pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 6 जनवरी 2009

बदला

** उसने इंस्पेक्टर को अपनी बाहों में भरा और नीचे छलांग लगा दी ** ___________________________________________________पता नहीं वह कैसे शहर की इस सबसे सुरक्षित समझी जाने वाली इमारत की पांचवीं मंजिल के बाहर खिड़की पर लगे छज्जे पर आ खड़ा हुआ था।सुबह आफिस वगैरह खुलने का समय था, सड़क पर आवाजाही शुरु हो चुकी थी तभी लोगों का ध्यान इस ओर गया। इमारत के नीचे भीड़ जमा होने लगी यातायात अवरुद्ध हो गया। किसी ने पुलिस को खबर कर दी। पुलिस ने इलाके की घेराबंदी कर फायरब्रिगेड वालों को भी बुलवा लिया। उसे हर तरह से समझा बुझा कर देख लिया गया पर वह तो मानो पत्थर के बुत की तरह वहां टंगा रहा। उतारने की हर कोशिश पर लगता कि वह नीचे कूद पड़ेगा। इसी बीच इंस्पेक्टर वर्मा भी वहां पहुंच गया। उसने सारी स्थिति का जायजा लिया, कुछ देर विचार विमग्न रह, अपने साथियों से कुछ कह कर लिफ्ट की ओर बढ गया। पांचवीं मंजिल पर पहुंच उस कमरे की खिड़की के पास गया जिसके बाहर वह खड़ा था। इंस्पेक्टर को देख कर वह खिसक कर खिड़की से कुछ और दूर हट गया। उसे ऐसा करते देख वर्मा बोला कि घबराओ मत मैं कुछ नहीं करुंगा, तुम सिर्फ यह बताओ कि तुम मरना क्यूं चाहते हो? बार-बार पूछने पर भी उस बुत नुमा इंसान ने कुछ नहीं कहा। उसे चुप देख वर्मा ने फिर कहा कि देखो तुम्हारी जो भी शिकायत है उसे दूर करने की पूरी चेष्टा करूंगा। आत्महत्या पाप है। सोचो तुम्हारे इस कदम से तुम्हारे परिवार का क्या होगा। देखो मेरा हाथ पकड़ो और अंदर आ जाओ तुम्हें कोई कुछ नहीं कहेगा। पर उस पर किसी भी बात का कोई असर नहीं हो रहा था। जैसे वह कुछ सुन ही ना रहा हो। फिर भी वर्मा ने हिम्मत नहीं हारी उसे समझाते हुए बोला, सोचा है तुमने कि तुम्हारे नहीं रहने से तुम्हारे बच्चों का क्या होगा, कैसे जी पायेंगें वे? इस बार बच्चों का जिक्र सुन उसकी आंखों से पानी बहने लगा। वर्मा का हौंसला बढा, उसने बात का छोर पकड़ कर बात आगे बढाई, पूछा बच्चों को कोई तकलीफ है, बिमार है, क्या हुआ है बताओ मैं क्या सहायता कर सकता हूं? इस पर उसका बांध टूट गया। उसके आंसूओं की धारा तेज हो गयी। यह देख इंस्पेक्टर भी खिड़की के बाहर आ गया, एक हाथ से खिड़की को थाम दूसरा हाथ उसकी ओर बढा बोला कि पूरी बात बताओ क्या हुआ है मैं पूरी तरह तुम्हारा साथ दूंगा। रोते-रोते वह इंस्पेक्टर की तरफ कुछ खिसका और उसकी बांह थाम कर कहना शुरु किया, सरकार तीन दिन पहले की बात है, मंत्री महोदय का काफिला गुजरने वाला था, सड़क पूरी तरह से बंद कर दी गयी थी। मेरा घर सड़क के किनारे ही है, वहीं मेरी छोटी सी दुकान भी है। उसी समय मेरे आठ साल के बच्चे की गेंद उसके हाथों से छूट कर सड़क पर चली गयी, वह अबोध उसे लेने जैसे ही सड़क के किनारे गया वहां तैनात पुलिस कर्मी ने उसे हटाने के लिये अपना डंडा जोर से घुमाया जो बच्चे के सिर पर जा लगा। बच्चा तड़प कर वहीं गिर गया। पर किसी ने उसकी तरफ ध्यान नहीं दिया। काफिला गुजरने के बाद उसे अस्पताल पहुंचाया जा सका, जहां कल उसने दम तोड़ दिया। मैं और मेरा बेटा इन दो ही जनों का परिवार था मेरा। अब वह नहीं रहा तो मैं भी जी कर क्या करुंगा। इंस्पेक्टर को भी वह घटना याद आ गयी उसीके डंडे की चोट से एक बालक घायल हुआ था। अपने को स्थिरचित्त कर वर्मा ने उससे कहा, जो हो गया सो हो गया तुम उस हादसे को भूल जाओ, चलो नीचे उतरो। इतना कह कर उसे अपनी ओर खींचा। वह भी धीरे से खिड़की की ओर बढा और अचानक इंस्पेक्टर को अपनी बाहों में भर नीचे की ओर छलांग लगा दी !!!

शनिवार, 3 जनवरी 2009

जल-प्रलय हुई थी

जल प्रलय एक ऐसी घटना, जिसका जिक्र वेद, कुर्आन तथा बाईबिल में है। तीनों ग्रन्थों का दुनिया के अलग-अलग धर्मों और क्षेत्रों से संबंध है फिर भी तीनों ग्रन्थों में इसके ब्योरे में इतनी समानता है कि विश्वास हो जाता है कि ऐसी घटना जरूर हुई होगी।
पहले वेद की कथा को देखें तो इसमें मनु को प्रभू ने स्वप्न में निर्देश दिये कि आज से सातवें दिन सारी पृथ्वी जलमग्न हो जायेगी तुम सज्जनों के साथ नाव में बैठ जाना। मनु ने कहना मान कर तीन सौ हाथ लंबी, पचास हाथ चौड़ी और तीन सौ हाथ गहरी नौका बनाई और समस्त पशु, पक्षियों, जीव, जंतुओं के जोड़ों और अपने कुटुंब के साथ उसमें बैठ कर प्रभू के ध्यान में लीन हो गये। चालीस दिनों तक पानी बरसता रहा, सारी धरती पानी में डूब गयी सारे समुंद्र एक हो गये। पर प्रभू की कृपा से मनु और उनके साथी बच गये और धरती पर फिर से जीवन शुरु हो सका।
बाइबिलके अनुसार नोहा को ईश्वर ने कहा कि सारे मनुष्यों का अंत आ चुका है उनके अत्याचार से पृथ्वी त्रस्त है। मैं उन्हें नष्ट करने जा रहा हूं । तुम अपने लिये एक नौका तैयार करो जिसकी लंबाई तीन सौ हाथ, चोड़ाई पचास हाथ और ऊंचाई तीस हाथ हो, उसमें तीन खंड़ हों। तुम उसमें अपनी पत्नि, पुत्र और पुत्रों की पत्नियों तथा हर जीव-जंतुओं की प्रजातियों में से दो-दो को अपने साथ ले लेना। नोह ने ऐसा ही किया। उसके बाद ऐसा हुआ कि समुद्र के सारे स्रोत फूट पड़े, आकाश मानो फट पड़ा हो, चालीस दिन और चालीस रातों तक बरसात होती रही। सारी सृष्टि नष्ट हो गयी सिर्फ नोहा और उसके साथी बच पाये। उनकी नौका अरारात की पहाड़ियों पर टिक गयी। वहां से उसने एक कबूतर को छोड़ा ताकि पता लग सके कि पानी घटा कि नही। जब पृथ्वी बिल्कुल सूख गयी तब सारे जने बाहर आये और धरती पर फिर से जीवन लौट सका।
कुर्आन मे भी इसी तरह की कथा मिलती है। उसके अनुसार वाणी की गयी नूह कि ओर कि तेरी कौम में कोई ईमान नहीं लायेगा, मात्र उन्हें छोड़ जो ईमान ला चुके हैं। इसलिये जो दुर्जन हैं वे अवश्य जलमग्न कर दिये जायेंगे। तू हमारी देख-रेख में एक नौका बना। उसमें प्रत्येक प्रजाति के जानवारों के नर-मादा के जोड़े सवार कर और उन्हें भी साथ ले जो ईमान लाये। नूह ने नौका तैयार की। तभी जल उबलने लगा, पहाड़ जैसी मौजें उठने लगीं। सारी धरती डूब गयी। फिर आदेश हुआ कि हे पृथ्वी अपना जल पी जा और हे आकाश थम जा। तुरंत जल घट गया। नौका जूदी पर्वत पर टिक गयी। फिर सबको उतरने का आदेश हुआ। धरती फिर गुलजार हो गयी।
यहां उल्लेखित जूदी पहाड़ी अरारात पर्वत का ही एक हिस्सा है, जो इराक के आर्मीनिया क्षेत्र में स्थित है।
इस प्रकार देखा जाये तो हम पाते हैं कि जल-प्रलय का विवरण तीनों धर्म-ग्रन्थों मे करीब-करीब एक जैसा है जो इस तरफ इशारा करता प्रतीत होता है कि ऐसी कोई घटना जरूर हुई होगी। संसार का भी ऐसे ही नवीनीकरण होता रहता होगा।

शुक्रवार, 2 जनवरी 2009

चपत लगाने से चैतन्यता बढती है।

हमारा शरीर एक अजूबा है। यह इतना जटिल और विचित्र है कि इसके रहस्यों को समझ पाना अभी तक संभव नहीं हो पाया है। धन्य हैं वे सर्जन, डाक्टर और वैज्ञानिक जो दिन रात एक कर जुटे हुए हैं मानव शरीर के अंगों की पूर्ण जानकारी पाने के लिये जिससे आने वाले समय में मानव रोगमुक्त जीवन जी सके।
आज कान की तरफ कान देते हैं। यह हमारे शरीर की महत्वपूर्ण ज्ञानेन्द्री है। इसका संबंध आंख, नाक, गले तथा मस्तिष्क से होता है। इस पर काफी शोध हो चुका है, पर अभी भी भीतरी कान का इलाज पूर्णतया संभव नहीं हो पाया है। हार्वर्ड यूनिवर्सिटी के एस.एस. स्टीवेंस के अनुसार कान के पास करीब 27000 नर्व-फाइबर्स का जमावड़ा होता है। इसीलिये कान की मालिश बहुत उपयोगी मानी जाती है। कहते हैं कि यदि आप पूरे शरीर की मालिश ना कर पायें तो सिर्फ सिर, कान और पैर के तलवों की मालिश जरूर कर लें खास कर जाड़ों में। इससे भी शरीर को स्वस्थ रहने में काफी सहायता मिलती है।
हमारे यहां तो प्राचीन काल से ही कानों में बालियां पहनने का रिवाज रहा है। इससे कान विभिन्न तरह के रोगों से बचे रहते थे। चीन के चिकित्सकों ने भी इस ओर काफी शोधकार्य कर 'एक्यूपंचर' पद्धति का प्रचलन शुरु किया था। चूंकि कान के पास की बारीक नसों का संबंध दिमाग से होता है, सो स्कूलों में जाने-अनजाने अध्यापकगण चपतियाकर, कान उमेठ कर या कान पकड़ कर उठक-बैठक करवा कर हमारी बुद्धी को चैतन्य करने में सहायक ही होते थे।
वैसे आजकल सौंदर्य विशेषज्ञ सुंदरता बढाने के लिये भी स्लैप-थेरेपी (थप्पड़ चिकित्सा) का उपयोग भी करने लग गये हैं। कहा जाता है कि इस तरह चपतियाने से खून का दौरा बढता है।
तो क्या इरादा है ? सुंदर दिखने के साथ-साथ बुद्धिमान भी कहलवाना चाहते हैं तो शुरु हो जायें आज से ही। वैसे किसी ने अपने ही कान उमेठ कर अपने ही मुंह पर चपतियाते देख लिया तो पता नहीं हम बुद्धिमान बने ना बने पर उसकी नज़र में तो कुछ और ही बन जायेंगे। सो जरा देख-भाल कर चिकित्सा शुरु करें।

मंगलवार, 30 दिसंबर 2008

ज्ञान भी सुपात्र को ही देना चाहिए

एक बहुत विद्वान ब्राह्मण थे। उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैली हुई थी। वे घूम-घूम कर लोगों में ज्ञान बांटा करते थे। एक बार इसी तरह विचरण करते हुए वह एक राजा के यहां जा पहुंचे। राजा ने उनका बहुत आदर सत्कार किया। उन्हें अपने महल में ठहराया। रोज ही उनके सत्संग रूपी प्रकाश से राज्य की जनता अपना अज्ञान रूपी अंधकार मिटाती रही। इसी तरह कुछ दिन व्यतीत होने पर ब्राह्मणदेव ने अपनी यात्रा जारी करने की इच्छा जाहिर की। जाते समय राजा ने उनसे गुरुमंत्र देने को कहा। इस पर उन्होंने राजा से कहा कि सदा आलस्य रहित होकर, शान्ति, मित्रता, दया और धर्म से अपने राज्य का संचालन करते रहना। इस पर राजा ने प्रसन्न होकर उन्हें एक गांव भेंट करना चाहा पर ब्राह्मणदेव ने उसे लेने से इंकार कर दिया और अपनी राह चल पड़े।
चलते-चलते वे एक नदी किनारे आ पहुंचे। वहां का मल्लाह निपट मूर्ख था। उसे सिर्फ अपने पैसों से मतलब था। उसने आज तक किसी को भी बिना पैसा लिये पार नहीं उतारा था। पैसे के लिये वह लड़ाई-झगड़ा करने से भी बाज नहीं आता था। अब ब्राह्मण को उस पार जाना था सो उन्होंने नाविक से पूछा कि क्या भाई मुझे उस पार ले जाओगे ? नाविक ने कहा क्यों नहीं, किराया क्या दोगे? पंडितजी ने कहा मैं तुम्हें ऐसा उपाय बताउंगा जिससे तुम्हारे धन और धर्म दोनों की वृद्धि होगी। यह सुन कर मल्लाह ने उन्हें पार उतार दिया और उधर जा पैसे की मांग की। पंडितजी ने कहा कि तू पार उतारने के पहले ही यात्रियों से पैसा ले लिया कर, बाद में उनका मन बदल सकता है। यह धन की वृद्धि का उपाय है। नाविक ने सोचा कि इस सलाह के बाद ये पैसे भी देगा, सो उसने फिर किराया मांगा। पंडितजी ने कहा अभी तुझे धन की वृद्धि का उपाय बताया अब तू धर्म वृद्धि का उपाय भी जान ले, कैसा भी समय हो जगह हो कभी क्रोध मत करना इससे तेरा धर्म बढ़ेगा और तू सदा सुखी रहेगा। पर इस शिक्षा का मल्लाह पर कोई असर नहीं हुआ उसने कहा क्या यही तेरा किराया है? इससे काम नहीं चलनेवाला पैसे निकालो। पंडितजी ने कहा भाई मेरे पास तो शिक्षा ही है और कुछ तो है नहीं। मल्लाह चिल्लाया कि अरे भिखारी तेरे पास पैसे नहीं थे तो तू मेरी नाव में क्यूं चढ़ा, इतना कह उसने पंडितजी को नीचे गिरा पीटना शुरु कर दिया। इसी बीच नाविक की पत्नि आ गयी और उसने किसी तरह पंडितजी को छुड़ाया।
पंडितजी जाते-जाते सोच रहे थे कि इसी शिक्षा को सुनकर राजा मुझे गांव देने को तैयार था और उसी शिक्षा को सुन यह जाहिल मेरी जान के पीछे पड़ गया था।

शुक्रवार, 26 दिसंबर 2008

तालियाँ, पैसे कमाने का एक जरिया.

इस जगत में स्तुति गान की परंपरा रही है, चाहे देवलोक हो या पृथ्वी लोक। देवी-देवताओं, गुरुओं, राजा महाराजाओं, ज्ञानी गुणी जनों आदि की पूजा अर्चना, बड़ाई, स्वागत इत्यादि में तरह-तरह के कसीदे काढे जाते रहे हैं। ये सब कभी श्रद्धा कभी खुशी कभी भय या कभी मजबूरी में भी होता रहा है। आज तो अपनी जयजयकार करवाना, तालियां बजवाना अपने आप को महत्वपूर्ण होने, दिखाने का पैमाना बन गया है। इस काम को अंजाम देने वाले भी सब जगह उपलब्ध हैं। तभी तो लच्छू सबेरे तोताराम जी का गुणगान करता मिलता है तो दोपहर को गैंडामल जी की सभा में उनकी बड़ाई करते नहीं थकता और शाम को बैलचंद की प्रशंसा में दोहरा होता चला जाता है।

यह सब अभी शुरु नहीं हुआ है, यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है। हमारे यहां अधिकांश शासकों के यहां चारण और भाट ये काम करते आये हैं। जिनमें से बहुतों ने मुश्किल समय में अपने फर्जानुसार देश की सेवा भी की है। पर यहां सिर्फ अपने आप को महत्वपूर्ण दिखाने के लिये की जानेवाली व्यवस्था की बात कर रहा हूं।
रोम के सम्राट नीरो ने अपनी सभा में काफी संख्या में ताली बजाने वालों को रोजी पर रखा हुआ था। जो सम्राट के मुखारविंद से निकली हर बात पर करतलध्वनी कर सभा को गुंजायमान कर देते थे।

ब्रिटेन में किराये के लोग बैले नर्तकों के प्रदर्शन पर तालियों की शुरुआत कर दर्शकों को एक तरह से मजबूर कर देते थे प्रशंसा के लिये। पर इस तरह के लोगों को अच्छी नजर से नहीं देखा जाता था। ब्रिटेन में ही एक थियेटर में ऐसी हरकत करने वाले के खिलाफ एक दर्शक ने 'दि टाईम्स' पत्र में शिकायत भी कर दी थी। पर उसका असर उल्टा ही हो गया, लोगों का ध्यान इस कमाई वाले धंधे की ओर गया और बहुत सारे लोगों ने यह काम शुरु कर दिया। जिसके लिये बाकायदा ईश्तिहारों और पत्र लेखन द्वारा इसका प्रचार शुरु हो गया।

इटली में भी यह धंधा खूब चल निकला। धीरे-धीरे इसकी दरें भी निश्चित होती चली गयीं। जिनमें अलग-अलग बातों और माहौल के लिये अलग-अलग किमतों का प्रावधान था। बीच-बीच में इसका विरोध भी होता रहा पर यह व्यवसाय दिन दूनी रात अठगुनी रफ्तार से बढता चला गया।

इन सब को छोड़ें, कभी ध्यान से अपने टी वी पर किसी ऐसे कार्यक्रम को देखें जिसमें लोग बहुत खुश, हंसते या तालियां बजाते नजर आते हों। कैमरे के बहुत छिपाने पर भी आप देख पायेंगे, कि यह पागलपन का दौरा सिर्फ सामने की एक दो कतारों पर ही पड़ता है, पीछे बैठे लोग निर्विकार बने रहते हैं। क्योंकि सिर्फ सामने वालों का ही जिम्मा है आप पर डोरे डालने का।

जाते-जाते :- पश्चिम जर्मनी के दूरदर्शन वालों ने एन शैला नामक एक महिला को दर्शकों के बीच बैठ कर हंसने के लिये अनुबंधित किया था। कहते हैं उसकी हंसी इतनी संक्रामक थी कि सारे श्रोता और दर्शक हंसने के लिये मजबूर हो जाते थे।
तो क्या ख्याल है--------------

रविवार, 21 दिसंबर 2008

आस्था अपनी अपनी, श्वान पुत्र की माँ का डर

गांव के बाहर एक घना वट वृक्ष था। जिसकी जड़ों में एक दो फुटिया पत्थर खड़ा था। उसी पत्थर और पेड़ की जड़ के बीच एक श्वान परिवार मजे से रहता आ रहा था।
एक दिन महिलाओं का सामान बेचने वाले एक व्यापारी ने थकान के कारण दोपहर को उस पेड़ के नीचे शरण ली और अपनी गठरी उसी पत्थर के सहारे टिका दी। सुस्ताने के बाद उसने अपना सामान उठाया और अपनी राह चला गया। उसकी गठरी शायद ढीली थी सो उसमें से थोड़ा सिंदुर उस पत्थर पर गिर गया। सबेरे कुछ गांव वालों ने रंगा पत्थर देखा तो उस पर कुछ फूल चढा दिये। इस तरह अब रोज उस पत्थर का जलाभिषेक होने लगा, फूल मालायें चढने लगीं, दिया-बत्ती होने लगी। लोग आ-आकर मिन्नतें मांगने लगे। दो चार की कामनायें समयानुसार प्राकृतिक रूप से पूरी हो गयीं तो उन्होंने इसे पत्थर का चमत्कार समझ उस जगह को और प्रसिद्ध कर दिया। अब लोग दूर-दूर से वहां अपनी कामना पूर्ती के लिये आने लग गये। एक दिन एक परिवार अपने बच्चे की बिमारी के ठीक हो जाने के बाद वहां चढावा चढा धूम-धाम से पूजा कर गया।
यह सब कर्म-कांड श्वान परिवार का सबसे छोटा सदस्य भी देखा करता था। दैव योग से एक दिन वह बिमार हो गया। तकलीफ जब ज्यादा बढ गयी तो उसने अपनी मां से कहा, मां तुम भी इन से मेरे ठीक होने की प्रार्थना करो, ये तो सब को ठीक कर देते हैं। मां ने बात अनसुनी कर दी। पर जब श्वान पुत्र बार-बार जिद करने लगा तो मजबूर हो कर मां को कहना पड़ा कि बेटा ये हमारी बात नहीं सुनेंगें। पुत्र चकित हो बोला कि जब ये इंसान के बच्चे को ठीक कर सकते हैं तो मुझे क्यों नहीं।
हार कर मां को कहना पड़ा, बेटा तुम्हारे पिता जी ने इसे इतनी बार धोया है कि अब तो मुझे यहाँ रहते हुए भी डर लगता है।

गुरुवार, 18 दिसंबर 2008

विवाहों की भी श्रेणियां होती हैं।

#हिन्दी_ब्लागिंग 
तकरीबन संसार के सभी धर्मों और जातियों में, समाज में मर्यादा बनाये रखने के लिये, सदाचार की बढोतरी तथा व्यभिचार की रोक-थाम के लिये विवाह की प्रथा का चलन रहा है। हमारे वेदों में भी सारे आश्रमों में गृहस्थाश्रम को सर्वोपरि स्थान दिया गया है। जिसमें प्रवेश विवाह के पश्चात ही मिल पाता है। इसके आठ प्रकार बताये गये हैं।

* ब्रह्म विवाह :- वर और कन्या ने ब्रह्मचर्य का पालन करते हुए अपनी शिक्षा पूरी की हो। वे विद्वान और धार्मिक विचारों को मानने वाले हों। व्यवहार कुशल एवं सुशील हों और उनका विवाह आपसी सहमति से हुआ हो।

* देव विवाह :- यज्ञ और ऋत्विक कर्म करते हुए कन्यादान करना, देव विवाह कहलाता है।

* आर्य विवाह :- वर पक्ष से कुछ धन आदि लेकर कन्या का विवाह करना इस श्रेणी के अंतर्गत आता है। कभी-कभी इसका रूप विकृत हो जाता है, जब कन्या का पिता अपने स्वार्थ के लिये अपनी कन्या को बेच देता है। अनेकों जनजातियों में यह प्रथा प्राचीनकाल से चली आ रही है।

* प्राजापत्य विवाह :- इसमें विवाह बुद्धि व धर्म के अनुसार होता है। वर-वधू एक दूसरे के लिये आयु, रूप, गुण आदि में एक दूसरे के लिये सर्वथा उपयुक्त होते हैं। ऐसे विवाह ज्यादातर सफल होते हैं।

* असुर विवाह :- इस प्रकार के विवाह में आपसी सहमति से, एक दूसरे से लेन-देन होता है। आज के युग में जिसे दहेज कहा जाता है। दहेज की विभीषिका को आज सभी जानते हैं।

* राक्षस विवाह :- बलपूर्वक, लड़-झगड़ कर या हर कर कन्या से विवाह करना राक्षस विवाह कहलाता है। प्राचीन काल में भी इसकी स्वीकृति नहीं थी। आज तो यह कानूनी अपराध की श्रेणी में आता है।

*गंधर्व विवाह :- अनियम, असमय, परिस्थितिवश वर-कन्या का संयोग होना गंधर्व विवाह कहलाता है। प्राचीन काल में इसे कुछ हद तक सामाजिक मान्यता प्राप्त थी। आज भी ऐसे विवाह बहुतायद से होते हैं पर ऐसा करने वाले कुछ ही लोग समाज के सामने इसे स्वीकारने की हिम्मत दर्शा पाते हैं।

* पैशाच विवाह :- नशे में चूर, पागल या सोती हुई कन्या के साथ बलपूर्वक या उसकी अनभिज्ञता से संबंध स्थापित करना पैशाच विवाह कहलाता है। वैसे इसे विवाह नहीं व्यभिचार का नाम दिया जा सकता है।

इन आठों प्रकारों में ब्रह्म विवाह सर्वोत्तम, देव एवं प्राजापत्य मध्यम, आर्य, असुर व गंधर्व निम्न तथा राक्षस और पैशाच विवाहों को भ्रष्ट श्रेणियों में माना जाता है।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...