दिल्ली की कुतुबमीनार तो खैर दिल्ली की पहचान ही बन गयी है। परन्तु इसको भी पीछे छोड़ने की कोशिश की गयी थी बीते जमाने मे।
जहां कुतुबमीनार खड़ी हो आकाश से बातें कर रही है उसी प्रांगण मे और भी बहुत से बने-अधबने अवशेष बिखरे पड़े हैं। वहीं है कुव्वतुल-इस्लाम मस्जिद। अलाउद्दीन खिलजी ने इस मस्जिद को अपने मूल आकार से दोगुना बड़ा बनवा दिया था, जिससे ज्यादा से ज्यादा लोग नमाज अता कर सकें। उसकी हार्दिक इच्छा थी कि इस मस्जिद की मीनार को भी वह कुतुब से दोगुनी बड़ी बनवा दे। उसने बनवाना प्रारम्भ भी कर दिया था पर इसी बीच उसकी मृत्यु हो जाने से उसका सपना पूरा नहीं हो पाया।
कुतुब के पास ही उसकी उत्तरी दिशा मे यह अधूरी बनी मीनार खड़ी है। जिसकी ऊंचाई करीब २४.५ फिट है। यह मुश्किल से पहली मंजिल ही बन पाई थी कि अलाउद्दीन को ऊपर से बुलावा आ गया था।
इसे अलाई मीनार के नाम से जाना जाता है।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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7 टिप्पणियां:
चलिये उस का काम निपटा वरना है एक ओर मीनर देखनी पडती....
आभार, इस जानकारी का..
हा हा हा
राज जी से सहमत
आपके ब्लाग की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर
हमारे लिये एक नई जानकारी, आभार!
नयी जानकारी के लिए आभार
सचमुच यह अनोखी जानकारी है कम से कम मेरे लिए। आपका आभार.
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