आज के मशीनी युग में आस्था, विश्वास, चमत्कार जैसी बातें दकियानुसी लगती हैं। पर कभी-कभी कुछ ऐसा हो जाता है, जिसे आस्थावान चमत्कार, पर भोतिकवादी संयोग कह कर संतुष्ट हो जाते हैं। बिना लाग-लपेट के एक सच्ची घटना बता रहा हूं। अब इसे चाहे संयोग माने चाहे आस्था का चमत्कार।
राजस्थान के मेंहदीपुर जिले में हनुमानजी के बाल रूप की पूजा “बालाजी महाराज” के रूप में होती है। मान्यता है कि दुनिया भर की अलाओं-बलाओं का निवारण यहां होता है। वह भी स्वयं बालाजी द्वारा। किसी पण्डे, पुजारी या झाड़-फूंक करनेवाले की कोई भूमिका यहां नहीं होती। हजारों मरीज ठीक हो कर जाते हैं यहां से, जिनमें डाक्टर, इंजिनियर, वकील, सरकारी अफसर, अमीर-गरीब सभी शामिल हैं।
यहां बिना टिप्पणी, एक घटना का जिक्र करना चाहता हूं। बात सात-आठ साल पहले दिल्ली की है। मेरी एक दूर के रिश्ते की मामीजी हैं, वह फरिदाबाद में रहती हैं। उनकी हनुमानजी में अटूट श्रद्धा है। बहुत कम लोगों में ऐसी आस्था देखी है मैंने। एक बार उन्हीं के जोर देने के कारण मुझे, मेंहदीपुर जाने का सुअवसर प्राप्त हुआ। मैं, मेरे दो कजिन, मामीजी तथा उनका पुत्र, पांचो जने मंदिर की संगत के साथ, हनुमानजी के दर्शन करने वहां गये थे। वहां का दस्तूर है कि मंदिर पहुंचते ही सबसे पहले बालाजी की मुर्ती के सामने, जिसे दरबार कहते हैं, अपनी हाजिरी लगवानी होती है। उसी तरह लौटते समय उनकी इजाजत लेने का नियम है। इजाजत लेते समय प्रभू से प्रार्थना करनी पड़ती है कि वे अपना गण हमारे साथ भेजें ,जिससे हम सहीसलामत अपने घर वापस पहुंच सकें। हो सकता है कि वर्षों पहले जब वहां घना जंगल हुआ करता था, तो ऐसी प्रार्थना , यत्रियों को अतिरिक्त मनोबल प्रदान करती हो। अब तो सारी सुविधाएं उपलब्ध हैं। बसों, गाड़ियों की भरमार है। फ़िर भी प्रथा चली आ रही है।
पूजा-अर्चना कर दूसरे दिन दोपहर बाद साढे तीन बजे हमने दिल्ली के लिए बस पकड़ी। जिसने करीब दस बजे हमें दिल्ली के, धौला कुआं बस टर्मिनल पर उतार दिया। यहां से हमें जनकपुरी जो मुश्किल से आठ-दस किमी है, जाना था और मामीजी को फरिदाबाद, जो दिल्ली यू.पी. के बार्डर पर स्थित है, जहां जाने के लिए उस समय उन्हें तीन बार वाहन बदलना पड़ना था। धौला कूआं से आश्रम, आश्रम से फरिदाबाद मोड़ तथा वहां से उनके घर तक। क्योंकि उस समय फरिदाबाद के लिए अंतिम बस जा चुकी थी। आम समय में ही उतनी दूर जाने में ड़ेढ एक घंटा लग जाता है। रात गहराते देख हमने बहुत जोर लगाया कि रात आप जनकपुरी में ही रुक जाएं, पर उन्होंने हमारी एक ना सुनी। उसी समय उन्हें पहले पड़ाव की बस मिली और वे दोनो मां बेटा उसमें चले गये। हमे करीब आधे घंटे के बाद बस मिली। हम तकरीबन सवा ग्यारह बजे घर पहुंच गये। अभी बैठे कुछ ही देर हुए थी कि फरिदाबद से मामीजी के घर पहुंचने का फोन आ गया। इतनी जल्दि उनके पहुंचने का सुन जहां मन चिंता मुक्त हुआ वहीं आश्चर्य से ही भर गया।
सुबह उन्होंने विस्तार से जो जानकारी दी वह मैं संक्षेप में आप को बता रहा हूं। धौला कूआं से जब वह आश्रम वाले स्टाप पर उतरीं तो वहां बिल्कुल सुनसान था। फरिदाबाद की तरफ़ जानेवाली बस के स्टाप पर भी कोई नहीं था। आंच मिनट बाद पता नहीं कहां से एक लड़का आया, हमें वहां खड़े देख, उसके पूछने पर, जब हमने अपनी बात बताई तो उसने कहा कि फरिदाबाद की बस तो जा चुकी है पर आप घबड़ायें नहीं कुछ ना कुछ इंतजाम हो जायेगा। थोड़ी देर बाद पता नहीं कहां से एक थ्री व्हिलर लेकर आया और बोला कि वैसे तो इन वाहनों का बार्डर पार करना मना है, पर आपको यह फरिदाबाद मोड़ तक छोड़ आयेगा। इसके पहले की उसे हम धन्यवाद के दो शब्द कह पाते, वह अंधेरे में गायब हो गया। रात को मन थोड़ा घबरा रहा था, पर मुझे अपने बालाजी पर पूर्ण विश्वास था, सो तनिक भी डर नहीं लग रहा था। स्कूटर ने जब हमें मोड़ पर उतारा, ग्यारह के ऊपर बज चुके थे और वहां भी सन्नाटा छाया हुआ था। उसी समय वहां से एक टेम्पो निकल रहा था, हमें खड़े देख हमारा गंत्व्य पूछ बोला, कि उधर तो नहीं जा रहा हूं, पर इतनी रात में आप परेशान होंगी सो आपको घर पहुंचा कर चला जाऊंगा। इसतरह बालाजी की कृपा से मैं आपलोगों के साथ-साथ ही घर पहुंच गयी।
अब सोचता हूं कि क्या वह सब संयोग था? उस भद्र महिला का कैसा अटूट विश्वास था, जिसने उनका मनोबल बनाये रखा? या सचमुच अदृष्य शक्तियां होती हैं जो अपने पर पूरी आस्था रखनेवालों का सदा साथ देती हैं। क्या कोई जवाब है इसका?
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
सोमवार, 13 अक्टूबर 2008
शनिवार, 11 अक्टूबर 2008
शिबु रिक्शेवाला
आजकल जब स्कूल जाते बच्चों को रिक्शे पर लदे हुए देखता हूं तो अपने बचपन के दिन याद आ जाते हैं। तब रिक्शे में लदा नहीं बैठा जाता था। हां यदि मां-बाप के साथ छोटे बच्चे होते थे तब तो एक ही रिक्शे से काम चल जाता था। परन्तु बड़े बच्चों के लिए अलग से रिक्शा किया जाता था। यही अघोषित परंपरा थी। शायद ही कभी दो की जगह तीन सवारियां किसी रिक्शे पर दिखाई पड़ती थीं। अपने वाहन बहुत कम होते थे। रिक्शों का चलन आम था। उन्हीं दिनों मैं और मेरा हम-उम्र सहपाठी मंजीत सिंह, दोनो करीब दस-ग्यारह साल के, एक रिक्शे में स्कूल जाया करते थे। स्कूल कोई सात-आठ किमी दूर था। स्कूलों में भी आजकल जैसी अफरातफरी का माहौल नहीं हुआ करता था। सही मायनों में शिक्षा देने की परंपरा अभी जीवित थी। गर्मियों में बच्चों का ध्यान रखते हुए स्कूल सुबह के हो जाते थे, सात से ग्यारह। बाकी महिनों में वही दस से चार का समय रहता था। स्कूल की तरह ही रिक्शेवाले भी वर्षों वर्ष एक ही रहते थे, लाने-ले-जाने के लिए। इससे बच्चे भी उन्हें परिवार का ही अंग समझने लगते थे। उनसे जिद्द, मनुहार आम बात होती थी। आपको बात बतानी थी, अपने रिक्शेवाले की। वह उड़िसा का रहनेवाला था, जितना याद पड़ता है, उम्र ज्यादा नहीं थी, कोई पच्चिस-छब्बीस साल का होगा। उसको सब शिबु कह कर पुकारते थे। नाम तो शायद उसका शिव रहा होगा, पर जैसा कि बंगला या उड़िया उच्चारणों में होता है, वह शिवो और शिवो से शिबु हो गया होगा। जैसा अब समझ में आता है। उसके हम पर स्नेह के कारण शायद उसका नाम मुझे अभी तक याद है। जैसा कि होता है, एक ही दिशा से स्कूल की तरफ कयी रिक्शा वाले अपनी-अपनी बच्चा सवारियों के साथ आते थे। कयी बार अपने रिक्शे से किसी और रिक्शे को आगे होते देख बाल सुलभ इर्ष्या के कारण हम शिबु को और तेज चलने के लिए उकसाते थे और इस तरह रोज ही ‘रेस-रेस खेल’ हो जाता था। स्कूल आने-जाने के दो रास्ते थे। एक प्रमुख सड़क से तथा दूसरा घुमावदार, कुछ लंबा। शिबु अक्सर हमें लंबे रास्ते से वापस लाया करता था। उस रास्ते पर एक बड़ा बाग हुआ करता था। बाग में एक खूब बड़ी फिसलन-पट्टी भी थी। हमारे हंसने-खेलने के लिए वह अक्सर वहां घंटे-आध-घंटे के लिए रुक जाता था। जब तक हम वहां धमा-चौकड़ी मचाते थे तब तक वह पीपल के पेड़ के पत्ते में पीपल का सफेद दूध इकट्ठा करता रहता था। एक-एक बूंद से अच्छा खासा द्रव्य इकट्ठा कर वह दोने को हमें पकड़ा देता था उसी के साथ पत्ते की नाल को मोड़ एक रिंग नुमा गोला भी थमा देता था। उसने हमें बताया हुआ था कि उस से बुलबुले कैसे बनाये जाते हैं। आजकल साबुन के घोल से जैसे बनाते हैं वैसे ही। उन दिनों यह सब सामान्य लगता था। पर आज के परिवेश को देखते हुए जब सोचता हूं तो अचंभा होता है। क्या जरूरत थी शिबु को सिर्फ हमारी खुशी के लिए लंबा चक्कर काटने की? अपना समय खराब कर धैर्य पूर्वक पीपल का रस इकट्ठा करने की? हमें हंसता खुश होता देखने की? हमारी खुशी के लिए अपना पसीना बहा रोज रेस लगाने की? खूद गीले होने की परवाह ना कर बरसातों में हमें भरसक सूखा रखने की? जबकी इसके बदले नाही उसे अलग से पैसा मिलता था नाही और कोई लाभ। कभी देर-सबेर की कोयी शिकायत नहीं। क्या ऐसी बात थी कि उसके रहते हमारे घरवालों को कभी हमारी चिंता नहीं रहती थी। शायद उसके इसी स्नेह से हम रोज स्कूल जाने के लिए भी उत्साहित रहते थे। आज वह पता नहीं कहां होगा। पर जहां भी होगा, खुश रह कर खुशियां बांट रहा होगा, क्योंकि दूसरों को खुश रखने वालों के पास दुख नहीं फटका करता।
शुक्रवार, 10 अक्टूबर 2008
पौराणिक काल में यदि पशु-पक्षी संरक्षण जैसी कोई संस्था होती तो ?
दूसरी ओर बेचारे असुर पैदल, दौड़ते-भागते रह कर ही युद्ध लड़ने को मजबूर थे। उनमें कोई बड़ा ओहदेदार हुआ तो उसे स्वचालित रथ वगैरह मिल जाते थे। अब यदि आज जैसी कोई संस्था होती तो सारे पशु-पक्षियों को भार मुक्त कर दिया जाता ! लड़ाईयां बराबरी पर लड़ी जातीं । सभी जानते हैं कि अधिकतम बार असुर, सुरों पर भारी पड़ते रहते थे ! तब देवताओं की तो बोलती बंद होती और असुरों की तूती का शोर मचा होता। किस्से-कहानियां, कथाएं-ग्रंथ सब, प्रथानुसार विजेता का ही स्तुति गान करते और हम सब भी अपने उन्हीं पूर्वजों का गुण-गान कर गौरवान्वित होते रहते..........!
#हिन्दी_ब्लागिंग
जरा सोचिए, यदि एनिमल वेलफेयर एसोसिएशन या पशु-पक्षी संरक्षण समिति जैसी संस्थाएं पौराणिक काल में ही अस्तित्व में आ जातीं तो इस संसार की तो छोड़िए हमारे देश का परिदृष्य कैसा होता ? हमारे दोनों महान ग्रंथों की कथाएं कैसी होतीं ? वे लिखे भी जा पाते या नहीं ? इनके लेखकों को अभिव्यक्ति की कितनी भी आजादी होती पर क्या वे स्वतंत्र रूप से कुछ रच भी पाते ? जरा सोचिए ! यदि ऐसा हो गया होता तो आज हम क्या पढ़ रहे होते ? पता नहीं पढ़ भी रहे होते कि नहीं !
रामायण काल की बात करें तो शायद आज हम राक्षसराज रावण की पूजा कर रहे होते। क्योंकि महर्षि वाल्मिकी हिरण जैसे मासूम जीव का वध करवा नहीं पाते ! जब हिरण वध के लिए राम आश्रम छोड़ते ही नहीं तो सीता हरण हो ही नहीं पाता ! और जब सीता हरण ही नहीं होता तो फिर युद्ध किस बात का ? यदि युद्ध का कोई और बहाना खोजा जाता तो रामजी सेना कहाँ से लाते ? वानर, भालुओं की सेना तो बनने नहीं दी जाती। हनुमानजी किसी भी तरह साथ हो भी लेते तो उन बेचारे को तो तरह-तरह के आरोपों से परेशान कर दिया जाता ! सोच कर देखिए, उत्तरांचल के लोग संजीवनी के लिए द्रोणगिरी पर्वत हटाने के कारण उनसे आज तक खफा हैं। वैसा कुछ होता तो क्या होता ! लंका की अशोक वाटिका में हजारों पेड़-पौधों के तहस नहस करने का हिसाब साफ़ करने के लिए पता नहीं कितनी सफाई देनी पड़ती ! मान लीजिए यदि किसी भी तरह यदि सेना बन भी जाती तो सेतु-बंध के नाम पर सागर किनारे की पहाड़ियों के पत्थर सागर में डाल कर वहां की भूमि का समतलीकरण कर दिया गया ! हजारों-लाखों वृक्ष, पेड़ उखड़ने से वहाँ के पर्यावरण पर जो असर पड़ा, इतने सारे वृक्ष, पेड़, पौधे, पर्वत शिलाओं को सागर में फेंकने से जो प्रकृति का संतुलन बिगड़ा, उसका तो जांच आयोग के सामने जवाब देना मुश्किल हो जाता कि इसका जवाबदार कौन है ? क्या लगता है कि इन सब पचड़ों के बीच युद्ध हो पाता ? और अगर वह महासमर ना होता तो कल्पना की ही जा सकती है रावण के साम्राज्य की।
उधर यदि बात करें श्री कृष्ण जी की तो उन्होंने तो बचपन में ही अनगिनत खतरनाक लुप्तप्राय जीवों को दूसरे लोक भेजने में अहम् भूमिका निभाई थी। यदि उनको संरक्षण मिल गया होता तो आज हमारे यहां दानवी शक्तियों का ही बोल-बाला होता। हमारे धर्म-ग्रन्थों की तस्वीर तो कुछ अलग होती ही, शायद धरा पर असुरों का ही राज होता। क्योंकि सारे देवी-देवताओं ने अपने वाहनों के रूप में पशु-पक्षियों को ही प्रमुखता दे रखी है। तीनों महाशक्तियों को देखिए, शिवजी के परिवार में, बैल शंकरजी का वाहन है, मां पार्वती का वाहन सिंह है, कार्तिकेयजी मोर पर सवार हैं तो गणेशजी को चूहा पसंद है। विष्णुजी का भार गरुड़जी उठाते हैं तो मां लक्ष्मी की सवारी उल्लू है। ब्रह्माजी तथा मां सरस्वती हंस पर आते-जाते हैं। इंद्र को हाथी प्यारा है तो सूर्यदेव ने सात-सात घोड़े अपने रथ में जोड़ रखे हैं। कहां तक गिनायेंगे।
दूसरी ओर बेचारे असुर पैदल, दौड़ते-भागते रह कर ही युद्ध लड़ने को मजबूर थे। उनमें कोई बड़ा ओहदेदार हुआ तो उसे स्वचालित रथ वगैरह मिल जाते थे। अब यदि आज जैसी कोई संस्था होती तो सारे पशु-पक्षियों को भार मुक्त कर दिया जाता ! लड़ाईयां बराबरी पर लड़ी जातीं । सभी जानते हैं कि अधिकतम बार असुर, सुरों पर भारी पड़ते रहते थे ! तब देवताओं की तो बोलती बंद होती और असुरों की तूती का शोर मचा होता। किस्से-कहानियां, कथाएं-ग्रंथ सब, प्रथानुसार विजेता का ही स्तुति गान करते और हम सब भी अपने उन्हीं पूर्वजों का गुण-गान कर गौरवान्वित होते रहते !
बुधवार, 8 अक्टूबर 2008
क्या रावण सच में निंदा का पात्र है ? आगे--------------
रावण ने धैर्य नहीं खोया। उस समय यदि वह चाहता तो अपने इन्द्र को जीतनेवाले बेटे तथा महाबली भाई कुम्भकर्ण के साथ अपनी दिग्विजयी सेना को भेज दोनो भाईयों को मरवा सकता था। हालांकि राम-लक्ष्मण ने खर दूषण का वध किया था, पर उनकी सेना और रावण की सेना में जमीन आसमान का फर्क था। जब हनुमानजी तथा और वानर वीरों के रहते युद्ध के दौरान इन दोनों पर घोर संकट आ सकता था तो उस समय तो दोनो भाई अकेले ही थे। पर रावण यह भी जानता था कि ये दोनो भाई साधारण मानव नहीं हैं और युद्ध की स्थिति में लंका को और उसके निवासियों को भी खतरा था। इसलिए रावण ने युद्ध टालने के लिए सीता हरण की योजना बनाई। उसका विश्वास था कि सीताजी के वियोग में यदि राम प्राण त्याग देते हैं तो लक्ष्मण का जिंदा रहना भी नामुमकिन होगा। सीताजी के हरण के पश्चात उसने उन्हें अपने महल में ना रख, अशोक वाटिका में महिला निरिक्षकों की निगरानी में ही रखा और कभी भी उनके पास अकेला बात करने नहीं गया।
वैसे भी सीता हरण उसकी मजबूरी थी। एक विश्व विजेता की बहन का सरेआम अपमान हुआ और वह चुप्पी साध कर बैठा रहता तो क्या इज्जत रह जाती उसकी। इसके अलावा सिर्फ दो मानवों को मारने के लिए यदि वह अपनी सेना भेजता तो यह भी किसी तरह उसकी ख्याति के लायक बात नहीं थी। यह काम भी उसके अपमान का सबब बनता।
पर रावण की योजना उस समय विफल हो गयी जब हनुमानजी ने राम-सुग्रीव की मैत्री का गठबंधन करवा दिया। उसके बाद अलंघ्य सागर ने भी राम की सेना को मार्ग दे दिया। फिर भी वह महान योद्धा विचलित नहीं हुआ। एक-एक कर अपने प्रियजनों की मृत्यु पर भी उसने बदले की भावना के वश सीताजी को क्षति पहुंचाने का उपक्रम नहीं किया।
विभिन्न कथाकारों ने रावण को कामी, क्रोधी, दंभी तथा निरंकुश शासक निरुपित किया है। पर ध्यान देने की बात है कि जिसमें इतने अवगुण हों वह क्या कभी देवताओं द्वारा पोषित उनके कोष के रक्षक कुबेर को परास्त कर अपनी लंका वापस ले सकता था? शिवजी के महाबली गण नंदी को परास्त करना क्या किसी कामी-क्रोधी का काम हो सकता था? शिवजी को प्रसन्न कर उनका चंद्रहास खड़्ग लेना क्या किसी अधर्मी के वश की बात थी? देवासुर संग्राम में जब मेघनाद ने इंद्र को पराजित किया, उस समय युद्ध में भगवान विष्णु और शिवजी ने भी भाग लिया था। वे भी क्या रावण को रोक पाये थे? ऐसा महाबली क्या भोग विलास में लिप्त रहनेवाला हो सकता है?
युद्ध के दौरान दोनों पक्षों ने शक्ति की पूजा की थी। मां ने दोनों को दर्शन दिये थे। पर राम को वरदान मिला, विजयी भव का, और रावण को कल्याण हो। रावण का कल्याण असुर योनी से मुक्ति में ही था। सबसे बड़ी बात यदि रावण बुराइयों का पुतला होता तो क्या सर्वज्ञ साक्षात विष्णु के अवतार, अपने ही अंश लक्ष्मण को रावण से ज्ञान लेने भेजते?
हमारे ऋषि-मुनिओं ने सदा अहंकार से दूर रहने की चेतावनी दी है। यह किसी भी रूप में हो सकता है, शक्ति का, रूप का, धन का यहां तक की भक्ति का भी। ऐसा जब-जब हुआ है, उसका फल अभिमानी को भुगतना पड़ा है। फिर वह चाहे इंद्र हो, नारद हो, कोई महर्षि हो या रावण हो। पर शायद रावण के साथ ही ऐसा हुआ है कि प्रायश्चित के बावजूद, सदियां गुजर जाने के बाद भी बदनामी ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है। आज भी उसे बुराईयों का पर्याय माना जाता है।
पर क्या यह उचित है ???
वैसे भी सीता हरण उसकी मजबूरी थी। एक विश्व विजेता की बहन का सरेआम अपमान हुआ और वह चुप्पी साध कर बैठा रहता तो क्या इज्जत रह जाती उसकी। इसके अलावा सिर्फ दो मानवों को मारने के लिए यदि वह अपनी सेना भेजता तो यह भी किसी तरह उसकी ख्याति के लायक बात नहीं थी। यह काम भी उसके अपमान का सबब बनता।
पर रावण की योजना उस समय विफल हो गयी जब हनुमानजी ने राम-सुग्रीव की मैत्री का गठबंधन करवा दिया। उसके बाद अलंघ्य सागर ने भी राम की सेना को मार्ग दे दिया। फिर भी वह महान योद्धा विचलित नहीं हुआ। एक-एक कर अपने प्रियजनों की मृत्यु पर भी उसने बदले की भावना के वश सीताजी को क्षति पहुंचाने का उपक्रम नहीं किया।
विभिन्न कथाकारों ने रावण को कामी, क्रोधी, दंभी तथा निरंकुश शासक निरुपित किया है। पर ध्यान देने की बात है कि जिसमें इतने अवगुण हों वह क्या कभी देवताओं द्वारा पोषित उनके कोष के रक्षक कुबेर को परास्त कर अपनी लंका वापस ले सकता था? शिवजी के महाबली गण नंदी को परास्त करना क्या किसी कामी-क्रोधी का काम हो सकता था? शिवजी को प्रसन्न कर उनका चंद्रहास खड़्ग लेना क्या किसी अधर्मी के वश की बात थी? देवासुर संग्राम में जब मेघनाद ने इंद्र को पराजित किया, उस समय युद्ध में भगवान विष्णु और शिवजी ने भी भाग लिया था। वे भी क्या रावण को रोक पाये थे? ऐसा महाबली क्या भोग विलास में लिप्त रहनेवाला हो सकता है?
युद्ध के दौरान दोनों पक्षों ने शक्ति की पूजा की थी। मां ने दोनों को दर्शन दिये थे। पर राम को वरदान मिला, विजयी भव का, और रावण को कल्याण हो। रावण का कल्याण असुर योनी से मुक्ति में ही था। सबसे बड़ी बात यदि रावण बुराइयों का पुतला होता तो क्या सर्वज्ञ साक्षात विष्णु के अवतार, अपने ही अंश लक्ष्मण को रावण से ज्ञान लेने भेजते?
हमारे ऋषि-मुनिओं ने सदा अहंकार से दूर रहने की चेतावनी दी है। यह किसी भी रूप में हो सकता है, शक्ति का, रूप का, धन का यहां तक की भक्ति का भी। ऐसा जब-जब हुआ है, उसका फल अभिमानी को भुगतना पड़ा है। फिर वह चाहे इंद्र हो, नारद हो, कोई महर्षि हो या रावण हो। पर शायद रावण के साथ ही ऐसा हुआ है कि प्रायश्चित के बावजूद, सदियां गुजर जाने के बाद भी बदनामी ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है। आज भी उसे बुराईयों का पर्याय माना जाता है।
पर क्या यह उचित है ???
क्या रावण सच में निंदा का पात्र है ?
महर्षि वाल्मिकी एक कवि तथा कथाकार के साथ-साथ इतिहासकार भी थे। राम और रावण उनके समकालीन थे। इसलिए उनके द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामायण’ यथार्थ के ज्यादा करीब माना जाता है। बाकी जितनों ने भी राम कथा की रचना की है, उस पर समकालीन माहौल, सोच तथा जनता की भावनाओं का प्रभाव अपनी छाप छोड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तुलसीदास कृत राम चरित मानस है। तुलसी दास के आराध्य श्री राम रहे हैं तो उनके चरित्र का महिमामंडित होना स्वाभाविक है। परन्तु वाल्मिकीजी राम और रावण के समकालीन थे सो उन्होंने राम के साथ-साथ रावण का भी अद्भुत रूप से चरित्र चित्रण किया है। उनके अनुसार ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य और पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की चार संतानों में रावण अग्रज था। इस प्रकर वह ब्रह्माजी का वंशज था।
महर्षि कश्यप की पत्नियां, अदिति जो देवताओं की जननी थीं और दिति जिन्होंने दानवों को जन्म दिया था, आपस में बहनें थीं। इस प्रकार सुर और असुर सौतेले भाई थे। विचारों, परिवेश तथा माहौल इत्यादि के अलग होने के कारण उनका कभी भी मतैक्य नहीं हो पाया। जिससे सदा अनबन बनी रहती थी जिसके फलस्वरूप युद्ध होते रहते थे। जिनमें ज्यादातर दैत्यों की पराजय होती थी। दैत्यों के पराभव को देख कर रावण ने दीर्घ तथा कठोर तप कर ब्रह्माजी से तरह-तरह के वरदान प्राप्त कर लिए थे एवं उन्हीं के प्रभाव से शक्तिशाली हो अपने नाना की नगरी लंका पर फिर से अधिकार कर लिया था। उसने लंका को स्वर्ग से भी सुंदर, अभेद्य तथा सुरक्षित बना दिया था। उसके राज में नागरिक सुखी, संपन्न तथा खुशहाल थे। लंका के वैभव का यह हाल था कि जब हनुमानजी सीताजी की खोज में वहां गये तो उन जैसा ज्ञानी भी वहां का वैभव और सौंदर्य देख ठगा सा रह गया था।
वाल्मिकी रामायण में रावण एक वीर, धर्मात्मा, ज्ञानी, नीति तथा राजनीति शास्त्र का ज्ञाता, वैज्ञानिक, ज्योतिषाचार्य, रणनीति में निपुण, स्वाभिमानी, परम शिव भक्त तथा महान योद्धा निरुपित है। उसका एक ही दुर्गुण था अभिमान, अपनी शक्ति का अहम जो अंतत: उसके विनाश का कारण बना। यदि निष्पक्ष रूप से कथा का विवेचन किया जाए तो साफ देखा जा सकता है कि रावण का चरित्र उस तरह का नहीं था जैसा कालांतर में लोगों में बन गया या बना दिया गया।
श्री राम ने लंका की तरफ बढ़ते हुए तेरह सालों में अनगिनत राक्षसों का वध किया था पर कभी भी आवेश में या क्रोधावश रावण ने राम से युद्ध करने की कोशिश नहीं की। जब देवताओं ने देखा कि कोई भी उपाय रावण को उत्तेजित नहीं कर पा रहा है तो उन्होंने शूर्पणखा कांड की रचना की। वह अभागिन, मंद बुद्धि राक्षस कन्या अपने भाई के समूचे परिवार के नाश का कारण बनी। उसको बदसूरत किया जाना रावण को खुली चुन्नौती थी। पर रावण ने फिर भी धैर्य नहीं खोया था।
*बाकी कल दशहरे के दिन---------
महर्षि कश्यप की पत्नियां, अदिति जो देवताओं की जननी थीं और दिति जिन्होंने दानवों को जन्म दिया था, आपस में बहनें थीं। इस प्रकार सुर और असुर सौतेले भाई थे। विचारों, परिवेश तथा माहौल इत्यादि के अलग होने के कारण उनका कभी भी मतैक्य नहीं हो पाया। जिससे सदा अनबन बनी रहती थी जिसके फलस्वरूप युद्ध होते रहते थे। जिनमें ज्यादातर दैत्यों की पराजय होती थी। दैत्यों के पराभव को देख कर रावण ने दीर्घ तथा कठोर तप कर ब्रह्माजी से तरह-तरह के वरदान प्राप्त कर लिए थे एवं उन्हीं के प्रभाव से शक्तिशाली हो अपने नाना की नगरी लंका पर फिर से अधिकार कर लिया था। उसने लंका को स्वर्ग से भी सुंदर, अभेद्य तथा सुरक्षित बना दिया था। उसके राज में नागरिक सुखी, संपन्न तथा खुशहाल थे। लंका के वैभव का यह हाल था कि जब हनुमानजी सीताजी की खोज में वहां गये तो उन जैसा ज्ञानी भी वहां का वैभव और सौंदर्य देख ठगा सा रह गया था।
वाल्मिकी रामायण में रावण एक वीर, धर्मात्मा, ज्ञानी, नीति तथा राजनीति शास्त्र का ज्ञाता, वैज्ञानिक, ज्योतिषाचार्य, रणनीति में निपुण, स्वाभिमानी, परम शिव भक्त तथा महान योद्धा निरुपित है। उसका एक ही दुर्गुण था अभिमान, अपनी शक्ति का अहम जो अंतत: उसके विनाश का कारण बना। यदि निष्पक्ष रूप से कथा का विवेचन किया जाए तो साफ देखा जा सकता है कि रावण का चरित्र उस तरह का नहीं था जैसा कालांतर में लोगों में बन गया या बना दिया गया।
श्री राम ने लंका की तरफ बढ़ते हुए तेरह सालों में अनगिनत राक्षसों का वध किया था पर कभी भी आवेश में या क्रोधावश रावण ने राम से युद्ध करने की कोशिश नहीं की। जब देवताओं ने देखा कि कोई भी उपाय रावण को उत्तेजित नहीं कर पा रहा है तो उन्होंने शूर्पणखा कांड की रचना की। वह अभागिन, मंद बुद्धि राक्षस कन्या अपने भाई के समूचे परिवार के नाश का कारण बनी। उसको बदसूरत किया जाना रावण को खुली चुन्नौती थी। पर रावण ने फिर भी धैर्य नहीं खोया था।
*बाकी कल दशहरे के दिन---------
"मां सिद्धिदात्री" देवी दुर्गा का नौवां स्वरूप
नवरात्र-पूजन के नवें दिन "मां सिद्धिदात्री" की पूजा का विधान है।मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व , ये आठ प्रकार की सिद्धियां होती हैं। मां इन सभी प्रकार की सिद्धियों को देनेवाली हैं। इनकी उपासना पूर्ण कर लेने पर भक्तों और साधकों की लौकिक-परलौकिक कोई भी कामना अधुरी नहीं रह जाती। परन्तु मां सिद्धिदात्री के कृपापात्रों के मन में किसी तरह की इच्छा बची भी नही रह जाती है। वह विषय-भोग-शून्य हो जाता है। मां का सानिध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। संसार में व्याप्त समस्त दुखों से छुटकारा पाकर इस जीवन में सुख भोग कर मोक्ष को भी प्राप्त करने की क्षमता आराधक को प्राप्त हो जाती है। इस अवस्था को पाने के लिए निरंतर नियमबद्ध रह कर मां की उपासना करनी चाहिए।
मां सिद्धिदात्री कमलासन पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपरवाले दाहिने हाथ में गदा तथा नीचेवाले दाहिने हाथ में चक्र है। ऊपरवाले बायें हाथ में कमल पुष्प तथा नीचेवाले हाथ में शंख है। इनका वाहन सिंह है। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव को भी इन्हीं की कृपा से ही सारी सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। इनकी ही अनुकंपा से शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था और वे "अर्धनारीश्वर" कहलाये थे।
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सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
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देखते-देखते मां की विदाई का समय आ गया। आज अपने बच्चों पर आशिषों की वर्षा कर वे अपने धाम चली जाएंगी। भक्तों की आखों में आंसू होंगे पर ऐसा लगेगा जैसे मां कह रही हों कि मैं तुमसे दूर भला कहां हूं। मां अपने बच्चों से अलग कहां रह सकती है। बच्चे ही मां को याद नहीं रखते मां कहां भूल पाती है किसी को।
आईए हम सब मिलकर प्रार्थना करें, कि मां इसी तरह हर साल आ कर हमें स्वस्थ, सुखी, शान्तियुक्त पाती रहें। हम कभी उनके चरणों के ध्यान को ना बिसराएं। आमीन।
मां सिद्धिदात्री कमलासन पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपरवाले दाहिने हाथ में गदा तथा नीचेवाले दाहिने हाथ में चक्र है। ऊपरवाले बायें हाथ में कमल पुष्प तथा नीचेवाले हाथ में शंख है। इनका वाहन सिंह है। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव को भी इन्हीं की कृपा से ही सारी सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। इनकी ही अनुकंपा से शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था और वे "अर्धनारीश्वर" कहलाये थे।
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सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
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देखते-देखते मां की विदाई का समय आ गया। आज अपने बच्चों पर आशिषों की वर्षा कर वे अपने धाम चली जाएंगी। भक्तों की आखों में आंसू होंगे पर ऐसा लगेगा जैसे मां कह रही हों कि मैं तुमसे दूर भला कहां हूं। मां अपने बच्चों से अलग कहां रह सकती है। बच्चे ही मां को याद नहीं रखते मां कहां भूल पाती है किसी को।
आईए हम सब मिलकर प्रार्थना करें, कि मां इसी तरह हर साल आ कर हमें स्वस्थ, सुखी, शान्तियुक्त पाती रहें। हम कभी उनके चरणों के ध्यान को ना बिसराएं। आमीन।
मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008
आविष्कार की मां का नाम आवश्यकता है
इस शीर्षक को जापानियों ने सही ठहराया है, अपने मछली प्रेम से।
है ना, तीन इंच की जबान के लिए दुनिया भर की भाग-दौड़।
जापानियों का मछली प्रेम जग जाहिर है। परन्तु वे व्यंजन से ज्यादा उसके ताजेपन को अहमियत देते हैं। परन्तु आज कल प्रदुषण के कारण समुद्री तट के आसपास मछलियों का मिलना लगभग खत्म हो गया है। इसलिए मछुवारों को गहरे समुद्र की ओर जाना पड़ता था। इससे मछलियां तो काफी तादाद में मिल जाती थीं, पर आने-जाने में लगने वाले समय से उनका ताजापन खत्म हो जाता था। मेहनत ज्यादा बिक्री कम, मछुवारे परेशान। फिर इसका एक हल निकाला गया। नौकाओं में फ्रिजरों का इंतजाम किया गया, मछली पकड़ी, फ्रिजर में रख दी, बासी होने का डर खत्म। मछुवारे खुश क्योंकि इससे उन्हें और ज्यादा शिकार करने का समय मिलने लग गया। परन्तु वह समस्या ही क्या जो ना आए। जापानिओं को ज्यादा देर तक फ्रिज की गयी मछलियों का स्वाद नागवार गुजरने लगा। मछुए फिर परेशान। पर मछुवारों ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने नौका में बड़े-बड़े बक्से बनवाए और उनमें पानी भर कर मछलियों को जिन्दा छोड़ दिया। मछलियां ग्राहकों तक फिर ताजा पहुंचने लगीं। पर वाह रे जापानी जिव्हो, उन्हे फिर स्वाद में कमी महसूस होने लगी। क्योंकि ठहरे पानी में कुछ ही देर मेँ मछलियां सुस्त हो जाती थीं और इस कारण उनके स्वाद में फ़र्क आ जाता था। पर जुझारु जापानी मछुवारों ने हिम्मत नहीं हारी और एक ऐसी तरकीब इजाद की, जिससे अब तक खानेवाले और खिलानेवाले दोनों खुश हैं। इस बार उन्होंने मछलियों की सुस्ती दूर करने के लिए उन बड़े-बड़े बक्सों में एक छोटी सी शार्क मछली डाल दी। अब उस शार्क का भोजन बनने से बचने के लिए मछलियां भागती रहती हैं और ताजी बनी रहती हैं। कुछ जरूर उसका आहार बनती हैं पर यह नुक्सान मछुवारों को भारी नहीं पड़ता।
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