pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 24 सितंबर 2010

वृक्ष अकडा था या अन्याय के सामने तना था ?

वर्षों से एक कहानी पढाई/सुनाई जाती है कि एक घना वृक्ष था। विशाल, मजबूत, जिसकी छाया में इंसान हो या पशु सभी गर्मी से राहत पाते थे। उसकी ड़ालियों पर हजारों पक्षियों का बसेरा था। उस पर लगने वाले फल बिना भेदभाव के सब की क्षुधा शांत करते थे।

पर समय का फेर। एक बार भयंकर तूफान आया। ऐसा लगता था कि सारी कायनात ही खत्म हो कर रह जाएगी। लागातार पानी बरसता रहा। हवाओं ने जैसे सब कुछ उड़ा ले जाने की ठान रखी थी। प्रकृति के इस प्रकोप को वह वृक्ष भी सह नहीं पाया और जड़ से उखड़ गया।

दूसरे दिन उधर से एक ज्ञानी पुरुष अपने शिष्यों के साथ निकले। वृक्ष का हश्र देख उन्होंने अपने शिष्यों को उसे दिखा कर कहा कि देखो अहंकारी का अंत ऐसा ही होता है। घमंड़ के कारण यह विनाशकारी तूफान के सामने भी अकड़ा खड़ा रहा और मृत्यु को प्राप्त हुआ। उधर वह कोमल घास विपत्ति के समय झुक गयी और अब लहलहा रही है। इसे कहते हैं बुद्धिमत्ता।

बहुत बार मन में आया कि उस ज्ञानी पुरुष ने अपने शिष्यों को जो सबक सिखाया क्या वह सही था। वह यह भी तो बता सकते थे कि इसे कहते हैं वीरता, बहादुरी, अन्यायी के सामने ना झुकने का संकल्प। देखो और सीखो इस वृक्ष से। जिसने मरना मंजूर किया पर अन्याय के सामने झुका नहीं। वहीं यह मौकापरस्त घास है, जो लहलहा तो रही है पर हर कोई उसे रौंदता चला जाता है।

बुधवार, 22 सितंबर 2010

कामनवेल्थ खेल? नहीं जी, कामन-वेल्थ यानी सार्वजनिक धन

लगता है राष्ट्रमंडल खेलों को आयोजित करने की जबरन कोशिश गले की हड़्ड़ी बन गयी है। ठीक सांप-छछुंदर की दशा हो गयी है ना निगलते बनता है ना उगलते। हड़बड़ी का काम शैतान का होता है कहावत सही होती लग रही है। कभी कोई कमी उजागर होती है तो कभी कोई। आज पुल गिरा, कल सड़क उधड़ी थी, परसों पानी भर गया था। मुझे तो ड़र है कि बेचारा कोई जिमनास्ट अपनी हड़्ड़ी ना तुड़वा बैठे किसी कमजोर उपकरण पर करतब दिखाते हुए।

ये कामनवेल्थ खेल ना होकर सिर्फ कामन-वेल्थ यानी सार्वजनिक धन रह गया है। मौका है जो जहां है बटोर ले। बदनामी का क्या है, लोगों की यादाश्त बहुत कमजोर होती है, साल-छह महीनों में सब भूल भाल जाएंगे। नहीं भी भूले तो कौन किसका क्या बिगाड़ लेगा?

सोमवार, 20 सितंबर 2010

एक अनोखा संग्रहालय, शौचालयों का




दुनिया के हर देश मे तरह-तरह के संग्रहालय हैं। जिनमें कोशिश की गयी है अपने-अपने देश के इतिहास, विज्ञान, कला-संस्कृति को सहेज कर रखने की। पर कभी आपने किसी ऐसी चीज के म्यूजियम के बारे में सुना है जो जिंदगी तो क्या रोजमर्रा में काम आने वाली अहम वस्तु है। शायद सुना भी हो।
"शौचालयों का म्यूजियम।" जिसे अंजाम दिया है देश में इंसान को अपने सर पर ‘मैला’ ढोने के अभिशाप से मुक्ति दिलवाने के लिये “सुलभ शौचालयों” की श्रृंखला बनाने वाले डा विंधेश्वरी पाठक ने। अपने एन.जी.ओ. द्वारा।
बिहार से शुरुआत कर सारे देश में धीरे-धीरे स्वच्छता का विस्तार करने वाले पाठकजी के मन में एक ऐसा संग्रहालय बनाने की बात आई जिसमें इस अहम वस्तु के इतिहास और समय-समय पर हुए बदलाव के बारे में पूरी जानकारी हासिल हो। इस योजना को मूर्त रूप देने में इनको अपना अमूल्य समय और ऊर्जा खपानी पड़ी। उन्होंने देश विदेश में आधुनिक और पुरातन काल में काम मे आने वाले शौचालयों के बारे में छोटी से छोटी जानकारी हासिल की। इसके लिये वह जगह-जगह विशेषज्ञों, जानकारों के अलावा अलग-अलग देशों के दूतावासों, उच्चायुक्तों से मिले जिन्होंने उनकी पूरी सहायता कर उन्हें इस क्षेत्र में समय-समय पर आए बदलाव, तकनिकी और शोध की विस्तृत जानकारी तथा फोटो वगैरह उपलब्ध करवाए। जो दिल्ली में "पालम-दाबड़ी मार्ग पर स्थित महावीर एन्कलेव" मे बने संग्रहालय में आम जनता के लिए उपलब्ध हैं। इस अजायबघर का उद्देश्य है, इस क्षेत्र में समय-समय पर आए बदलाव और विकास की लोगों को जानकारी देना । जिससे इस क्षेत्र से सम्बंधित लोगों को अपनी वस्तुएं बनाने में उपयोगी जानकारी मिल सके। जिससे वातावरण को दुषित होने से बचाया जा सके और प्रकृति को स्वच्छ रखने मे मदद मिल सके।
इस जगह का उचित प्रचार नहीं हो पाया है। यही कारण है कि दुनिया के इस एकमात्र अजूबे को देश-विदेश की तो क्या ही कहें, अधिकाँश दिल्ली वासियों को भी इसकी खबर नहीं है।










रविवार, 19 सितंबर 2010

पढ़िए, गुदगुदाएंगे जरूर,

आज सबेरे की अखबार में छपे कुछ चुटकुले गुदगुदा गए। सोचा खुशी बाँट ली जाए।

# पति - हमारी शादी को इतने साल हो गये पर तुम्हारा तेरा-मेरा खत्म नहीं हुआ। हर समय यह मेरे पैसे, मेरे गहने, मेरे बच्चे मेरा घर करती हो। कभी तो यह हमारा है, कहा करो।अब इतनी देर से क्या खोज रही हो अलमारी मे?हमारा पेटीकोट। पत्नी ने जवाब दिया।

# शर्माजी ने अपने पोते से कहा, बेटा एक ग्लास पानी ले आ। पोता बोला मैं अपना काम कर रहा हूं, मैं नहीं जाता।पास बैठा दूसरा पोता बोला, दादू ये बहुत बदतमीज है, बात नहीं सुनता। आप खुद ही जा कर ले लीजिए।

# छेदी लाल अपनी कार के लोन की किस्त नहीं चुका पाया था जिसके फलस्वरूप बैंक वाले उसकी कार उठा कर ले गये थे। वह बैठा-बैठा सोच रहा था कितना अच्छा होता यदि उसने अपनी शादी के लिए लोन लिया होता।

क्या आपने किसी ऐसे संग्रहालय के बारे में सुना है जो सिर्फ शौचालयों को समर्पित हो? वह भी अपने देश में? कल देखते हैं, कैसा है यह अनोखा, अनूठा म्यूजियम जिसमे प्राचीन काल से लेकर आधुनिक काल तक का इतिहास समेट रखा है दिनचर्या की इस अहम् वस्तु का।

शनिवार, 18 सितंबर 2010

हवाई जहाज और नेता महाराज

बाल दिवस पर सरकार की तरफ से बच्चों को हवाई जहाज की सैर करवाने का इंतजाम किया गया। छोटे प्लेन में पाइलट के अलावा एक टीचर के साथ तीन बच्चों को एक बार में घूमाने की व्यवस्था थी। एक-दो उड़ानों के बाद वहां एक नेताजी आ पहुंचे और समझाने के बावजूद, हम तो नेता हूं। हम भी मजा लूंगा बोले और जबरन प्लेन में सवार हो गये। उनके कारण दो बच्चों को नीचे ही रहना पड़ा। ऊपर पहुंचते ही प्लेन में कुछ खराबी आ गयी। पाइलट ने कहा कि सिर्फ तीन ही पैराशूट हैं एक मेरा है मैं तो कूद रहा हूं, और वह ये गया वो गया। बचे दो में से एक नेताजी ने उठा लिया बोले, हम तो नेता हूं, देश को हमरा बहूत जरूरत है, और दन से कूद गये। जहाज तेजी से नीचे की ओर जा रहा था। गुरुदेव बोले, बेटा हम दोनों में से एक ही जान बचा सकता है, मैंने तो अपनी जिंदगी जी ली है। तुम्हारे सामने भविष्य बाहें फैलाये खड़ा है। बचे हुए पैराशूट को बांधो, और जल्दी से अपनी जान बचा लो। बच्चा बोला, हम दोनों को कुछ नहीं होगा सर, यहां दो पैराशूट हैं। नेताजी तो मेरा स्कूल बैग ले कूद गये हैं।

जहाज ने जैसे ही उड़ान भरी नेताजी जनरल क्लास से उठ पहले दर्जे में जा विराजे। होस्टेस ने उन्हें बहुत समझाया कि आपका टिकट इस दर्जे का नहीं है आप अपनी जगह जा कर बैठें। नेताजी उसकी जुर्रत पर आग-बबूला हो गये, बोले तुम जानती नहीं हम कौन हैं? एक इशारा करेंगे और तुमरा ई उड़न खटोला बंद हो कर रह जाएगा, समझी, जाओ अपना काम करो।बेचारी होस्टेस घबरा गयी उसने जा कर पाइलट को इसकी जानकारी दी। पाइलट उठा उसने नेता को कुछ कहा, नेता महाराज उसी समय उठ कर अपनी जगह जा विराजे।इतनी जल्दी और इतनी शांति के साथ सब हो जाने पर आश्चर्यचकित एयर-होस्टेस ने पाइलट से पूछा कि सर आपने ऐसा क्या कह दिया जिससे वह बंदा बिना किसी हील-हुज्जत के यहां से उठ गया? अरे कुछ नहीं मैंने उससे कहा, सर आपको तो दिल्ली जाना है, यह ट्रेन तो है नहीं कि सारी की सारी गाड़ी एक ही जगह जाती हो। यह तो हवाई जहाज है और आपकी सीट दिल्ली जा रही है यह वाली नहीं।

शुक्रवार, 17 सितंबर 2010

मेरे शेव करने पर तो आपकी भाभी ही नोटिस नही करतीं, पर वहाँ.....

मेरे मित्र त्यागराजनजी बहुत सीधे, सरल ह्रदय और खुशदिल इंसान हैं। किसी पर भी शक, शुबहा करना उन्होंने तो जैसे सीखा ही नहीं है। अक्सर हम संध्या समय चाय-बिस्कुट के साथ अपने सुख-दुख बांटते हुए दुनिया जहान को समेटते रहते हैं। पर कल जब वह आए तो कुछ अनमने से लग रहे थे, जैसे कुछ बोलना चाहते हों पर झिझक रहे हों। मैंने पूछा कि क्या बात है? कुछ परेशान से लग रहे हैं। वे बोले नहीं ऐसी कोई बात नहीं है। मैंने कहा कुछ तो है जो आप मूड़ में नहीं हैं। वे धीरे से मुस्कुराए और बोले कोई गंभीर बात नहीं है कुछ शंकाएं हैं, पर आप बोलोगे कि पता नहीं आज कैसी बातें कर रहा हूं। मैंने कहा, अरे हमारे बीच ऐसी औपचारिकता कहां से आ गयी? खुल कर कहिये क्या बात है। वे बोले टी.वी. में इतने सारे विज्ञापन आते हैं तरह-तरह की हरकतों के साथ। उनमें से अधिकांश को समाज के शिखर पर बैठी बड़ी-बड़ी हस्तियां पेश करती हैं। पर अधिकतर विज्ञापनों के दावे गले नहीं उतरते। सच तो प्रस्तुत करने वाले भी जानते ही होंगे फिर उनकी क्या मजबूरी है, ना उन्हें पैसे की कमी है ना ही शोहरत की, फिर क्यूं वे ऐसा करते हैं? अब जैसे मैं रुक्षता के बचाव की खातिर एक क्रीम शाहरूख के समझाने के वर्षों पहले से लगा रहा हूं, पर मेरा रंग वैसे का वैसा ही सांवला है। मुझे लगा कि इतना बड़ा हीरो झूठ थोड़े ही बोलेगा। मेरी स्किन में ही कोई गड़बड़ी ना हो। मैं अपनी हंसी दबा कर बोला, क्या महाराज आप भी किसकी बातों में आ गये? अरे वहां सब पैसों का खेल है, उसकी बातों में सच्चाई होती तो उस क्रीम के निर्माता अपनी फैक्टरी अफ्रिका में लगाए बैठे होते, जहां चौबिसों घंटे बारहों महीने लगातार उत्पादन कर भी वे वहां की जरूरत पूरी नहीं कर पाते पर करोंड़ों कमाते। त्यागराजनजी कुछ उत्साहित हो बोले, वही तो, मैं समझ तो रहा था पर ड़ाउट क्लियर करना चाहता था। अब देखीए एक विज्ञापित ब्लेड़ से मैं दाढी बनाते आ रहा हूं, पर बाहर किसी कन्या ने तो क्या ही कहना आपकी भाभी ने भी कभी नोटिस नहीं लिया कि मैंने शेव बनाई भी है कि नहीं। और उधर शेव बनने की देर है और कन्या हाजिर। वैसे आप तो मुझे जानते ही हैं कि यदि ऐसा कोई हादसा मेरे शेव करने पर होता तो मैं तो शेव बनाना ही बंद कर देता। मैं बोला यह सब बाजार की तिकड़में हैं जिनमें रत्ती भर भी सच्चाई नहीं होने पर भी लोग बेवकूफ बनते रहते हैं। इनका निशाना खासकर युवा वर्ग होता है। आप एक बात बताईये, आप इतना घूमते रहते हैं। हर छोटे-बड़े शहर में आपका जाना होता है। जहां तरह-तरह के लोग किस्म-किस्म के परफ्यूम लगाए मिलते होंगे। पर कभी आपने किसी एंड़-बैंड़-मोटरस्टैंड़ छोकरों के पीछे बदहवास सी कन्याओं को दौड़ते देखा है? अरे महिलाएं अच्छे-बुरे की पहचान मर्दों से ज्यादा रखती हैं। मुझे तो आश्चर्य है कि महिलाओं की प्रगति की बात करने वाले किसी भी संगठन ने ऐसे घटिया विज्ञापनों पर रोक लगाने की कोशिश तक नहीं की है अब तक। अच्छा बताईये भाभीजी के साथ साड़ी वगैरह तो लेने गये होंगे कभी? किसी भी दुकान में लटके-झटकों के साथ साड़ी बिकते देखी है कभी? कभी किसी बीमा एंजेंट को बस या ट्रेन में बिमा पालिसी बेचते देखा है? किसी भी पैथी की दवा खा कर कोई शतायू हो सका है? किसी पेय को पी कर किसी बच्चे को ताड़ बनते देखा है? कुदरत ने हमें जैसा बनाया है वही अपने आप में अजूबा है हमें अपनी कमजोरियां दिखती हैं पर अपनी खूबियों को हम नजरंदाज करते रहते हैं। हमें लगता है कि मैं ऐसा हूं तो लोग क्या कहेंगे, अरे कौन से लोग? दुनिया में कौन है जो पूरी तरह से देवता का रूप ले पैदा हुआ है? यह जो पैसा लेकर उल्टी-सीधी बातें हमें समझाते हैं, वे खुद पच्चीसों बिमारियों से घिरे हुए हैं। दुनिया में गोरों की संख्या से कहीं ज्यादा काले, पीले, गेहुंयें रंग वालों की तादाद है। एक अच्छी खासी तादाद नाटे लोगों की है। करोंड़ों लोगों का वजन जिंदगी भर पचास का आंकड़ा नहीं छू पाता। लाखों लोग मोटापे की वजह से ढंग से हिल-ड़ुल नहीं पाते। पर आप अपनी ओर देखीये आज भी आप पांच-सात कि.मी. चलने के बावजूद थकते नहीं हैं यह भी तो भगवान की अनमोल देन है आपको। आप जो हैं खुद में एक मिसाल हैं इन टंटों में ना पड़ मस्त रहिए बिंदास होकर प्रभू द्वारा दी गयी जिन्दगी का आनन्द लीजिए। मेरे इतने लंबे भाषण से त्यागराजनजी को कुछ कुछ रिलैक्स होता देख मैंने अंदर की ओर आवाज लगाई कि क्या हुआ भाई, आज चाय अभी तक नहीं आई? तभी श्रीमतीजी चाय की ट्रे लिए नमूदार हो गयीं। चाय का पहला घूंट लेते ही त्यागराजनजी बोले, भाभीजी यह वही ताजगी वाली चाय है ना जिसमें पांच जड़ी बूटियां पड़ी होती हैं? बहुत रोकते, रोकते भी मेरा ठहाका निकल ही गया।

गुरुवार, 16 सितंबर 2010

प्रेम की पराकाष्ठा











भगवान से प्रेम बहुत से लोग करते हैं। पहुंचे हुए संतों ने उनकी उपस्थिति भी महसूस की है, कहते हैं। हमने उसे सदा सर्वशक्तिमान ही माना है। उसके थकने की तो कोई कल्पना भी नहीं कर पाया है। पर विदेशी भक्तों का प्रेम सराहनीय है जिनकी सोच ने, प्रेम ने, ममता ने लगातार एक ही स्थिति में खड़े प्रभू को जरा आराम देने की सोची, उनकी बांह के नीचे सहारा देकर।




उसपर छवि कितनी सुन्दर हैं, आखें ही नहीं हटती।

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