pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 1 मार्च 2011

भगवान ने भी क्रैश कोर्स करवाया

धीरे-धीरे स्वर्ग में रहनेवाले वहां की एक जैसी जिंदगी और दिनचर्या से ऊबने लग गये थे। वही रोज की रुटीन, ना काम ना काज, ना थकान ना सुस्ती। समय पर इच्छा करते ही हर चीज उपलब्ध। बस सुबह-शाम भजन-कीर्तन, स्तुति गायन। फिर वही हुआ जो होना था। सुख का आंनद भी तभी महसूस होता है जब कोई दुख: से गुजर चुका होता है।अब स्वर्ग में निवास करने वाली आत्माएं जो परब्रह्म में लीन रह कर उन्मुक्त विचरण करती रहती थीं, उन्हें क्या पता था कि बिमारी क्या है, दुख: क्या है, क्लेश क्या है, आंसू क्यों बहते हैं, बिछोह क्या होता है, वात्सल्य क्या चीज है ममता क्या है।
भगवान भी वहां के वाशिंदों की मन:स्थिति से वाकिफ थे। वैसे भी वहां की बढती भीड़ ने उनके काम-काज में रुकावट डालनी शुरु कर दी थी। सो उन्होंने इन सब ऊबे हुओं को सबक सिखाने के लिये एक "क्रैश कोर्स" की रूपरेखा बनाई। इसके तहत सारी आत्माओं को स्वर्ग से बाहर जा कर तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे। इसके लिये एक रंगमंच की आवश्यकता थी सो पृथ्वी का निर्माण किया गया। वहां के वातावरण को रहने लायक तथा मन लगने लायक बनाने के लिये मेहनत की गयी। हर छोटी-बड़ी जरूरत का ध्यान रख उसे अंतिम रूप दे दिया गया। पर आत्माओं पर तो कोई गति नहीं व्यापति। इसलिये उन्हें संवेदनशील बनाने के लिये एक माध्यम की जरूरत महसूस हुई इस के लिये शरीर की रचना की गयी जिसमें स्वर्ग के एक क्षणांश की अवधि में रह कर हरेक को तरह-तरह के अनुभव प्राप्त करने थे।
अब हर आत्मा का अपना नाम था, अस्तित्व था, पहचान थी। उसके सामने ढेरों जिम्मेदारियां थीं। समय कम था काम ज्यादा था। पर यहां पहुंच कर भी बहुतों ने अपनी औकात नहीं भूली। वे पहले की तरह ही प्रभू को याद करती रहीं। कुछ इस नयी जगह पर बने पारिवारिक संबंधों में उलझ कर रह गयीं। पर कुछ ऐसी भी निकलीं जो यहां आ अपने आप को ही भगवान समझने लग गयीं। अब इन सब के कर्मों के अनुसार भगवान ने फल देने थे। तो अपनी औकात ना भुला कर भग्वद भजन करने वालों को तो जन्म चक्र से छुटकारा मिल फिर से स्वर्ग की सीट मिल गयी। गृहस्थी के माया-जाल में फसी आत्माओं को चोला बदल-बदल कर बार-बार इस धरा धाम पर आने का हुक्म हो गया। और उन स्वयंभू भगवानों ने, जिन्होंने पृथ्वी पर तरह-तरह के आतंकों का निर्माण किया था, दूसरों का जीना मुहाल कर दिया था, उनके लिये एक अलग विभाग बनाया गया जिसे नरक का नाम दिया गया।
अब स्वर्ग में भीड़-भाड़ काफी कम हो गयी है। वहां के वाशिंदों को अपने-अपने अनुभव बता-बता कर अपना टाइम पास करने का जरिया मिल गया है।
प्रभू आराम से अपनी निर्माण क्रिया में व्यस्त हैं।

सोमवार, 28 फ़रवरी 2011

ऐसी मनस्थिति कब तक बनी रहेगी

शुक्रवार २५ फरवरी, दिल्ली से मुम्बई जाने वाली इंडिगो कम्पनी की उड़ान में एक तमाशा हो गया। उड़ान पहले से ही कोहरे की वजह से अपने निश्चित समय से एक घंटा लेट हो चुकी थी। नौ बजे के करीब जब उड़ने को तैयार हुई तभी उसके दरवाजे फिर खोल दिए गए। क्योंकि एक अधेड़ पुरुष को जहाज की चालाक एक महिला होने क कारण घबडाहट हो गयी थी।
पूरा ब्योरा इस तरह है कि जैसे ही प्लेन में औपचारिक घोषणा के साथ पायलट का नाम बताया गया वैसे ही एक अधेड़ पुरुष ने बडबडाते हुए अपने पड़ोसी को कहना शुरू कर दिया "मरना है क्या ? घर तो संभलता नहीं, प्लेन क्या संभलेगा ?
फिर उसने एयर होस्टेज को बुलाया और प्लेन की महिला पायलट होने पर आपत्ती जताई। बहस-बाजी करीब चालीस minat tak chalatee rahii जिससे दुसरे यात्रियों में अंसतोष फैलने लगा।
प्लेन तभी उड़ पाया जब उस मुसाफिर को प्लेन से उतार उसका असबाब उसके हवाले कर दिया गया।
* हिंदी के अस्त्र-शस्त्र धोखा दे रहे हैं

गुरुवार, 24 फ़रवरी 2011

व्यक्ति पूजा घातक भी हो सकती है '२'

13 मे 1931 को इंड़ियाना मे एक बच्चे का जन्म हुआ। नाम था उसका जेम्स वारेन 'जिम' जोंस। उस समय किसे पता था कि '13' तारीख को जन्मने वाला यह बच्चा बड़ा हो कर दुनिया के सबसे बड़े नरसंहार का प्रणेता बनेगा। बड़े हो कर 1950 में वह कैलिफोर्निया में जाकर जिंदगी की जद्दोजहद में शामिल हुआ पर उसकी पहचान बनी जब उसने 1978 के मध्य में "प्युपिल-टेंपल" नामकी संस्था बनाई और उसका मुख्यालय सैन-फ्रैंसिस्को में स्थापित किया। और खुद उसका संस्थापक और लीड़र बना। वहां उसके हजारों अनुयायी बन गये। पता नहीं क्या खूबी थी उसके व्यक्तित्व में, क्या सम्मोहन था उसकी वाणी में कि कोई भी उसके कहने पर कुछ भी करने को तत्पर रहता था।

समय बीतता गया जोंस की ख्याति, दीन-दुखियों के मसीहा, दर्दमंदों के हमदर्द, अश्वेतों के रहबर और समाजवादी धारा के नायक के रूप में चारों ओर फैल गयी। लोग उसके विचार सुनने के लिए पागल हुए रहते थे। व्यक्ति पूजा का वह एक अद्वितीय उदाहरण बन गया था। उसने लोगों पर तरह-तरह के प्रयोग करने शुरु कर दिए थे।

नवम्बर 1978, उन दिनों वह अपने अनुयायीयों के मन से मौत का ड़र मिटाने का प्रयोग कर रहा था। इसके लिए वह उन्हें मीठा शरबत जहर के नाम पर पिलवाता रहा जिससे लोगों के मन से मौत का खौफ निकल जाए ।
17 नवम्बर की शाम को प्रवचन के बाद उसने सबको दूसरे दिन सुबह-सुबह मंदिर के प्रांगण में इकट्ठा होने का आदेश दिया। 18 नवम्बर की भोर बेला में सैंकड़ों स्त्री-पुरुष अपने बच्चों समेत अपने गुरु की वाणी सुनने घने जंगल में स्थित मंदिर के प्रांगण में आ जमा हुए। कुछ ही देर बाद जोंस वहां नमूदार हुआ और बगैर किसी भूमिका के उसने अपना फरमान सुना दिया "आज तुम सब को अपने दिलों से मौत का खौफ सदा के लिए मिटाने के वास्ते मरना होगा। यह मौत सम्मानजनक होगी। जितना मैं तुम्हें चाहता हूं यदि तुम भी मुझे उतना ही चाहते हो तो तुम्हें मेरा आदेश मानना पड़ेगा।"

भीड़ में ड़र की लहर दौड़ गयी। भय, आतंक, ड़र का साया साफ पसरा दिख रहा था। अधिकांश अपने गुरु का यह आदेश मामने को राजी नहीं थे। पूरा परिसर निस्तब्ध था। माओं ने अपने बच्चे कस कर अपनी छाती से चिपका लिए थे। तभी कहीं से किसी ने रोते हुए पूछा "पर हमारा कसूर क्या है? हमें क्यूं मरना है?"
कोई उत्तर नहीं दिया गया पर जोंस की मौत की तरह ठंडी आवाज गूंजी "शरबत ला कर पहले बच्चों को दिया जाए"।
मांएं चित्कार कर उठीं और अपने बच्चों को अपने में छिपाने की निष्फल कोशिश करने लगीं। इसे देख फिर आवाज आई "भलाई इसी में है कि खुद ही विष पी लो नहीं तो गोली के शिकार बना दिए जाओगे।"बात ना मानते देख पहरेदारों को इशारा हुआ और उन्होंने मांओं से जबरन बच्चों को छीन कर उनके मुंह में विष उड़ेल दिया। बाकियों के लिए भी कोई विकल्प नहीं था। कुछ ही देर में पूरा परिसर सैंकड़ों लाशों से पट गया। यहां तक कि पालतु पशु-पक्षियों को भी नहीं छोड़ा गया। अंत में रेवरेंड़ जोंस ने खुद को भी गोली मार ली।

इस दिन के पहले जो दुखियों का मसीहा, दर्दमंदों का हमदर्द, समाजवादी धारा का नायक और अश्वेतों का रहबर समझा जाता था। उस दिन के बाद से उसकी एक ही पहचान बची थी भगवान से शैतान।

गायना का यह सामूहिक नरसंहार दुनिया का सबसे बड़ा 'Murder Mass Suicide" माना जाता है।

इन अभागे लोगों के साथ वहीं से गुजर रहे पांच लोग भी अपनी उत्सुकता के कारण मारे गये थे। जबकि उनका इस पंथ से कोई लेना-देना नहीं था।

मंगलवार, 22 फ़रवरी 2011

व्यक्ति पूजा बहुत घातक होती है

किसी भी व्यक्ति के प्रति समाज के किसी भी वर्ग का अंधनुकरण या समर्पण घातक होता है। इतिहास में ऐसे अनगिनत उदाहरण मौजूद हैं जब धर्म गुरुओं या राज नेताओं ने खुद अपने को पुजवा कर अपनी शक्ति बढा उसका दुरपयोग किया है। भेड़ों की तरह अपने अनुयायियों को अपनी वाणी से सम्मोहित कर उसे काल्पनिक संसार का सपना दिखा, अपनी बात मनवाने को अपना अनुकरण करने को बाध्य कर दिया है। फिर वह अनुयायी इंसान नहीं रह जाता एक वस्तु बन जाता है जिसका उपयोग कर्ता सिर्फ अपने हित को साधने में करने लगता है। अपने पीछे खड़ी भीड़ की ताकत दिखा वह कर्ता लोगों पर, समाज पर और तो और देश पर भी हावी होने का दुस्साहस करने लगता है।

कभी लोग किसी को पूज कर भगवान बना देते हैं कभी कोई खुद को पुजवा कर भगवान बन बैठता है। स्थितियां दोनों ही भयावह होती हैं। पर हम भी क्या करें हमें घुट्टी में घोंट-घोंट कर पिलाया गया है कि अपना जीवन सार्थक करने के लिए किसी की शरण में जाओ। वही तुम्हें सही राह दिखाएगा। सुखी हो तो मोक्ष मिलेगा दुखी हो तो त्राण। अब असुरक्षा की भावना, भावी का ड़र, रोज की कशमकश से छुटकारा पाने को बेताब किसी न किसी की शरण में जा पहुंचता है। वह शरण धार्मिक भी हो सकती है और राजनीतिक भी। वहां के भंवर में जा फंसने के बाद उसका अस्तित्व धीरे-धीरे लोप कर दिया जता है, कर्ता की सम्मोहिनी सत्ता उस पर काबिज हो जाती है। कभी-कभी वहां से उकता कर निकलने की कोशिश भी करता है तो उस मकड़ी के जाले से उसकी मुक्ति नहीं हो पाती। उसके दिमाग पर ऐसा असर डाल दिया जाता है कि अपने गुरु पर कितने आरोप भी सिद्ध हो जाएं अनुयायी विश्वास नहीं करता। अभी हाल ही के दिनों में "चैनलाई स्वयंभू भगवानों" पर कितने ही आरोप प्रमाणित हुए पर भक्तों की आंखें कहां खुलीं।

अभी भी दुनिया में हताश-निराश लोगों की भगवान में आस्था है। वह उसकी शरण में जाता भी है परंतु तुरंत राहत ना मिल पाने की वजह से वह इन कलयुगी भगवानों के चक्कर में फंस जाता है जिन्होंने बड़े ही सुनियोजित तरीके से अपना जाल फैलवा रखा होता है। यह व्यक्ति पूजा धार्मिक लबादा ओढे रहती है। जिसकी आड़ में तमाम अधार्मिक कर्म प्रशय पाते हैं।

व्यक्ति पूजा के दुसरे केंद्र राजनीतिक खेमे में चरण वंदना से खेल शुरु करवाया जाता है। चरण स्पर्श, चाटुकारिता, स्तुति-गान कुछ ऐसी सीढियां हैं जिन पर अपने कुछ खास चहेतों को चढवा कर किसी दुर्लभ जगह काबिज करवा अन्य नये-पुराने पिछ्लगुओं पर अपनी धाक जमा अपने आप को जनता का भाग्य विधाता रोपित करने में कामयाबी हासिल कर लेते हैं । फिर शुरु होती है बाकियों में भी कुछ हासिल करने के लिए उस व्यक्ति विशेष की चापलूसी, जो कभी चप्पल उठा पीछे दौड़ने के रूप में सामने आती है तो कभी जूतों पर का कीचड़ साफ करके, या फिर अपने आका को खुश करने के लिए किसी की बेज्जती कर के। इन रीढ विहीनों का एक ही मकसद होता है कि वह व्यक्ति विशेष किसी भी तरह अपनी नजरें इनायत इन पर कर दे।

यह व्यक्ति पूजा शायद मनुष्य की उत्पत्ति के साथ ही उसके दिमाग में रोपित हो गयी है। इसके लिए किसी देश, धर्म या पंथ की सीमा नहीं है। वह व्यक्ति सिकंदर भी हो सकता है, बाबर भी, हिटलर भी, माओ भी गद्दाफी भी या हमारे "चैनलाई स्वयंभू भगवान" भी।

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* कल ऐसे ही एक गुरु की हिमाकत जिसने करीब हजार अनुयायिओं को एक ही समय में मौत का आलिंगन करने पर मजबूर कर दिया था।

शनिवार, 19 फ़रवरी 2011

मयखाने भी क्या-क्या गुल खिलाते हैं

एक बड़ी कंपनी की बस से चार-पांच युवक उतर कर एक बार में पीने को घुसे। उन्होंने जम कर पी। फिर वहीं एक लड़की से छेड़खानी शुरु कर दी। वहां बैठे एकमात्र बुजुर्ग ग्राहक ने हस्तक्षेप किया तो उसकी पिटाई की और उसे बाहर धकेल दिया।लड़की ने आकर बुजुर्ग को उठाया और पूछा ज्यादा चोट तो नहीं आई, कमबख्तों ने बहुत मारा है।कोई बात नहीं बुजुर्ग ने मुस्कुराते हुए कहा जब उन्हें अपनी जेबें खाली मिलेंगी तो नानी याद आ जाएगी। कंपनी की बस देखते ही मुझे उनके मालदार होने का विश्वास हो गया था क्योंकि वह कंपनी आज की तारीख में ही वेतन बांटती है। लड़की मुस्करायी और बोली, ईश्वर को धन्यवाद है कि आपकी पिटाई और मेरी एक्टिंग बेकार नहीं गयी।

(बहुत पहले आई एक फिल्म "शान" में जानी वाकर और बिंदिया गोस्वामी के रोल भी इसी ब्राजील की लघु कथा से लिए गये थे शायद।)

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बार से नशे में धुत झुमते-झामते बाहर निकलते हुए श्रीमानजी ने द्वारपाल से पूछा 'आज तक तुम्हें ज्यादा से ज्यादा टिप कितनी मिली है'?
'सौ रुपये सर' उसने जवाब दिया।
'बस! ये लो दो सौ रुपये, वैसे किसने तुम्हें सौ रुपये दिए थे?'
'कल आपने ही सर'

शुक्रवार, 18 फ़रवरी 2011

"स्वयंप्रभा" रामायण का एक उपेक्षित पात्र

थके-हारे, निश्चित समय में सीता माता को ना खोज पाने के भय से व्याकुल, वानर समूह को उचित मार्गदर्शन दे, लंका का पता बताने वाली सिद्ध तपस्विनी "स्वयंप्रभा" को वाल्मीकि रामायण के बाद कोई विशेष महत्व नहीं मिल पाया। हो सकता है, श्री राम से इस पात्र का सीधा संबंध ना होना इस बात का कारण हो।

शबरी की तरह ही स्वयंप्रभा भी श्री राम की प्रतीक्षा, एकांत और प्रशांत वातावरण में संयत जीवन जीते हुए कर रही थी। परन्तु ये शबरी से ज्यादा सुलझी और पहुंची हुई तपस्विनी थीं। इनका उल्लेख किष्किंधा कांड के अंत में तब आता है, जब हनुमान, अंगद, जामवंत आदि सीताजी की खोज में निकलते हैं। काफी भटकने के बाद भी सीताजी का कोई सुराग नहीं मिल पाता है। सुग्रीव द्वारा दिया गया समय भी स्माप्ति पर आ जाता है। थके-हारे दल की भूख प्यास के कारण बुरी हालत होती है। सारे जने एक जगह निढ़ाल हो बैठ जाते हैं। तभी हनुमानजी को एक अंधेरी गुफा में से भीगे पंखों वाले पक्षी बाहर आते दिखते हैं। जिससे हनुमानजी समझ जाते हैं कि गुफा के अंदर कोई जलाशय है। गुफा बिल्कुल अंधेरी और बहुत ही डरावनी थी। सारे जने एक दूसरे का हाथ पकड़ कर अंदर प्रविष्ट होते हैं। वहां हाथ को हाथ नहीं सूझता था। बहुत दूर चलने पर अचानक प्रकाश दिखाई पड़ता है। वे सब अपने आप को एक बहुत रमणीय, बिल्कुल स्वर्ग जैसी जगह में पाते हैं। पूरा समूह आश्चर्य चकित सा खड़ा रह जाता है। चारों ओर फैली हरियाली, फलों से लदे वृक्ष, ठंडे पानी के सोते, हल्की ब्यार सब की थकान दूर कर देती है। इतने में सामने से प्रकाश में लिपटी, एक धीर-गंभीर साध्वी, आती दिखाई पड़ती है। जो वल्कल, जटा आदि धारण करने के बावजूद आध्यात्मिक आभा से आप्लावित लगती है। हनुमानजी आगे बढ़ कर प्रणाम कर अपने आने का अभिप्राय बतलाते हैं, और उस रहस्य-लोक के बारे में जानने की अपनी जिज्ञासा भी नहीं छिपा पाते हैं। साध्वी, जो की स्वयंप्रभा हैं, करुणा से मंजुल स्वर में सबका स्वागत करती हैं तथा वहां उपलब्ध सामग्री से अपनी भूख-प्यास शांत करने को कहती हैं। उसके बाद शांत चित्त से बैठा कर वह सारी बात बताती हैं।
यह सारा उपवन देवताओं के अभियंता मय ने बनाया था। इसके पूर्ण होने पर मय ने इसे देवराज इंद्र को समर्पित कर दिया। उनके कहने पर, इसके बदले कुछ लेने के लिए जब मय ने अपनी प्रेयसी हेमा से विवाह की बात कही तो देवराज क्रुद्ध हो गये, क्योंकि हेमा एक देवकन्या थी और मय एक दानव। इंद्र ने मय को निष्कासित कर दिया, पर उपवन की देख-भाल का भार हेमा को सौंप दिया। हेमा के बाद इसकी जिम्मेदारी स्वयंप्रभा पर आ गयी।

इतना बताने के बाद, उनके वानर समूह के जंगलों में भटकने का कारण पूछने पर हनुमानजी उन्हें सारी राम कथा सुनाने के साथ-साथ समय अवधी की बात भी बताते हैं कि यदि एक माह स्माप्त होने के पहले सीता माता का पता नहीं मिला तो हम सब की मृत्यु निश्चित है। स्वयंप्रभा उन्हें कहती हैं कि घबड़ायें नहीं, आप सब अपने गंतव्य तक पहुंच गये हैं। इतना कह कर वे सबको अपनी आंखें बंद करने को कहती हैं। अगले पल ही सब अपने-आप को सागर तट पर पाते हैं। स्वयंप्रभा सीताजी के लंका में होने की बात बता वापस अपनी गुफा में चली जाती हैं।

आगे की कथा तो जगजाहिर है। यह सारा प्रसंग अपने-आप में रोचक तो है ही, साथ ही साथ कहानी का महत्वपूर्ण मोड़ भी साबित होता है।

"पर पता नहीं, स्वयंप्रभा जैसा इतना महत्वपूर्ण पात्र उपेक्षित क्यूं रह गया।

गुरुवार, 17 फ़रवरी 2011

सामने वाले सौदेबाजों को क्यों नहीं सालता सरकार गिरने का डर ?

जब इतने बड़े देश का मुखिया दीन-हीन बन कर ऐसी भाषा का प्रयोग करे जिसमें पूरी तरह हताशा, निराशा और कमजोरी झलकती हो तो देश की जनता कितनी निराश होगी कोई भी सोच सकता है।

देश का सबसे ताकतवर इंसान यह कहता है कि गठबंधन में समझौते करने पड़ते हैं, पर यह कैसा समझौता है कि आओ हमारी पार्टी की सरकार बनवाओ और इसके बदले में देश को लूट कर खा जाओ। यदि गठबंधन टूटने पर सरकार गिरने का ड़र आपको सालता है तो सामने वाले सौदेबाजों को भी तो मालुम है कि ऐसा होने पर वे कहीं के नहीं रहेंगे। बात तो तब होती जब आप उनके आगे झुकने से बेहतर उन्हें धमकी देते कि मैं किसी भी हालत में नाजायज मांगें स्वीकार नहीं करूंगा चाहे इसके लिए कोई भी कीमत क्यों ना चुकानी पड़े। इस पर यदि बात नहीं बनती तो फिर जनता के सामने सारी हकीकत रख फिर जनादेश के लिए चुनाव करवाना देश पर उतना भारी नहीं पड़ता जितना एक निरंकुश इंसान ने अकेले हड़प लिया। इस पर सारे देश के सामने आपकी छवि और निखर कर सामने आती।

भले ही ईमानदारी से गलती मान कर अपना पक्ष सही ठहराने की आपके द्वारा कोशिश की गयी हो पर यह सब बातें किसी के गले नहीं उतरी है। आपके सामने भ्रष्टाचार का नंगा नाच होता रहा और उसके कारण को जानते हुए भी मूक दर्शक बने रहना और फिर कहना कि मैं मजबूर था। सामने वाले ने आपको समझा दिया कि सब नियमानुसार हो रहा है और आपका आंख मूंद कर बैठ जाना। अरबों की हेरा-फेरी हो रही हो और अर्थशास्त्री होने पर भी भनक ना लगना। कोई कैसे विश्वास कर पाएगा इन बातों पर। फिर अब सारा दोष दूसरों पर मढना। गठबंधन की मजबूरियां गिनाना। अब आप ही बताएं कि यदि आप ही मजबूर और लाचार हैं तो ताकतवर और सक्षम कौन है?

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