कल ऐसे ही रिमोट से टीवी के चैनलों का जायजा ले रहा था। अचानक एक जगह भव्य सेट देख कर थम गया। खोजा तो दिखा कि 'शकुन्तला' नाम का सीरीयल चल रहा है। आगे बढ़ने ही वाला था की परदे पर की कन्या ने साथ के युवक से कहा की आपके सर में दर्द हो रहा है, मैं "बाम" लगा देती हूँ। मुझे लगा की शायद मैंने ग़लत सुना हो, पर यकीन मानिए, वह सतयुगी बाला बार-बार कलयुगी शब्द "बाम" का उपयोग धड़ल्ले से करती रही। कम से कम तीन-चार बार तो उसने कहा ही होगा।
सोच-सोच कर ही डर लगता है कि इतना शक्तिशाली माध्यम कैसे-कैसे हाथों में चला गया है। यह तो एक बानगी है। पता नहीं कैसे-कैसे लोग कैसी-कैसी चीजें कैसे-कैसे रूपों में परोसे जा रहे हैं। लोगों का हाज़मा बिगडे उनकी बला से।
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
गुरुवार, 7 मई 2009
बुधवार, 6 मई 2009
अजीब है पर सच है
1) कागज की एक शीट को, चाहे वह कितनी भी बड़ी क्यों ना हो, चारों कोने मिला कर, आठ बार से ज्यादा फोल्ड नहीं किया जा सकता। कोशीश कर देखें।
2) FOUR एक ऐसी संख्या है, जिसमें अक्षर और संख्या का मान बराबर है।
3) कबूतर अकेला पक्षी है जो पानी को चूस कर पी सकता है। बाकी के पक्षियों को पानी निगलने के लिये अपनी गर्दन को पीछे झटकना पड़ता है।
4) आदमी अकेला प्राणी है जो पीठ के बल भी सो सकता है।
5) “37” एक ऐसी संख्या है जो खुद किसी और संख्या से विभाजित नहीं होती, पर नीचे वाली अजीबोगरीब संख्यायों को विभाजित कर देती है :- 111, 222, 333, 444, 555, 666, 777, 888, 999।
6) ज़ेबरे पर सफेद धारियां होती हैं ना कि काली।
2) FOUR एक ऐसी संख्या है, जिसमें अक्षर और संख्या का मान बराबर है।
3) कबूतर अकेला पक्षी है जो पानी को चूस कर पी सकता है। बाकी के पक्षियों को पानी निगलने के लिये अपनी गर्दन को पीछे झटकना पड़ता है।
4) आदमी अकेला प्राणी है जो पीठ के बल भी सो सकता है।
5) “37” एक ऐसी संख्या है जो खुद किसी और संख्या से विभाजित नहीं होती, पर नीचे वाली अजीबोगरीब संख्यायों को विभाजित कर देती है :- 111, 222, 333, 444, 555, 666, 777, 888, 999।
6) ज़ेबरे पर सफेद धारियां होती हैं ना कि काली।
रविवार, 3 मई 2009
"मंडी", जहाँ महाकाव्य महाभारत की रचना हुई थी.
इस बार अपने देश का अधिकतर भाग गर्मी की चपेट में है। इससे बचने के लिये पहाड़ों पर जाने का प्रोग्राम बना रहे हैं और प्रकृति की सुंदरता को करीब से देखना चाहते हैं तो अपेक्षाकृत कम जानीजाने वाली जगहों को अपनी छुट्टियों के लिये चुने। वहां मशहूर जगहों की अपेक्षा कम भीड़-भाड़ और ज्यादा सकून मिल पायेगा। ऐसी ही एक जगह है “मंडी”।
यह चण्ड़ीगढ कुल्लू मार्ग पर व्यास नदी के तट पर बसा बेहद खूबसूरत नगर है, जो प्राकृतिक सौंदर्य, एतिहासिक महत्ता और धार्मिक स्थलों के लिये खासा मशहूर है। ऐसा माना जाता है कि महर्षि मांड़व्य ने यहां घोर तपस्या की थी जिस कारण इसे मांडव्य के नाम से जाना जाने लगा। जो कालांतर में मंडी बन गया। यही वह स्थान है जहां महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की थी।
यहां वर्षों तक सैन वंश का शासन रहा जिन्होंने अपने शासन काल में सैंकड़ों मंदिरों, स्मारकों व किलों का निर्माण करवाया था। यहां अभी भी सौ से ज्यादा मंदिर हैं । जिनमें नीलकंठ महादेव, भूतनाथ, एकादश रुद्र, त्रिलोकी नाथ, अर्ध नारिश्वर, सिद्धकाली, सिद्धभद्रा, महामृत्युंजय आदि प्रमुख हैं।
यहां घूमने-देखने के लिये ढेरों स्थानों में रिवाल्सर,कमरूनाथ, पाराशर झील जैसी अनेकों जगहें हैं जिन्हें देख प्रकृति प्रेमियों का वापस जाने का दिल नहीं करता।
मंडी से 40 कि.मी. दूर पराशर झील के किनारे ऋषि पराशर का एक खूबसूरत पैगोड़ा शैली का बना हुआ मंदिर है। इस में लकडी पर उकेरी गयी आकृतियां इतनी लाजवाब हैं कि देखने वाला खड़ा का खड़ा रह जाता है। इस मंदिर में लक्ष्मी, विष्णू, दुर्गा तथा शिव जी की प्रतिमायें स्थापित हैं।
इसी तरह रिवाल्सर झील जो मंडी से 25कि.मी. की दूरी पर स्थित है, अपनी सुंदरता में अद्वितीय है। यह जगह महर्षि लोमष की तपोभूमी के रूप में जानी जाती है। जो शिव जी के अनन्य भक्त थे।
मंडी से ही 50 कि.मी. की दूरी पर एक और खूबसूरत झील कमरूनाग है। यहां का पहुंच मार्ग इतना सुंदर है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यहीं कमरुनाथ जी का प्रसिद्ध बेहद प्राचीन मंदिर भी है।
मंडी से ही शिमला जाने के रास्ते में ‘तत्ता पानी’ नाम की एक और दर्शनीय जगह आती है। जो एक अजूबे की तरह है। एक तरफ सतलुज नदि का बर्फ के समान ठंड़ा पानी है तो वहीं नदि के आगोश से निकलता हुआ गर्म जल किसी परी कथा की याद दिला देता है।
तो जब भी, कभी भी, पहाड़ों का रुख करें तो विख्यात जगहों को छोड़ कुछ अनजानी जगहों को तलाशें। यकीन मानिये कभी भी निराशा हाथ नहीं लगेगी।
यह चण्ड़ीगढ कुल्लू मार्ग पर व्यास नदी के तट पर बसा बेहद खूबसूरत नगर है, जो प्राकृतिक सौंदर्य, एतिहासिक महत्ता और धार्मिक स्थलों के लिये खासा मशहूर है। ऐसा माना जाता है कि महर्षि मांड़व्य ने यहां घोर तपस्या की थी जिस कारण इसे मांडव्य के नाम से जाना जाने लगा। जो कालांतर में मंडी बन गया। यही वह स्थान है जहां महर्षि वेदव्यास जी ने महाभारत की रचना की थी।
यहां वर्षों तक सैन वंश का शासन रहा जिन्होंने अपने शासन काल में सैंकड़ों मंदिरों, स्मारकों व किलों का निर्माण करवाया था। यहां अभी भी सौ से ज्यादा मंदिर हैं । जिनमें नीलकंठ महादेव, भूतनाथ, एकादश रुद्र, त्रिलोकी नाथ, अर्ध नारिश्वर, सिद्धकाली, सिद्धभद्रा, महामृत्युंजय आदि प्रमुख हैं।
यहां घूमने-देखने के लिये ढेरों स्थानों में रिवाल्सर,कमरूनाथ, पाराशर झील जैसी अनेकों जगहें हैं जिन्हें देख प्रकृति प्रेमियों का वापस जाने का दिल नहीं करता।
मंडी से 40 कि.मी. दूर पराशर झील के किनारे ऋषि पराशर का एक खूबसूरत पैगोड़ा शैली का बना हुआ मंदिर है। इस में लकडी पर उकेरी गयी आकृतियां इतनी लाजवाब हैं कि देखने वाला खड़ा का खड़ा रह जाता है। इस मंदिर में लक्ष्मी, विष्णू, दुर्गा तथा शिव जी की प्रतिमायें स्थापित हैं।
इसी तरह रिवाल्सर झील जो मंडी से 25कि.मी. की दूरी पर स्थित है, अपनी सुंदरता में अद्वितीय है। यह जगह महर्षि लोमष की तपोभूमी के रूप में जानी जाती है। जो शिव जी के अनन्य भक्त थे।
मंडी से ही 50 कि.मी. की दूरी पर एक और खूबसूरत झील कमरूनाग है। यहां का पहुंच मार्ग इतना सुंदर है कि उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। यहीं कमरुनाथ जी का प्रसिद्ध बेहद प्राचीन मंदिर भी है।
मंडी से ही शिमला जाने के रास्ते में ‘तत्ता पानी’ नाम की एक और दर्शनीय जगह आती है। जो एक अजूबे की तरह है। एक तरफ सतलुज नदि का बर्फ के समान ठंड़ा पानी है तो वहीं नदि के आगोश से निकलता हुआ गर्म जल किसी परी कथा की याद दिला देता है।
तो जब भी, कभी भी, पहाड़ों का रुख करें तो विख्यात जगहों को छोड़ कुछ अनजानी जगहों को तलाशें। यकीन मानिये कभी भी निराशा हाथ नहीं लगेगी।
शुक्रवार, 1 मई 2009
आओ कसाबो, हमारे जले पर नमक छिड़को
आओ हमारे देश में तुम्हारा स्वागत है। आप तो जानते ही हैं कि हम और हमारा देश मेहमानों को देवता स्वरूप समझते हैं। हम खायें ना खायें उन्हें भरपेट भोजन उपलब्ध करवाते हैं। खुद गीले-सुखे में जैसे-तैसे गुजारा कर अतिथी को शैया सुख प्रदान करते हैं। हमारी फितरत है कि आप हमें लतियाते, धकियाते, गलियाते रहें पर हम फिर भी आपको सिर पर बैठाये रखते हैं। हमें सिखाया गया है कि कोई एक गाल पर मारे तो दूसरा गाल उसके सामने कर दो, कि ले भाई गुस्सा निकाल ले, यह दिल के लिये घातक होता है। पर यदि कहीं आप ज्यादा ही नाराज हो सौ-पचास लोगों का क्रिया करम भी कर देते हैं तो भी हमारे यहां डरने की जरूरत नहीं होती, यहां मानवाधिकारियों की फौज पुरजोर कोशीश करती है कि आप के सलीके से संवारे गये बालों में एक खम भी ना पड़े। जिनकी जान जाती है उनके आत्मियों को भी यह पता है कि यह आपकी करनी नहीं है आप तो सिर्फ माध्यम हो करने वाला तो भगवान है। आत्मा अमर होती है वह चोला बदलती रहती है, इत्यादि-इत्यादि और यह सब हमारी घुट्टी में है। इसलिये बेचारे कुछ दिन रो-गा कर चुप हो जाते हैं। वैसे आप लोग भी कफी समझदार हैं इसीलिए किसी संत्री-मंत्री पर हाथ नहीं डालते क्योंकि वैसे कुछ दिक्कत हो सकती है। आम आदमी की कीमत यहां किसी भुनगे-मकौडे से ज्यादा नहीं है। फिर भी खुदा न खास्ता यदि आप कभी हिरासत में ले भी लिये जाते हैं तो हम वहां भी आपकी खातिर-तवज्जो में कोई कमी नहीं आने देते। आपको बेहतरीन सुविधाओं के साथ-साथ लज़ीज भोजन का स्वाद दिलाया जाता है। आपकी दिनचर्या को खुशगवार बनाने में हम कोई कोर-कसर नहीं छोडते। यहां तक कि नहाने धोने के बाद आपकी पसंद का इत्र-फुलेल भी आपकी खिदमत में प्रस्तुत करने में हिचकिचाते नहीं हैं। आपकी हर फरमाईश को सिर माथे पर रखने के साथ-साथ ही हमारी कोशीश रहती है कि आप सादर और सुरक्षित हमसे विदा लें। फिर वापस आने की तैयारी कर के।
सो आईये, घूमिये-फिरिये, तफरीह करिये, शिकार का शौक फर्माईये और हमारी छती पर मूंग दलिये।
--------------------------------------------
दुनिया में शायद हमारा ही देश है, जहां खून-खराबा करने वाला भी रोज-रोज अपनी नयी-नयी मांगे मनवाने की जुर्रत कर सकता है। कसाब की हिम्मत देखिए कि जेल में अपनी मांगें ऐसे रख रहा है जैसे उसने हमारे लिए कोई बहादुरी का काम किया हो। बिना किसी शर्म, हया लज्जा के आज वह इत्र मांग रहा है, कल मुजरा देखने की भी फर्माइश कर सकता है। काश कोई तो ऐसा होता कि उसी समय उसके मुंह पर एक झापड़ रसीद करता। किस की शह पर उसमें इतनी हिम्मत आ गयी कि वह अपनी कारस्तानियों के कारण डरने की बजाय हमारे जख्मों पर ही नमक छिड़कने पर तुला हुआ है।
सो आईये, घूमिये-फिरिये, तफरीह करिये, शिकार का शौक फर्माईये और हमारी छती पर मूंग दलिये।
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दुनिया में शायद हमारा ही देश है, जहां खून-खराबा करने वाला भी रोज-रोज अपनी नयी-नयी मांगे मनवाने की जुर्रत कर सकता है। कसाब की हिम्मत देखिए कि जेल में अपनी मांगें ऐसे रख रहा है जैसे उसने हमारे लिए कोई बहादुरी का काम किया हो। बिना किसी शर्म, हया लज्जा के आज वह इत्र मांग रहा है, कल मुजरा देखने की भी फर्माइश कर सकता है। काश कोई तो ऐसा होता कि उसी समय उसके मुंह पर एक झापड़ रसीद करता। किस की शह पर उसमें इतनी हिम्मत आ गयी कि वह अपनी कारस्तानियों के कारण डरने की बजाय हमारे जख्मों पर ही नमक छिड़कने पर तुला हुआ है।
बुधवार, 29 अप्रैल 2009
बेनामी टिप्पणियों से टेंशन क्यों लेना
आज हर जगह आक्रोश, अराजकता, द्वेष, असंतोष का बोलबाला है। हर चौथा आदमी किसी न किसी से असहमत लगता है, और अपनी इस असहमती का इजहार बेतुकी हरकतों से कर रहा है। इन सब बातों का असर ब्लाग जगत पर भी साफ दिखाई दे रहा है। जबकी यह एक ऐसा मंच है जहां ब्लागर अपनी सोच को औरों के सामने रखता है। कोई जरूरी नहीं कि सब उससे सहमत हों, पर यदि असहमति है भी तो उसे शालीन शब्दों में जाहिर करना उचित होता है। छिप कर बारूद को तीली दिखा तमाशा देखना कैसी बात है सभी जानते हैं।
यह भी सच है कि कटु वचनों से दिलो-दिमाग तनावग्रस्त हो जाते हैं। ऐसी हरकतें समय-समय पर होती रहती हैं। कौन बच पाया है इनसे, सारे बड़े नामों को इस जद्दोजहद का सामना करना पड़ा है। समीर जी, भटिया जी, शास्त्री जी, द्विवेदी जी, किसको नहीं सहने पड़े ऐसे कटाक्ष। पर इन्होंने सारे प्रसंग को खेल भावना से लिया। ये सब तो स्थापित नाम हैं। मुझ जैसे नवागत को भी शुरु-शुरु में अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा था। वह भी एक "पलट टिप्पणी" के रूप में। एक बेनामी भाई को एक ब्लाग पर की गयी मेरी टिप्पणी नागवार गुजरी और वह घर के सारे बर्तन ले मुझ पर चढ बैठे थे। मन तो खराब हुआ कि लो भाई अच्छी जगह है, न मैं तुम्हें जानता हूं ना ही तुम मुझे तो मैंने तुम्हारी कौन सी बकरी चुरा ली जो पिल पड़े। दो-एक दिन दिमाग परेशान रहा फिर अचानक मन प्रफुल्लित हो गया वह कहावत याद कर के कि "विरोध उसीका होता है जो मशहूर होता है" तब से अपन भी अपनी गिनती खुद ही मशहूरों में करने लग पड़े।
मेरे ख्याल से तो ऐसी हरकतों को तूल ही नहीं देना चाहिये। पढिये, किनारे करिये। उस को लेकर यदि हो-हल्ला मचायेंगे तब तो उस भले/भली का मनसूबा ही पूरा करेंगे। उस ओर से चुप्पी साध लें तो वह अपने आप ही बाज आ जायेगा/जायेगी। रही टिप्पणी माडरेशन की बात, वैसे तो यह पूरी तरह ब्लागर के ऊपर निर्भर करता है, फिर भी इसे उपयोग में न लाना ही बेहतर नहीं है? एक तो इससे लगेगा कि उस अनजान प्राणी से हम भयग्रस्त हो गये। बाहर किसीके डर से कोई घर से निकलना तो बंद नहीं करता। दूसरा स्वस्थ आलोचनायें भी शायद इसकी भेंट चढ जायें। क्योंकि हमारी फितरत है कि हम आलोचना कम ही पसंद करते हैं। जो कि लेखन को सुधारने में मदद ही करती हैं।
इसलिए मेरा निवेदन है , मुम्बई टाईगर जी से कि यार दिल पर मत ले। टेंशन लेने का नहीं, देने का।
यह भी सच है कि कटु वचनों से दिलो-दिमाग तनावग्रस्त हो जाते हैं। ऐसी हरकतें समय-समय पर होती रहती हैं। कौन बच पाया है इनसे, सारे बड़े नामों को इस जद्दोजहद का सामना करना पड़ा है। समीर जी, भटिया जी, शास्त्री जी, द्विवेदी जी, किसको नहीं सहने पड़े ऐसे कटाक्ष। पर इन्होंने सारे प्रसंग को खेल भावना से लिया। ये सब तो स्थापित नाम हैं। मुझ जैसे नवागत को भी शुरु-शुरु में अभद्र भाषा का सामना करना पड़ा था। वह भी एक "पलट टिप्पणी" के रूप में। एक बेनामी भाई को एक ब्लाग पर की गयी मेरी टिप्पणी नागवार गुजरी और वह घर के सारे बर्तन ले मुझ पर चढ बैठे थे। मन तो खराब हुआ कि लो भाई अच्छी जगह है, न मैं तुम्हें जानता हूं ना ही तुम मुझे तो मैंने तुम्हारी कौन सी बकरी चुरा ली जो पिल पड़े। दो-एक दिन दिमाग परेशान रहा फिर अचानक मन प्रफुल्लित हो गया वह कहावत याद कर के कि "विरोध उसीका होता है जो मशहूर होता है" तब से अपन भी अपनी गिनती खुद ही मशहूरों में करने लग पड़े।
मेरे ख्याल से तो ऐसी हरकतों को तूल ही नहीं देना चाहिये। पढिये, किनारे करिये। उस को लेकर यदि हो-हल्ला मचायेंगे तब तो उस भले/भली का मनसूबा ही पूरा करेंगे। उस ओर से चुप्पी साध लें तो वह अपने आप ही बाज आ जायेगा/जायेगी। रही टिप्पणी माडरेशन की बात, वैसे तो यह पूरी तरह ब्लागर के ऊपर निर्भर करता है, फिर भी इसे उपयोग में न लाना ही बेहतर नहीं है? एक तो इससे लगेगा कि उस अनजान प्राणी से हम भयग्रस्त हो गये। बाहर किसीके डर से कोई घर से निकलना तो बंद नहीं करता। दूसरा स्वस्थ आलोचनायें भी शायद इसकी भेंट चढ जायें। क्योंकि हमारी फितरत है कि हम आलोचना कम ही पसंद करते हैं। जो कि लेखन को सुधारने में मदद ही करती हैं।
इसलिए मेरा निवेदन है , मुम्बई टाईगर जी से कि यार दिल पर मत ले। टेंशन लेने का नहीं, देने का।
रविवार, 26 अप्रैल 2009
ताजमहल का नामोनिशान मिट गया होता अगर......
अंग्रेजों ने अपने शासन काल में मनमानी लूट-खसोट की। हमारी बहुमूल्य धरोहरों को अपने देश भेज दिया। हजारों छोटे-मोटे गोरों ने अपने घरों को सजा, सवांर, समृद्ध बना लिया, हमारे बल-बूते पर। पर उनमें कुछ ऐसे लोग भी थे, जिन्होंने अपनी कर्तव्य परायणता के आड़े किसी भी चीज को नहीं आने दिया। ऐसा ही एक नाम है लार्ड कर्जन का। अगर वे नहीं होते तो शायद हमारे गौरवशाली अतीत का बखान करने वाले कयी स्मारक भी शायद न होते। बात कुछ अजीब सी है पर सही है।
समय था 1831 का, दिल्ली और आगरा पर ब्रिटिश फौज ने कब्जा जमा लिया था और शासन था, लार्ड विलियम बैंटिक का। इन शहरों की खूबसूरत इमारतें बैंटिक की आंख की किरकिरी बनी हुई थीं। खासकर ताजमहल। एक योजना के अंतर्गत यह तय किया गया कि दिल्ली के लाल किले और आगरे के ताजमहल को या तो गिरा दिया जाए या बेच दिया जाए। इस आशय की एक खबर बंगाल के एक अखबार 'जान बुल' में 26 जुलाई 1831 के अंक में छपी भी थी। इसमें बताया गया था कि ताज को सरकार की बेचने की मंशा है पर यदि सही कीमत नहीं मिलती तो इसे गिराया भी जा सकता है। इसके पहले आगरा के लाल किले में स्थित संगमरमर के बने नहाने के हौदों को बैंटिक ने निलाम करवाया था, पर उनको तोड़ने में जो खर्च आया था वह उसके मलबे से प्राप्त रकम से काफी ज्यादा था। यह भी एक कारण था ताज के टूटने में होने वाले विलंब का और शासन की झिझक का। इधर अवाम को भी इस सब की खबर लग चुकी थी जिसमें अंग्रेजों की इस तोड़-फोड़ की नीतियों से आक्रोश उभर रहा था। बैंटिक के अधिकारों पर भी सवाल उठने लग गये थे। ब्रिटिश हुकुमत भी सिर्फ ताज के संगमरमर के कारण उसे गिराने के कारण फैलने वाले असंतोष को लेकर सशंकित थी। इसलिए इस घाटे के सौदे से उसने अपना ध्यान धीरे-धीरे हटा लिया। और फिर लार्ड कर्जन के आने के बाद तो सारा परिदृश्य ही बदल गया। कर्जन एक कर्तव्यनिष्ठ शासक था। जनता के मनोभावों को समझते हुए उसने यहां की सभी गौरवशाली इमारतों के संरक्षण तथा रखरखाव का वादा किया और निभाया। उसके शासन काल में इन प्राचीन इमारतों तथा स्मारकों को संरक्षण तो मिला ही उनका उचित रख-रखाव और देख-रेख भी की जाती रही।
इन सब बातों का खुलासा 7 फरवरी 1900 को एशियाटिक सोसायटी आफ बेंगाल की सभा में खुद लार्ड कर्जन ने किया था।
समय था 1831 का, दिल्ली और आगरा पर ब्रिटिश फौज ने कब्जा जमा लिया था और शासन था, लार्ड विलियम बैंटिक का। इन शहरों की खूबसूरत इमारतें बैंटिक की आंख की किरकिरी बनी हुई थीं। खासकर ताजमहल। एक योजना के अंतर्गत यह तय किया गया कि दिल्ली के लाल किले और आगरे के ताजमहल को या तो गिरा दिया जाए या बेच दिया जाए। इस आशय की एक खबर बंगाल के एक अखबार 'जान बुल' में 26 जुलाई 1831 के अंक में छपी भी थी। इसमें बताया गया था कि ताज को सरकार की बेचने की मंशा है पर यदि सही कीमत नहीं मिलती तो इसे गिराया भी जा सकता है। इसके पहले आगरा के लाल किले में स्थित संगमरमर के बने नहाने के हौदों को बैंटिक ने निलाम करवाया था, पर उनको तोड़ने में जो खर्च आया था वह उसके मलबे से प्राप्त रकम से काफी ज्यादा था। यह भी एक कारण था ताज के टूटने में होने वाले विलंब का और शासन की झिझक का। इधर अवाम को भी इस सब की खबर लग चुकी थी जिसमें अंग्रेजों की इस तोड़-फोड़ की नीतियों से आक्रोश उभर रहा था। बैंटिक के अधिकारों पर भी सवाल उठने लग गये थे। ब्रिटिश हुकुमत भी सिर्फ ताज के संगमरमर के कारण उसे गिराने के कारण फैलने वाले असंतोष को लेकर सशंकित थी। इसलिए इस घाटे के सौदे से उसने अपना ध्यान धीरे-धीरे हटा लिया। और फिर लार्ड कर्जन के आने के बाद तो सारा परिदृश्य ही बदल गया। कर्जन एक कर्तव्यनिष्ठ शासक था। जनता के मनोभावों को समझते हुए उसने यहां की सभी गौरवशाली इमारतों के संरक्षण तथा रखरखाव का वादा किया और निभाया। उसके शासन काल में इन प्राचीन इमारतों तथा स्मारकों को संरक्षण तो मिला ही उनका उचित रख-रखाव और देख-रेख भी की जाती रही।
इन सब बातों का खुलासा 7 फरवरी 1900 को एशियाटिक सोसायटी आफ बेंगाल की सभा में खुद लार्ड कर्जन ने किया था।
गुरुवार, 23 अप्रैल 2009
जब ईश्वरचंद्र विद्यासागर जी ने चप्पल फेंकी।
फिर एक चप्पल चली। रोज ही कहीं ना कहीं यह पदत्राण थलचर हाथों में आ कर नभचर बन अपने गंत्वय की ओर जाने की नाकाम कोशिश करते नज़र आने लगे हैं। अब यह जनता की दबी भड़ास का नतीजा हैं या प्रायोजित कार्यक्रम, यह खोज का विषय है। पर वर्षों पहले भी एक चप्पल चली थी, वह भी एक ऐसे इंसान के हाथों जो अपने समय के प्रबुद्ध और विद्वान पुरुष थे।
बात ब्रिटिश हुकुमत की है। बंगाल में नील की खेती करनेवाले अंग्रेजों जिन्हें, नील साहब या निलहे साहब भी कहा जाता था, के अत्याचार , जोर-जुल्म की हद पार कर गये थे। लोगों का जीवन नर्क बन गया था। इसी जुल्म के खिलाफ कहीं-कहीं आवाजें भी उठने लगी थीं। ऐसी ही एक आवाज को बुलंदी की ओर ले जाने की कोशीश में थे कलकत्ते के रंगमंच से जुड़े कुछ युवा। ये अपने नाटकों के द्वारा इन अंग्रेजों की बर्बरता का मंचन लोगों के बीच कर विरोध प्रदर्शित करते रहते थे । ऐसे ही एक मंचन के दौरान इन युवकों ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी को भी आमंत्रित किया। उनकी उपस्थिति में युवकों ने इतना सजीव अभिनय किया कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गये। खासकर निलहे साहब की भूमिका निभाने वाले युवक ने तो अपने चरित्र में प्राण डाल दिये थे। अभिनय इतना सजीव था कि विद्यासागर जी भी अपने पर काबू नहीं रख सके और उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाल कर उस अभिनेता पर दे मारी। सारा सदन भौचक्का रह गया। उस अभिनेता ने विद्यासागर जी के पांव पकड़ लिए और कहा कि मेरा जीवन धन्य हो गया। इस पुरस्कार ने मेरे अभिनय को सार्थक कर दिया। आपके इस प्रहार ने निलहों के साथ-साथ हमारी गुलामी पर भी प्रहार किया है। विद्यासागर जी ने उठ कर युवक को गले से लगा लिया। सारे सदन की आंखें अश्रुपूरित थीं।
बात ब्रिटिश हुकुमत की है। बंगाल में नील की खेती करनेवाले अंग्रेजों जिन्हें, नील साहब या निलहे साहब भी कहा जाता था, के अत्याचार , जोर-जुल्म की हद पार कर गये थे। लोगों का जीवन नर्क बन गया था। इसी जुल्म के खिलाफ कहीं-कहीं आवाजें भी उठने लगी थीं। ऐसी ही एक आवाज को बुलंदी की ओर ले जाने की कोशीश में थे कलकत्ते के रंगमंच से जुड़े कुछ युवा। ये अपने नाटकों के द्वारा इन अंग्रेजों की बर्बरता का मंचन लोगों के बीच कर विरोध प्रदर्शित करते रहते थे । ऐसे ही एक मंचन के दौरान इन युवकों ने ईश्वरचन्द्र विद्यासागर जी को भी आमंत्रित किया। उनकी उपस्थिति में युवकों ने इतना सजीव अभिनय किया कि दर्शकों के रोंगटे खड़े हो गये। खासकर निलहे साहब की भूमिका निभाने वाले युवक ने तो अपने चरित्र में प्राण डाल दिये थे। अभिनय इतना सजीव था कि विद्यासागर जी भी अपने पर काबू नहीं रख सके और उन्होंने अपने पैर से चप्पल निकाल कर उस अभिनेता पर दे मारी। सारा सदन भौचक्का रह गया। उस अभिनेता ने विद्यासागर जी के पांव पकड़ लिए और कहा कि मेरा जीवन धन्य हो गया। इस पुरस्कार ने मेरे अभिनय को सार्थक कर दिया। आपके इस प्रहार ने निलहों के साथ-साथ हमारी गुलामी पर भी प्रहार किया है। विद्यासागर जी ने उठ कर युवक को गले से लगा लिया। सारे सदन की आंखें अश्रुपूरित थीं।
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"बिजली का तेल" यह क्या होता है ? मेरे पूछने पर उन्होंने बताया कि बिजली के ट्रांस्फार्मरों में जो तेल डाला जाता है वह लगातार ...
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विजयी विश्व तिरंगा प्यारा, झंडा ऊंचा रहे हमारा। हमारे तिरंगे के सम्मान में लिखा गया यह गीत जब भी सुनाई देता है, रोम-रोम पुल्कित हो जाता ...
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अपनी एक पुरानी डायरी मे यह रोचक प्रसंग मिला, कैसा रहा बताइयेगा :- काफी पुरानी बात है। अंग्रेजों का बोलबाला सारे संसार में क्यूं है? क्य...