नेपाल में विष्णु भगवान का एक ऐसा मंदिर है जिसमें वहां के राजा को भी प्रवेश की मनाही है। जिसका कारण राजा खुद है।
राजधानी काठमांड़ू से नौ कि.मी. दूर भगवान विष्णु की करीब 12 फुट लम्बी लेटी हुई अवस्था में एक मूर्ती पानी के कुंड़ में स्थापित है। जिसे बूढा नीलकंठ के नाम से जाना जाता है। इसकी रोज विधिवत पूजा अर्चना होती है पर यहां नेपाल के राजा और उनके परिवार का आना वर्जित है।
कहते हैं कि 17वीं शताब्दी में राजा प्रतापमल्ल रोज भगवान के दर्शन करने हनुमान ढोका स्थित अपने महल से यहां आया करते थे। फिर उन्हें रोज नौ-दस कि.मी. आना-जाना असुविधाजनक लगने लगा तो उन्होंने नीलकंठ भगवान की एक प्रतिमूर्ती अपने महल में स्थापित करवा ली। इससे भगवान नाराज हो गये और उन्होंने राजा को श्राप दे दिया कि अब से तुम या तुम्हारा कोई भी उत्तराधिकारी यदि बूढा नीलकंठ हमारे दर्शन करने आएगा तो वह मृत्यु को प्राप्त होगा। तब से आज तक राजपरिवार का कोई भी सदस्य वहां जाने की हिम्मत नहीं जुटा पाया है।
भगवान विष्णु के इसी स्वरूप की एक और मूर्ती राजधानी के निकट बालाजू उद्यान में भी स्थित है जो पहली मूर्तियों से अपेक्षाकृत कुछ छोटी है। राजपरिवार के सदस्य यहां दर्शन करने जाते हैं। नवम्बर माह में यहां बड़ा भारी मेला लगता है जहां दूर-दूर से लोग अपनी मनौतियां ले कर आते हैं। इस मंदिर की भी काफी मान्यता है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शनिवार, 4 सितंबर 2010
शुक्रवार, 3 सितंबर 2010
जादू-टोने से ग्रस्त हैं बहुतेरे देश
जादू-टोने का चलन हमारे ही देश में नहीं विश्व के बहुतेरे देशों में व्याप्त है। इसकी परंपरा दुनिया की प्राय: सभी आदिम जातियों में पायी जाती रही है। आज भी जहां-जहां ऐसी जातियों का अस्तित्व है वहां-वहां टोने-टोटके का भी वर्चस्व मिलता है।
अमेरिका में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ज्योतिष, भूत-प्रेत, आत्माओं, टोने-टोटके पर पुरुषों से ज्यादा महिलाएं विश्वास करती हैं।
इंग्लैंड़ में जादू-टोने की परंपरा अठारहवीं सदी तक बहुत प्रचलित रही। सरकार द्वारा कठोर कानूनी प्रतिबंध लगाये जाने के बावजूद इसे खत्म नहीं किया जा सका। सत्रहवीं सदी में यहां जादूगरनियों पर सर्वाधिक मुकदमे चलाये गये।
आज भी विश्व में हवाई द्वीप एक ऐसा देश है जहां टोने-टोटकों पर सर्वाधिक विश्वास किया जाता है। वहां लोगों का मानना है कि द्वीप पर सदा दुष्ट आत्माएं मंड़राती रहती हैं। यहां के पुलिस वाले भी अपने साथ हथियारों के अलावा "टी" नामक पेड़ की पत्तियों को नमक लगा कर रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे बुरी आत्माएं पास नहीं आतीं।
हमारे यहां सम्राट अशोक के समय में जादू-टोने का बहुत प्रचलन था। इसके बढते प्रभाव से अशोक चिंतित रहा करता था। उसने इसके विरुद्ध आदेश पारित किये तथा शिलालेखों पर भी खुदवाया कि यह सब बेकार की बातें हैं इन पर विश्वास ना किया जाये। पर प्रजा ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
मध्य युग मे भी जब राजपूत युद्ध में लड़ने जाते थे तो वे अपनी विजय के लिये तंत्र-मंत्र व जादू-टोने का भी सहारा लेते थे। इसके लिए वे विभिन्न तरह के कवच धारण किया करते थे। इनमें शिव कवच, देवी कवच, नारायण कवच तथा पंचमुखी हनुमान कवच प्रमुख थे।
अमेरिका में किये गये एक सर्वेक्षण के अनुसार ज्योतिष, भूत-प्रेत, आत्माओं, टोने-टोटके पर पुरुषों से ज्यादा महिलाएं विश्वास करती हैं।
इंग्लैंड़ में जादू-टोने की परंपरा अठारहवीं सदी तक बहुत प्रचलित रही। सरकार द्वारा कठोर कानूनी प्रतिबंध लगाये जाने के बावजूद इसे खत्म नहीं किया जा सका। सत्रहवीं सदी में यहां जादूगरनियों पर सर्वाधिक मुकदमे चलाये गये।
आज भी विश्व में हवाई द्वीप एक ऐसा देश है जहां टोने-टोटकों पर सर्वाधिक विश्वास किया जाता है। वहां लोगों का मानना है कि द्वीप पर सदा दुष्ट आत्माएं मंड़राती रहती हैं। यहां के पुलिस वाले भी अपने साथ हथियारों के अलावा "टी" नामक पेड़ की पत्तियों को नमक लगा कर रखते हैं। ऐसी मान्यता है कि इससे बुरी आत्माएं पास नहीं आतीं।
हमारे यहां सम्राट अशोक के समय में जादू-टोने का बहुत प्रचलन था। इसके बढते प्रभाव से अशोक चिंतित रहा करता था। उसने इसके विरुद्ध आदेश पारित किये तथा शिलालेखों पर भी खुदवाया कि यह सब बेकार की बातें हैं इन पर विश्वास ना किया जाये। पर प्रजा ने इस ओर ज्यादा ध्यान नहीं दिया।
मध्य युग मे भी जब राजपूत युद्ध में लड़ने जाते थे तो वे अपनी विजय के लिये तंत्र-मंत्र व जादू-टोने का भी सहारा लेते थे। इसके लिए वे विभिन्न तरह के कवच धारण किया करते थे। इनमें शिव कवच, देवी कवच, नारायण कवच तथा पंचमुखी हनुमान कवच प्रमुख थे।
गुरुवार, 2 सितंबर 2010
प्रेम प्रसंग, फिल्मी दुनिया के
आजकल फिल्मी दुनिया में इश्क भी एक जरिया या माध्यम हो गया है। अपनी सहूलियत, अपने मतलब, अपने फायदे के लिये इसका उपयोग होने लगा है। इश्क में से प्रेम की गहराई गायब हो गयी है। मौजूदा पीढी की वफादारी एक शुक्रवार से दूसरे शुक्रवार तक सीमित हो कर रह गयी है। सामाजिक या पारिवारिक मर्यादाओं का इस दुनिया में कोई स्थान नहीं रह गया है। हमारा लचर कानून भी इनके दरवाजे की दहलीज लांघने की हिम्मत नहीं कर पाता है। आज किसी विवाहित प्रेमी का बसा बसाया घर उजाड़ने में किसी अभिनेत्री को कोई परहेज, ड़र या गम नहीं होता। अब तो बात और भी आगे बढ गयी है "लीव इन रिलेशनशिप" तक।
ऐसा नहीं है कि प्रेम प्रसंग पहले नहीं होते थे। समझ लीजिए कि फिल्मों की शुरुआत के साथ-साथ ही इस रोग का भी जन्म हो गया था। पर उस समय यह मतलब पूरा करने का जरिया ना हो कर आपसी समझ थी, लगाव था, साथ-साथ रहने की ललक थी। बहुत पीछे ना जाते हुए आजादी के बाद के कुछ जाने-माने नामों का जिक्र करते हैं। जिनमें कुछ सफल रहे तो कुछ दुखांत।
जद्दन बाई और मोहन बाबू : जद्दन बाई सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिस की मां थीं। वह अपने समय की मशहूर गायिका थीं। मोहन बाबू पंजाब से थे। दुनिया, धर्म, परिवारवालों की इच्छा के विरुद्ध जा कर दोनों ने विवाह कर लिया था। जो सदा सुखमय रहा था।
किशोर शाहू तथा स्नेहप्रभा प्रधान : किशोर शाहू जाने माने अभिनेता (दम मारो दम, गाइड) तथा फिल्म निर्माता थे तथा स्नेहलता उनकी नायिका, दोनों ने प्रेम विवाह किया था जो सफल नहीं हो सका था। दोनों में तलाक हो गया था।
राज कपूर और नर्गिस : शादी-शुदा होने के बावजूद राज कपूर का नर्गिस के साथ लगाव जग जाहिर था। पर सामाजिक-पारिवारिक दवाब के कारण यह कोई और नाम धारण ना कर सका था।
शम्मी कपूर व गीता बाली : शम्मी कपूर शुरु से ही विद्रोही स्वभाव के रहे थे। हजार अड़चनों के बावजूद उन्होंने गीता बाली से विवाह रचा ड़ाला था। पर गीता बाली की कुछ समय बाद बिमारी से मृत्यु हो गयी थी।
देवानंद और सुरैया : शायद फिल्मी दुनिया की यह सबसे दुखद कहानी रही है। दोनों के लाख प्रयासों के बावजूद उनकी शादी नहीं हो सकी। देव ने तो बाद में शादी कर ली पर सुरैया जीवनपर्यंत कुवांरी ही रही।
दिलीप कुमार और मधुबाला : मधुबाला का प्रेम प्रसंग पहले प्रेमनाथ के साथ था। पर अपने दोस्त दिलीप कुमार के कारण प्रेम नाथ ने अपने पैर पीछे खींच लिए थे। पर फिर भी मधुबाला के घर वालों की वजह से दिलीप और उसका निकाह नहीं हो सका था।
नाम तो बहुत सारे हैं, रणधीर कपूर-बबीता, ऋषी कपूर-डिंपल, अमिताभ-रेखा, अक्षय-रविना, अभिषेक-करिश्मा, और और और, जो साथ साथ काम करते-करते एक दूसरे में अपना जीवन साथी खोजते रहे। जिसमे कुछ सफल रहे तो कुछ असफल । बहुतों ने लायक ना होते हुए भी अपनी प्रेमिकाओं के लिए ढेरों फिल्में गढ डालीं जैसे चेतन आनंद और प्रिया राजवंश या व्ही. शांताराम और संध्या। यह दुनिया ही अजूबा है जिसमें ऐसी बातें होती रही थीं, होती रही हैं और होती रहेंगी।
ऐसा नहीं है कि प्रेम प्रसंग पहले नहीं होते थे। समझ लीजिए कि फिल्मों की शुरुआत के साथ-साथ ही इस रोग का भी जन्म हो गया था। पर उस समय यह मतलब पूरा करने का जरिया ना हो कर आपसी समझ थी, लगाव था, साथ-साथ रहने की ललक थी। बहुत पीछे ना जाते हुए आजादी के बाद के कुछ जाने-माने नामों का जिक्र करते हैं। जिनमें कुछ सफल रहे तो कुछ दुखांत।
जद्दन बाई और मोहन बाबू : जद्दन बाई सुप्रसिद्ध अभिनेत्री नर्गिस की मां थीं। वह अपने समय की मशहूर गायिका थीं। मोहन बाबू पंजाब से थे। दुनिया, धर्म, परिवारवालों की इच्छा के विरुद्ध जा कर दोनों ने विवाह कर लिया था। जो सदा सुखमय रहा था।
किशोर शाहू तथा स्नेहप्रभा प्रधान : किशोर शाहू जाने माने अभिनेता (दम मारो दम, गाइड) तथा फिल्म निर्माता थे तथा स्नेहलता उनकी नायिका, दोनों ने प्रेम विवाह किया था जो सफल नहीं हो सका था। दोनों में तलाक हो गया था।
राज कपूर और नर्गिस : शादी-शुदा होने के बावजूद राज कपूर का नर्गिस के साथ लगाव जग जाहिर था। पर सामाजिक-पारिवारिक दवाब के कारण यह कोई और नाम धारण ना कर सका था।
शम्मी कपूर व गीता बाली : शम्मी कपूर शुरु से ही विद्रोही स्वभाव के रहे थे। हजार अड़चनों के बावजूद उन्होंने गीता बाली से विवाह रचा ड़ाला था। पर गीता बाली की कुछ समय बाद बिमारी से मृत्यु हो गयी थी।
देवानंद और सुरैया : शायद फिल्मी दुनिया की यह सबसे दुखद कहानी रही है। दोनों के लाख प्रयासों के बावजूद उनकी शादी नहीं हो सकी। देव ने तो बाद में शादी कर ली पर सुरैया जीवनपर्यंत कुवांरी ही रही।
दिलीप कुमार और मधुबाला : मधुबाला का प्रेम प्रसंग पहले प्रेमनाथ के साथ था। पर अपने दोस्त दिलीप कुमार के कारण प्रेम नाथ ने अपने पैर पीछे खींच लिए थे। पर फिर भी मधुबाला के घर वालों की वजह से दिलीप और उसका निकाह नहीं हो सका था।
नाम तो बहुत सारे हैं, रणधीर कपूर-बबीता, ऋषी कपूर-डिंपल, अमिताभ-रेखा, अक्षय-रविना, अभिषेक-करिश्मा, और और और, जो साथ साथ काम करते-करते एक दूसरे में अपना जीवन साथी खोजते रहे। जिसमे कुछ सफल रहे तो कुछ असफल । बहुतों ने लायक ना होते हुए भी अपनी प्रेमिकाओं के लिए ढेरों फिल्में गढ डालीं जैसे चेतन आनंद और प्रिया राजवंश या व्ही. शांताराम और संध्या। यह दुनिया ही अजूबा है जिसमें ऐसी बातें होती रही थीं, होती रही हैं और होती रहेंगी।
बुधवार, 1 सितंबर 2010
है मथुरा तीनों लोकों से न्यारी पर वृन्दावन की है बलिहारी
दिल्ली से करीब 150 कि. मी. की दूरी पर स्थित मथुरा भगवान श्रीकृष्ण की जन्म भूमि है। पर उनका कर्म स्थल वृंदावन है जो मथुरा से सिर्फ 10 कि.मी. उत्तर-पश्चिम में यमुना के किनारे बसा हुआ है। तुलसी के पौधों की भरमार होने के कारण इस जगह का नाम वृंदावन पड़ गया। यह ब्रज का ह्रदय स्थल है। भक्तगण यहां आकर आनंद सागर में ड़ुबकी लगा कर कृत्य-कृत्य हो जाते हैं। हर कृष्ण भक्त की इच्छा होती है जीवन में कम से कम एक बार यहां आकर धन्य होने की।
यही वह जगह है जहां प्रभू ने अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में अनगिनत लीलाएं कर जन जीवन को सुगम बनाया था। यहां आकर पता चलता है कि प्रेम और भक्ति का साम्राज्य किसे कहते हैं। दर्शनार्थियों के लिए यहां बहुत सारे नये और प्राचीन मंदिर हैं।
श्री गोविंद मंदिर : यह बहुत प्राचीन मंदिर है। इसे जयपुर के राजा मानसिंह ने बनवाया था।
श्री रंगजी का मंदिर : दक्षिणी स्थापत्य शैली पर बने इस अति सुंदर और विशाल मंदिर को बनने में करीब सात साल लगे थे। मंदिर प्रांगण में स्थित सोने का ध्वज स्तंभ देखने लायक है।
बांके बिहारीजी का मंदिर : स्वामी हरिदासजी द्वारा निर्मित यह एक और दर्शनीय मंदिर है। यहां स्थापित अति आकर्षक मूर्ति को चमत्कारी माना जाता है।
राधा गोविंदजी का मंदिर : इसे ग्वालियर के महाराज जीवाजी राव सिंधिया ने अपने गुरु के आदेश पर 1860 में बनवाया था। इसे ब्रह्मचारीजी का मंदिर भी कहते हैं।
युगल किशोर मंदिर : इस मंदिर की मूर्ति भी बहुत सुंदर और मनोहारी है।
लाला बाबू का मंदिर : बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जमींदार कृष्णचंद्र द्वारा निर्मित यह मंदिर भी देखने वालों को मोह लेता है। अपने निर्माता के उपनाम पर यह मंदिर प्रसिद्ध है।
श्रीकृष्ण-बलराम मंदिर : इसे कृष्ण भावना संघ समुदाय द्वारा बनवाया गया है। यहां अनेक विदेशी भक्त वैष्णव धर्म में दीक्षित होकर निवास करते हैं। इसीलिए इसे अंग्रेजों का मंदिर भी कहा जाता है।
इन प्रमुख मंदिरों के अलावा भी अनेकोंनेक मंदिर वृंदावन में देखने लायक हैं जैसे जयपुर वाला मंदिर, पगला बाबा का मंदिर, जानकी-वल्लभ मंदिर, शालिग्राम मंदिर, गोपेश्वर मंदिर, राधा रमण मंदिर तथा कांच का मंदिर आदि।
इसलिए जब भी जाएं समय हाथ में रख कर जाएं हड़बड़ी में बहुत कुछ देखने से छूट सकता है।
जय श्रीकृष्ण।
बोलो बांके बिहारी की जय।
सबको जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं।
यही वह जगह है जहां प्रभू ने अपने बाल्यकाल और किशोरावस्था में अनगिनत लीलाएं कर जन जीवन को सुगम बनाया था। यहां आकर पता चलता है कि प्रेम और भक्ति का साम्राज्य किसे कहते हैं। दर्शनार्थियों के लिए यहां बहुत सारे नये और प्राचीन मंदिर हैं।
श्री गोविंद मंदिर : यह बहुत प्राचीन मंदिर है। इसे जयपुर के राजा मानसिंह ने बनवाया था।
श्री रंगजी का मंदिर : दक्षिणी स्थापत्य शैली पर बने इस अति सुंदर और विशाल मंदिर को बनने में करीब सात साल लगे थे। मंदिर प्रांगण में स्थित सोने का ध्वज स्तंभ देखने लायक है।
बांके बिहारीजी का मंदिर : स्वामी हरिदासजी द्वारा निर्मित यह एक और दर्शनीय मंदिर है। यहां स्थापित अति आकर्षक मूर्ति को चमत्कारी माना जाता है।
राधा गोविंदजी का मंदिर : इसे ग्वालियर के महाराज जीवाजी राव सिंधिया ने अपने गुरु के आदेश पर 1860 में बनवाया था। इसे ब्रह्मचारीजी का मंदिर भी कहते हैं।
युगल किशोर मंदिर : इस मंदिर की मूर्ति भी बहुत सुंदर और मनोहारी है।
लाला बाबू का मंदिर : बंगाल के मुर्शिदाबाद जिले के जमींदार कृष्णचंद्र द्वारा निर्मित यह मंदिर भी देखने वालों को मोह लेता है। अपने निर्माता के उपनाम पर यह मंदिर प्रसिद्ध है।
श्रीकृष्ण-बलराम मंदिर : इसे कृष्ण भावना संघ समुदाय द्वारा बनवाया गया है। यहां अनेक विदेशी भक्त वैष्णव धर्म में दीक्षित होकर निवास करते हैं। इसीलिए इसे अंग्रेजों का मंदिर भी कहा जाता है।
इन प्रमुख मंदिरों के अलावा भी अनेकोंनेक मंदिर वृंदावन में देखने लायक हैं जैसे जयपुर वाला मंदिर, पगला बाबा का मंदिर, जानकी-वल्लभ मंदिर, शालिग्राम मंदिर, गोपेश्वर मंदिर, राधा रमण मंदिर तथा कांच का मंदिर आदि।
इसलिए जब भी जाएं समय हाथ में रख कर जाएं हड़बड़ी में बहुत कुछ देखने से छूट सकता है।
जय श्रीकृष्ण।
बोलो बांके बिहारी की जय।
सबको जन्माष्टमी की ढेरों शुभकामनाएं।
मंगलवार, 31 अगस्त 2010
"पीपली को लाइव" कर अनुष्का ने नाम और दाम दोनों का जुगाड़ बैठा लिया
पीपली लाइव देख ड़ाली। ना ही देखी जाती तो ठीक था। पर गल्तियां तो सभी से होती हैं। हो गयी हमसे भी। पर दाद देनी पड़ेगी अनुष्का की हिम्मत की । पहले तो आमिर को वश में किया फिर जैसे-तैसे जुगाड़ लगा बहुत सारे मंत्रियों व संत्रियों को भी फिल्म का डोज पिलवा कर नाम और दाम दोनों पा लिए। इसे कहते हैं "मार्केटिंग"।
आगे चलने से पहले दो बातें।
वर्षों पहले श्री सत्यजीत रे ने एक फिल्म बनाई थी "गुपी गाईन बाघा बाईन"। जब पिक्चर रिलीज हुई तो उसके बारे में बड़े-बड़े दिग्गज समिक्षकों ने एक से बढ कर एक समीक्षा लिख मारी। सत्यजीत साहब की फिल्म एवंई तो हो नहीं सकती इसीलिए किसी को उसमें गहरी राजनीति नजर आई तो किसी को भ्रष्ट नेतागिरी किसी ने उसमें दार्शनिकता खोज डाली तो किसी ने अपने देश की उसमे दिखाए राज्य से तुलना कर डाली। हफ्ते भर बाद जब सत्यजीतजी से फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि "मैंने कोई गूढ बात इस फिल्म द्वारा नहीं कही है। यह विशुद्ध बच्चों की फिल्म है जिसकी कहानी वर्षों पहले मेरे नानाजी ने लिखी थी।"
एक थे ख्वाजा अहमद अब्बास। धुरंधर कहानीकार। उनकी कहानियों पर जब-जब राजकपूर ने फिल्में बनाईं वे सुपर हिट हुईं। पर जब-जब अब्बास साहब ने खुद अपने हाथ आजमाए तब-तब फिल्म कब आई कब उतरी किसी को पता भी नहीं चला।
आमिर का लगता है कि महिला पत्रकारों के लिए उनके दिल में कोई कोना सदा सुरक्षित रहता है। जहां जा कभी बरखा अपना हित साध लेती है तो कभी अनुष्का।
आमिर का नाम अपनी फिल्म से जोड़ कर इस चतुर महिला ने अपनी पहचान बनवा ली। पर देखा जाए तो एक अच्छे भले विषय की ऐसी की तैसी हो गयी है। कहानी कहना, सुनाना अलग बात है पर उसको फिल्माने के लिए दक्षता का होना बहुत जरूरी होता है। कैमरे की कलम से जब झरने की कलकल सी कहानी गढी जाती है तो उसका जादुई असर पड़ता है देखने वाले पर। इसी कहानी को यदि किसी निष्णात हस्ति ने या खुद आमिर ने फिल्माया होता तो इस व्यंग्य की धार इतनी पैनी होती कि देश में ऐसा माहौल बनाने वालों की बखिया उधड़ जाती। पर इसमें तो अभद्र और वाहियात संवादों और बेमतलब की गंदी गालियां ड़ाल अपने को बिंदास दिखा तुरंत मशहूर होने की फूहड़ कोशिश की गयी है वह भी एक महिला निर्देशक द्वारा।
इसके अलावा पता नहीं परफेक्टनिष्ट कहलाने वाले आमिर की नजर नत्थे की पत्नी के किरदार पर कैसे नहीं पड़ी। एक गरीब, फटेहाल, दाने-दाने को मोहताज किसान परिवार, जिसके पुरुषों के गंदे कपड़े, धूल भरे चेहरों पर बेतरतीब बढे बिना कंघियाए बाल और झाड़-झंखाड़ की तरह उगी दाढियां अपनी बदहाली का बखान करती नजर आती हैं वहीं नत्थे की बीवी की "भवें" अभी अभी तराशी गयीं लगती हैं। इतना ही नहीं उसके चेहरे का मेक-अप और सलवट रहित साड़ियां निर्देशक की कमजोरी की चुगली खाती नजर आती हैं। एक मरभुक्खे परिवार की महिला को क्या अपनी भवें तराशने या चेहरा पोतने की मोहलत मिल भी पाती है कभी?
सही बात है यदि कैमरे से कहानी में रंग भरना इतना ही आसान होता तो आज हर ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे का नाम आसिफ, राज कपूर, गुरुदत्त, बिमलराय या ऋषिकेश मुखर्जी के साथ लिखा नजर आता।
आगे चलने से पहले दो बातें।
वर्षों पहले श्री सत्यजीत रे ने एक फिल्म बनाई थी "गुपी गाईन बाघा बाईन"। जब पिक्चर रिलीज हुई तो उसके बारे में बड़े-बड़े दिग्गज समिक्षकों ने एक से बढ कर एक समीक्षा लिख मारी। सत्यजीत साहब की फिल्म एवंई तो हो नहीं सकती इसीलिए किसी को उसमें गहरी राजनीति नजर आई तो किसी को भ्रष्ट नेतागिरी किसी ने उसमें दार्शनिकता खोज डाली तो किसी ने अपने देश की उसमे दिखाए राज्य से तुलना कर डाली। हफ्ते भर बाद जब सत्यजीतजी से फिल्म के बारे में पूछा गया तो उन्होंने कहा कि "मैंने कोई गूढ बात इस फिल्म द्वारा नहीं कही है। यह विशुद्ध बच्चों की फिल्म है जिसकी कहानी वर्षों पहले मेरे नानाजी ने लिखी थी।"
एक थे ख्वाजा अहमद अब्बास। धुरंधर कहानीकार। उनकी कहानियों पर जब-जब राजकपूर ने फिल्में बनाईं वे सुपर हिट हुईं। पर जब-जब अब्बास साहब ने खुद अपने हाथ आजमाए तब-तब फिल्म कब आई कब उतरी किसी को पता भी नहीं चला।
आमिर का लगता है कि महिला पत्रकारों के लिए उनके दिल में कोई कोना सदा सुरक्षित रहता है। जहां जा कभी बरखा अपना हित साध लेती है तो कभी अनुष्का।
आमिर का नाम अपनी फिल्म से जोड़ कर इस चतुर महिला ने अपनी पहचान बनवा ली। पर देखा जाए तो एक अच्छे भले विषय की ऐसी की तैसी हो गयी है। कहानी कहना, सुनाना अलग बात है पर उसको फिल्माने के लिए दक्षता का होना बहुत जरूरी होता है। कैमरे की कलम से जब झरने की कलकल सी कहानी गढी जाती है तो उसका जादुई असर पड़ता है देखने वाले पर। इसी कहानी को यदि किसी निष्णात हस्ति ने या खुद आमिर ने फिल्माया होता तो इस व्यंग्य की धार इतनी पैनी होती कि देश में ऐसा माहौल बनाने वालों की बखिया उधड़ जाती। पर इसमें तो अभद्र और वाहियात संवादों और बेमतलब की गंदी गालियां ड़ाल अपने को बिंदास दिखा तुरंत मशहूर होने की फूहड़ कोशिश की गयी है वह भी एक महिला निर्देशक द्वारा।
इसके अलावा पता नहीं परफेक्टनिष्ट कहलाने वाले आमिर की नजर नत्थे की पत्नी के किरदार पर कैसे नहीं पड़ी। एक गरीब, फटेहाल, दाने-दाने को मोहताज किसान परिवार, जिसके पुरुषों के गंदे कपड़े, धूल भरे चेहरों पर बेतरतीब बढे बिना कंघियाए बाल और झाड़-झंखाड़ की तरह उगी दाढियां अपनी बदहाली का बखान करती नजर आती हैं वहीं नत्थे की बीवी की "भवें" अभी अभी तराशी गयीं लगती हैं। इतना ही नहीं उसके चेहरे का मेक-अप और सलवट रहित साड़ियां निर्देशक की कमजोरी की चुगली खाती नजर आती हैं। एक मरभुक्खे परिवार की महिला को क्या अपनी भवें तराशने या चेहरा पोतने की मोहलत मिल भी पाती है कभी?
सही बात है यदि कैमरे से कहानी में रंग भरना इतना ही आसान होता तो आज हर ऐरे-गैरे, नत्थू खैरे का नाम आसिफ, राज कपूर, गुरुदत्त, बिमलराय या ऋषिकेश मुखर्जी के साथ लिखा नजर आता।
सोमवार, 30 अगस्त 2010
तब फिल्मों में स्त्री पात्र का होना एक अजूबा था.
फिल्मी पर्दे को छोड़ दें, वह तो बहुत बड़ी बात है, टीवी के छोटे पर्दे पर भी अपना चेहरा दिखाने और खुद अवतरित होने के लिए आज की कन्याएं कुछ भी करने को आतुर और लालायित रहती हैं। पर क्या इसकी कल्पना भी की जा सकती है कि जब भारत में फिल्मों के जनक दादा साहब फाल्के को अपनी पहली फिल्म, वह भी धार्मिक, के लिए महिला कलाकार की जरूरत पड़ी तो उन्हें दांतों तले पसीना आ गया था। कोई भी महिला या उसका परिवार अपने घर की युवती को इसकी इजाजत नहीं दे रहा था। थक-हार कर उन्होंने अपनी बेटी से ही वह भूमिका करवाने की सोची पर वह उस भूमिका के लिए काफी छोटी थी। आखिर मजबूर हो उन्हें इस भूमिका के लिए एक होटल में रसोइये का काम करने वाले सालुंके नामक युवक को राजी करना पड़ा था। वैसे उस समय रंगमंच पर स्त्री पात्रों का काम भी पुरुष पात्र निभाया करते थे। क्योंकि उस समय भले और सभ्रांत घर की बहू-बेटियों के लिए ऐसे काम करना अलिखित रूप से वर्जित माना जाता था।
इसी कारण जब दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म "लंका दहन" बनाई तो उसमें भी पुरुष और महिला किरदारों को सालुंके ने ही निभाया था।
पता नहीं यह स्थिति कब तक बनी रहती यदि उस समय बंबई में दफ्तरों इत्यादि में कार्यरत एंग्लो-इंड़ियन युवतियां फिल्मों में दिलचस्पी लेना शुरु ना कर देतीं।
आज तो यह सुन-पढ कर भी आश्चर्य होगा वर्तमान पीढी को।
इसी कारण जब दादा साहब ने अपनी दूसरी फिल्म "लंका दहन" बनाई तो उसमें भी पुरुष और महिला किरदारों को सालुंके ने ही निभाया था।
पता नहीं यह स्थिति कब तक बनी रहती यदि उस समय बंबई में दफ्तरों इत्यादि में कार्यरत एंग्लो-इंड़ियन युवतियां फिल्मों में दिलचस्पी लेना शुरु ना कर देतीं।
आज तो यह सुन-पढ कर भी आश्चर्य होगा वर्तमान पीढी को।
शनिवार, 28 अगस्त 2010
बिना शीर्षक के
कल एक खबरिया चैनल बता रहा था कि तिरुपति में बालाजी के मंदिर में चढावे के सोने के गहनों को नकली जेवरों से बदल दिया गया। सोने के लाखों रुपये के सिक्कों में हेराफेरी हुई है।
वर्षों पहले कलकत्ते में, शक्ति के रूपों में भी सबसे भयंकर, मां काली की सोने की जीभ चुरा ली गयी थी।
मंदिरों, पूजास्थलों या म्यूजिमों से देवी-देवताओं की मूर्तियां अक्सर चोरी हो ऊंचे दामोँ में बिकती रहती हैं।
पूजास्थलों में एक ही चढावा घूम-फिर कर बार-बार चढता रहता है।
क्या आस्था, ड़र, विश्वास सब तिरोहित होता जा रहा है? स्वर्ग, नर्क, अगला जन्म, यह सब छोड़ आप क्या सोचते हैं इस बारे में?
वर्षों पहले कलकत्ते में, शक्ति के रूपों में भी सबसे भयंकर, मां काली की सोने की जीभ चुरा ली गयी थी।
मंदिरों, पूजास्थलों या म्यूजिमों से देवी-देवताओं की मूर्तियां अक्सर चोरी हो ऊंचे दामोँ में बिकती रहती हैं।
पूजास्थलों में एक ही चढावा घूम-फिर कर बार-बार चढता रहता है।
क्या आस्था, ड़र, विश्वास सब तिरोहित होता जा रहा है? स्वर्ग, नर्क, अगला जन्म, यह सब छोड़ आप क्या सोचते हैं इस बारे में?
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शहद, एक हल्का पीलापन लिये हुए बादामी रंग का गाढ़ा तरल पदार्थ है। वैसे इसका रंग-रूप, इसके छत्ते के लगने वाली जगह और आस-पास के फूलों पर ज्याद...
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आज हम एक कोहेनूर का जिक्र होते ही भावनाओं में खो जाते हैं। तख्ते ताऊस में तो वैसे सैंकड़ों हीरे जड़े हुए थे। हीरे-जवाहरात तो अपनी जगह, उस ...
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चलती गाड़ी में अपने शरीर का कोई अंग बाहर न निकालें :) 1, ट्रेन में बैठे श्रीमान जी काफी परेशान थे। बार-बार कसमसा कर पहलू बदल रहे थे। चेहरे...
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युवक अपने बच्चे को हिंदी वर्णमाला के अक्षरों से परिचित करवा रहा था। आजकल के अंग्रेजियत के समय में यह एक दुर्लभ वार्तालाप था सो मेरा स...
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कहते हैं कि विधि का लेख मिटाए नहीं मिटता। कितनों ने कितनी तरह की कोशीशें की पर हुआ वही जो निर्धारित था। राजा लायस और उसकी पत्नी जोकास्टा। ...
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हनुमान जी के चिरंजीवी होने के रहस्य पर से पर्दा उठाने के लिए पिदुरु के आदिवासियों की हनु पुस्तिका आजकल " सेतु एशिया" नामक...
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...