हमारा देश विचित्रताओं से भरा पड़ा है। अनोखे लोग, अनोखे रीति-रिवाज, अनोखे स्थल। ऐसी ही एक अनोखी जगह है, हिमाचल की पार्वती घाटी या रूपी घाटी मे 2770मी की ऊंचाई पर बसा गावं "मलाणा"।
विद्वानों के अनुसार यह विश्व का लोकतांत्रिक प्रणाली से चलने वाला सबसे पुराना गावं है। यहां पहुंचने के दो रास्ते हैं, पहला कुल्लू जिले के नग्गर इलाके का एक दुर्गम चढ़ाई और तीक्ष्ण उतराई वाला, जिसका बरसातों मे बहुत बुरा हाल हो जाता है, पर्यटकों के लिये तो खास कर ना जाने लायक। दूसरा अपेक्षाकृत सरल, जो जरी नामक स्थान से होकर जाता है। यहां मलाणा हाइडल प्रोजेक्ट बन जाने से जरी से बराज तक सुंदर सडक बन गयी है, जिससे गाडियां बराज तक पहुंचने लग गयीं हैं। यहां से पार्वती नदी के साथ-साथ करीब 2किमी चलने के बाद शुरू होती है 3किमी की सीधी चढ़ाई, पगडंडी के रूप मे। घने जंगल का सुरम्य माहौल थकान महसूस नहीं होने देता पर रास्ता बेहद बीहड तथा दुर्गम है। कहीं-कहीं तो पगडंडी सिर्फ़ दो फ़ुट की रह जाती है सो बहुत संभल के चलना पड़ता है। पहाडों पर रहने वालों के लिए तो ऐसी चढ़ाईयां आम बात है पर मैदानों से जाने वालों को तीखी चढ़ाई और विरल हवा का सामना करते हुए मलाणा गांव तक पहुंचने में चारेक घंटे लग जाते हैं।
हिमाचल के सुरम्य पर दुर्गम पहाड़ों की उचाईयों पर बसे इस गांव, जिसका सर्दियों में देश के बाकि हिस्सों से नाता कटा रहता है, के ऊपर और कोई आबादी नहीं है। आत्म केन्द्रित से यहां के लोगों के अपने रीति रिवाज हैं, जिनका पूरी निष्ठा तथा कड़ाई से पालन किया जाता है, और इसका श्रेय जाता है इनके ग्राम देवता जमलू को जिसके प्रति इनकी श्रद्धा, खौफ़ की हद छूती सी लगती है। अपने देवता के सिवा ये लोग और किसी देवी-देवता को नहीं मानते। यहां का सबसे बडा त्योहार फागली है जो सावन के महिने मे चार दिनों के लिये मनाया जाता है। इन्ही दिनों इनके देवता की सवारी भी निकलती है, तथा साथ मे साल मे एक बार बादशाह अकबर की स्वर्ण प्रतिमा की पूजा भी की जाती है। कहते हैं एक बार अकबर ने अपनी सत्ता मनवाने के लिये जमलू देवता की परीक्षा लेनी चाही थी तो उसने अनहोनी करते हुए दिल्ली मे बर्फ़ गिरवा दी थी तो बादशाह ने कर माफी के साथ-साथ अपनी सोने की मूर्ती भिजवाई थी। इस मे चाहे कुछ भी अतिश्योक्ति हो पर लगता है उस समय गांव का मुखिया जमलू रहा होगा जिसने समय के साथ-साथ देवता का स्थान व सम्मान पा लिया होगा। सारे कार्य उसी को साक्षी मान कर होते हैं। शादी-ब्याह भी यहां, मामा व चाचा के रिश्तों को छोड, आपस मे ही किए जाते हैं।
कुछ साल पहले तक यहां किसी बाहरी व्यक्ती का आना लगभग प्रतिबंधित था। चमडे की बनी बाहर की कोई भी वस्तु को गावं मे लाना सख्त मना था। पर अब कुछ-कुछ जागरण हो रहा है। लोगों की आवाजाही बढ़ी है। पर अभी भी बाहर वालों को दोयम नजर से ही देखा जाता है। इनके मंदिर के प्रांगण में किसी भी बाहरी व्यक्ति का प्रवेश वर्जित है।
यहां करीब डेढ सौ घर हैं तथा कुल आबादी करीब पांच-छह सौ के लगभग है जिसे चार भागों मे बांटा गया है। यहां के अपने रीति-रिवाज हैं जिनका पूरी निष्ठा तथा सख्ती के साथ पालन होता है। अपने किसी भी विवाद को निबटाने के लिये यहां दो सदन हैं, ऊपरी तथा निचला। यही सदन यहां के हर विवाद का फ़ैसला करते हैं। यहां के निवासियों ने कोर्ट कचहरी का नाम भी नहीं सुना है।
वैसे तो यहां आठवीं तक स्कूल,डाक खाना तथा डिस्पेंसरी भी है पर साक्षरता की दर नहीं के बराबर होने के कारण इलाज वगैरह मे झाड-फ़ूंक का ही सहारा लिया जाता है। भेड पालन यहां का मुख्य कार्य है। वैसे नाम मात्र को चावल, गेहूं, मक्का इत्यादि की फसलें भी उगाई जाती हैं पर आमदनी का मुख्य जरिया है भांग की खेती। यहां की भांग जिसको मलाणा-क्रीम के नाम से दुनिया भर मे जाना जाता है, उससे बहुत परिष्कृत तथा उम्दा दरजे की हिरोइन बनाई जाती है तथा विदेश मे इसकी मांग हद से ज्यादा होने के कारण तमाम निषेद्धों व रुकावटों के बावजूद यह बदस्तूर देश के बाहर कैसे जाती है वह अलग विषय है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
शुक्रवार, 2 जुलाई 2010
गुरुवार, 1 जुलाई 2010
यह ब्लागवाणी को क्या हो गया है भाई ?
यह ब्लागवाणी को क्या हो गया है?
बीस-पच्चीस दिन दूर रहने के बाद अब जब भी इसे खोलता हूं तो वही 14जून का ही प्रवचन सुनने (देखने) को मिल रहा है। वहीं पर अटकी हुई मिलती है। कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है या कोई और कारण है समझ नहीं आ रहा है?
कृपया बताएंगे क्या?
बीस-पच्चीस दिन दूर रहने के बाद अब जब भी इसे खोलता हूं तो वही 14जून का ही प्रवचन सुनने (देखने) को मिल रहा है। वहीं पर अटकी हुई मिलती है। कुछ ज्यादा ही गड़बड़ है या कोई और कारण है समझ नहीं आ रहा है?
कृपया बताएंगे क्या?
कैटल क्लास और लगेज क्लास हमारी नियति
जब भी कभी हवाई यात्रा करनी हो तो मनाएं कि "पैसेज" की तरफ की सीट मिले। रेल यात्रा में चाहे ए सी 3टियर हो या स्लीपर भूल कर भी साईड वाली दो बर्थों का ना सोचें। ऐसा ना हो कि सफर, Suffer बन कर रह जाए।
शशि थुरूर की राजनीति से विदाई उनकी धूमकेतु रूपी चमक से संगी-साथियों की ईर्ष्या के कारण हुई या अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण यह बहस का विषय हो सकता है। पर वह इंसान ऐसा कड़वा सच बोलने पर क्यों मजबूर हुआ उस पर भी ध्यान देना उचित होगा। जिस-जिस ने आज की ललचाती दरों पर हवाई यात्रा की होगी वे भुग्तभोगी जानते ही होंगे कि घरेलू यात्रा के दौरान दो-तीन घंटे किस परिस्थिति में कटते हैं। बंधा हुआ सा बैठा रहता है यात्री। हिलने, ड़ुलने, यात्रा के दौरान एक बार उठने में भी हिचकिचाता हुआ चाहे प्रकृति की पुकार कितनी भी तीव्र हो।
बहुत पहले दूरदर्शन पर एक धारावाहिक आता था "राग दरबारी" उसमें एक बार एक सरकारी आदमी लोगों से परिवार को दो या तीन बच्चों तक सीमित रखने की पैरवी करता है। कथा का नायक उससे पूछता है कि इससे क्या होगा? तो पैरवी करने वाला उसे समझाता है कि मान लो तुमने घर में खीर बनाई, ज्यादा बच्चे होंगे तो खीर की कम मात्रा हिस्से मे आएगी, यदि कम बच्चे होंगे तो वे भरपेट खा सकेंगे। तो नायक पलट कर पूछता है कि खीर ज्यादा बनाने की जुगत क्यों नहीं करते? बच्चों के पीछे क्यों लट्ठ लिए पड़े हो?
अब एक उदाहरण ट्रेन का। पिछले दिनों अपने कार्यकाल मे श्रीमान लालूजी ने स्लीपर और वातानुकूलित डिब्बों में किनारे वाली शायिकाओं की संख्या बढवा कर दो से तीन करवा दी थीं। ना करवाने वाले ने उसमे कभी बैठना था ना करने वालों ने। अपने बेवकूफी भरे निर्णय पर कोई झांकने भी नहीं गया होगा। झूठी प्रशंसा पाने के चक्कर में जो गलत कदम उठाया गया था उस पर विरोध प्रगट करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई थी। कोई यह ना समझा सका था उस भले आदमी को कि ऐसा करने पर यात्रा करने वाले को कितना "सफर" करना पड़ेगा। उस बेढंगे बदलाव के बाद वहां सिर्फ इतनी सी जगह बनती है कि आप अपना बड़ा अटैची रख सकें, ऊंचाई के हिसाब से। खुद तो वहां बैठना तो दूर आप ढंग से लेट कर करवट भी नहीं बदल सकते। भला हो भारत के दक्षिण में रहने वाले लोगों का जिन्होंने सबसे पहले इस फैसले के विरुद्ध आवाज उठाई थी। विरोध का फायदा सिर्फ इतना हुआ कि तीन के बीच से एक शायिका हटवा दी गयी। पर ऊपर वाली अपनी जगह पर कायम है, जिस पर चढने उतरने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। बुजुर्गों और महिलाओं के तो बिल्कुल भी वश की बात नहीं है कि उस पर चढने की सोचें भी। उस शायिका को अपनी जगह ना लाने का कारण उस पर जरूरत से ज्यादा होने वाला खर्च बता रेलवे ने पल्ला झाड़ लिया है। उसका कहना है कि यह "सिस्टम" जिनमें ऐसी शायिकाएं बची हैं उन डिब्बों के कबाड़ होने पर अपने आप खत्म हो जाएगा।
धन्य है हमारी सहनशीलता। पैसा खर्च करने के बाद भी हम जैसे तैसे यात्रा पूरी कर संतुष्ट हो जाते हैं। यह तो गनीमत है कि थरूर ने रेल में यात्रा नहीं की नहीं तो इन डिब्बों में आने-जाने वालों को "लगेज क्लास" कहलाने में देर नहीं लगती।
शशि थुरूर की राजनीति से विदाई उनकी धूमकेतु रूपी चमक से संगी-साथियों की ईर्ष्या के कारण हुई या अपनी बेबाक टिप्पणियों के कारण यह बहस का विषय हो सकता है। पर वह इंसान ऐसा कड़वा सच बोलने पर क्यों मजबूर हुआ उस पर भी ध्यान देना उचित होगा। जिस-जिस ने आज की ललचाती दरों पर हवाई यात्रा की होगी वे भुग्तभोगी जानते ही होंगे कि घरेलू यात्रा के दौरान दो-तीन घंटे किस परिस्थिति में कटते हैं। बंधा हुआ सा बैठा रहता है यात्री। हिलने, ड़ुलने, यात्रा के दौरान एक बार उठने में भी हिचकिचाता हुआ चाहे प्रकृति की पुकार कितनी भी तीव्र हो।
बहुत पहले दूरदर्शन पर एक धारावाहिक आता था "राग दरबारी" उसमें एक बार एक सरकारी आदमी लोगों से परिवार को दो या तीन बच्चों तक सीमित रखने की पैरवी करता है। कथा का नायक उससे पूछता है कि इससे क्या होगा? तो पैरवी करने वाला उसे समझाता है कि मान लो तुमने घर में खीर बनाई, ज्यादा बच्चे होंगे तो खीर की कम मात्रा हिस्से मे आएगी, यदि कम बच्चे होंगे तो वे भरपेट खा सकेंगे। तो नायक पलट कर पूछता है कि खीर ज्यादा बनाने की जुगत क्यों नहीं करते? बच्चों के पीछे क्यों लट्ठ लिए पड़े हो?
अब एक उदाहरण ट्रेन का। पिछले दिनों अपने कार्यकाल मे श्रीमान लालूजी ने स्लीपर और वातानुकूलित डिब्बों में किनारे वाली शायिकाओं की संख्या बढवा कर दो से तीन करवा दी थीं। ना करवाने वाले ने उसमे कभी बैठना था ना करने वालों ने। अपने बेवकूफी भरे निर्णय पर कोई झांकने भी नहीं गया होगा। झूठी प्रशंसा पाने के चक्कर में जो गलत कदम उठाया गया था उस पर विरोध प्रगट करने की किसी की हिम्मत नहीं हुई थी। कोई यह ना समझा सका था उस भले आदमी को कि ऐसा करने पर यात्रा करने वाले को कितना "सफर" करना पड़ेगा। उस बेढंगे बदलाव के बाद वहां सिर्फ इतनी सी जगह बनती है कि आप अपना बड़ा अटैची रख सकें, ऊंचाई के हिसाब से। खुद तो वहां बैठना तो दूर आप ढंग से लेट कर करवट भी नहीं बदल सकते। भला हो भारत के दक्षिण में रहने वाले लोगों का जिन्होंने सबसे पहले इस फैसले के विरुद्ध आवाज उठाई थी। विरोध का फायदा सिर्फ इतना हुआ कि तीन के बीच से एक शायिका हटवा दी गयी। पर ऊपर वाली अपनी जगह पर कायम है, जिस पर चढने उतरने के लिए काफी मशक्कत करनी पड़ती है। बुजुर्गों और महिलाओं के तो बिल्कुल भी वश की बात नहीं है कि उस पर चढने की सोचें भी। उस शायिका को अपनी जगह ना लाने का कारण उस पर जरूरत से ज्यादा होने वाला खर्च बता रेलवे ने पल्ला झाड़ लिया है। उसका कहना है कि यह "सिस्टम" जिनमें ऐसी शायिकाएं बची हैं उन डिब्बों के कबाड़ होने पर अपने आप खत्म हो जाएगा।
धन्य है हमारी सहनशीलता। पैसा खर्च करने के बाद भी हम जैसे तैसे यात्रा पूरी कर संतुष्ट हो जाते हैं। यह तो गनीमत है कि थरूर ने रेल में यात्रा नहीं की नहीं तो इन डिब्बों में आने-जाने वालों को "लगेज क्लास" कहलाने में देर नहीं लगती।
बुधवार, 30 जून 2010
कुतुबमीनार को नीचा दिखाने की कोशिश भी हुई थी.
दिल्ली की कुतुबमीनार तो खैर दिल्ली की पहचान ही बन गयी है। परन्तु इसको भी पीछे छोड़ने की कोशिश की गयी थी बीते जमाने मे।
जहां कुतुबमीनार खड़ी हो आकाश से बातें कर रही है उसी प्रांगण मे और भी बहुत से बने-अधबने अवशेष बिखरे पड़े हैं। वहीं है कुव्वतुल-इस्लाम मस्जिद। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को अपने मूल आकार से दोगुना बड़ा बनवा दिया था, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग नमाज अता कर सकें। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि इस मस्जिद की मीनार को भी वह कुतुब से दोगुनी बड़ी बनवा दे। उसने बनवाना प्रारम्भ भी कर दिया था पर इसी बीच उसकी मृत्यु हो जाने से उसका सपना पूरा नहीं हो पाया।
कुतुब के पास ही उसकी उत्तरी दिशा मे यह अधूरी बनी मीनार खड़ी है। जिसकी ऊंचाई करीब २४.५ फिट है। यह मुश्किल से पहली मंजिल ही बन पाई थी कि अलाउद्दीन को ऊपर से बुलावा आ गया था।
इसे अलाई मीनार के नाम से जाना जाता है।
जहां कुतुबमीनार खड़ी हो आकाश से बातें कर रही है उसी प्रांगण मे और भी बहुत से बने-अधबने अवशेष बिखरे पड़े हैं। वहीं है कुव्वतुल-इस्लाम मस्जिद। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को अपने मूल आकार से दोगुना बड़ा बनवा दिया था, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग नमाज अता कर सकें। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि इस मस्जिद की मीनार को भी वह कुतुब से दोगुनी बड़ी बनवा दे। उसने बनवाना प्रारम्भ भी कर दिया था पर इसी बीच उसकी मृत्यु हो जाने से उसका सपना पूरा नहीं हो पाया।
कुतुब के पास ही उसकी उत्तरी दिशा मे यह अधूरी बनी मीनार खड़ी है। जिसकी ऊंचाई करीब २४.५ फिट है। यह मुश्किल से पहली मंजिल ही बन पाई थी कि अलाउद्दीन को ऊपर से बुलावा आ गया था।
इसे अलाई मीनार के नाम से जाना जाता है।
मंगलवार, 29 जून 2010
वो दिन हवा हुए जब पसीना गुलाब था.
जो पिछले महीने की तेइस तारीख से तबीयत ढीली हो लटकने लगी तो लटकती ही चली गयी। पहले तो लगा कि ऐसे ही है ठीक हो जाएगा जैसे पहले भी होता आया था। पर इस बार अगला भी पटकनी देने के मूड़ मे था। वैसे चेतावनी तो 10-12 दिन पहले से ही मिल रही थी कि कुछ होने वाला है पर ध्यान नही दिया गया यह जानते हुए भी कि अब वो दिन नही रहे जब पसीना गुलाब था। इस बीच पाबलाजी को अंदेशा हुआ और उन्होंने फोन कर पूछा कि क्या गड़बड़ है तो उन्हें बताया कि जिद के कारण भोग भोगना पड़ रहा है।
घर के सारे जनों का छुट्टियों मे बाहर जाने का प्रोग्राम था। "इनक्लुडिंग मी"। बनाया भी मैंने ही था, तीन महीने पहले से। पर ऐन मौके पर मुंह से निकल गया कि मैं ना जा पाऊंगा, कर्म क्षेत्र में मेरा रहना जरूरी है (अब बीस दिन नहीं रहा तो जैसे काम ही बंद हो गया हो)। पर जब ब्रह्मवाक्य निकल गया तो उस पर अड़ना ही था।
कुछ दुखी, कुछ परेशान, कुछ गुस्से में सारे लोग निकल लिए और अकेले देख धर दबोचा बिमारी ने। अब लो मजा, ना जाने लायक ना रहने लायक। पर घर वाले समझदार होते हैं। समझ गये थे कि करेला नीम चढा और पंजाबी बात पर अड़ा बराबर ही होते हैं (बतर्ज पाबलाजी)। तो कुछ ऐसी परिस्थिति बनाई कि सांप भी ना मरे और लाठी भी टूट जाए। सांप को तो बाद में काम में लाया जाएगा आगामी किसी अकड़ को ढीला करवाने में।
तो सुखी-सांदी तीन को दिल्ली चला गया। हवा, पानी, धूल, मिट्टी, माहौल बदला। सुर्त आई (पंजाबी में)। राजनीति - रावण वगैरह देख, बिना दूसरे दिन जल्दि उठने की चिंता के फुटबाल को गोल-गोल करते कल लौटा हूं।
मेरा ऐसा सोचना था कि किसी के कहीं जाने-वाने से अपनी इस ब्लागिंग की दुनिया में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। किसे फुर्सत है कि देखे कौन आया कौन नहीं आया। इसीलिए मैंने कभी अनुपस्थित होने का जिक्र नहीं किया। पर इस बार ललितजी ने दूरभाष पर जब पूछा कि भाई कहां हो तीन तारीख से, तो मन में आया कि नहीं ये अनजाने देखे रिश्ते नाते महज औपचारिक नहीं हैं इनमें लगाव है, अपनत्व है, जिज्ञासा है, फिक्र है। और यह ऐसी ही बनी रहे यही तहे दिल की तमन्ना है।
तो लीजिए फिर शुरु होता है वही बैल का कोल्हू, कोल्हू का चक्कर।
घर के सारे जनों का छुट्टियों मे बाहर जाने का प्रोग्राम था। "इनक्लुडिंग मी"। बनाया भी मैंने ही था, तीन महीने पहले से। पर ऐन मौके पर मुंह से निकल गया कि मैं ना जा पाऊंगा, कर्म क्षेत्र में मेरा रहना जरूरी है (अब बीस दिन नहीं रहा तो जैसे काम ही बंद हो गया हो)। पर जब ब्रह्मवाक्य निकल गया तो उस पर अड़ना ही था।
कुछ दुखी, कुछ परेशान, कुछ गुस्से में सारे लोग निकल लिए और अकेले देख धर दबोचा बिमारी ने। अब लो मजा, ना जाने लायक ना रहने लायक। पर घर वाले समझदार होते हैं। समझ गये थे कि करेला नीम चढा और पंजाबी बात पर अड़ा बराबर ही होते हैं (बतर्ज पाबलाजी)। तो कुछ ऐसी परिस्थिति बनाई कि सांप भी ना मरे और लाठी भी टूट जाए। सांप को तो बाद में काम में लाया जाएगा आगामी किसी अकड़ को ढीला करवाने में।
तो सुखी-सांदी तीन को दिल्ली चला गया। हवा, पानी, धूल, मिट्टी, माहौल बदला। सुर्त आई (पंजाबी में)। राजनीति - रावण वगैरह देख, बिना दूसरे दिन जल्दि उठने की चिंता के फुटबाल को गोल-गोल करते कल लौटा हूं।
मेरा ऐसा सोचना था कि किसी के कहीं जाने-वाने से अपनी इस ब्लागिंग की दुनिया में किसी को कोई फर्क नहीं पड़ता। किसे फुर्सत है कि देखे कौन आया कौन नहीं आया। इसीलिए मैंने कभी अनुपस्थित होने का जिक्र नहीं किया। पर इस बार ललितजी ने दूरभाष पर जब पूछा कि भाई कहां हो तीन तारीख से, तो मन में आया कि नहीं ये अनजाने देखे रिश्ते नाते महज औपचारिक नहीं हैं इनमें लगाव है, अपनत्व है, जिज्ञासा है, फिक्र है। और यह ऐसी ही बनी रहे यही तहे दिल की तमन्ना है।
तो लीजिए फिर शुरु होता है वही बैल का कोल्हू, कोल्हू का चक्कर।
गुरुवार, 3 जून 2010
लटकाना हमारी आदत में शूमार हो गया है.
आप मेरी और किसी बात से सहमत हों ना हों पर इस बात से तो सहमत होंगे ही कि हमें किसी भी चीज को लटकाने की आदत सी पड़ गयी है। मैं कंधे पर शाल या गले में टाई या खूंटी पर कपड़े लटकाने की बात नहीं कर रहा हूं। मैं कुछ ऊंची आदतों की बात कर रहा था। जैसे किसी योजना की शुरुआत की बात हो, सर पर मंड़राते जल संकट की बात हो, खाद्य समस्या की बात हो, दिन पर दिन फैलते आतंक की बात हो, दफ्तर में कछुए की पीठ पर रखी फाईलों की बात हो, सरहद की बात हो, आंतरिक सुरक्षा की बात हो, कोर्ट में शहतीरों से लटकते-लटकते दम तोड़ते केसों की बात हो, यह बात हो, वह बात हो कोई भी बात हो हम उसे लटकाए रखने में विश्वास करते हैं।
आजादी के बाद से शुरू हुई समस्याएं वैसे ही लटकते-लटकते फलती फूलती आ रहीं हैं। तरह तरह के नेता आये और गये, किसीने थोड़ी बहुत कोशिश की भी होगी पर ज्यादातर तो जैसे हवन के बाद लाल कपड़े में नारियल बांध कहीं लटका देते हैं वैसे ही वे भी कुछ ना कुछ नया लटका कर अपने रास्ते चल दिए या भेज दिए गये।
इस लटकन से कोई भी पीछा नहीं छुड़ा पाया। इन चारों ओर लटकती लटकनों से आम आदमी का सर टकराता रहता है। कभी-कभी लहूलुहान भी हो जाता है पर हम यह संस्कृति नहीं छोड़ते, शायद छोड़ना ही नहीं चाहते। आजादी के बाद तो यह लटकन क्रिया अमरबेल हो गयी है। किसी भी सरकारी दफ्तर में जाईए किसी काम को लेकर, पहले यही सुनाई पड़ेगा, कल आईएगा।
यह शब्द "काल होबे" याने यह काम "कल होगा" बंगाल की देन है। कहा जाता था कि आज जो बंगाल सोचता या कहता है वही बाकि देश भविष्य में कहता है। वहीं से चल कर यह "काल होबे" सारे देश का कल आईएगा बन कर अपना लिया गया है।
लीजिए एक और लटकन।
तिमारपुर्सी के लिए एक सज्जन आये हैं। बिमार का हालचाल पूछने।
तो लटक गयी ना यह भी पोस्ट.............
आजादी के बाद से शुरू हुई समस्याएं वैसे ही लटकते-लटकते फलती फूलती आ रहीं हैं। तरह तरह के नेता आये और गये, किसीने थोड़ी बहुत कोशिश की भी होगी पर ज्यादातर तो जैसे हवन के बाद लाल कपड़े में नारियल बांध कहीं लटका देते हैं वैसे ही वे भी कुछ ना कुछ नया लटका कर अपने रास्ते चल दिए या भेज दिए गये।
इस लटकन से कोई भी पीछा नहीं छुड़ा पाया। इन चारों ओर लटकती लटकनों से आम आदमी का सर टकराता रहता है। कभी-कभी लहूलुहान भी हो जाता है पर हम यह संस्कृति नहीं छोड़ते, शायद छोड़ना ही नहीं चाहते। आजादी के बाद तो यह लटकन क्रिया अमरबेल हो गयी है। किसी भी सरकारी दफ्तर में जाईए किसी काम को लेकर, पहले यही सुनाई पड़ेगा, कल आईएगा।
यह शब्द "काल होबे" याने यह काम "कल होगा" बंगाल की देन है। कहा जाता था कि आज जो बंगाल सोचता या कहता है वही बाकि देश भविष्य में कहता है। वहीं से चल कर यह "काल होबे" सारे देश का कल आईएगा बन कर अपना लिया गया है।
लीजिए एक और लटकन।
तिमारपुर्सी के लिए एक सज्जन आये हैं। बिमार का हालचाल पूछने।
तो लटक गयी ना यह भी पोस्ट.............
बुधवार, 2 जून 2010
इंसान ही नहीं वस्तुएं भी बदकिस्मत होती हैं.
सन 1733।
क्रेमलिन के आइवान वैलिकी के गिरजाघर में एक विशालकाय घंटे को लगाने का प्रस्ताव पास हुआ। सोचा गया कि घंटा इतना बड़ा हो कि दुनिया भर में उसकी चर्चा हो। अंत में 200 टन भार के घंटे को बनाने की सोची गयी। नक्शा बन गया। सांचा भी तैयार हो गया। घंटे को ढालने का काम भी शुरू हो गया। पर ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था। जहां घंटे की ढलाई हो रही थी उस कारखाने में भीषण आग लग गयी। सारा कुछ जल कर राख हो गया।
लगभग बन चुका घंटा भी टूट गया और कारखाने के मलबे के नीचे दब गया।
करीब सौ साल बाद फिर उसकी याद आई। राजा निकोलस के शासन काल में मलबा साफ किया गया और उस घंटे को एक चबूतरा बना उस पर स्थापित कर दिया गया। दुर्घटना में घंटे का एक टुकड़ा टूट कर अलग हो गया था, उसे भी चबूतरे पर रख दिया गया।
इस घंटे की ऊंचाई 19 फुट तथा घेरा करीब 60 फुट और इसकी दिवार की मोटाई करीब 2 फुट है। इसके अंदर इतनी जगह है कि बीस आदमी वहां खड़े हो सकते हैं। इसके ऊपर सुंदर नक्काशी की गयी है तथा बहुत सारे देवी-देवताओं के चित्र बनाए गये हैं। सबसे ऊपर रूस के राष्ट्रीय पक्षी बाज का चित्र बना हुआ है।
इस बदकिस्मत घंटे के टूट जाने के पश्चात एक दूसरा घंटा बनाया गया जिसका वजन 128 टन है। जो आज भी गिरजे के ऊपर उसी मीनार में लगा हुआ है जहां उस दुनिया के सबसे बड़े घंटे ने होना था।
क्रेमलिन के आइवान वैलिकी के गिरजाघर में एक विशालकाय घंटे को लगाने का प्रस्ताव पास हुआ। सोचा गया कि घंटा इतना बड़ा हो कि दुनिया भर में उसकी चर्चा हो। अंत में 200 टन भार के घंटे को बनाने की सोची गयी। नक्शा बन गया। सांचा भी तैयार हो गया। घंटे को ढालने का काम भी शुरू हो गया। पर ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था। जहां घंटे की ढलाई हो रही थी उस कारखाने में भीषण आग लग गयी। सारा कुछ जल कर राख हो गया।
लगभग बन चुका घंटा भी टूट गया और कारखाने के मलबे के नीचे दब गया।
करीब सौ साल बाद फिर उसकी याद आई। राजा निकोलस के शासन काल में मलबा साफ किया गया और उस घंटे को एक चबूतरा बना उस पर स्थापित कर दिया गया। दुर्घटना में घंटे का एक टुकड़ा टूट कर अलग हो गया था, उसे भी चबूतरे पर रख दिया गया।
इस घंटे की ऊंचाई 19 फुट तथा घेरा करीब 60 फुट और इसकी दिवार की मोटाई करीब 2 फुट है। इसके अंदर इतनी जगह है कि बीस आदमी वहां खड़े हो सकते हैं। इसके ऊपर सुंदर नक्काशी की गयी है तथा बहुत सारे देवी-देवताओं के चित्र बनाए गये हैं। सबसे ऊपर रूस के राष्ट्रीय पक्षी बाज का चित्र बना हुआ है।
इस बदकिस्मत घंटे के टूट जाने के पश्चात एक दूसरा घंटा बनाया गया जिसका वजन 128 टन है। जो आज भी गिरजे के ऊपर उसी मीनार में लगा हुआ है जहां उस दुनिया के सबसे बड़े घंटे ने होना था।
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