूप जगदीश्वर है, उसी की स्तुति करें। उसकी कृपा से जैसे खरबूजा पकने के बाद लता बंधन से छूटकर अमृत तुल्य होता है, वैसे ही हम लोग भी प्राण और शरीर के वियोग से छूट जाएं। लेकिन अमृतरूपी मोक्ष सुख से कभी भी अलग ना होवें। हे प्रभो! उत्तम गंधयुक्त, रक्षक स्वामी, सबके अध्यक्ष हम आपका निरंतर ध्यान करें, ताकि लता के बंधन से छूटे पके अमृतस्वरूप खरबूजे के तुल्य इस शरीर से तो छूट जाएं, परंतु मोक्ष सुख, सत्य धर्म के फल से कभी ना छूटें।

देखने की बात यह है कि इतने प्रकार के फलों के होने के बावजूद मंत्र में खरबूजे का ही चयन क्यों किया गया। इसके बारे में यजुर्वेद में विस्तार से बताया गया है कि खरबूजे के विशिष्ट गुणों के कारण उसे यह सम्मान प्राप्त हुआ है। खरबूजा जब तक कच्चा रहता है तब तक बेल से अलग नहीं होता। जब वह पक जाता है तो उसकी सुगंध दूर-दूर तक फैल जाती है। उसकी मधुरता का जवाब नहीं होता। इसका चौथा गुण यह है कि वह दूसरे खरबूजे को देख रंग बदल लेता है। पक जाने पर जब वह बेल से अलग होता है तो बेल का कोई भी रेशा उसके साथ नहीं रहता। पक जाने पर वह अपने अंदर के बीजों को भी खुद से अलग कर देता है।

ठीक उसी तरह भक्त परमात्मा से प्रार्थना करता है कि हे देव, मुझे अकाल मृत्यु से दूर रखना, मेरे गुणों की सुगंध भी दूर-दूर तक फैले, मुझमें भी सदा औरों के लिए मधुरता यानि प्रेम बना रहे, मेरे गुणों से और लोग भी गुणी बनें, मेरे अंदर कभी दुर्गुण घर ना करें और जब मैं इस संसार को छोड़ कर जाऊं तो इसका मोह मुझे ना व्यापे और हे प्रभू आप से विनती है कि अपने से मुझे कभी दूर ना करें या रखें।

ॐ नम: शिवाय।

लेख में या लिखने में कोई त्रुटि रह गयी हो तो क्षमा करेंगे।

शनिवार, 23 जुलाई 2011

न नौ मन तेल होगा न राधा नाचेगी। ऐसा क्यों?

एक मुहावरा हैना नौ मन तेल होगा ना राधा नाचेगी काफी दिनों के बाद भी यह कोई नहीं बता पाया है कि नाच और तेल का आपस का क्या सम्बंध है। फिर यह राधा कौन है जो नाचने के लिए ऐसी ऊट-पटांग शर्त रख रही है। सोचने की बात यह भी है कि वह नाचेगी ही क्यूं ? बिना मतलब के तो कोई नाचता नहीं। हो सकता है कि कोई खास आयोजन होगा, पर यदि ऐसा है तो नौ मन तेल की शर्त क्यूं रखी गयी है ?

नौ मन तेल तो नहीं पर दिमाग का तेल निकालने के बाद ऐसा लगता है कि ये राधाजी कोई बड़ी जानी-मानी डांसिंग स्टार होंगी और किसी अप्रख्यात जगह से उन्हें बुलावा आया होगा। हो सकता है कि उस जगह अभी तक बिजली नहीं पहुंची हो और वहां सारा कार्यक्रम मशाल वगैरह की रोशनी में संम्पन्न होना हो। इस बात का पता राधा एण्ड़ पार्टी को वेन्यू पहुंच कर लगा होगा और अपनी प्रतिष्ठा के अनुकूल हर चीज ना पा कर आर्टिस्टों का मूड उखड़ गया होगा और उन्होंने ऐसी शर्त रख दी होगी जिसको पूरा करना गांव वालों के बस की बात नहीं होगी। पर फिर यह सवाल उठता है कि नौ मन तेल ही क्यूं ? राउंड फिगर में दस या पन्द्रह मन क्यूं नहीं ? तो हो सकता है कि यह आंकड़ा काफी दर-मोलाई के बाद फिक्स हुआ हो।

ऐसा भी हो सकता है कि पेमेन्ट को ले कर मामला फंस गया हो। वहां ग्रामिण भाई कुछ नगद और कुछ राशन वगैरह दे कर आयोजन करवाना चाहते हों पर राधा के सचिव वगैरह ने पूरा कैश लेना चाहा हो। बात बनते ना देख उसने इतने तेल की ड़िमांड रख दी हो जो पूरे गांव के भी बस की बात ना हो।

तो मुहावरे का लब्बो-लुआब यही निकलता है कि एक ख्यातनाम ड़ांसिंग स्टार अपने आरकेस्ट्रा के साथ किसी छोटे से गांव में अपना प्रोग्राम देने पहुंचीं। उन दिनों मैनेजमेंट गुरु जैसी कोई चीज तो होती नहीं थी सो गांव वालों ने अपने हिसाब से प्रबंध कर लिया होगा और यह व्यवस्था "राधा एण्ड कंपनी" को रास नहीं आयी होगी। पर उन लोगों ने गांव वालों को डायरेक्ट मना करने की बजाय अपनी एण्ड़-बैण्ड़ शर्त रख दी होगी। जो उस हालात और वहां के लोगों के लिये पूरा करना नामुमकिन होगा। इस तरह वे जनता के आक्रोश और अपनी बदनामी दोनों से बचने में सफल हो गये होंगे।

इसके बाद इस तरह के समारोह करवाने वाले अन्य व्यवस्थाओं के साथ-साथ नौ-दस मन तेल का भी इंतजाम कर रखने लग गये होंगे। वैसे किस तेल की फर्माईश की जाती रही है यह भी पता नहीं चल पाया है, क्योंकि फिर कभी राधाजी और तेल के नये आंकड़ों की खबर नहीं आयी है।

इस बारे में नयी जानकारियों का स्वागत है।

बुधवार, 20 जुलाई 2011

किसी लेखक ने अपनी कलम को कभी कोई नाम नहीं दिया, ऐसा क्यों?

सृष्टि के आरंभ में आदि-मानव को अपनी सुरक्षा और जानवरों को मारने के लिए अपने बाहुबल के अलावा भी किसी अन्य साधन की जरूरत महसूस हुई होगी। क्योंकि प्रकृति ने अन्य जीव-जंतुओं की तरह उसे आत्मरक्षा हेतु कोई अतिरिक्त प्राकृतिक सुविधा नहीं दे रखी थी। उल्टा वह ताकत में उनसे कमजोर ही साबित होता था। शुरु में अपने बचाव और भोजन प्राप्ति के लिए उसने अनघड़ पत्थरों या किसी पेड़ की ड़ाली का उपयोग हथियार के रूप में किया होगा। धीरे-धीरे उन्हीं चीजों को तीक्ष्ण आकार दे और घातक बनाया होगा और जब उसे समझ में आया होगा कि दूर से फेंक कर मारने में खुद की ज्यादा सुरक्षा है तो तीर और धनुष का आविष्कार हुआ होगा। शास्त्रों में भी तीर-धनुष का विशेष उल्लेख मिलता है। यहां तक कि देवताओं द्वारा धारण किए गये इस अस्त्र के बाकायदा नाम भी हैं। जैसे शंकरजी का "पिनाक", विष्णुजी का "श्रृंग", इंद्र का "विजय", अर्जुन का "गांडिव" जो अत्यधिक प्रसिद्ध रहा है। धनुषों का निर्माण बांस या किसी लचीली धातु से किया जाता था। धनुर्धर इसे तरह-तरह से सजा कर रखते थे। इसकी मार करीब 300 फुट तक होती थी।
ऐसा माना जाता है कि तीर-धनुष के बाद तलवार अस्तित्व में आई। जिसका आविष्कार ब्रह्माजी ने असुरों के संहार के लिए देवताओं के लिए किया था। भारत में भी इसके होने के प्रमाण 2000 ईसा पूर्व से मिलते हैं। इसके कयी रूप-रंग होते थे तथा इसका निर्माण लोहे से किया जाता था। तलवार योद्धाओं का प्रिय शस्त्र रहा है। इसे वे अपने शरीर का ही एक अंग मानते थे। यह कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि युद्ध में रत योद्धा अपनी तलवार पर अपना नाम लिख अपने विवाह मंडप में भेज देता था और उसी के साथ फेरे ले विवाह सम्पन्न मान लिया जाता था। कुछ इतिहास प्रसिद्ध तलवारें हैं, रावण की "चंद्हास", शिवाजी महारज की "भवानी", शाहजहां की "पारादल", अकबर की "लक्खी"। मुगल काल में शमशीर का बोलबाला रहा।
इसी तलवार या शमशीर से बहुत बार किसी राजकुमारी का हाथ पाने के लिए प्रतियोगिताएं जीती गयीं। यूरोप में तो इस तरह के आयोजन होते ही रहते थे।
ये तो हुई प्राण लेने वाले हथियारों की बात जो योद्धाओं में इतने प्रिय थे कि उन्होंने बाकायदा इन्हें नाम दे रखा था।
यह सब देख-सुन एक सवाल उठता है मन में कि योद्धाओं की तरह लेखक का प्रिय हथियार तो कलम ही होती है। उस से किसी का खून तो नहीं बहता पर उसकी ताकत से बहुत बार साम्राज्यों की चूलें हिल गयीं, समाज का रवैय्या बदल गया, लोगों की सोच में आमूल-चूल परिवर्तन आ गये, पर आज तक किसी लेखक ने अपनी लेखनी को कोई नाम दिया हो यह बात सुनने में नहीं आई। जब कि कहावत है कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है।
ऐसा क्यूं ?

रविवार, 17 जुलाई 2011

क्या देवी-देवताओं को वाहनों की जरूरत पड़ती है?

वर्षों से यह धारणा चली आ रही है कि हमारे देवी-देवताओं के पशु या पक्षी के रूप में अपने-अपने वाहन होते हैं। जैसे माँ दुर्गा का सिंह, शिवजी का नंदी बैल, विष्णुजी का गरुड़, गणेशजी का चूहा, कार्तिकेयजी का मोर, लक्ष्मीजी का उल्लू इत्यादि-इत्यादि !
शायद इसीलिए इन देवी-देवतओं के साथ यह पशु-पक्षी चित्रित किए जाते रहे हैं। पर सोचने की बात यह है कि जैसी मान्यता है, हमारे देवी-देवता तो कहीं भी कभी भी क्षणांश में आने-जाने में सक्षम हैं। फिर यह भी धारणा है कि देव जाति दया, वात्सल्य तथा ममता से सराबोर है तो वे क्यों निरीह प्राणियों को ऐसे काम में ला उन्हें कष्ट देंगे।

हाँ, ऐसा हो सकता कि इन मूक, निरीह, प्रकृति की सुंदर रचनाओं को मनुष्य के हाथों बचाने के लिए उनके प्राणों की रक्षा हेतु उनका सम्बंध देवी देवताओं से इस रूप में जोड़ दिया गया हो। क्योंकि हो सकता है कि प्राचीन समय में किसी कारणवश भूमि से शाकाहार उतना प्राप्त ना किया जा सक रहा हो या मनुष्य उतनी मेहनत ना कर आसानी से उपलब्ध मांसाहार पर ज्यादा निर्भर रहने लगा हो और यही सब देख कर हमारे भविष्यदृष्टा ऋषि-मुनियों ने, आगत को ध्यान में रख, निर्दोष जीव-जंतुओं का जितना भी संभव हो बचाव हो सके, इसलिए यह बात आम जन के मन में वैसे ही बैठाने की कोशिश की हो जैसे पेड़-पौधों में देवताओं का वास बता उनके अंधाधुंध विनाश पर रोक लगाने के लिए की गयी थी।

कभी ध्यान से श्री कृष्णजी के पास खड़ी उनकी पांव की तरफ मुग्ध भाव से झुकी गाय को देखा है। कितने कोमल भाव हैं कितनी ममता है। भगवान दत्तात्रेयजी के साथ सदा मुग्धा गाय, काले कुत्ते या कबूतर को देख किसके मन में हिंसा उपज सकती है। ईसा की बाहों में मेमना, घायल हंस को अश्रुपूरित आंखों से तकते सिद्धार्थ, माँ सरस्वतीजी का हंस, शिवजी के पूरे परिवार का विभिन्न पशु-पक्षियों के साथ सानिध्य, गुरु गोविंद सिंहजी का बाज यह सभी तो एक ही संदेश दे रहे हैं। दया का, ममता का, धरा के सारे प्राणियों के साथ प्रेम-भाव का।

शनिवार, 16 जुलाई 2011

आक्रोश

देश की दुर्दशा और उसके तथाकथित कर्णधारों की हरकतों से यहां की जनता ही नहीं विदेशों में रह रहे भारतीय भी विक्षुब्ध हैं। ऐसे ही एक भाई ने अपना आक्रोश शब्दों में ढाल कर इ-मेल से भेजा है।

आओ बच्चों तुम्हें दिखाएं
झांकी घपलिस्तान की
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है बेईमान की

बंदों में है दम,
राडिया-विनायकम्
बंदों में है दम, राडिया-विनायकम्

उत्तर में घोटाले करती
मायावती महान है
दक्षिण में राजा-कनिमोझी
करुणा की संतान हैं
जमुना जी के तट को देखो
कलमाडी की शान है
घाट-घाट का पानी पीते
चावला की मुस्कान है.

देखो ये जागीर बनी है
बरखा-वीर महान की
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है बेईमान की

बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.

ये है अपना जयचंदाना
नाज़ इसे गद्दारी पे
इसने केवल मूंग दला है
मजलूमों की छाती पे
ये समाज का कोढ़ पल रहा
साम्यवाद के नारों पे
बदल गए हैं सभी
अधर्मी भाडे के हत्यारे में
हिंसा-मक्कारी ही अब
पहचान है हिन्दुस्तान की

इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है हैवान की
बन्दों में है दम...राडिया-विनायकम्.

देखो मुल्क दलालों का,
ईमान जहां पे डोला था.
सत्ता की ताकत को
चांदी के जूतों से तोला था.
हर विभाग बाज़ार बना था,
हर वजीर इक प्यादा था.
बोली लगी यहाँ
सारे मंत्री और अफसरान की.
इस मिट्टी पे सर पटको
ये धरती है शैतान की.
बन्दों में है दम... नंगे-बेशरम....!

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...