pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

बुधवार, 19 मई 2010

क्या पान खाना स्वास्थ्यप्रद है?

पान का सेवन हमारे यहां सैकड़ों वर्षों से होने के प्रमाण मिलते हैं। खास-खास अवसरों पर या आदर-सत्कार में तो इसका चलन तो है ही। किसी बड़े या कठिन काम के लिए भी इसका बीड़ा दिया जाता रहा है। पर कहीं-कहीं यह व्यसन की सीमा तक भी जा पहुंचा है।

आयुर्वेद में भी इसके उपयोग का जिक्र मिलता है जहां इसे "तांबूल या नागरबेल" का नाम दिया गया है। इसके अनुसार इसके खाने से मुख की स्वच्छता, खाने में रुचि तथा मुंह दुर्गंध रहित रहता है।

आजकल तो पान में तरह-तरह के मसाले, तंबाकू, किमाम और ना जाने किन-किन चिजों का इस्तेमाल होने लगा है जिनका दीर्घकाल तक सेवन स्वास्थ्य पर विपरीत असर डालता है। पान का सेवन बिना किसी नशीले पदार्थ के होना चाहिए। इसमें चूने, कत्थे की उचित मात्रा के साथ-साथ जायफल, सुपारी, इलायची और लौंग का उपयोग किया जा सकता है। इसे मुंह में रख धीरे-धीरे चबाना चाहिए तथा इससे जो रस बने उसे निगलते रहना चाहिए। सुपारी का भी ज्यादा उपयोग ना ही हो तो बेहतर है।

पान का सेवन बेस्वाद मुख को ठीक करता है, जीभ साफ रखता है, दांतों व जबड़ों के लिए फायदेमंद रहता है तथा गले के लिए भी उपयोगी है। इसका उपयोग सुबह मुंह साफ करने के बाद भोजनोपरांत तथा रात के खाने के बाद किया जाना चाहिए।
पर कुछ परिस्थितियों में पान खाना निषिद्ध कहा गया है -
जब नाक, मुंह, कान, गुदा से खून आता हो।
अत्यधिक थकान में।
गश आते हों तो।
गले में या शरीर में सूजन हो तो।
आंखें आयी हुई हों तो।
तथा गरम प्रकृति के व बहुत कृशकाय व्यक्ति को इसके सेवन से बचना चाहिए।

तो चलिए एक पान हो जाए.....

मंगलवार, 18 मई 2010

कृत्य है जिनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?

यह कोई कविता नहीं है, क्योंकि मुझे कविता लिखनी आती ही नहीं, नाही उसकी समझ है। जब दिलो-दिमाग आक्रोशित हों, बेकाबू होती परिस्थितियों से, कुछ ना कर पाने की कशमकश हो, जो कुछ कर पा सकते हैं वे भी आग में आहूती देते दिखें तो ऐसे में उपजे उद्वेग से निकला यह शब्द समुह है। जो सवाल कर रहा है उन सभी से जो इस रोज होते नर संहार के घिनौने प्रकरण को खत्म ना कर अपनी-अपनी पुरियां तले जा रहे हैं। एक शांत प्रदेश को ज्वालामुखी बना कर धर दिया है।

उनका खून, खून है, इनकी जिंदगी बे-मानी है?
इनकी जान की कोई कीमत नहीं, उनकी मौत कुर्बानी है?
कृत्य है उनका दानव सा, कहते तुम उनको मानव हो?
किसके किस अधिकार की बातें तुम करते हो?
ममता, स्वामी, दिग, यश, अरुन्धती,
आंखें खोलो ना बनो गांधारी,
निष्पक्ष हो बात करो छोड़ो फैलाना बिमारी।
पूछो अपने जमीर से हो रहा क्या सब ठीक है?
उजड़ रहे हैं घर, साया छिन रहा बच्चों का, बेसहारा हो गये मां-बाप, क्या कसूर था इन बेवाओं का?
त्यागो अपनी हठधर्मिता, जाओ जाकर उनसे पूछो, कहां से आए, क्या चाहते हैं? बहाते क्यों खून निर्दोषों का? बात करते किस न्याय की, वैर निभाते किस बैरी का?
आग है इतनी सीने में, धधक रही है ऐसी ज्वाला,
तो जा रक्षा करें सरहद की उस मिट्टी की जिसने है इनको पाला।
पर देश की रक्षा करना है इतना आसान नहीं। यह काम है वीर जवानों का।
वहां दाल ना गलती बुजदिलों की। ना बचाने खड़े होते हैं मौका परस्त।
वहां खेल होता है फर्रुखाबादी, धरे रह जाते हैं सारे बंदोबस्त।

रविवार, 16 मई 2010

आज तोता नहीं, कौवा है :-)

# संता और संतानी गोवा घूमने गये। वहां संता ने एक मोटर सायकिल किराए पर ली और दोनों घूमने निकल पड़े। अब संता तो संता ऊपर से पीछे बैठी बीवी उसने बीवी पर रौब ड़ालने के लिये उल्टी-सीधी बिना नियम कानून देखे गाड़ी चलाई फलस्वरूप एक चौराहे पर ट्रैफिक पुलिस ने रोक कर चालान कर दिया। संता बोला सरजी आगे तो कोई और नहीं रोकेगा? पुलिसवाले ने कहा कोई रोके तो कह देना "तोता"।
संता के हाथ चिराग लग गया। दिन भर बेतहाशा गाड़ी दौड़ाता रहा। दूसरे दिन भी अपनी हरकतों से बाज नहीं आया। नतीजतन एक जगह यातायात नियमों को तोड़ते फिर रोका गया। जैसे ही पुलिस वाला पास आया उसने अकड़ कर कहा "तोता"।
पुलिस वाले ने कहा पांच सौ रुपये निकालो, आज "कौवा" है।

# संतानी बंतानी से, तुम तो अपने कुत्ते की बहुत बड़ाई कर रही थी कि यह बहुत चतुर है, कैसे भला?जब भी मेरे पति आल्मारी खोलने लगते हैं, यह जोर-जोर से भौंकने लगता है।
बंतानी ने बात साफ की।

संता रात पी कर लौटा। पत्नी की नाराजगी से ड़र चुपचाप अपने कमरे मे जा एक बड़ी सी किताब उठा पढने लगा। पत्नी ने कमरे मे आते ही पूछा, आज फिर पी कर आए हो?
संता बोला नहीं तो।
तो फिर यह ब्रीफकेस मुंह के सामने रख क्या कर रहे हो? पत्नी ने पूछा।

शनिवार, 15 मई 2010

तोला, माशा, रत्ती

पुरानी चीजों की तरह पुराने नाप-तौल भी चलन के बाहर होते चले गए। कभी-कभी मुहावरों में या किसी ख़ास खरीद फरोक्त वगैरह में उन्हें भले ही याद कर लिया जाता हो नहीं तो आज की पीढी को तो वे अजूबा ही लगते होंगे। चलिए एक बार उन्हें याद ही कर लेते हैं :-

पुराने भारतीय नाप-तौल :-
8 खसखस = 1 चावल,
8 चावल = 1 रत्ती,
8 रत्ती = 1 माशा,
4 माशा =1 टंक, 12 माशा = 1 तोला,
5 तोला = 1 छटांक,
4 छटांक = 20 तोला या 1 पाव,
8 छटांक या 40 तोला = 1 अधसेरा,
16 छटांक या 80 तोला = 1 सेर,
5 सेर = 1 पसेरी,
8 पसेरी = 40 सेर या 1 मन,

1 केजी = 86 तोला या 1 सेर 6/5 छटांक,
100 केजी = 1 क्विंटल या 2 मन 27 5/2 सेर।

विभिन्न प्रदेशों के जमीन के नाप :-
उत्तर प्रदेश -
1 लाठा = 99 इंच या 8 फुट 3 इंच।
20 अनवांसी = 1 कचवांसी,
20 कचवांसी = 1 बिस्वांसी,
20 बिस्वांसी = 1 बिस्वा,
20 बिस्वा = 1 बीघा या 3025 वर्गगज,
8 बीघा = 5 एकड़ या 24200 वर्गगज।

बंगाल -
1 वर्ग हाथ = 1 गण्ड़ा,
20 गण्ड़ा = 1 छटांक,
16 छटांक = 1 काठा = 80 वर्गगज,
20 काठा = 1 बीघा,
121 बीघा = 40 एकड़ ( 1 एकड़ = 3 बीघा 8 छटांक)
1936 बीघा = 1 वर्गमील,

पंजाब -
1 करम = 3 हाथ,
9 वर्ग करम या सरसांई = 1 मरला,
20 मरला = 1 कनाल,
4 कनाल = 1 बीघा,
2 बीघा = 1 घूमा या 3240 वर्गगज।

बुधवार, 12 मई 2010

कभी न कभी आप के साथ भी ऐसा जरूर हुआ होगा

कभी-कभी कुछ अजीब सी स्थिति बन जाती है हमारी। उस समय तो कोफ्त ही होती है। पर ऐसा क्यों होता है कि :-

* जब आप घर में अकेले हों और नहा रहे हों तभी फ़ोन की घंटी बजती है।

* जब आपके दोनों हाथ तेल आदि से सने हों तभी आपके नाक में जोर की खुजली होती है।

* जब भी कोई छोटी चीज आपके हाथ से गिरती है तो वहाँ तक लुढ़क जाती है जहाँ से उसे उठाना कठिन होता है।

* जब भी आप गर्म चाय या काफ़ी पीने लगते हैं तो कोई ऐसा काम आ जाता है जिसे आप चाय के ठंडा होने केपहले पूरा नहीं कर पाते।

* जब आप देर से आने पर टायर पंचर का बहाना बनाते हैं तो दूसरे दिन सचमुच टायर पंचर हो जाता है।

* जब आप यह सोच कर कतार बदलते हैं कि यह कतार जल्दी आगे बढेगी तो जो कतार आपने छोडी होती हैवही जल्दी बढ़ने लगती है।

मर्फी के "ला" को छोडिये। यह बताईये ऐसा होता है क्या ? :-)

सोमवार, 10 मई 2010

धृतराष्ट्र हर युग में होते हैं।

कुछ दिनों पहले एक सामने घट रहे वाकये का जिक्र किया था "आज का धृतराष्ट्र जो खुद ही बैल को उकसा रहा है" के नाम से। जिसमें पुत्र मोह में पड़ा एक बाप अपने 32साला लड़के की इस बात को, कि उसका पहली पत्नि से तलाक हो चुका है और एक बच्चा भी है, छिपा कर फिर उसकी शादी करने जा रहा था। वह इंसान अपने लड़के के भविष्य(?) के लिए इतना अंधा हो चुका था कि उसे उस लड़की का जरा भी ख्याल नहीं आ रहा था, जिसे वह धोखे से अपनी बहू बना घर लाने जा रहा था। बहुत से लोगों ने बहुत तरह से उसे समझाने की कोशिश की। उसे समझाया कि लड़की वालों को सब साफ-साफ बता कर ही बात आगे बढाना नहीं तो शादी के बाद मुसीबत में फंस जाओगे। हर ऊंच-नीच समझाई कि यह कोई व्यसायिक गठबंधन नहीं होने जा रहा या यह रिश्ता दोस्ती-मैत्री का नहीं है कि पसंद नहीं आया या पटी नहीं आपस में तो अलग-अलग रास्ता अख्तियार कर लिया जाएगा। पर उसने किसी की बात पर भी ध्यान नहीं दिया। उसे यहां तक कहा गया कि यदि तुम्हारी बेटी के साथ कोई ऐसा करता तो तुम पर क्या बीतती? इसका कोई जवाब नहीं था उसके पास, उसे ऐसी नसीहत देने वाले अपने दुश्मन लग रहे थे। उसकी बस एक ही रट थी कि शादी हो जाएगी फिर सब ठीक हो जाएगा, क्या ठीक हो जाएगा इसका उसे भी पता नहीं था।

अगला 10-12 लोगों को ले सगाई कर आया तथा इसी आने वाली अक्षय तृतिया पर शादी का होना तय हो गया।
पर कहीं ना कहीं कोई न्याय व्यवस्था है शायद। लड़की के कर्म अच्छे थे या उसके परिवार ने कुछ पुण्य कार्य किया होगा, उनको भनक लग गयी लड़के के इतिहास की। पूछ-ताछ हुई, सच सामने आ गया और उन्होंने साफ मना कर दिया इस रिश्ते से।

अब ये कहता फिर रहा है, भगवान मेरे साथ था, कहीं शादी के बाद पता चलता तो मेरे को मार ही दिए होते।

वैसे पीछे अभी भी नहीं हटा है पर अब ऐसी लड़की खोज रहा है जो परित्यक्ता हो या तलाक शुदा।

रविवार, 9 मई 2010

आप ब्लॉग किस मुद्रा या माहौल में लिखते हैं ?

बड़े-बड़े लेखकों की बड़ी-बड़ी सनकें। कोई सो कर लिखता था तो कोई खड़े हो कर। कोई सोने से पहले तो कोई जागने के बाद। कोई शराब पी कर तो कोई चाय। किसी को शोर-शराबा पसंद था तो किसी को संगीत, कोई अपने पालतू के बिना कुछ सोच भी नहीं सकता था तो किसी को किसी की भी उपस्थिति नागवार गुजरती थी। इसे सनक कहिए या उनका विश्वास कि यदि ऐसा नहीं होगा तो कुछ लिखा ही नहीं जाएगा और लिखा भी गया तो वह वैसा नहीं होगा। और फिर "मूड़", जिसके बिना लेखक अधुरा होता है। इसको बनाने के लिए भी लेखकों को कितनी कसरतें करनी पड़ती थीं। सो हरि कथा की भांति इनका संसार भी तरह-तरह के अजूबों से भरा पड़ा है। यही कहा जा सकता है कि, "लेखक अनन्त लेखक कथा अनन्ता।"

अब ताल्स्ताय की बात करें तो वे सुबह सबेरे ही लिखते थे। उनके अनुसार सुबह-सुबह उनका मन रूपी आलोचक हर लेख पर नजर रखता था जो कि रात को संभव नहीं हो पाता था।

एमिल जोला बिना थके लिखने की सोच भी नहीं सकते थे। इसके लिए वे घूमने निकल जाते थे और इसी दौरान रास्ते में पड़ने वाले लैम्प पोस्ट गिनते रहते थे, गिनती गलत होने पर दोबारा गिनना शुरु करते थे। इस काम में जब बेहद थक जाते थे तो लौट कर लिखना शुरु करते थे।

फ्रांसीसी उपन्यासकार बालजाक रात के सन्नाटे में अपना लेखन कार्य पूरा किया करते थे। लिखते समय उनके कमरे में सिर्फ उनके नौकर को जाने की ईजाजत थी जो थोड़ी-थोड़ी देर में उनके लिए काफी बना कर लाता रहता था।

अलेक्जेंड़र ड़यूमा का विश्वास था कि अच्छा उपन्यास नीले रंग के कागज पर, कविता पीले रंग के कागज पर तथा बाकी की रचनाएं गुलाबी रंग के कागज पर ही लिखी जानी चाहियें।

विक्टर ह्यूगो खड़े हो कर ही लिख पाते थे। इसके लिए उन्होंने अपने कंधे की ऊंचाई के बराबर मेज बनवा रखी थी। लिखते-लिखते वे लिखे हुए कागज जमीन पर बिखराते रहते थे।

मार्क ट्वेन पेट के बल लेट कर लिखते थे , बैठ कर लिखने पर उन्हें आलस्य घेर लेता था।

हमारे शरत बाबू आराम कुर्सी पर अधलेटी अवस्था में अपनी रचनाओं को मूर्त रूप दिया करते थे।

प्रेमचंद जैसे खुद सीधे साधे थे वैसे ही उनका लिखने को लेकर कोई खास सनक भी नहीं थी। वे किसी भी समय, किसी भी जगह, किसी भी हालत में लिख लेते थे। उनके अनुसार लिखने के लिए साफ अनलिखा कागज तथा बिना रुके चलने वाली कलम का होना ही जरूरी होता है।

विशिष्ट पोस्ट

रीयल आइस मैन ऑफ इंडिया

भीड़ में जिस शख्स का कद सबसे बड़ा था, पता चला वह शख्स किसी और के कांधे पर खड़ा था 😡 लद्दाख ! जहां लोगों की मुख्य आजीविका खेती है, वहां पानी...