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बुधवार, 8 अक्टूबर 2008

क्या रावण सच में निंदा का पात्र है ? आगे--------------

रावण ने धैर्य नहीं खोया। उस समय यदि वह चाहता तो अपने इन्द्र को जीतनेवाले बेटे तथा महाबली भाई कुम्भकर्ण के साथ अपनी दिग्विजयी सेना को भेज दोनो भाईयों को मरवा सकता था। हालांकि राम-लक्ष्मण ने खर दूषण का वध किया था, पर उनकी सेना और रावण की सेना में जमीन आसमान का फर्क था। जब हनुमानजी तथा और वानर वीरों के रहते युद्ध के दौरान इन दोनों पर घोर संकट आ सकता था तो उस समय तो दोनो भाई अकेले ही थे। पर रावण यह भी जानता था कि ये दोनो भाई साधारण मानव नहीं हैं और युद्ध की स्थिति में लंका को और उसके निवासियों को भी खतरा था। इसलिए रावण ने युद्ध टालने के लिए सीता हरण की योजना बनाई। उसका विश्वास था कि सीताजी के वियोग में यदि राम प्राण त्याग देते हैं तो लक्ष्मण का जिंदा रहना भी नामुमकिन होगा। सीताजी के हरण के पश्चात उसने उन्हें अपने महल में ना रख, अशोक वाटिका में महिला निरिक्षकों की निगरानी में ही रखा और कभी भी उनके पास अकेला बात करने नहीं गया।
वैसे भी सीता हरण उसकी मजबूरी थी। एक विश्व विजेता की बहन का सरेआम अपमान हुआ और वह चुप्पी साध कर बैठा रहता तो क्या इज्जत रह जाती उसकी। इसके अलावा सिर्फ दो मानवों को मारने के लिए यदि वह अपनी सेना भेजता तो यह भी किसी तरह उसकी ख्याति के लायक बात नहीं थी। यह काम भी उसके अपमान का सबब बनता।
पर रावण की योजना उस समय विफल हो गयी जब हनुमानजी ने राम-सुग्रीव की मैत्री का गठबंधन करवा दिया। उसके बाद अलंघ्य सागर ने भी राम की सेना को मार्ग दे दिया। फिर भी वह महान योद्धा विचलित नहीं हुआ। एक-एक कर अपने प्रियजनों की मृत्यु पर भी उसने बदले की भावना के वश सीताजी को क्षति पहुंचाने का उपक्रम नहीं किया।
विभिन्न कथाकारों ने रावण को कामी, क्रोधी, दंभी तथा निरंकुश शासक निरुपित किया है। पर ध्यान देने की बात है कि जिसमें इतने अवगुण हों वह क्या कभी देवताओं द्वारा पोषित उनके कोष के रक्षक कुबेर को परास्त कर अपनी लंका वापस ले सकता था? शिवजी के महाबली गण नंदी को परास्त करना क्या किसी कामी-क्रोधी का काम हो सकता था? शिवजी को प्रसन्न कर उनका चंद्रहास खड़्ग लेना क्या किसी अधर्मी के वश की बात थी? देवासुर संग्राम में जब मेघनाद ने इंद्र को पराजित किया, उस समय युद्ध में भगवान विष्णु और शिवजी ने भी भाग लिया था। वे भी क्या रावण को रोक पाये थे? ऐसा महाबली क्या भोग विलास में लिप्त रहनेवाला हो सकता है?
युद्ध के दौरान दोनों पक्षों ने शक्ति की पूजा की थी। मां ने दोनों को दर्शन दिये थे। पर राम को वरदान मिला, विजयी भव का, और रावण को कल्याण हो। रावण का कल्याण असुर योनी से मुक्ति में ही था। सबसे बड़ी बात यदि रावण बुराइयों का पुतला होता तो क्या सर्वज्ञ साक्षात विष्णु के अवतार, अपने ही अंश लक्ष्मण को रावण से ज्ञान लेने भेजते?
हमारे ऋषि-मुनिओं ने सदा अहंकार से दूर रहने की चेतावनी दी है। यह किसी भी रूप में हो सकता है, शक्ति का, रूप का, धन का यहां तक की भक्ति का भी। ऐसा जब-जब हुआ है, उसका फल अभिमानी को भुगतना पड़ा है। फिर वह चाहे इंद्र हो, नारद हो, कोई महर्षि हो या रावण हो। पर शायद रावण के साथ ही ऐसा हुआ है कि प्रायश्चित के बावजूद, सदियां गुजर जाने के बाद भी बदनामी ने उसका पीछा नहीं छोड़ा है। आज भी उसे बुराईयों का पर्याय माना जाता है।
पर क्या यह उचित है ???

क्या रावण सच में निंदा का पात्र है ?

महर्षि वाल्मिकी एक कवि तथा कथाकार के साथ-साथ इतिहासकार भी थे। राम और रावण उनके समकालीन थे। इसलिए उनके द्वारा रचित महाकाव्य ‘रामायण’ यथार्थ के ज्यादा करीब माना जाता है। बाकी जितनों ने भी राम कथा की रचना की है, उस पर समकालीन माहौल, सोच तथा जनता की भावनाओं का प्रभाव अपनी छाप छोड़ता है। इसका सबसे बड़ा उदाहरण तुलसीदास कृत राम चरित मानस है। तुलसी दास के आराध्य श्री राम रहे हैं तो उनके चरित्र का महिमामंडित होना स्वाभाविक है। परन्तु वाल्मिकीजी राम और रावण के समकालीन थे सो उन्होंने राम के साथ-साथ रावण का भी अद्भुत रूप से चरित्र चित्रण किया है। उनके अनुसार ब्रह्मा के पुत्र पुलस्त्य और पुलस्त्य के पुत्र विश्रवा की चार संतानों में रावण अग्रज था। इस प्रकर वह ब्रह्माजी का वंशज था।
महर्षि कश्यप की पत्नियां, अदिति जो देवताओं की जननी थीं और दिति जिन्होंने दानवों को जन्म दिया था, आपस में बहनें थीं। इस प्रकार सुर और असुर सौतेले भाई थे। विचारों, परिवेश तथा माहौल इत्यादि के अलग होने के कारण उनका कभी भी मतैक्य नहीं हो पाया। जिससे सदा अनबन बनी रहती थी जिसके फलस्वरूप युद्ध होते रहते थे। जिनमें ज्यादातर दैत्यों की पराजय होती थी। दैत्यों के पराभव को देख कर रावण ने दीर्घ तथा कठोर तप कर ब्रह्माजी से तरह-तरह के वरदान प्राप्त कर लिए थे एवं उन्हीं के प्रभाव से शक्तिशाली हो अपने नाना की नगरी लंका पर फिर से अधिकार कर लिया था। उसने लंका को स्वर्ग से भी सुंदर, अभेद्य तथा सुरक्षित बना दिया था। उसके राज में नागरिक सुखी, संपन्न तथा खुशहाल थे। लंका के वैभव का यह हाल था कि जब हनुमानजी सीताजी की खोज में वहां गये तो उन जैसा ज्ञानी भी वहां का वैभव और सौंदर्य देख ठगा सा रह गया था।
वाल्मिकी रामायण में रावण एक वीर, धर्मात्मा, ज्ञानी, नीति तथा राजनीति शास्त्र का ज्ञाता, वैज्ञानिक, ज्योतिषाचार्य, रणनीति में निपुण, स्वाभिमानी, परम शिव भक्त तथा महान योद्धा निरुपित है। उसका एक ही दुर्गुण था अभिमान, अपनी शक्ति का अहम जो अंतत: उसके विनाश का कारण बना। यदि निष्पक्ष रूप से कथा का विवेचन किया जाए तो साफ देखा जा सकता है कि रावण का चरित्र उस तरह का नहीं था जैसा कालांतर में लोगों में बन गया या बना दिया गया।
श्री राम ने लंका की तरफ बढ़ते हुए तेरह सालों में अनगिनत राक्षसों का वध किया था पर कभी भी आवेश में या क्रोधावश रावण ने राम से युद्ध करने की कोशिश नहीं की। जब देवताओं ने देखा कि कोई भी उपाय रावण को उत्तेजित नहीं कर पा रहा है तो उन्होंने शूर्पणखा कांड की रचना की। वह अभागिन, मंद बुद्धि राक्षस कन्या अपने भाई के समूचे परिवार के नाश का कारण बनी। उसको बदसूरत किया जाना रावण को खुली चुन्नौती थी। पर रावण ने फिर भी धैर्य नहीं खोया था।
*बाकी कल दशहरे के दिन---------

"मां सिद्धिदात्री" देवी दुर्गा का नौवां स्वरूप

नवरात्र-पूजन के नवें दिन "मां सिद्धिदात्री" की पूजा का विधान है।मार्कण्डेयपुराण के अनुसार अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा, प्राप्ति, प्राकाम्य, इशित्व और वशित्व , ये आठ प्रकार की सिद्धियां होती हैं। मां इन सभी प्रकार की सिद्धियों को देनेवाली हैं। इनकी उपासना पूर्ण कर लेने पर भक्तों और साधकों की लौकिक-परलौकिक कोई भी कामना अधुरी नहीं रह जाती। परन्तु मां सिद्धिदात्री के कृपापात्रों के मन में किसी तरह की इच्छा बची भी नही रह जाती है। वह विषय-भोग-शून्य हो जाता है। मां का सानिध्य ही उसका सर्वस्व हो जाता है। संसार में व्याप्त समस्त दुखों से छुटकारा पाकर इस जीवन में सुख भोग कर मोक्ष को भी प्राप्त करने की क्षमता आराधक को प्राप्त हो जाती है। इस अवस्था को पाने के लिए निरंतर नियमबद्ध रह कर मां की उपासना करनी चाहिए।
मां सिद्धिदात्री कमलासन पर विराजमान हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपरवाले दाहिने हाथ में गदा तथा नीचेवाले दाहिने हाथ में चक्र है। ऊपरवाले बायें हाथ में कमल पुष्प तथा नीचेवाले हाथ में शंख है। इनका वाहन सिंह है। देवी पुराण के अनुसार भगवान शिव को भी इन्हीं की कृपा से ही सारी सिद्धियों की प्राप्ति हुई थी। इनकी ही अनुकंपा से शिवजी का आधा शरीर देवी का हुआ था और वे "अर्धनारीश्वर" कहलाये थे।
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सिद्धगन्धर्वयक्षाद्यैरसुरैरमरैरपि ।
सेव्यमाना सदा भूयात सिद्धिदा सिद्धिदायिनी।।
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देखते-देखते मां की विदाई का समय आ गया। आज अपने बच्चों पर आशिषों की वर्षा कर वे अपने धाम चली जाएंगी। भक्तों की आखों में आंसू होंगे पर ऐसा लगेगा जैसे मां कह रही हों कि मैं तुमसे दूर भला कहां हूं। मां अपने बच्चों से अलग कहां रह सकती है। बच्चे ही मां को याद नहीं रखते मां कहां भूल पाती है किसी को।
आईए हम सब मिलकर प्रार्थना करें, कि मां इसी तरह हर साल आ कर हमें स्वस्थ, सुखी, शान्तियुक्त पाती रहें। हम कभी उनके चरणों के ध्यान को ना बिसराएं। आमीन।

मंगलवार, 7 अक्टूबर 2008

आविष्कार की मां का नाम आवश्यकता है

इस शीर्षक को जापानियों ने सही ठहराया है, अपने मछली प्रेम से।

जापानियों का मछली प्रेम जग जाहिर है। परन्तु वे व्यंजन से ज्यादा उसके ताजेपन को अहमियत देते हैं। परन्तु आज कल प्रदुषण के कारण समुद्री तट के आसपास मछलियों का मिलना लगभग खत्म हो गया है। इसलिए मछुवारों को गहरे समुद्र की ओर जाना पड़ता था। इससे मछलियां तो काफी तादाद में मिल जाती थीं, पर आने-जाने में लगने वाले समय से उनका ताजापन खत्म हो जाता था। मेहनत ज्यादा बिक्री कम, मछुवारे परेशान। फिर इसका एक हल निकाला गया। नौकाओं में फ्रिजरों का इंतजाम किया गया, मछली पकड़ी, फ्रिजर में रख दी, बासी होने का डर खत्म। मछुवारे खुश क्योंकि इससे उन्हें और ज्यादा शिकार करने का समय मिलने लग गया। परन्तु वह समस्या ही क्या जो ना आए। जापानिओं को ज्यादा देर तक फ्रिज की गयी मछलियों का स्वाद नागवार गुजरने लगा। मछुए फिर परेशान। पर मछुवारों ने भी हार नहीं मानी। उन्होंने नौका में बड़े-बड़े बक्से बनवाए और उनमें पानी भर कर मछलियों को जिन्दा छोड़ दिया। मछलियां ग्राहकों तक फिर ताजा पहुंचने लगीं। पर वाह रे जापानी जिव्हो, उन्हे फिर स्वाद में कमी महसूस होने लगी। क्योंकि ठहरे पानी में कुछ ही देर मेँ मछलियां सुस्त हो जाती थीं और इस कारण उनके स्वाद में फ़र्क आ जाता था। पर जुझारु जापानी मछुवारों ने हिम्मत नहीं हारी और एक ऐसी तरकीब इजाद की, जिससे अब तक खानेवाले और खिलानेवाले दोनों खुश हैं। इस बार उन्होंने मछलियों की सुस्ती दूर करने के लिए उन बड़े-बड़े बक्सों में एक छोटी सी शार्क मछली डाल दी। अब उस शार्क का भोजन बनने से बचने के लिए मछलियां भागती रहती हैं और ताजी बनी रहती हैं। कुछ जरूर उसका आहार बनती हैं पर यह नुक्सान मछुवारों को भारी नहीं पड़ता।

है ना, तीन इंच की जबान के लिए दुनिया भर की भाग-दौड़।

"महागौरी", महाशक्ति का आठवां स्वरूप

आज नवरात्रों का आठवां दिन है। आज के दिन दुर्गा माता के "महागौरी" स्वरूप की पूजा होती है। पुराणों के अनुसार मां पार्वती ने भगवान शिव को पति के रूप में पाने के लिए घोर तपस्या की थी जिसके कारण इनके शरीर का रंग एकदम काला पड़ गया था। शिवजी ने इनकी भक्ति से प्रसन्न होकर खुद इनके शरीर को गंगाजी के पवित्र जल से धोया जिससे इनका वर्ण विद्युत-प्रभा की तरह कांतिमान, उज्जवल व गौर हो गया। तभी से इनका नाम महागौरी पड़ा।
इनकी आयु आठ वर्ष की मानी जाती है। इनके समस्त वस्त्र, आभूषण आदि भी श्वेत हैं। इनकी चार भुजाएं हैं। ऊपर का दाहिना हाथ अभय मुद्रा में है और नीचेवाले दाहिने हाथ में त्रिशुल है। ऊपरवाले बायें हाथ में डमरू और नीचे का बायां हाथ वर मुद्रा में है। मां शांत मुद्रा में हैं। ये अमोघ शक्तिदायक एवं शीघ्र फल देनेवालीं हैं। इनका वाहन वृषभ है।
भक्तजनों द्वारा मां गौरी की पूजा, आराधना तथा ध्यान सर्वत्र किया जाता है। इस कल्याणकारी पूजन से मनुष्य के आचरण से सयंम व दुराचरण दूर हो परिवार तथा समाज का उत्थान होता है। कुवांरी कन्याओं को सुशील वर तथा विवाहित महिलाओं के दाम्पत्य सुख में वृद्धि होती है। इनकी उपासना से पूर्व संचित पाप तो नष्ट होते ही हैं भविष्य के संताप, कष्ट, दैन्य, दुख भी पास नहीं फटकते हैं। इनका सदा ध्यान करना सर्वाधिक कल्याणकारी है।
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श्वेते वृषे समारूढा श्वेताम्बरधरा शुचि:।
महागौरी शुभं दद्यान्महादेवप्रमोददा ।।
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सोमवार, 6 अक्टूबर 2008

"मां कालरात्रि," देवी दुर्गा का सातवां स्वरुप

माँ दुर्गा जी की सातवीं शक्ति "कालरात्रि" के नाम से जानी जाती हैं। इनके शरीर का रंग घने अन्धकार की तरह एकदम काला है। सर के बाल बिखरे हुए हैं। गले में बिजली की तरह चमकने वाली माला है। इनके तीन नेत्र हैं। नासिका से अग्नी की भयंकर ज्वालायें निकलती रहती हैं। इनके चार हाथ हैं। उपरवाला दाहिना हाथ वरमुद्रा के रूप में उठा हुआ है तथा नीचेवाला अभयमुद्रा में है। उपरवाले बांयें हाथ में कांटा तथा नीचेवाले हाथ में खड़्ग धारण की हुई हैं। इनका स्वरूप अत्यंत भयानक है। परन्तु ये सदा शुभ फल देनेवाली हैं। इसी के कारण इनका एक नाम "शुभंकरी" भी है। इनका वाहन गर्दभ (गधा) है।
मां कालरात्रि दुष्टों का दमन करनेवाली हैं। इनके स्मर्ण मात्र से ही दैत्य, दानव, भूत-प्रेत आदि बलायें भाग जाती हैं। इनकी आराधना से अग्निभय, जलभय, जंतुभय, शत्रुभय यानि किसी तरह का डर नही रह जाता है।
इस दिन साधक को अपना मन 'सहस्त्रार चक्र में अवस्थित कर आराधना करने का विधान है। इससे उसके लिए ब्रह्माण्ड की समस्त सिद्धियों के द्वार खुल जाते हैं। उसके समस्त पापों का नाश हो जाता है और अक्षय पुण्यों की प्राप्ति होती है।
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एकवेणी जपाकर्णपूरा नग्ना खरास्थिता । लम्बोष्ठी कर्णिकाकर्णी तैलाभ्यक्तशरीरिणी ।। वामपादोल्लसल्लोहलताकण्टकभूषणा। वर्धनमूर्धध्वजा कृष्णा कालरात्रीर्भयंकारी।।
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रविवार, 5 अक्टूबर 2008

चलते क्या हरिद्वार

चलिए इस बार हरिद्वार चलते हैं। छुट्टियां हैं, मौसम भी अच्छा है तथा सब से बड़ी बात, यहां जाना बाकि के तीर्थों से सबसे सुगम है। यह सड़क मार्ग से देश के प्राय: सभी नगरों से जुड़ा हुआ तो है ही, रेल मार्ग भी इसे देश के बहुतेरे हिस्सों से जोड़ता है। यहां रहने-खाने की हर तरह की व्यवस्था है। पर्यटन की दृष्टि से सितम्बर मध्य से अप्रैल अंत तक का समय उम्दा रहता है।
हरिद्वार का पौराणिक नाम 'मायापुर है। इसे सप्तपुरियों में स्थान प्राप्त है। हर बारहवें वर्ष, जब सूर्य और चंद्रमा मेष राशि में तथा बृहस्पति कुंभ राशि में आते हैं, तब यहां कुंभ का मेला लगता है। हिमालय की तराई में स्थित हरिद्वार में ही गंगा, पहली बार समतल जमीन पर बहना शुरु करती है। पुराणों के अनुसार गंगा स्नान का सर्वाधिक महत्व गंगोत्री, हरिद्वार, प्रयाग तथा गंगासागर में होता है। यहीं से उत्तराखंड की यात्रा प्रारंभ की जाती है।
हरिद्वार का पर्याय है 'हर की पौडी'। इसी विश्वप्रसिद्ध घाट पर कुंभ का मेला लगता है। यह एक विशाल कुंड सा है, जिसमें सदा कमर तक पानी रहता है। गंगा की मुख्य धारा से अलग हो उसकी एक शाखा इस कुंड से होकर प्रवाहित होती है। इसे ब्रह्मकुंड के नाम से भी जाना जाता है। इसी के निकट गंगा देवी का तथा अन्य कुछ मंदिर भी हैं। सूर्यास्त के समय यहां रोज गंगाजी की आरती की जाती है, उस समय नदी में प्रवाहित किए जाने वाले दीपक एक अलौकिक दृश्य उत्पन्न करते हैं। जिसका अनुभव सुन कर नहीं देख कर ही किया जा सकता है।
हरिद्वार या हरद्वार अपने आप में ही पूर्ण दर्शनीय स्थान है। फिर भी यहां पुराने और नये बहुत से स्थल देखे बिना नहीं लौटना चाहिए। इनमेँ प्रमुख हैं :- मनसा देवी का मंदिर, भीमगोड़ा तालाब , माया देवी का मंदिर, गुरुकुल कांगडी विश्वविद्यालय, चंडी देवी का मंदिर, सप्तऋषि आश्रम, दक्ष प्रजापति का मंदिर, परमार्थ आश्रम, भारत माता मंदिर इत्यादि-इत्यादि-इत्यादि। योग गुरु स्वामी रामदेवजी का विशाल सर्वसुविधायुक्त, आयुर्वेदिक चिकित्सा केन्द्र 'पतंजलि योगपीठ' भी यहीं स्थित है।
जैसे-जैसे आवागमन आसान तथा सुलभ होता गया है वैसे-वैसे शहरीपन भी इस धार्मिक स्थल पर अपनी छाप छोड़ने लगा है। पहले लोग धार्मिक कर्म-कांडों के लिए या तीर्थ का लाभ पाने के लिए यहां जाया करते थे। परन्तु अब लोगों के हनीमून मनाने के स्थानों में भी इसका नाम शुमार हो गया है। बढ़ती आबादी का असर यहां भी अपने पैर पसार रहा है। वही भीड़-भाड़, शोर- शराबा, हल्ला-गुल्ला यहां के रोजमर्रा के अंग बनते जा रहे हैं। फिर भी इसका प्राकृतिक सौंदर्य अपनी जगह है। इसलिए जब कभी भी मौका मिले तो जाने से मत चूकिएगा।

विशिष्ट पोस्ट

दिल्ली पुलिस तुम्हें सलाम 🙏

पुलिस जिसका नाम ही काफी है ! उसका एक जवान यदि किसी मरघिल्ले को पांच सेकेंड भी घूर कर देख ले तो उसका वस्त्र गीला-पीला हो जाए ! सिर्फ एक बार स...