शनिवार, 20 जून 2009

एक पुरस्कार, जिसे वर्षों से अपने लिए जाने का इन्तजार है.

श्रीलंका की एक संस्था 'श्रीलंका रेशनलिस्ट एसोसिएशन' के संस्थापक डा. अब्राहम टी. कोवूर, जो एक प्रसिद्ध वैज्ञानिक और मनोचिकित्सक थे, ने 1963 में एक लाख रुपये का इनाम उस व्यक्ति को देने की बात कही थी जो यह सिद्ध कर सके कि दुनिया में चमत्कार नाम की भी कोई चीज होती है। यह भी एक चमत्कार ही है कि इस बात के संसार भर में अखबारों द्वारा प्रकाशित, प्रचारित होने के बावजूद आज तक कोई इंसान इस राशि पर अपना हक नहीं जमा सका है। डा. कोवूर ने करीब पचास साल तक इन तथाकथित चमत्कारों का अध्ययन कर के अपने तजुर्बे से यह निष्कर्ष निकाला था कि इनमें से कुछ असत्य पर आधारित हैं, कुछ पर तर्क ही नहीं किया जा सकता और कुछके पीछे कोई न कोई वैज्ञानिक तथ्य है जिसकी जानकारी आम इंसान को न होने की वजह से वह इसे चमत्कार मान बैठता है।
एक लाख की राशि अपने ले जाने वाले के इंतजार में है। कोशिश करेंगे ?

मंगलवार, 16 जून 2009

क्या बोतलबंद पानी बेचनेवाली कंपनियां पीने के पानी की कमी बनाए रखना चाहती हैं ?

पानी को लेकर आज चारों ओर लोगों को जागरुक बनाने की मुहीम चलाई जा रही है। इसी संदर्भ में रोज-रोज डरावनी तस्वीरें पेश कर इसके खत्म होने का डर दिखाया जा रहा है। ठीक है, पानी की किल्लत भयावह रूप ले चुकी है। भूजल खिसकते-खिसकते पाताल जा पहुंचा है। पांच-पांच नदियों वाला प्रदेश पंजाब भी इसकी कमी शिद्दत से महसूस कर रहा है। पर यह कोई अचानक आई विपदा नहीं है। हमारी आबादी जब बेहिसाब बढी है तो उसके रहने, खाने, पीने की जरूरतें भी तो साथ आनी ही थीं। अरब से ऊपर की आबादी को आप बिना भोजन-पानी के तो रख नहीं सकते थे। उनके रहने खाने के लिये कुछ तो करना ही था जिसके लिये कुछ न कुछ बलिदान करना ही पड़ना था। सो संसाधनों की कमी लाजिमी थी पर हमें उपलब्ध संसाधनों की कमी का रोना ना रो, उन्हें बढाने की जी तोड़ कोशिश करनी चाहिये, समाज को जागरूक करने के साथ-साथ।
पानी की बात करें तो पृथ्वी पर पीने के पानी की जरूर कमी है, पर पानी का भंड़ार असीमित है। थल को जल ने चारों ओर से घेर रखा है। जरूरत है उसी पानी को पीने के योग्य बनाने की। जब टायलेट का दुषित जल साफ कर दोबारा काम में लाया जा सकता है तो इस अथाह राशी को क्यों नहीं। ऐसा नहीं है कि इस ओर ध्यान नहीं दिया गया पर इस विधि के मंहगी होने के कारण इस पर उतना ध्यान नहीं दिया गया शायद। पर जब आप इस विधि पर होने वाले खर्च और बोतल बंद पानी पर लुटाये गये पैसों की तुलना करेंगे तो चौंक उठेंगे। कितनी अजीब बात है कि नल से मिलने वाले पानी से बोतलबंद पानी करीब 1500 गुना मंहगा होता है। जिसके शुद्ध होने पर भी संदेह है। संसार में अरबों रुपये का बोतल का पानी बिकता है। जिसे रखने के लिये करोड़ों बोतलों की जरूरत पड़ती है। जिनके बनाने के दौरान लाखों टन जहरीली गैसों का उत्सर्जन होता है। एक करोड़ से ज्यादा बोतलें रोज कूड़े में तब्दील हो जाती हैं। यकीन मानिए अरबों रुपये खर्च होते हैं इस बोतलबंद पानी को बनाने तथा हम तक पहुंचाने में। तुलनात्मक रूप से देखा जाए तो समुद्र के पानी को पीने योग्य बनाने में होने वाला खर्च भविष्य को देखते हुए जरा सी भी फिजुलखर्ची नहीं होगी। यह भी तो हो सकता है कि पानी को दूध से भी मंहगा बेचने वाली कंपनियां इस राह में रोड़ा अटकाती हों।
कुछ दिनों पहले कहीं पढा था कि मद्रास में वैज्ञानिकों ने समुद्र के पानी को पीने लायक बनाने में सफलता पा ली है वह भी एक रुपये प्रति लीटर के खर्च पर (खेद है मैं उस खबर को संभाल कर रख नहीं पाया)। पर कयी रेगिस्तानों से घिरे देशों में इस तरह का पानी काम में लाया जाता है।
मेरा तात्पर्य यह है कि मुसीबत तो अपना डरावना चेहरा लिये सामने खड़ी है। उससे मुकाबला करने का आवाहन होना चाहिये नकि उससे लोगों को भयभीत करने का। दुनिया में यदि दसियों हजार लोग विनाश लीला पर तुले हैं तो उनकी बजाय उन सैंकड़ों लोगों के परिश्रम को सामने लाने की मुहिम छेड़ी जानी चाहिये जो पृथ्वी तथा पृथ्वीवासियों को बचाने के लिये दिन-रात एक किये हुए हैं।

रविवार, 14 जून 2009

क्या जुड़वाओं में ऐसा संभव है ?

एक खबर ने वर्षों पहले बचपन में देखी एक स्टंट फिल्म की धुंधली सी याद ताजा कर दी। उसमें नायक का दोहरा रोल था। एक को चोट लगती थी तो दुसरे को भी तकलीफ होती थी। एक को दर्द होता था तो दुसरा भी बेचैन हो उठता था। यह खबर भी कुछ वैसी ही है। मध्य-प्रदेश के विदिशा शहर में रहने वाली दो जुड़वां बहनों में अजीबो-गरीब तारतम्य है। एक का नाम चांदनी है और दूसरी का रोशनी। पांचवीं कक्षा में एक साथ पढने वाली दोनों बहनों की पसंद-नापसंद, खान-पान, कपड़े वगैरह की रुचि एक जैसी ही हैं। पर सबसे ज्यादा चौंकाने की बात यह है कि अगर एक के शरीर में दर्द होता है तो दूसरी बहन भी उसे महसूस करती है। एक को जुकाम होता है तो दूसरी की नाक भी बहने लगती है। एक को बुखार आता है तो दूसरी का शरीर भी तपने लगता है। एक को ड़ांट पड़ती है तो दूसरी भी उदास हो जाती है। उनकी मां के अनुसार दो-तीन घटनाएं ऐसी हुई हैं कि यदि उनके सामने ना हुई होतीं तो वह भी विश्वास नहीं करतीं। उन्होंने बताया कि एक बार चांदनी अपने रिश्तेदार के यहां गयी हुई थी वहां उसे उल्टियां होने लगीं तो घर पर रोशनी को भी उबकाई आने लगीं थी। फिर एक बार साइकिल से गिरने पर रोशनी के पैर में मोच आ गयी तो उसी समय चांदनी के भी उसी पैर में दर्द शुरु हो गया। सबसे आश्चर्यजनक बात तो तब हुई जब साईकिल से गिरने पर चांदनी के आगे का दांत टूट गया तो उसी दिन रोशनी को भी ठोड़ी पर उसी जगह चोट लग गयी।
वैसे भी दोनों बहनों में इतनी समानता है कि दोनों को पहचानना बहुत मुश्किल है। रिश्तेदारों की बात जाने दें, जिनसे रोज मिलना नहीं होता है, परन्तु उन्हें रोज पढानेवाली शिक्षिकाएं भी भ्रम में पड़ जाती हैं। बचपन से उनका इलाज करने वाले डा. माहेश्वरी भी बताते हैं कि जब भी इलाज करवाना होता है तो दोनों साथ ही आती हैं। वे बताते हैं कि मैं इन्हें बचपन से देखता आ रहा हूं, दोनों को एक जैसी ही बिमारी या तकलीफ होती है। यह पूछने पर कि दोनों के शरीर में इतना ताल-मेल क्यूं और कैसे है, वे भी इसे विचित्र संयोग कह कर चुप हो जाते हैं। मेडीकल सांईस के अनुसार जुड़वां बच्चों का स्वभाव, बिमारियां, बनावट एक जैसी हो सकती हैं, पर एक को चोट लगने पर दूसरे को भी चोट लगना, वह भी उसी अंग और जगह पर, समझ से परे की बात है।
केरल का एक गांव, कोड़िन्ही, जो अपने 250 से भी ज्यादा जुड़वों के कारण जगत प्रसिद्ध है, जिसका जिक्र कुछ दिनों पहले मैंने अपनी एक पोस्ट किया था, वहां भी ऐसी कोई बात कभी नहीं सुनी गयी कभी। वैसे आज के युग में जब नाम व शोहरत की चाहत में मां-बाप अपने नौनीहालों से कहीं भी कुछ भी ऐंड़-बैंड करवाने से गुरेज नहीं करते तो चोट वाली बातें क्या शक पैदा नहीं करतीं ?

शुक्रवार, 12 जून 2009

क्या बात है !!! है न अजीबोगरीब (-:

हम दिन भर में करीब आधा लीटर पानी का वाष्पीकरण कर देते हैं, अपनी सांस लेने की क्रिया से। पानी बचाओ अभियान वाले कहीं यह न कहने लगें कि भाई सांसें कम लो। (-:

नीली व्हेल की एक साधारण फूंक से करीब 2000 गुब्बारे फुलाए जा सकते हैं।

ज्वालामुखी का लावा 50कीमी तक ऊपर उछल जाता है।

दुनिया के सारे ऊर्जा के स्रोत, कोयला, लकड़ी, तेल, गैस इत्यादि मिल कर भी कुछ दिनों तक ही सूर्य के बराबर ऊर्जा दे सकते हैं।

हमारी चमड़ी का वजन करीब सवा तीन केजी होता है।

पर हमारी आर्टरी, कैपिलरी और वेन को फैलाया जाए तो पूरी पृथ्वी को चार बार लपेटा जा सकता है।

हमारे शरीर की सबसे छोटी हड्डी कान के अंदर होती है जो बमुश्किल चावल के दाने जितनी होती है।

गुरुवार, 11 जून 2009

सहवाग और धोनी को लेकर मीडिया ने भ्रम फैलाया

आज कल मीड़िया में सहवाग और धोनी को लेकर तनातनी चल रही है। एक गुट दिल्ली के जाट के पक्ष में खड़ा है तो दूसरा झारखंड़ी ठाकुर के। खेल के गलियारे को भी जात-पात के अखाड़े में बदल कर रख दिया है मतलब परस्तों ने। पहला गुट सहवाग पर अवसरवादी होने का आरोप लगा बता रहा है कि उसने अपने कंधे की चोट, जो उसे पिछले आईपीएल में डेक्कन के खिलाफ खेलते हुए लगी थी, जान-बूझ कर छिपाई, क्योंकि उसके (सहवाग के) ख्याल में भारत के 20-20 के विश्व कप में जीतने की अच्छी संभावना है और उसमें मिलने वाली भारी-भरकम रकम का हिस्सा वह खोना नहीं चाहता। इसीलिये सिर्फ एक दो मैचों में अपनी उपस्थिति दर्ज करवाने के बाद वह अपनी चोट का हवाला दे बाहर बैठा रहना चाहता था। इसीलिये वह अपने परिवार को भी साथ ले आया था जिससे खाली समय में तफरीह की जा सके।
दूसरा खेमा धोनी को निशाना बना सहवाग का पक्ष ले लिखे जा रहा है। उसके अनुसार धोनी की निरंकुशता जग जाहिर है। वह अपने ऊपर किसी भी सीनियर को सहन नहीं कर पा रहा तथा एक-एक कर उसने सब से पार पा लिया है। अकेला बचा सहवाग (तेंदुलकर भी तकरीबन टेस्ट में ही सिमट कर रह गया है)जो भारत का अकेला त्रिशतकवीर है, अपने खेल के बूते पर धोनी के लिये खतरा बना हुआ है। उसका बल्ला जब बोलता है तो धोनी हाशीए पर चला जाता है और अपनी यह हेठी इस ठाकुर को पच नहीं पाती है। मीडिया के इस पक्ष के अनुसार दोनों के बीच कुछ भी ठीक नहीं है। इस बात को नकारने के लिये धोनी को मजबूरन प्रेस को बुलाना पड़ा पर वहां भी वह अपने अहं को छिपा नहीं पाया और आधी-अधूरी कांफ्रेंस को बीच में छोड़ उठ कर चला गया।
अब आप ही बतायें कि आप किसका कहा सच मानेंगें। इस बिकाऊ युग में।

मंगलवार, 9 जून 2009

आस पर दुनिया कायम है.

नासिक के कुंभ के मेले में जो भगदड़ मची थी, उसी में अपनी इस कहानी के पात्र दो गधे दोस्त बिछड़ गये थे। उनमें से एक किसी गांव में पहुंच गया और वहां एक कुम्हार के पास रहने लगा। दूसरा भटकते-भटकते शहर चला गया। वहां एक नट ने उसे आश्रय दिया। वर्षों बीत गये ऐसे ही एक दिन गांव का गधा घूमते हुए बाई चांस शहर जा पहुंचा। वहां उसने एक नट को तमाशा दिखाते देखा तो वह भी भीड़ में घुस गया। तभी उसकी नज़र अपने बिछड़े दोस्त पर पड़ी जो सूख कर कांटा हो गया था। दोनों एक-दूसरे को पहचान कर गले मिले, फिर गांव वाले ने अपने दोस्त की हालत देख पूछा कि यह क्या हालत बना रखी है, कुछ लेते क्यों नहीं, यदि यहां खाना-वाना नहीं मिलता है तो मेरे साथ गांव चलो। मेरी ओर देखो तुमसे बड़ा ही होउंगा पर कितना स्मार्ट लगता हूं। तुम तो जैसे बुढा गये हो। यह सब सुन शहर वाला गधा बोला नहीं दोस्त मैं कहीं नहीं जाऊंगा यहां मेरी जिंदगी संवरने का चांस है। गांव वाले ने कहा, क्या खाक चांस है, जब जिंदगी ही नहीं रहेगी तो क्या संवारोगे? वैसे, बाइ द वे, क्या उम्मीद लगाये बैठे हो ? शहर वाले ने बतलाना शुरु किया कि वह देखो उन दो बल्लीयों पर तनी रस्सी पर जो कन्या चल रही है, वह इस नट की लड़की है। नट रोज खेल शुरु करने के पहले उससे कहता है कि खेल में गड़बड़ी नहीं होनी चाहिये। यदि तू रस्सी से गिर पड़ी, तो याद रख, मैं तेरी शादी इसी गधे से कर दूंगा।
और बस भाई ! मैं इसी आस में यहां पड़ा हूं कि कभी तो किसी दिन---------------

सोमवार, 8 जून 2009

जब मेरे ताऊजी और पिताजी निजाम की जेल गए. २सरा भाग :

वह दिन भी आ गया जब हमें रिहा कर दिया गया। हम सब ऐसे जोश में थे जैसे अंग्रेजों को हमने देश के बाहर खदेड़ दिया हो। लौटते समय हमारा जगह-जगह स्वागत-सत्कार होता रहा। हम भी अपने को किसी हीरो जैसा समझ रहे थे। हावड़ा स्टेशन पर पुलिस की सख्ती के बावजूद सैकड़ों लोग हमारी अगवानी के लिये मौजूद थे। हमें फूल-मालाओं से लाद दिया गया। पूरा स्टेशन नारों से गूंज रहा था और माँ हमें अपने गले से चिपटाए अनवरत आसूं बहाये जा रहीं थीं...............!

#हिन्दी_ब्लागिंग 

मेरे पिताजी का पिछले साल स्वर्गवास हो गया था। उन्हीं की बरसी में ताऊजी का रायपुर घर आना हुआ था। तभी उन्होंने मन में कहीं दबी-छुपी वर्षों पुरानी यादों को हम सबके सामने उजागर किया था। हालांकि ताऊजी अब बानवें साल में हैं फिर भी 70-75 साल पुरानी बातें ऐसे सुना रहे थे जैसे अभी कल ही घटी हों !   
उन्होंने बताया कि :- उस समय का माहौल ही कुछ अजीब होता था। अंग्रेजों के विरुद्ध देश के लिये कुछ भी करने को लोग तैयार बैठे रहते थे। ऐसे ही संस्कार बच्चों में भी ड़ाले जाते थे। जोर-जुल्म से कोई भी ड़रता नहीं था। उसी रौ में हम भी हैदराबाद चल दिए थे। लगता था, जाते ही निजाम को सबक सिखा देंगें ! शुभ (मेरे पिताजी का नाम) थोडा नाजुक और चुप रहने वाला लड़का था और मैं (खुद ताऊजी) जरा रफ-टफ तरह का। इसलिये मैं तो कहीं भी कैसे भी निभा लेता था, पर छोटे की चिंता हो जाती थी, जो सिर्फ मेरे कहने पर मेरे साथ चला आया था। पर उसने भी गजब का साहस दिखाया कभी किसी भी कठिनाई में उदास या परेशान नहीं हुआ। 

जेल के दूसरे दिन किसी तरह कुछ आटे का जुगाड़ कर "लोहार खाने" की भट्ठी पर मैने कुछ आड़ी-टेढ़ी रोटियां सेकीं, जिनसे बहुत राहत मिली। एक-दो दिन बाद तिकड़मी दिमाग ने एक राह सुझाई। जेल में व्रत-त्योहार आदि पर अलग से राशन देने का प्रावधान था। उस दिन एकादशी का दिन था। मैने व्रत का बहाना बनाया, जिससे जेल वालों ने मुझे  अलग राशन दे दिया और कहा अपना बनाओ और खाओ। 

इसी बीच सबको सजा के दौरान काम तय कर दिया गया ! हम बच्चों को खेत में फसलों की देख-रेख का हल्का काम सौंपा गया। हमें मां की सीख याद थी कि अंग्रेजों की हर बात का विरोध करना है ! सो हमने फसल संभालने की जगह सारी खड़ी फसलें उखाड़ दीं। इसका दंड तो मिलना ही था, हमें अलग-अलग कोठरियों में बंद कर दिया गया। ज्यादा छोटा होने की वजह से शुभ को मेरे साथ ही रखा गया था। इस सबके बाद फिर हमें कुर्सी तथा गलीचा बुनाई में हाथ बटाने का काम दिया गया ! यहां भी हम बखिया उधेड़ने से बाज नहीं आए ! फिर उसी अकेली कोठरी में, जिसमें शायद जीरो वॉट की रोशनी ही होती थी, बंद कर दिए गए ! 

नाबालिग होने की वजह से हमें शारीरिक प्रताड़ना नहीं दी जाती थी पर डराया-धमकाया खूब जाता था। हम भी विरोध का कोई मौका हाथ से नहीं जाने देते थे। खाना, जिसमें थोड़ा सुधार हो गया था, हमें जमीन पर बैठ कर ही खाना पड़ता था। एक दिन एक पहरेदार जूते पहन कर हमारी खाने की जगह में आ गया फिर क्या था, खाना बंद नारे शुरु ! किसी तरह हमें शांत कर भोजन करवाया गया। धीरे-धीरे समय निकलता चला गया। जेल वगैरह का कोई खौफ हमें नहीं था, उल्टे तरह-तरह की शरारतों में मजा आता था। ऐसे ही एक दिन कब्ज और पेट दुखने का नाटक किया तो हमे हास्पिटल में दाखिल कर दिया गया। हास्पिटल क्या था, तीन सीलन भरे कमरे थे। एक में एक टेबल-कुरसी तथा दो आल्मारियों में दवाऐं वगैरह होती थीं तथा दूसरे दोनों कमरों में दो–दो लोहे के पलंग जैसे कुछ थे। वहां कीड़े-मकौड़ों की भरमार थी। पर जगह बदलने से हम खुश थे। पर यह खुशी दिन की रोशनी तक ही सीमित रही। रात मे मेरे पैर पर कुछ रेंगने का आभास हुआ देखा तो बिच्छू था, फिर तो लालटेन जला कर रात भर बिच्छू ही मारते रहे !

ऐसे ही काम करते, शैतानी करते, सजा भुगतते कैसे 6 महीने बीत गए पता ही नहीं चला। वह तो संचार का उस समय कोई साधन नहीं था नहीं तो हम अपने और दोस्तों को भी बुला लेते। बचपन की समझ से इन्हीं सब चीजों में आनंन्द खोजते समय कट गया और वह दिन भी आ गया जब हमें रिहा कर दिया गया। हम सब ऐसे जोश में थे जैसे अंग्रेजों को हमने देश के बाहर खदेड़ दिया हो। लौटते समय हमारा जगह-जगह स्वागत-सत्कार होता रहा। हम भी अपने को किसी हीरो जैसा समझ रहे थे। हावड़ा स्टेशन पर पुलिस की सख्ती के बावजूद सैकड़ों लोग हमारी अगवानी के लिये मौजूद थे। हमें फूल-मालाओं से लाद दिया गया। पूरा स्टेशन नारों से गूंज रहा था और माँ हमें अपने गले से चिपटाए अनवरत आसूं बहाये जा रहीं थीं।"

ताऊजी पुरानी यादों में पूरी तरह से खो गए थे, लगता था जैसे माँ, हमारी दादीजी, अदृश्य रूप से वहां खड़ी हो उनके सर को सहला रही हों ! गहरी खामोशी पसरी हुई थी ! हम सब मौन साधे ताऊजी को देख रहे थे! जिनकी पलकों की कोर पर नमी आ गई थी और आज वर्षों बाद यह संस्मरण लिखते हुए मेरी आंखें भी बार-बार भीगती जा रही हैं, भीगती जा रही हैं..........!

विशिष्ट पोस्ट

जिसने सबसे ज्यादा विभिन्न रोगग्रस्त पात्रों का किरदार निभाया

अनेकों बार  Autism, Dyslexia, Progeria, Paraplegia, Alzheimer, Amnesia, Schizophrenia जैसी अनेक  बीमारियों पर, जिनका नाम भी आम लोगों ने सुना...