pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

शुक्रवार, 11 सितंबर 2009

जब-जब जो-जो होना है, तब-तब सो-सो होना ही है, तो घबडाहट क्यूं?

फिजिक्स की क्लास में एक बच्चे ने सर से कहा कि बरसात में मुझे जब बिजली चमकती है और बादल गरजते हैं तो बहुत ड़र लगता है, मैं क्या करूं? टीचर ने समझाया, देखो बेटा, जब बिजली चमकती है और बादल गरजते हैं तो जो कुछ होना होता है वह हो चुका होता है। हमें कुछ देर बाद ही आवज और चमक दिखाई पड़ती है। इसलिये डरने की कोई बात ही नहीं है। यदि पहले कुछ होता है तो हमें पता चलने से पहले ही हो चुका होता है। उसमें फिर ड़रने के लिये कोई बचता ही नहीं है। इस डर को बाहर निकालो और अपने अध्ययन में दिल लगाओ। जब जो होना है उसे कोई नहीं रोक पायेगा। सब निश्चित है।

उस बच्चे की तरह हम सब अंत से डरते, अनहोनी की आशंका में इस खुदा की नेमत जिंदगी का एक बड़ा हिस्सा एवंई गवां देते हैं। मंदिरों, मस्जिदों, गुरुद्वारे, चर्च में जा कर अपनी रक्षा, अनहोनी से बचाव या संकट में उससे सहायता की गुहार लगाते रहते हैं। कितने जने हैं जो वहां जा कर कुछ मांगने की अपेक्षा उसे इस सुंदर जीवन को देने का धन्यवाद करते हैं?

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क्या आप जानते हैं कि श्री कृष्णजी ने अर्जुन को दो बार गीता का उपदेश दिया था?
आगामी कल।

बुधवार, 9 सितंबर 2009

मुर्गे को मुर्गी की फीगर की चिंता

डान की बेटी शादी की दुसरी सुबह गुस्से से तमतमाई हुई अपने कमरे से बाहर निकली। उसकी मां ने उसे ऐसी हालत में देख उसे नार्मल करने को कहा, बेटी सब ठीक हो जायेगा। बेटी बोली वह तो ठीक है, पर अंदर पड़ी लाश का क्या करूं ?
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एक मुर्गी ने बेकरी वाले के यहां जा दो अंडे मांगे। बेकरी वाले ने हैरान हो पूछा, अरे तुम्हें अंडों की क्या जरूरत है? मुर्गी ने शर्माते हुए कहा, मेरा मुर्गा कहता है कि दो रुपयों के लिये तुम अपनी फ़ीगर मत खराब करो।

सोमवार, 7 सितंबर 2009

पानी की समस्या इतिहास बनने की कगार पर

चलो देर से ही सही नींद तो खुली। वैसे इसे देर भी नहीं कह सकते क्योंकी जब-जब, जो-जो, होना है। तब-तब सो-सो होता है। आखिर में सागर के अथाह जल की ओर ध्यान गया ही सरकार का। वैज्ञानिकों ने एक महत्वपूर्ण उपलब्धी हासिल कर ही ली। रोज दिल दहलाती, जी जलाती, आग उगलती खबरों के बीच ठंड़ी हवा का झोंका बन कर आयी यह खबर कि समुद्री पानी को पीने योग्य बना लिया गया है।

ऐसा नहीं है कि इससे पहले सागर से पीने का पानी बनाने की बात नहीं सोची गयी पर उस पर खर्च इतना आता था कि उसका वहन सब के बस का नहीं था। और तब ना ही इतना प्रदुषण था ना ही बोतलबंद पानी का इतना चलन। अब जब पानी दूध से भी मंहगा होता जा रहा है, तो कोई उपाय तो खोजना ही था। फिलहाल लक्षद्वीप के कावारती द्वीप के रहने वालों को सबसे पहले इसका स्वाद चखने को मिल गया है। और यह संभव हो पाया है "राष्ट्रीय समुद्र प्रौद्योगिकी संस्थान" के अथक प्रयासों के कारण। आशा है साल के खत्म होते-होते तीन संयत्र काम करना शुरु कर देंगे। एक लाख लीटर रोज की क्षमता वाले एक संयत्र ने तो 2005 से ही काम करना शुरु कर दिया है।

शुरु-शुरु में समुद्र तटीय इलाकों में इस पानी को पहुंचाने की योजना है। समुद्री पानी को पेयजल में बदलने के लिये निम्न ताप वाली "तापीय विलवणीकरण प्रणाली (L.T.T.D.) का उपयोग किया जाता है। यह प्रणाली सस्ती तथा पर्यावरण के अनुकूल है। इस योजना के सफल होने पर सरकार बड़े पैमाने पर बड़े संयत्रों को स्थापित करने की योजना बना रही है। अभी एक करोड़ लीटर रोज की क्षमता वाले संयत्र की रुपरेखा पर काम चल रहा है। सारे काम सुचारू रूप से चलते रहे तो दुनिया में कम से कम पानी की समस्या का तो स्थायी हल निकल आयेगा।

16 जून की अपनी एक पोस्ट में मुझे लगा था कि सागर की इतनी जल राशि के रहते पानी के लिये उतनी चिंता की आवश्यकता नहीं है जितनी की खोज की । सही भी है विज्ञान के इस युग में जब टायलेट का पानी साफ कर उपयोग में लाया जा सकता है तो फिर समुद्री पानी को क्यों नहीं । रही बात खर्चे की तो आज जो कीमत हम बोतलों में बंद पानी की दे रहे हैं, जिसके पूर्ण शुद्ध होने पर भी शक विद्यमान है, उससे तो सस्ता ही पड़ेगा सागर के पानी को साफ करना। आखिर अरबों लोगों, जीव-जंतुओं की प्यास का सवाल है।

रविवार, 6 सितंबर 2009

सीकरी, फर्श से अर्श और अर्श से फर्श तक

सूर्य की तेज गर्मी और तपते रेगिस्तान में एक व्यक्ति नंगे पैर एक दरागाह की तरफ बढा जा रहा था। दुनिया से बेखबर सिर्फ अपनी मंजिल को पाने के लिये बेताब। उसे तो अपने पैरों में पड़े छालों से रिसते खून से उत्पन्न वेदना का भी एहसास नहीं हो रहा था। यह व्यक्ति था सम्राट अकबर। दरागाह थी शेख सलीम चिश्ती साहब की और जगह थी सीकरी नामक एक गांव की।
दुनिया जानती है कि अपनी संतान ना होने के कारण सम्राट अकबर ने सलीम चिश्ती की दरागाह पर जा मन्नत मांगी थी और शेख साहब के आशीर्वाद से उन्हें पुत्र की प्राप्ति हुई थी। इससे अकबर की खुशी की सीमा ना रही। उसने अपने पुत्र का नाम भी शेख साहब के नाम पर सलीम रखा और उस गांव सीकरी को अपनी राजधानी बनाने का फ़ैसला कर लिया।
यूं सीकरी के भाग्य ने पलटा खाया। एक छोटी सी पहाड़ी पर स्थित यह छोटा सा गांव देखते-देखते पूरे देश की राजधानी बन गया। अपनी गुजरात विजय को अविस्मरणीय बनाने के लिये अकबर ने इसका नाम फतेहपुर सीकरी रख दिया। इसे ऊंची-ऊंची दिवारों से घेर कर अनेकों सुंदर भवनों, मस्जिदों बाग-बगीचों का निर्माण कर सजा दिया गया। दिवारों में भी आवागमन के लिये सात दरवाजे बनाये गये जिनका नाम, दिल्ली दरवाजा, आगरा दरवाजा, ग्वालियर दरवाजा, अजमेरी दरवाजा, मथुरा दरवाजा, बीरबल दरवाजा और चंद्रफूल दरवाजा रखा गया। यहां के भवन ज्यादातर लाल पत्थरों से बनाये गये हैं। यहीं शेख साहब तथा उनके परिवार वालों की कब्रें भी हैं जिन्होंने समय के साथ-साथ तीर्थ स्थल की जगह ले ली है। यहां हर साल भव्य तरीके से उर्स मनाया जाता है जहां दुनिया भर से लाखों लोग अपनी मन्नत पूरी करवाने आते हैं।
पर काल के गाल में सबको समाना पड़ता है। उसकी मजबूत दाढों से आज तक कोई नहीं बच पाया है। वही सीकरी जिसकी तूती सारे देश में गूंजती थी, राजधानी दिल्ली चले जाने के बाद, अपना महत्व धीरे-धीरे खोती चली गयी। आज हालत यह है कि सारे भवनों, स्मारकों, बावड़ियों का अस्तित्व खतरे में है। हर जगह विराने का साम्राज्य है। पर्यटक आते जरूर हैं पर बुलंद दरवाजे जैसी कुछ जगहों को देख लौट जाते हैं। रह जाता है पूरा शहर अपने गौरवमयी इतिहास को जन-जन तक पहुंचाने को आतुर।

शनिवार, 5 सितंबर 2009

हिंदी लिखने के लिये hindikalam.com आजमा कर देखें।

बहुत बार देखा है कि किसी-किसी पोस्ट पर अनेक वर्तनी की गल्तियां होती हैं। जो लिखने वाले वाले से नहीं लिखवाए जाने वाले माध्यम की सिमितताओं  का नतीजा होती हैं। आज पाबला जी की पोस्ट पर अच्छी जानकारी थी। पर hindikalam.com का जिक्र मैंने कहीं नहीं पाया। मैं इसी माध्यम का उपयोग करता हूं, और मुझे लगता है कि इस पर लिखने से हिंदी के एक-दो शब्दों को छोड़ सारे कलिष्ट शब्द भी लिखे जा सकते हैं। । साथ ही यह है भी बहुत आसान। एक बार तो आजमाया ही जा सकता है।
हाँ, कापी-पेस्ट की जहमत तो उठानी पड़ेगी।

शुक्रवार, 4 सितंबर 2009

जमजम का पानी, रेगिस्तान में कुदरत का करिश्मा

प्रकृति के अनगिनत चमत्कारों में से एक है सऊदी अरब के शहर मक्का का एक कुआं। यह पवित्र धर्मस्थल काबा के पास स्थित है। जैसे हर हिंदु की अभिलाषा रहती है कि उसके घर में सदा गंगाजल रहे वैसे ही हर मुसलमान की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि इस कुएं का पानी उसके घर में हो।
इस कुएं का नाम है जमजम। घोर आश्चर्य की बात है कि मीलों फैले रेगिस्तान में जहां सिर्फ रेत ही रेत है वहीं यह कुआं लाखों लोगों की पानी की जरुरतों को पूरा करता है। मक्का और मदीना के लोग तो इसका पानी लेते ही हैं, हज के समय हर वर्ष वहां लाखों की तादाद में जाने वाले यात्रियों की जल की आवश्यकता को भी यही कुआं पूरा करता है। इसके अलावा लौटते वक्त भी सभी हाजियों की यह हार्दिक इच्छा रहती है कि वे अपने साथ इस कुएं का ज्यादा से ज्यादा पानी ले जा सकें। जिससे इसको अपने सगे-संबंधियों और मित्रों में बांटा जा सके। इसके वितरण से पुण्य का लाभ मिलता है। ऐसी धारणा है।
इस 14x18x6 फिट के आकार वाले कुएं के पानी की खासियत है कि वह कभी खराब नहीं होता। और यह कुदरत का चमत्कार ही है कि इसमें से चाहे कितना भी पानी निकल जाये पर यह ना तो सूखता है नाही खाली होता है। मरुस्थल में यह कुआं इंसानों के लिये एक वरदान ही तो है।

बुधवार, 2 सितंबर 2009

संगीतकार नौशाद को अपनी शादी दर्जी बन कर करनी पडी थी

कल्पना कीजिए की जिसने अपने संगीत से सारे भारत में धूम मचा रखी थी , उसे ही अपनी शादी दर्जी बन कर करनी पड़ रही थी।

आज के समय में गीत-संगीत, नाच-गाना प्रतिभा की पहचान के रूप में देखे जाते हैं। किसी का भी बच्चा जरा ठुमक कर क्या चल लिया या किसी फिल्मी गाने की नकल कर भर ली तो उसके मां-बाप उसे किसी मंच पर पहुंचाने के लिये आतुर हो उठते हैं। फिर चाहे बच्चे को सरगम का 'सा' या नाच का 'ना' का पता भी ना हो। पर कुछ ही सालों पहले की बात है जब इन कलाओं को अच्छी दृष्टि से नहीं देखा जाता था। मां-बाप इन विधाओं के सख्त खिलाफ हुआ करते थे। इसी सब के चलते संगीतकार नौशाद को कैसी-कैसी परिस्थितियों का सामना करना पड़ा था, सुनिये उन्हीं की जुबानी :-


"मां ने मेरी शादी पक्की कर लखनऊ बुलवा लिया। तैयारियों के बीच एक दिन उन्होंने मुझे बुलाया और कहा, बेटा ससुराल में किसी को पता नहीं चलना चाहिये कि तुम गाने बजाने का काम करते हो। मैं आश्चर्य में पड़ गया और पूछा, ऐसा क्यों अम्मी? तो अम्मी ने कहा कि मैंने सब को कह रखा है कि मेरा बेटा बंबई में दर्जी का काम करता है। अगर मैं बता देती कि तू गाने बजाने का काम करता है तो तेरी शादी ही तय नहीं होनी थी। तेरी ससुराल वाले सूफी किस्म के लोग हैं। मैं मां की बात मानने को मजबूर था। पर मन में एक प्रश्न घुमड़ रहा था कि क्या संगीत का काम इतना घटिया है कि एक दर्जी उस पर भारी पड़ रहा है। फिर उसके बाद जो हुआ उसका आप अंदाज लगा मेरी हालत समझ सकते हैं। 

उन्हीं दिनों फिल्म "रतन" रिलीज हुई थी और उसके मेरे द्वारा निर्देशित गाने सारे हिंदुस्तान में धूम मचा रहे थे। तो जब मेरी बारात चली तो बैंड वालों ने उसी फिल्म के गाने बजाने शुरु कर दिये। लड़की वालों के यहां भी शहनाई पर "रतन" के गानों की बहार थी और मैं दर्जी बना निकाह की रस्में पूरी कर रहा था।"
बाद में जब नौशाद साहब की श्रीमतीजी बंबई आयीं तो उन्हें पता चला कि उनके शौहर मशहूर संगीतकार हैं।

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राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...