pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

रविवार, 13 फ़रवरी 2011

यह "त्रिशंकु" कौन था ?

देवराज इंद्र इस गलत परंपरा से बहुत क्रोधित थे सो इसके निवारण हेतु उन्होंने सत्यव्रत को फिर नीचे की ओर ढकेल दिया। अब ऋषी के तपोबल और देव प्रकोप के कारण सत्यव्रत कहीं का ना रहा।

सत्ता और धन आज से नहीं हजारों-हजार साल से मनुष्य के दिमाग को विकृत करते आए हैं। फिर उस असंतुलित दिमाग ने  अपने स्वामी को अहम से भर सनकी बना अजीबोगरीब काम या फैसले  करने पर मजबूर
किया है। ऐसा ही एक चरित्र है   "त्रिशंकु"।    जिसका असली नाम था सत्यव्रत। सूर्यवंशी राजा सत्यव्रत। उस पर प्रभू की असीम कृपा थी। यश चारों ओर फैला हुआ था। सब ठीक-ठाक था पर उसे कुछ अनोखा करने की इच्छा सदा बनी रहती थी। अचानक एक दिन उसके दिमाग में एक कीडा कुलबुलाया और एक सनक ने जन्म लिया कि मुझे सशरीर स्वर्ग जाना है। बस फिर क्या था इस प्रयोजन के लिए उसने विशेष यज्ञ की तैयारी कर अपने कुलगुरु ऋषी वसिष्ठ को यज्ञ का संचालन करने को कहा। पर वसिष्ठ ने इस प्रकृति विरुद्ध कार्य को करने से इंकार कर दिया। राजा पर तो सनक सवार थी उसने ऋषी वसिष्ठ के पुत्रों के पास जा उनसे इस कार्य को संपन्न करवाने को कहा। पर वे भी इस गलत परंपरा को डालने को किसी भी प्रकार राजी नहीं हुए। समझाने पर भी राजा ने उनकी बात नहीं मानी और उन्हें बुरा-भला कहने लगा जिससे ऋषी पुत्रों को क्रोध आ गया और उन्होंने उसे चांडाल बन जाने का श्राप दे डाला। उसी क्षण राजा की कांति मलिन हो गयी और वह श्रीहीन हो गया। पर उसने भी हठ नहीं छोड़ा और उसी अवस्था में वह ऋषी विश्वामित्र के पास गया और सारी बात बता अपना यज्ञ पूरा करने की प्रार्थना करने लगा। उसका हाल देख ऋषी द्रवित हो गये और उन्होंने यज्ञ संचालित करने की स्वीकृति दे दी। यज्ञ में शामिल होने के लिए सारे ब्राह्मणों को आमंत्रंण भेजा गया पर वसिष्ठ पुत्रों ने यह कह कर आने से इंकार कर दिया कि ब्राह्मण कुल के हो कर वे किसी चांडाल के यज्ञ में भाग नहीं ले सकते जब कि वह यज्ञ भी एक ब्राह्मण द्वारा संचालित ना हो कर एक क्षत्रीय द्वारा किया जा रहा हो। उनके इन कटु वचनों से क्रुद्ध हो कर विश्वामित्र ने उन्हें भस्म हो जाने और अगले जन्म में चांडाल योनि में जन्मने का श्राप दे डाला। फिर उन्होंने यज्ञ पूरा किया और अपने तपोबल से राजा सत्यव्रत को सदेह स्वर्ग भिजवा दिया।

उधर देवराज इंद्र इस गलत परंपरा से बहुत क्रोधित थे सो इसके निवारण हेतु उन्होंने सत्यव्रत को फिर नीचे की ओर ढकेल दिया। अब ऋषी के तपोबल और देव प्रकोप के कारण सत्यव्रत कहीं का ना रहा।

कहते हैं आज भी वह धरती और आकाश के बीच त्रिशंकु बन लटका हुआ है।

मंगलवार, 8 फ़रवरी 2011

बाहर वाले भी हमारी बेवकूफी पर हंसते होंगे

स्विस बैंक के एक प्रबन्धक ने भारत की अर्थ व्यवस्था पर टिप्पणी करते हुए कहा है कि भारत की जनता गरीब हो सकती है पर देश गरीब नहीं है। उसने आगे कहा कि वहां का इतना पैसा स्विस बैंकों में जमा है जिससे :-

# भारत सरकार 30 सालों तक बिना टैक्स का बजट पेश कर सकती है।

# 60 करोड़ नौकरियां वहां उपलब्ध करवा सकती है।

# दिल्ली से देश के हर गांव तक 4 लेन सड़क बनवा सकती है।

# बिजली की अनवरत सप्लाई की जा सकती है।

# वहां के हर नागरिक को साठ साल तक 2000 रुपये दे सकती है।

# ऐसे देश को किसी भी वर्ल्ड बैंक या कर्ज की कोई जरूरत नहीं पड़ सकती।

यह कहना था वर्ल्ड बैंक के एक जिम्मेदार अधिकारी का। जरा गंभीरता से सोचिये कि भ्रष्टता की यह कौन सी सीमा है। ऐसी कौन सी मजबूरी है सरकार पर या वह कौन सी ताकते हैं जिनके सामने किसी की हिम्मत नहीं पड़ रही कुछ करने की और उस धन को वापस लाने की।

शुक्रवार, 4 फ़रवरी 2011

क्षीण होती जाती है स्पर्श शक्ति भी धूम्रपान से

धूम्रपान की ढेर सारी बुराइयों में एक यह भी है कि इससे शरीर की स्पर्श शक्ति भी क्षीण होती चली जाती है। अमेरिका के वैज्ञानिकों के परीक्षण मे यह बात सामने आई है। उन्होंने युवकों के दो दल बनाए, एक में वे लोग थे जो सिगरेट नहीं पीते थे तथा दूसरे में वे जो इसके आदी थे। फिर एक लोहे की राड़ को हल्का गर्म कर बारी-बारी से दोनों दलों को पकड़ने को कहा गया। जो धूम्रपान नहीं करते थे उन्होंने सलाख की गर्मी को तुरंत महसूस किया। इसके विपरीत धूएं का सेवन करने वालों को किसी भी तरह की गरमाहट का आभास नहीं हुआ।
इसका एक और भी निष्कर्ष निकाला गया कि ज्यादा धूम्रपान करने वालों को ह्रदयाघात का दर्द महसूस नहीं होता जिससे रोग का निदान जल्द ना होने से समय पर इलाज नहीं हो पाता जो जानलेवा भी हो जाता है।
इसका दुष्प्रभाव हाथ की उन ऊंगलियों पर भी अपना प्रकोप ड़ालता है जिनमें सिगरेट ज्यादा देर तक फंसी रहती है। उसकी गर्मी त्वचा की संवेदना को खत्म कर देती है।


# चर्चिल सिगार बहुत पीते थे। एक बार किसी ने उनसे कहा, "इतना धूम्रपान आपको धीरे-धीरे मौत की ओर ले जा रहा है।"
चर्चिल ने तुरंत जवाब दिया "मुझे भी कोई जल्दी नहीं है"

गुरुवार, 3 फ़रवरी 2011

समय रहते चेत जाओ नहीं तो चेतने के लिए भी समय नहीं मिलेगा

प्रकृति का प्रकोप या अनहोनी अचानक ही नहीं घटित हो जाती। बहुत पहले से वह अपने अच्छे-बुरे बदलाव का आभास देने लग जाती है। ऐसे ही एक बदलाव की पदचाप दूर से आती महसूस होने लगी है।

भ्रष्टाचार, तानाशाही, मंहगाई की मार से दूभर होती जिंदगी से देश का नागरिक त्रस्त है। अपने सामने गलत लोगों को गलत तरीके से धनाढ्य होते और उस धनबल से हर क्षेत्र में अपनी मनमानी करते और इधर खुद और अपने परिवार की जिंदगी दिन प्रति दिन दुश्वार होते देख अब एक आक्रोश उसके दिलो-दिमाग में जगह बनाता जा रहा है। यदि इसका कहीं विस्फोट हो गया तो ऐसे भ्रष्ट धनकुबेरों का क्या हश्र होगा तथा उनके संरक्षक किस बिल को ढूंढेंगे अपना अस्तित्व बचाने के लिए इसकी कल्पना भी नहीं की जा सकती।

एक पुरानी कहानी है। एक मठ में कुछ संत रहते हुए ध्यान-पूजन किया करते थे। बाकी तो सब ठीक था पर एक चूहा उन सब को बहुत परेशान किए रहता था। जितने संभव उपाय थे वह सब किए जा चुके थे पर वह इतना निड़र और उद्दंड था कि किसी के भी काबू नहीं आता था। दिन प्रति दिन उसका उत्पात बढता ही जा रहा था। एक दिन उसी मठ में एक संत आए। बातों ही बातों में उन्हें उस आतातायी चूहे के बारे में भी पता चला। सारी बातें जानने के बाद उन्होंने कहा कि उस चूहे को स्वर्णबल प्राप्त है। उसका बिल खोदा जाए। जब चूहे का बिल खोदा गया तो वहां स्वर्ण का भंडार मिला। जिसे जनहितार्थ खर्च कर दिया गया। उस दिन के बाद से वह चूहा, चूहा बन कर ही रह गया।

ऐसे ही हमारे तथाकथित जनसेवकों का अकूत धन विदेशों की दिवारों में दफन है। पर उसके बल पर यहां 'ये' तो ये इनके लगे-बधें भी ओछी हरकतें करने से बाज नहीं आते। इन्हें किसी भी तरह का ड़र नहीं व्यापता चाहे वह पुलिस हो या न्यायालय। पर अब इन कुछ मुट्ठी भर अमीर लोगों के गरीब देश के निरीह वाशिंदों का दिलो-दिमाग अब और ना सह पाने के कारण आक्रोशित होने लगा है।

यह भी प्रकृति के उसी बदलाव के आगमन का सूचक है, जो आभास दे रहा है कि समय रहते चेत जाओ नहीं तो चेतने के लिए भी समय नहीं मिलेगा।

बुधवार, 2 फ़रवरी 2011

असाधारणता को सदा अपने हाथ क्यों कटाने पड़ते हैं ?

इंसान की एक सनातन इच्छा है कि वह अमर हो जाए। सशरीर ऐसा होना नामुमकिन होने की वजह से वह अपने नाम को ही ज्यादा से ज्यादा समय तक दुनिया में कायम रखने की जुगत करता रहता आया है। सदियों से राजा, महाराजा, बादशाह, नवाब आदि सक्षम लोग अपने दरबार में कलाकारों तथा कारीगरों को स्थान देते आए हैं। जो अपने हुनर से कुछ ऐसा रचते भी रहे हैं जिससे उनके आश्रयदाता का नाम वर्षों तक लोगों की जुबान पर चढा रहा है। पर कुछ ऐसे बदनसीब कारीगर भी हुए हैं जिनके अद्वितीय कार्य को लोग आज भी अचंभित हो कर देखते हैं पर यह नहीं जानते कि ऐसी अद्भुत रचना करने वाले को इनाम के बदले अमानुषिक दंड़ दिया गया था।

दुनिया की सबसे भव्य, अनूठी, सुंदर इमारत "ताजमहल"। बीस हजार कुशल कारीगरों ने बाईस साल तक अपने खून को पसीने की तरह बहा-बहा कर अपने कला प्रेमी बादशाह के सपने को पूरा करने के लिए इसका निर्माण किया था। हजारों लोग हर साल इसे देखने भारत आते हैं और उनके आश्चर्य से खुले मुख से एक ही शब्द निकलता है "वाह"। पर इसके बदले इसे बनाने वालों को क्या मिला ? कोई सोच भी नहीं सकता कि एक सौंदर्य प्रेमी बादशाह का दिल इतना क्रूर भी हो सकता है। जिसके मन की शंका, कि कहीं ये कारीगर कहीं और जा कर इससे भी खूबसूरत इमारत ना बना ड़ालें जिससे मेरे इस प्रेम प्रतीक को लोग भूल ही जाएं। इस विचार रुपी नाग के सर उठाते ही उसने एक अमानवीय निर्णय लिया और कारीगरों के हाथ कटवा ड़ाले, जिससे उसकी प्रेम निशानी सरताज बनी रह सके।

ऐसा पहली बार नहीं हुआ।
दक्षिण में एक संगतराश हुआ था, नाम था उसका 'सतपथी'। जादू था उसके हाथों में। उसकी छैनी-हथौड़ी जैसे हथियार कठोर पाषाण पर ऐसे चलते थे जैसे वह मोम का बना हो। कठोर से कठोर पत्थर भी उसके हाथों में आ ऐसा जिवंत हो उठता था जैसे अभी बोलने लग जाएगा। कभी-कभी तो भ्रम हो जाता था कि सामने प्रतिमा है कि जिंदा इंसान। होते-होते उसकी ख्याति राजा तक भी पहुंची। उसका काम देख राजा ने उसे अपने दरबार मे स्थान दे दिया। सतपथी ने भी वहां रह कर राजा के कहेनुसार ऐसे-ऐसे शिल्प गढे कि लोग उन्हें देख खड़े के खड़े रह जाते थे। इसी कलाकारी के कारण राजा की ख्याति दूर-दूर तक फैल गयी। पर एक बुरी घड़ी में राजा के दिमाग का कीड़ा भी कुलबुलाया कि यदि सतपथी मुझे छोड़ कहीं और जा बसा तो मुझे कौन याद रखेगा? बस ऐसा ख्याल आते ही उस निष्ठुर ने सतपथी के हाथ कटवा ड़ाले।

ऐसा ही भाग्य ले कर जन्मे थे सालों पहले आज के बांग्ला देश के ढाका शहर के वस्त्र निर्माता। जिनकी रुई के रेशों से बनाई 'मलमल' इतनी बारीक, मुलायम और पारदर्शी होती थी जैसे हवा। रूई के रेशों को ये कारीगर पता नहीं किस जादूई स्पर्श से कपड़े का रूप देते थे जिसे देख लगता था जैसे शबनम बिखरी हुई हो। महीन इतना कि एक अंगुठी से सारा का सारा थान निकल जाता था। कहते हैं कि एक बार बादशाह औरंगजेब की पुत्री इसकी चौदह तहें लपेट कर बादशाह के सामने आ गयी तो वह नाराज हो गया। उसे वह करीब-करीब वस्त्रहीन लगी थी। पर यहां भी क्रूर इतिहास अपने को दोहराने से नहीं रोक पाया। भारत में अंग्रेजों का आगमन अपना व्यवसाय फैलाने के लिए हुआ था। आते ही उन्होंने इस मलमल को अपने यहां के बने वस्त्रों से मीलों आगे पाया। अपने हित की खातिर उन्हें इसके अलावा और कुछ नहीं सूझा कि इन रूई के रेशों में जादू जगाने वालों के हाथ काट दिए जाएं।

खूबसूरती, विलक्षणता, असाधारणता सदा खुशनुमा, लाभप्रद या भाग्यशाली ही नहीं होतीं। इनके भी सौ दुश्मन होते हैं जिनकी ईर्ष्या , जलन और अपने हित इन प्रभू की नेमतों का नाश करने में नहीं सकुचाते। इतिहास गवाह है कि ऐसी प्रतिभाओं को प्राचीन काल से लेकर आज तक भारी कीमत चुकानी पड़ती रही है।

सोमवार, 31 जनवरी 2011

यह एवरेस्ट कौन थे ?

माउंट एवरेस्ट, दुनिया की सबसे ऊंची पहाड़ी चोटी। पर यह एवरेस्ट कौन थे जिनके नाम पर इस चोटी का नाम रखा गया ?

1830 से 1843 तक भारत के सर्वेयर जनरल रहे थे कर्नल सर जार्ज एवरेस्ट। आधुनिक भूगणितीय सर्वेक्षण की नींव भारत में उन्होंने ही रखी थी। दक्षिण की कन्याकुमारी से लेकर उत्तर की मसूरी तक हिमालयी पर्वत श्रेणी के वृत्तांश (meridional ark)को मापने जैसा असंभव सा कार्य सर्वप्रथम उन्होंने ही किया था। उनके इसी बहुमूल्य तथा मौलिक कार्य के कारण हिमालय के सर्वोच्च शिखर का नाम उनके नाम पर रखा गया था।

शुक्रवार, 28 जनवरी 2011

एक और राष्ट्रीय दिवस "निपटा" सब लौट गए छुट्टी मनाने

एक और राष्ट्रीय दिवस निपटा घर लौट गये सब छुट्टी मनाने। जिस संस्था से जुडा हूं, वहां और किसी दिन जाओ न जाओ आज जाना बहुत जरूरी होता है। अपने को देश-भक्त सिद्ध करने के लिए। मन मार कर आए हुए लोगों का जमावड़ा, कागज का तिरंगा थामे बच्चों को भेड़-बकरियों की तरह घेर-घार कर संभाल रही शिक्षिकाएं, एक तरफ साल में दो-तीन बार निकलती गांधीजी की तस्वीर, नियत समय के बाद आ अपनी अहमियत जताते खास लोग। फिर मशीनी तौर पर सब कुछ जैसा होता आ रहा है वैसा ही निपटता चला जाना। झंडोत्तोलन, वंदन, वितरण, फिर दो शब्दों के लिए चार वक्ता, जिनमे से तीन ने आँग्ल भाषा का उपयोग कर उपस्थित जन-समूह को धन्य किया और लो हो गया सब का फ़र्ज पूरा। कमोबेश यही हाल सब जगह हैं।

आजादी के शुरु के वर्षों में सारे भारतवासियों में एक जोश था, उमंग थी, जुनून था। प्रभात फ़ेरियां, जनसेवा के कार्य और प्रेरक देशभक्ति की भावना सारे लोगों में कूट-कूट कर भरी हुई थी। यह परंपरा कुछ वर्षों तक तो चली फिर धीरे-धीरे सारी बातें गौण होती चली गयीं। अब वह भावना, वह उत्साह कहीं नही दिखता। लोग नौकरी के ड़र से या और किसी मजबूरी से, गलियाते हुए, खानापूर्ती के लिए इन समारोहों में सम्मिलित होते हैं। ऐसे दिन, वे चाहे गणतंत्र दिवस हो या स्वतंत्रता दिवस स्कूल के बच्चों तक सिमट कर रह गये हैं या फिर हम पुराने रेकार्डों को धो-पौंछ कर, निशानी के तौर पर कुछ घंटों के लिए बजा अपने फ़र्ज की इतिश्री कर लेते हैं। क्या करें जब चारों ओर हताशा, निराशा, वैमनस्य, खून-खराबा, भ्रष्टाचार इस कदर हावी हों तो यह भी कहने में संकोच होता है कि आईए हम सब मिल कर बेहतर भारत के लिए कोई संकल्प लें। 

फिर भी प्रकृति के नियमानुसार कि जो आरंभ होता है वह खत्म भी होता है तो एक बेहतर समय की आस में सबको इस दिवस की ढेरों शुभकामनाएं। क्योंकि आखिर इस दिवस ने किसी का क्या बिगाड़ा है।

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