pub-3648900737756323 कुछ अलग सा

मंगलवार, 2 दिसंबर 2008

आप तो जानते हैं इन नेताओं को

बहुत सारे नेताओं को ले जाती एक लग्जरी बस का एक गांव के पास एक्सीडेंट हो गया। मौका-ए-वारदात पर पुलिस के पहुंचते-पहुंचते ग्रामिणों ने सब को दफना दिया था। तहकिकात करते हुए जब इंस्पेक्टर ने गांव वालों से पूछा - क्यों भाई कोई भी जिंदा नहीं बचा था क्या? तो एक गांव वाला बोला, कुछ लोग बोल तो रहे थे कि हम जिंदा हैं। पर सरकार आप तो जानते ही हो कि ये नेता लोग कितना झूठ बोलते हैं। सो---------------------

सोमवार, 1 दिसंबर 2008

दैत्यगुरु शुक्राचार्य, ग्रहों की कहानी :- 7

शुक्राचार्य दानवों के गुरु और पुरोहित हैं। ये योग के आचार्य भी हैं। इन्होंने असुरों के कल्याण के लिए ऐसे कठोर व्रत का अनुष्ठान किया था जैसा फिर कोई नहीं कर पाया। इस व्रत से देवाधिदेव शंकर भगवान प्रसन्न हुये और उन्होंने इन्हें वरदान स्वरूप मृतसंजीवनी विद्या प्रदान की। जिससे देवताओं के साथ युद्ध में मारे गये दानवों को फिर जिला देना संभव हो गया था। प्रभू ने इन्हें धन का अध्यक्ष भी बना दिया, जिससे शुक्राचार् इस लोक और परलोक की सारी सम्पत्तियों के साथ-साथ औषधियों, मन्त्रों तथा रसों के भी स्वामी बन गये।
ब्रह्माजी की प्रेरणा से शुक्राचार्य ग्रह बन कर तीनों लोकों के प्राणों की रक्षा करने लग गये। लोकों के लिये ये अनुकूल ग्रह हैं। वर्षा रोकने वाले ग्रहों को ये शांत कर देते हैं। इनका वर्ण श्वेत है तथा ये श्वेत कमल पर विराजमान हैं। इनके चारों हाथों में – दण्ड, रुद्राक्ष की माला, पात्र तथा वरदमुद्रा सुशोभित रहती है। इनका वाहन रथ है जिसमें अग्नि के समान आठ घोड़े जुते रहते हैं। रथ पर ध्वजायें फहराती रहती हैं। इनका आयुध दण्ड है। ये वृष तथा तुला रशि के स्वामी हैं । इनकी महादशा बीस साल की होती है।
इनका सामान्य मंत्र है :- “ ऊँ शुं शुक्राय नम:”। जप का समय सूर्योदय काल है। अनुष्ठान किसी विद्वान के सहयोग से ही करना चाहिये।

रविवार, 30 नवंबर 2008

ग्रहों की कहानी-----------6 :- बृहस्पति

देवगुरु बृहस्पति महर्षि अंगिरा के पुत्र और देवताओं के पुरोहित हैं। इन्होंने प्रभास तीर्थ में भगवान शंकरजी की कठोर तपस्या की थी जिससे प्रसन्न होकर प्रभू ने उन्हें देवगुरु का पद प्राप्त करने का वर दिया था। इनका वर्ण पीला है तथा ये पीले वस्त्र धारण करते हैं। ये कमल के आसन पर विराजमान हैं तथा इनके चार हाथों में क्रमश:- दंड, रुद्राक्ष की माला, पात्र और वरमुद्रा सुशोभित हैं। इनका वाहन रथ है जो सोने का बना हुआ है और सूर्य के समान प्रकाशमान है। उसमें वायुगति वाले पीले रंग के आठ घोड़े जुते हुए हैं। इनका आवास स्वर्ण निर्मित है। ये अपने भक्तों पर प्रसन्न होकर उन्हें सम्पत्ति तथा बुद्धि प्रदान कर उन्हें सन्मार्ग पर चलाते हैं और विपत्तियों में उनकी रक्षा करते हैं। शरणागतवत्सलता इनमें कूट-कूट कर भरी है। इनकी तीन पत्नियां हैं। पहली पत्नी शुभा से सात कन्याएं उत्पन्न हुई हैं। दूसरी पत्नी तारा से सात पुत्र तथा एक कन्या है तथा तीसरी पत्नी ममता से दो पुत्र, भरद्वाज और कच हुए हैं। कच ने ही दैत्य गुरु शुक्राचार्य से मृतसंजीवनी विद्या सीख कर देवताओं की मदद की थी। बृहस्पति प्रत्येक राशि में एक-एक साल तक रहते हैं। वक्रगति होने पर अंतर आ जाता है। इनकी महादशा सोलह साल की होती है। ये मीन और धनु राशि के स्वामी हैं।
इनका सामान्य मंत्र है :- “ ऊँ बृं बृहस्पतये नम:”। एक निश्चित समय और संख्या में श्रद्धानुसार इसका जप करना चाहिये। जाप का समय संध्या काल है।
* पिछला ग्रह : बुध, अगला ग्रह : शुक्र

शनिवार, 29 नवंबर 2008

हमें नाज़ है अपने वीर जवानों पर

हमारे वीर जवानों ने फिर एक बार संकट से देश को उबारा। ये देश के सच्चे सपूत, जिस निड़रता, जिंदादिली और जज्बे से काम करते हैं, भूखे, प्यासे, उनींदे, खुद को मौत के मुंह में डाल दूसरों की जिंदगी की रक्षा करते हैं, जो खुद के परिवारों से दूर देशवासियों को चैन की नींद सुलाने की कठिन जिम्मेदारी निभाते हैं उनकी जितनी भी स्तुति की जाये कम है। पर विडंबना देखिये उन्हीं को जब आर्थिक सहूलियत देने की बात होती है तो हाय-तौबा मच जाती है।
सदन में एक दूसरे को फूटी आंखों ना सुहाने वाले नेतागण अपनी आर्थिक बढ़ोतरी पर तो बेशर्मों की तरह एक हो जाते हैं पर जब जवानों की भलाई की बात का मौका आता है तब अड़चने क्यों पेश आने लगती हैं। क्यों सेना के अधिकारियों को अपना विरोध प्रकट करना पड़ता है? क्यूं? क्यूं?

गुरुवार, 27 नवंबर 2008

कहाँ मुंह छिपाए बैठे हैं

कहां हैं देवताओं के नाम वाली सेनाओं के सेनापति? लोग भी समझ लें कि सिर्फ नाम रख लेने से ही देवत्व नहीं आ जाता। क्यूं नहीं जागती इनकी गैरत? कहां मुंह छिपाये छिपे बैठे हैं निर्दोषों पर कहर बरपाने वाले? अपने ही देश के गरीब, निहत्थे, बेसहारा लोगों पर अपनी मर्दानगी दिखाने वालों को क्यूं सांप सूंघ गया है। बात तो तब होती कि आज सामने आकर ललकारते देश के दुश्मनों को। जतला देते कि हम सचमुच अपने राज्य के लोगों की चिंता करते हैं। पर नहीं उस खेल में और इस हकीकत में जमीन-आसमान का फर्क है। वहां जान लेने पर भी खुद पर आंच ना आने की गारंटी थी। यहां सीधे ऊपर जाने का रास्ता नजर आता है।

बुधवार, 26 नवंबर 2008

ग्रहों की कहानी--------५ :- बुध

बुध के पिता चन्द्रमा और मां तारा हैं। इनकी बुद्धि बड़ी गम्भीर थी इसलिए ब्रह्माजी ने इनका नाम बुध रखा। ये सभी शास्त्रों में पारंगत तथा अपने पिता चन्द्रमा की तरह कांतिमान हैं। इन्हें सब तरह से योग्य पा ब्रह्माजी ने इन्हें भूतल का स्वामी तथा ग्रह बना दिया था। इनका वर्ण कनेर के फूल की तरह पीला है तथा ये पीले रंग के ही वस्त्र धारण करते हैं। इन्होंने अपने चारों हाथों में तलवार, ढाल, गदा तथा वरमुद्रा धारण की हुई है। इनका रथ श्वेत और प्रकाश से दीप्त है, जिसमें वायु के समान गति वाले दस घोड़े जुते हुए हैं। इनका एक वाहन सिंह भी है। इनकी विद्या-बुद्धि से प्रभावित होकर महाराज मनु ने अपनी गुणवती कन्या इला का विवाह इनके साथ कर दिया। इनके संयोग से महाराज पुरूरवा की उत्पत्ति हुई। जिन्होंने चन्दवंश का विस्तार किया। बुध ग्रह के अधिदेवता भगवान विष्णु हैं। बुध, मिथुन और कन्या राशि के स्वामी हैं। इनकी महादशा 17 वर्ष की होती है। इनकी शांति के लिए प्रत्येक अमावस्या को व्रत रखना शुभ होता है। वैसे ये प्राय: मंगल ही करते हैं। इनका सामान्य मंत्र :- “ऊँ बुं बुधाय नम:” है। जिसका जाप एक निश्चत संख्या में रोज करने से शुभ फल प्राप्त होता है। किन्हीं विशेष परिस्थितियों में विद्वानों का मार्ग दर्शन लेना उपयोगी रहता है।

* पिछला ग्रह : मंगल, अगला ग्रह : बृहस्पति।

मंगलवार, 25 नवंबर 2008

ग्रहों की कहानी---------------४ :- मंगल

विभिन्न कल्पों में मंगल की उत्पत्ति की विभिन्न कथाएँ हैं। इनमें ज्यादा प्रचलित कथा इस प्रकार है। जब हिरण्यकशिपु का बड़ा भाई हिरण्याक्ष पृथ्वी को चुरा कर ले गया था तब भगवान ने वाराहावतार लिया और हिरण्याक्ष को मार कर पृथ्वी का उद्धार किया था। इस पर पृथ्वी ने प्रभू को पति रूप में पाने की इच्छा की। प्रभू ने उनकी मनोकामना पूरी की। इनके विवाह के फलस्वरूप मंगल की उत्पत्ति हुई। इनकी चार भुजाएँ हैं तथा शरीर के रोयें लाल रंग के हैं। इनके वस्त्रों का रंग भी लाल है। यह भेड़ के वाहन पर सवार हैं और इनके हाथों ने त्रिशूल, गदा, अभयमुद्रा तथा वरमुद्रा धारण की हुई है। पुराणों में इनकी बड़ी महिमा बताई गयी है। ये प्रसन्न हो जायें तो मनुष्य की हर इच्छा पूरी हो जाती है। इनके नाम का पाठ करने से ऋण से मुक्ति मिल जाती है। यदि इनकी गति वक्री ना हो तो यह हर राशि में एक-एक पक्ष बिताते हुए बारह राशियों को ड़ेढ़ वर्ष में पार करते हैं। इनको अशुभ ग्रह माना जाता है। इनकी महा दशा सात वर्षों तक रहती है। इनकी शान्ति के लिए शिव उपासना, मगलवार को व्रत और हनुमान चालीसा का पाठ करना चाहिए। ये मेष तथा वृश्चिक राशि के स्वामी हैं। इनका सामान्य मंत्र :- “ऊँ अं अंगारकाय नम:” है। इसके जाप का समय प्रात: काल का है। इसका एक निश्चित संख्या में, निश्चित समय में पाठ करना चाहिये। इस विषय में किसी विद्वान का सहयोग और परामर्श ले लेना चाहिये।
* अगला ग्रह :- बुध

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...