pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

सोमवार, 1 जून 2009

गरीब देश के अमीर सेवकों के बारे में आज एक मेल मिला उसे वैसे ही पोस्ट कर रहा हूँ.

To, All Indian. Salary & Govt. Concessions for a Member of Parliament (MP)
Monthly Salary : 12,000
Expense for Constitution per month :10,000
Office expenditure per month :14,000
Traveling concession (Rs. 8 per km) : 48,000( eg.For a visit from kerala to Delhi & return: 6000 km)
Daily DA TA during parliament meets :500/day
Charge for 1 class (A/C) in train: Free (For any number of times) (All over India )
Charge for Business Class in flights : Free for 40 trips / year (With wife or P.A.)
Rent for MP hostel at Delhi : Free
Electricity costs at home : Free up to 50,000 units
Local phone call charge : Free up to 1 ,70,000 calls.
TOTAL expense for a MP [having no qualification] per year : 32,00,000 [i.e . 2.66 lakh/month]
TOTAL expense for 5 years : 1,60,00,000
For 534 MPs, the expense for 5 years : 8,54,40,00,000 (nearly 855 crores)
AND THE PRIME MINISTER IS ASKING THE HIGHLY QUALIFIED, OUT PERFORMING CEOs TO CUT DOWN THEIR SALARIES......
This is how all our tax money is been swallowed and price hike on our regular commodities......... And this is the present condition of our country:

855 crores could make their life livable !! Think of the great democracy we have.............. PLEASE FORWARD THIS MESSAGE TO ALL REAL CITIZENS OF INDIA ... but,STILL Proud to be INDIAN
I know hitting a delete button is easier.......bt.........try 2 press fwd button 2 make people aware of it!


Regards Indian Citizens

शनिवार, 30 मई 2009

मच्छरों को महिलाएं लुभाती हैं.

मच्छर तथा मलेरिया पर वर्षों से इतना लिखा पढ़ा गया है कि एक अच्छा खासा महाकाव्य बन सकता है। 1953 में इस रोग की रोकथाम के उपायों की शुरुआत की गयी, जिसे 1958 में एक राष्ट्रीय कार्यक्रम का रूप दे दिया गया। पर नतीजा शून्य बटे सन्नाटा ही रहा। सरकारें थकती नहीं नियंत्रण की बात करने में और उधर मच्छर भी डटे हैं रोगियों की संख्या बढ़ाने मेँ। विडम्बना है कि जिस खून को बनाने-बचाने में इंसान चौबिसों घंटे लगा रहता है, उसी खून को मच्छर अपने भार से तीन गुना अधिक एक ही बार में चूस कर पेट भर लेता है। जबकी उसकी उम्र होती है मात्र तीस दिन की।आजकल टीवी के नब्बे प्रतिशत धारावाहिकों में महिलाएं ही महिलाओं की दुश्मन नज़र आती हैं। पहले लगता था कि यह सब आज की दौड़ में बने रहने के हथकंडे हैं। पर ऐसा नहीं है प्रकृति ने ही कुछ ऐसा विधान बनाया हुआ है कि "नारी ना सोहे नारी के रूपा"।मच्छर लाल रंग या रोशनी की तरफ ज्यादा आकर्षित होते हैं तथा महिलाएं इन्हें ज्यादा लुभाती हैं। वैज्ञानिकों के अनुसार महिलाओं में एक खास हारमोन होता है, जिससे उनके पसीने में एक विशेष गंध पैदा होती है। वही मच्छरों को अपनी ओर आकर्षित करती है। और ये तो जग जाहिर है कि सिर्फ़ मादा मच्छर ही रक्त चूसती है। ये आश्चर्य की बात है कि यह नन्हा सा कीड़ा विज्ञान का भी जानकार होता है, तभी तो अपने डंक के साथ एक ऐसा रासायन भी शरीरों में छोड़ता है जिससे रक्त अपने जमने की विशेषता कुछ समय के लिए खो बैठता है। उतनी देर में यह खून चूस, किटाणु छोड़ हवा हो जाता है। जानकर विश्वास नहीं होता कि आज तक जितने लोग युद्धों में मरे, उससे ज्यादा लोगों को इस कीड़े ने मौत के मुंह में पहुंचा दिया है। जितना पैसा दुनिया भर की सरकारें इस से छुटकारा पाने पर खर्च करती हैं वह यदि बच जाए यो दुनिया में कोई भूखा नंगा नहीं रह जाए। इससे बचने का एक ही उपाय है कि बिना किसी का मुंह जोहे, अपनी सुरक्षा आप की जाए। इन सुरक्षा विधियों पर इतना लिखा, पढ़ा, छापा गया है कि उनका दोहराव फिजूल ही होगा।
बस इतना ही समझ लीजिये की ये महाशय 'देखन में छोटे हैं पर घाव करें घंभीर। सो बचाव में ही बचाव है।

शुक्रवार, 29 मई 2009

बायें हाथ से काम करने वालों की मुश्किलें

हमने अपने सगे-सम्बन्धीयों, जाने-पहचाने, अड़ोस-पड़ोस में या मशहूर बहुत सारे लोगों के बारे में पढा, सुना या देखा होगा कि वे लोग अपना ज्यादातर काम अपने बायें हाथ से निपटाते हैं। इसे हमने प्राकृतिक तौर पर ही लिया भी होगा। पर कभी भी इनकी मुश्किलों पर ना तो ध्यान ही दिया और न ही कभी सोचा। यदि आप दाहिने हाथ से काम करने वाले हैं तो एक बहुत छोटा सा काम कर देखिये। एक कैंची लीजिए और अपने बायें हाथ से उससे कुछ भी, कागज, कपड़ा या अपनी मूछें, कतरने की कोशीश कर देखिये क्या होता है। दुनिया में ज्यादातर लोग अपने दायें हाथ से काम करते हैं। इसीलिये उन्हीं को मद्देनजर रख औजार बनाने वाली कंपनियां अपने उत्पाद बनाती हैं। एक मोटे तौर पर दुनिया मे बायें हाथ से काम करने वालों की संख्या करीब 10-11 प्रतिशत है। इसी आबादी को ध्यान में रख आस्ट्रेलिया के एक व्यवसायी ने बायें हाथ से काम करने वालों की मुश्किलों को दूर करने के लिये अपने उत्पाद 'लेफ्ट हैंडेड प्रोडक्टस' के नाम से बनाने शुरु कर दिये। अपना और दूसरों का भला एक साथ।
यह तो विज्ञान ने साबित कर दिया कि दोनों तरह के लोगों में कोई फर्क नहीं होता नहीं तो सदियों से बायें हाथ से काम करने वालों को अच्छी नज़र से नहीं देखा जाता था। यहां तक कि इन्हें भूत-प्रेत की संज्ञा देकर मार डालने तक की कोशीशें भी होती रहती थीं। इसी डर से बहुत से मां-बाप अपने बायें हाथ का उपयोग करने वाले बच्चों को जबरन राइट हैंडेड बनाने की कोशीश किया करते थे। पति अपनी बायें हाथ से काम करने वाली पत्नि को त्यागने में गुरेज नहीं करते थे। मार-पीट, प्रताड़ना तो आम बात थी।
आज भी रूस, जापान, जरमनी और यहां तक की अपने देश भारत में भी कहीं-कहीं बायें हाथ का इस्तेमाल अशुभ माना जाता है।
आपके क्या विचार हैं?

बुधवार, 27 मई 2009

आईए भूत मारें ! ! !

जी हां सही पढा आपने। आप भी किसी अला-बला को भगा-हटा सकते हैं। इसमें जीवट की कम सतर्कता की ज्यादा जरूरत पड़ती है। सावधानी हटी और आप की साख घटी वाला मामला है यहां। इस काम में आपका कद्दावर कद, भारी चेहरा, घनी भौंहें, उलझे-घने-लम्बे बाल काफी सहायक हो सकते हैं। इसके साथ-साथ आपको अपनी आंखें लाल करने की कला भी आनी चाहिये। यदि आपकी आवाज धीर गंभीर हो तो सोने में सुहागा। इसके अलावा "आपके" मंत्रों से सिद्ध कुछ चीजों की जरूरत पड़ती है जो बाज़ार में आसानी से उपलब्ध हैं। यदि आपका कोई विश्वासपात्र दुकानदार हो तो आप का खेल तुरंत जम जायेगा।
तैयारी :- एक ऐसा नारियल लें जिसके रेशे बहुत घने हों। इसके अंदर पानी न हो तो ठीक है। आपने देखा होगा कि नारियल की एक तरफ तीन गोल आकृतियां सी रहती हैं। उनमें से किसी एक को किसी धारदार चाकू से सावधानी से हटा लें। कटे हुए टुकड़े को संभाल कर रख लें। यदि नारियल में पानी हो तो उसे निकाल दें। फिर उस छिद्र से कुछ बाल , काला धागा, कुछ छोटी हड्डियां, जो किसी भी खाद बेचने वाले के यहां से बोन- मील के नाम से मिल जायेंगी, तथा गहरे लाल रंग का पेन्ट या टमाटर सास या फिर आपको जो भी खून के रंग का अच्छ विकल्प लगे, सावधानी से छिद्र के अंदर प्रविष्ट करा उस छिद्र को उस कटे हुए टुकड़े से किसी चिपकाऊ पदार्थ से सील कर दें। इसके बाद नारियल के घने रेशों में ठोस सोडियम के छोटे-छोटे टुकड़े छिपा दें। इसे अपने परिचित दुकानदार के पास रख छोड़ें। यहां आपका आधा काम हो गया। इस काम के लिये यदि एक चोगे नुमा लबादे का इंतजाम हो जाये तब तो मैदान आपके हाथ में होगा इसके बाद सारा कुछ आपकी कलाकारी पर निर्भर करता है।
कार्य प्रणाली :- घटना स्थल पर जाकर ऐसा हाव-भाव प्रदर्शित करें जैसे आप वह सब कुछ देख पा रहे हों जो वहां उपस्थित और लोगों को नज़र नहीं आ रहा है। फिर कुछ ताम-झाम, सु-सटाक कर गंगा जल की मांग करें, ना मिलने पर अपनी झोली से “अभिमंत्रित” जल निकाल कर सारे घर में छिड़काव कर एक आसन पर ध्यान लगा बैठ जायें। "अपने मंत्रों" का जाप करते-करते एक नारियल लाने को कहें, यह सुनिश्चित कर लें कि आप वाला नारियल ही लाया जाए। नारियल आने पर उसे “अपने” मंत्रों से शुद्ध कर एक आसन पर रख धुएं वगैरह का इंतजाम लोबान इत्यादि जला कर करलें। फिर माहौल बना कर नारियल को “अभिमंत्रित” जल से सिंचित करें। जल के संपर्क में आते ही सोडियम आग पकड़ लेगा और लोगों की आंखे खुली की खुली और हाथ जुड़े के जुड़े रह जायेंगे। पर अभी तो चर्मोत्कर्ष बाकी है। अब आप उस नारियल को भीषण उद्घोष के साथ फोड़ें उसके फूटते ही उसके अंदर के द्रव्य बाहर आ आपकी साख न जमा दें तो कहियेगा। अब आप वह सब अल्लम-गल्लम सब को दिखा साधिकार भूत के मरने की घोषणा कर अपना सिक्का जमा सकते हैं। वैधानिक चेतावनी :- (-: भाई मेरे, इस तांत्रिक प्रयोग का प्रयोग ना ही करें तो अच्छा है। अरे सोचो, यदि सच में कुछ हुआ तो # #$#%$#@ (-:
यह भी एक ठगी का तरीका है जिससे भोले-भाले, मासूम, अनपढ लोगों के दिलो-दिमाग में गहरे पैठे अंधविश्वासों तथा कमजोर मानसिकता का फायदा उठा कुछ असामाजिक तत्व अपना उल्लू सीधा करने में लगे रहते हैं। वैसे देखें तो अनपढ ही नहीं, पढे-लिखे लोग भी हानी या मन मुताबिक काम ना होने पर इस तरह के टोटकों का सहारा लेने से नहीं चूकते। इसी अंजान भय और अनिश्चितता से ड़रे घबराये हुओं को कुछ शातिर, जरा सी विज्ञान की जानकारी, वाचालता और हाथ की सफाई के सहारे गुमराह कर अपनी रोटी तो सेकते ही हैं उसमें घी लगाने का इंतजाम भी कर लेते हैं। जरूरत है लोगों को जागरुक बनाने तथा ऐसे लोगों की पोल खोलने की। आइये इस भूत को मारें। काम थोड़ा मुश्किल है पर नामुमकिन नहीं।

मंगलवार, 26 मई 2009

विवाह में वर-वधु सात फेरे क्यों लेते हैं

क्या चीज हैं ये अंक भी। एक-एक अंक अपने 'अंक' में कैसी-कैसी विशेषताएं, कैसे-कैसे रहस्य लिये दुनिया को नचाते रहते हैं। आज अंक "सात" की बात करते हैं।
हमारी संस्कृति में, हमारे जीवन में, हमारे जगत में इस अंक विशेष का एक महत्वपूर्ण स्थान है।
सूर्य के रथ में सात घोड़ों का जिक्र आता है। प्रकाश में सात रंग होते हैं। सुर में सात स्वर, सा, रे, गा, मा, पा, धा, नि, यानि, षड़ज, ऋषभ, गांधार, मध्यम, पंचम, धैवत तथा निषाद होते हैं। सात लोकों, भू, भुव:, स्व:, मह:, जन, तप और सत्य, का वर्णन मिलता है। पाताल भी सात ही गिनाये गये हैं जैसे, अतल, वितल, सुतल, तलातल, महातल, रसातल और पाताल। सात द्विपों के साथ-साथ सात समुद्रों का अस्तित्व है। सात ही पदार्थ, गोरोचन, चंदन, स्वर्ण, शंख, मृदंग, दर्पण और मणि, शुभ माने जाते हैं। सात क्रियायें, शौच, मुखशुद्धी, स्नान, ध्यान, भोजन, भजन तथा निद्रा आवश्यक होती हैं। इन सात जनों, ईश्वर, माता, पिता, गुरु, सूर्य, अग्नि तथा अतिथी का सम्मान करने के साथ-साथ इन सात विकारों का, ईर्ष्या, क्रोध, मोह, द्वेष, लोभ, घृणा तथा कुविचारों का त्याग करना चाहिये। हमारे वेदों में स्नान भी सात ही प्रकार के बताये गये हैं यथा, मंत्र स्नान, भौम स्नान, अग्नि स्नान, वायव्य स्नान, दिव्य स्नान, करुण स्नान और मानसिक स्नान।
शायद इसीलिये हमारे ऋषि-मुनियों ने वैदिक रीति से होने वाले विवाहों में सात फेरों तथा सात वचनों का प्रावधान रखा था। वैदिक नियमों के अनुसार अपने परिजनों की साक्षी में वर-वधु पवित्र अग्नि के सात फेरे लेकर सात वचनों को निभाने का प्रण करते हैं। दोनों मिल कर यह कामना करते हैं कि हमें सदा मरीची, अंगिरा, अत्री, पुलह, केतु, पौलस्त्य,और वशिष्ठ इन सातों ऋषियों का आशिर्वाद मिलता रहे। हमारा प्रेम सात समुंदरों जैसा गहरा हो। निश दिन उसमें सातों सुरों का संगीत गुंजायमान हो। जीवन में सदा सातों रंगों का प्रकाश विद्यमान रहे। और हमारी ख्याति सातों लोकों में फैल जाये।

रविवार, 24 मई 2009

एक मीठी भाषा 'बांग्ला'

वैसे तो हिंदी सारे भारत में बोली समझी जाती है, पर अलग-अलग राज्यों में स्थानीय भाषायें इसे प्रभावित भी करती रहती हैं। यह घालमेल कभी-कभी बड़ी मनोरंजक स्थितियां पैदा कर देता है। आज बांग्ला - हिंदी की बात करने से पहले भाषा के कारण उपजे हास्य को चख लें -
कलकत्ते में हर प्रांत के लोग मिल-जुल कर रहते हैं तथा एक-दूसरे के तीज-त्योहार में शामिल होना आम बात है। ऐसे ही मोहल्ले में मुशायरा हो रहा था कि गोपाल बाबू अड़ गये कि हाम भी गोजल पढेगा। लोगों ने समझाया कि दादा उर्दू आपके बस की बात नहीं है। पर वह गोपाल ही क्या जो मान जाये। अंत में उन्हें दो लाईने दी गयीं कि इसे रट लो। लिखा था "न गिला करुंगा, न शिकवा करुंगा। तू सलामत रहे यही दुआ करुंगा।" गोपाल बाबू खुश। जब उनका नाम पुकारा गया तो उन्होंने बड़े आत्मविश्वास से पढना शुरु किया -" ना गीला कोरुंगा ना सूखा कोरुंगा तू साला मत रहे यही दूआ कोरुंगा"।अंदाज ही लगाया जा सकता है मुशायरे के हाल का।
बांग्ला में लड़के को खोका और लड़की को खोकी कहते हैं। खांसी को खोखी कहा जाता है। दफ्तर में बनर्जी बाबू को खांसी दम ना लेने दे रही थी सो उन्होंने अपने पंजाबी boss शर्माजी के पास जाकर कहा - सार, खोखी हुआ है, छुटी चाहिये।शर्माजी बोले - ओये बनर्जी चिंता ना कर अगले साल खोखा भी हो जायेगा।
बंगाली में कहीं-कहीं 'अ' का उच्चारण 'ओ' की तरह होता है, पर यह नियमबद्ध है हर बार ऐसा नहीं होता है। कलकत्ते में सियाल्दह स्टेशन के पास लक्ष्मी बाबू की एक सोने-चांदी की दुकान हुआ करती थी। उस समय आज की तरह ज्वेलर्स लिखने का चलन नहीं था। सभी की सहूलियत के लिये दुकान के दरवाजे के एक तरफ बांग्ला में लिखा हुआ था " लखी बाबुर सोना चांदीर दोकान"। इसी को दरवाजे की दूसरी तरफ हिंदी में लिख दिया गया था "लखी बाबू का सोना चांदी का दोकान" ले भाई एक कान सोने का दूसरा चांदी का, ऐश कर।
इस भाषा में मिठास बहुत है, पूरी तरह रसगुल्ले की चाशनी में पगी हुई होती है। विश्वास नहीं है तो देखिये - शाम के समय बनर्जी बाबू बाग मे बैठे हुए ठंड़ी हवा का आनंद लेने के बाद जब बाहर निकले तो उन्हें एहसास हुआ कि उनकी जेब काट ली गयी है। वे तुरंत फिर बाग के अंदर गये और वहां के माली से पूछा कि अभी जो यहां मेरे साथ एक भद्र लोक (पुरुष) बैठे थे उन्हें देखा ? माली ने जवाब दिया, नहीं। पर हुआ क्या ? बनर्जी बाबू बोले, अरे देखो न, वह भद्र लोक हमारी पोकेट मार कर भाग गया।गोयाकी पोकेटमार भी भद्र पुरुष होता है।
अब ऐसा है कि इस विषय पर लिखा जाय तो यह हनुमान जी की पूंछ की तरह बढता ही चला जायेगा। सोचा था कि बंगाल की हिंदी के बारे में लिखुंगा पर भटक गया। पर एक गुजारिश भी है कि इस भटकन को खेल भावना से ही लिया जाय। अगली बार रास्ते पर आ दोनों भाषाओं पर चर्चा करने की कोशिश करुंगा। तब तक के लिये नोमोश्कार।

शनिवार, 23 मई 2009

शीर्षक देना जरूरी है, पर क्या शीर्षक दूँ ?

अपने राज भाटिया जी की माताजी की तबीयत बहुत नाजुक है। डाक्टरों ने जवाब दे दिया है। आदमी चाहे कितना भी उम्रदराज हो जाये पर सदा अपने सर पर माँ के आंचल की छाया चाहता है। यही एक ऐसा रिश्ता है जिसमें किसी छल-फरेब-लालच का समावेश नहीं रहता। इतनी उम्र होने के बावजूद अभी भी जब बहुत हताश निराश हो जाता हूं तो माँ की गोद में सर रख देता हूं। भले ही वह मेरी परेशानी को दूर न कर पाती हों पर उनके हाथ का स्पर्श मिलते ही मुझमें एक हौसला जाग उठता है।भाटियाजी तो बहुत दूर हैं अपनी माताजी से उनकी मनोदशा को समझा जा सकता है। भगवान करे कि कोई चमत्कार हो और उनकी तबीयत सुधर जाये।

विशिष्ट पोस्ट

राष्ट्रगान और राष्ट्रीय गीत, फर्क क्या है

इन दोनों देशभक्ति से ओत-प्रोत संगीत रचनाओं में एक समानता यह है कि इनकी रचना बंगाल में, वहां की दो महान विभूतियों के द्वारा की गई है ! हमारा ...