पुराणों के अनुसार महर्षि 'कत' के पुत्र 'ऋषि कात्य' के गोत्र में महान 'महर्षि कात्यायन' का जन्म हुआ था। इन्होंने मां भगवती की कठोर तपस्या की थी। जब दानव महिषासुर का संहार करने के लिये, त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु तथा महेश ने अपने तेज का एक-एक अंश देकर देवी को उत्पन्न किया था तब महर्षि कात्यायन ने ही सर्वप्रथम इनकी पूजा की थी। इसी कारणस्वरूप ये कात्यायनी कहलायीं।
इनका स्वरूप अत्यंत हीभव्य व दिव्य है। इनका वर्ण सोने के समान चमकीला तथा तेजोमय है। इनकी चार भुजाएं हैं। मां का उपरवाला दाहिना हाथ अभयमुद्रा में तथा नीचेवाला वरमुद्रा में है। बायीं तरफ के उपरवाले हाथ में तलवार और नीचेवाले हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। इनका वाहन सिंह है।
मां कात्यायनी अमोघ फल देनेवाली हैं। इनकी आराधना करने से जीवन में कोई कष्ट नहीं रहता। इस दिन साधक मन को 'आज्ञा चक्र' में स्थित कर मां की उपासना करते हैं। जिससे उन्हें हर तरह के संताप से मुक्त हो परमांनंद की प्राप्ति होती है।
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चन्द्रहासोज्वलकरा शार्दूल वरवाहना ।
कात्यायनी शुभ दद्याद्देवी दानवघातिनी ।।
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इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
रविवार, 5 अक्टूबर 2008
शनिवार, 4 अक्टूबर 2008
मां दुर्गा का पांचवां स्वरुप "स्कन्दमाता"
नवरात्रि के पांचवें दिन मां दुर्गा के "स्कन्दमाता" स्वरुप की आराधना की जाती है। स्कन्द, भगवान कार्तिकेय का ही एक नाम है। इन्हीं की माता होने के कारण मां दुर्गा को स्कन्दमाता के नाम से भी जाना जाता है। इनकी चार भुजाएं हैं। अपनी दाहिनी भुजा में इन्होंने भगवान् कार्तिक को बाल रुप में उठा रखा है, दुसरी भुजा अभय मुद्रा में उठी हुई है तथा बाकि दोनों हाथों में कमल-पुष्प है। इनका वर्ण शुभ्र है। ये कमल के आसन पर विराजमान रहती हैं। सिंह भी इनका वाहन है।
इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं तथा उसे परम शांति और सुख की प्राप्ति होती है। स्कन्दमाता की आराधना से बालरुप स्कन्द भगवान की भी उपासना अपने आप हो जाती है। नवरात्रि की पंचमी को स्कन्दमाता की आराधना करते समय साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक भी अलौकिक तेज व कांति से संपन्न हो जाता है।
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सिंहासनम्ता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।
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इनकी उपासना से भक्त की सारी इच्छाएं पूरी हो जाती हैं तथा उसे परम शांति और सुख की प्राप्ति होती है। स्कन्दमाता की आराधना से बालरुप स्कन्द भगवान की भी उपासना अपने आप हो जाती है। नवरात्रि की पंचमी को स्कन्दमाता की आराधना करते समय साधक का मन विशुद्ध चक्र में अवस्थित होना चाहिए। सूर्यमंडल की अधिष्ठात्री देवी होने के कारण इनका उपासक भी अलौकिक तेज व कांति से संपन्न हो जाता है।
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सिंहासनम्ता नित्यं पद्माश्रितकरद्वया ।
शुभदास्तु सदा देवी स्कन्दमाता यशस्विनी।।
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शुक्रवार, 3 अक्टूबर 2008
'मां कूष्माण्डा', दुर्गा माता का चौथा स्वरूप
जब सृष्टि का अस्तित्व नहीं था, चारों ओर सिर्फ़ अंधकार ही अंधकार था, तब "मां कूष्माण्डा" के सहयोग से ही ब्रह्माण्ड की रचना संभव हो पायी थी। इनकी मंद हंसी द्वारा ब्रह्माण्ड के उत्पन्न होने के कारण इनका नाम कूष्माण्डा देवी अभिहित किया गया। यही सृष्टि की आदि शक्ति हैं। इनका निवास सूर्य लोक में माना जाता है। इनके शरीर की कांति, रंगत व प्रभा सूर्य के समान ही तेजोमय है। कोई भी देवी-देवता इनके तेज और प्रभाव की समानता नहीं कर सकता। इन्हीं के तेज से दसों दिशाएं प्रकाशमान होती हैं। इनके आठ हाथ हैं, जिनमें कमण्डल,धनुष, बाण, कमल, कलश, चक्र तथा गदा हैं। आठवें हाथ में सिद्धियां प्रदान करने वाली जप माला है। इनका वाहन सिंह है।
इनकी आराधना से यश,बल आयु तथा आरोग्य प्राप्त होता है। सभी प्रकार की सिद्धियां इनके आशिर्वाद से सुलभ हो जाती हैं। चूंकि ये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारण हैं इसलिए संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले को मां कूष्माण्डा की पूजा अर्चना करने से लाभ होता है। इस दिन साधक का मन 'अनाहत चक्र' में अवस्थित होता है। सच्चे मन से इनकी शरण में जाने से मनुष्य को परमपद प्राप्त हो जाता है।
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सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हरतपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।
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इनकी आराधना से यश,बल आयु तथा आरोग्य प्राप्त होता है। सभी प्रकार की सिद्धियां इनके आशिर्वाद से सुलभ हो जाती हैं। चूंकि ये ब्रह्माण्ड की उत्पत्ति का कारण हैं इसलिए संतान प्राप्ति की कामना रखने वाले को मां कूष्माण्डा की पूजा अर्चना करने से लाभ होता है। इस दिन साधक का मन 'अनाहत चक्र' में अवस्थित होता है। सच्चे मन से इनकी शरण में जाने से मनुष्य को परमपद प्राप्त हो जाता है।
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सुरासम्पूर्णकलशं रूधिराप्लुतमेव च ।
दधाना हरतपद्माभ्यां कूष्माण्डा शुभदास्तु मे।।
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गुरुवार, 2 अक्टूबर 2008
छोटे कद पर विराट व्यक्तित्व के धनी शास्त्रीजी
एक ही दिन जन्मदिन होने के कारण छोटे कद पर विराट व्यक्तित्व के धनी शास्त्रीजी को वह सम्मान नहीं मिल पाता, जिसके वह हकदार रहे हैं। वैसे भी वह चमकदार मेहराबों के बनिस्पत नींव का पत्थर होना ज्यादा पसंद करते थे। उनकी सादगी को दर्शाते ये दो संस्मरण उस समय के हैं, जब वे प्रधान मंत्री थे।
एक बार देश की एक बड़ी कपहा बनाने वाली कंपनी ने ललिताजी के लिए कुछ सिल्क की साड़ियां उपहार स्वरुप देने की पेशकश की। साड़ियां काफी खुबसूरत तथा मुल्यवान थीं। शास्त्रीजी ने उनकी कीमत पूछी, जब काफी जोर देने पर उन्हें कीमत बताई गयी तो उन्होंने यह कह कर साफ मना कर दिया कि मेरी तन्ख्वाह इतनी नहीं है कि मैं इतनी मंहगी साड़ी ललिताजी के लिए ले सकूं, और अपने निर्णय पर वे अटल रहे।
एक बार उनके बड़े बेटे हरिकिशनजी को एक ख्याति प्राप्त घराने से अच्छे पद का प्रस्ताव मिला, उन्होंने शास्त्रीजी से अनुमती चाही, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह नौकरी मेरे प्रधान मंत्री होने के कारण तुम्हें दी जा रही है, यदि तुम समझते हो कि तुम इस पद के साथ न्याय कर पाओगे और तुम इस के लायक हो तो मुझे कोई आपत्ती नहीं है। हरिकिशनजी ने भी वह प्रस्ताव तुरंत नामंजूर कर दिया।इन्हीं आदर्शों की वजह से चाहे अंत समय तक उनका अपना कोई घर नहीं था नही ढ़ंग की गाड़ी थी, पर वे याद किए जाएंगें, जब तक भारत और उसका इतिहास रहेगा।
आज के वंशवादी, सत्ता पिपासु तथाकथित नेता क्या ऐसा सोच भी सकते हैं। जिनमें कुछ एक को छोड़ उनके राज्य के बाहर ही कोई उन्हें नहीं जानता और ना जानना चाहता है.
एक बार देश की एक बड़ी कपहा बनाने वाली कंपनी ने ललिताजी के लिए कुछ सिल्क की साड़ियां उपहार स्वरुप देने की पेशकश की। साड़ियां काफी खुबसूरत तथा मुल्यवान थीं। शास्त्रीजी ने उनकी कीमत पूछी, जब काफी जोर देने पर उन्हें कीमत बताई गयी तो उन्होंने यह कह कर साफ मना कर दिया कि मेरी तन्ख्वाह इतनी नहीं है कि मैं इतनी मंहगी साड़ी ललिताजी के लिए ले सकूं, और अपने निर्णय पर वे अटल रहे।
एक बार उनके बड़े बेटे हरिकिशनजी को एक ख्याति प्राप्त घराने से अच्छे पद का प्रस्ताव मिला, उन्होंने शास्त्रीजी से अनुमती चाही, तो उन्होंने जवाब दिया कि यह नौकरी मेरे प्रधान मंत्री होने के कारण तुम्हें दी जा रही है, यदि तुम समझते हो कि तुम इस पद के साथ न्याय कर पाओगे और तुम इस के लायक हो तो मुझे कोई आपत्ती नहीं है। हरिकिशनजी ने भी वह प्रस्ताव तुरंत नामंजूर कर दिया।इन्हीं आदर्शों की वजह से चाहे अंत समय तक उनका अपना कोई घर नहीं था नही ढ़ंग की गाड़ी थी, पर वे याद किए जाएंगें, जब तक भारत और उसका इतिहास रहेगा।
आज के वंशवादी, सत्ता पिपासु तथाकथित नेता क्या ऐसा सोच भी सकते हैं। जिनमें कुछ एक को छोड़ उनके राज्य के बाहर ही कोई उन्हें नहीं जानता और ना जानना चाहता है.
नवरात्रि का तीसरा दिन
नवरात्रि के तीसरे दिन, मां दुर्गा की तीसरी शक्ती "मां चंद्रघण्टा" की आराधना की जाती है। इनका यह स्वरुप परम शांति तथा कल्याण प्रदान करने वाला है। इनके शरीर का रंग स्वर्ण के समान है तथा मस्तक पर घंटे के आकार का अर्धचंद्र है, इसीसे इनका नाम "मां चंद्रघण्टा" पड़ा। इनके दस हाथ हैं जिनमें अस्त्र-शस्त्र विभुषित हैं। इनका वाहन सिंह है।
आज के दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में प्रविष्ट होता है। मां की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन तथा दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। पर इन क्षणों में साधक को बहुत आवधान रहने की जरुरत होती है। मां चंद्रघण्टा की दया से साधक के समस्त पाप और बाधाएं दूर हो जाती हैं। इनकी आराधना से साधक में वीरता, निर्भयता के साथ-साथ सौभाग्य व विनम्रता का भी विकास होता है। मां का ध्यान करना हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देनेवाला होता है।
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पिण्डजप्रवरारूढा चण्कोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्मां चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
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आज के दिन साधक का मन मणिपुर चक्र में प्रविष्ट होता है। मां की कृपा से उसे अलौकिक वस्तुओं के दर्शन तथा दिव्य ध्वनियां सुनाई देती हैं। पर इन क्षणों में साधक को बहुत आवधान रहने की जरुरत होती है। मां चंद्रघण्टा की दया से साधक के समस्त पाप और बाधाएं दूर हो जाती हैं। इनकी आराधना से साधक में वीरता, निर्भयता के साथ-साथ सौभाग्य व विनम्रता का भी विकास होता है। मां का ध्यान करना हमारे इहलोक और परलोक दोनों के लिए परम कल्याणकारी और सद्गति देनेवाला होता है।
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पिण्डजप्रवरारूढा चण्कोपास्त्रकैर्युता ।
प्रसादं तनुते मह्मां चंद्रघण्टेति विश्रुता।।
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बुधवार, 1 अक्टूबर 2008
भगवान् का एड्रेस / आबादी के लिए रेल दोषी
एक भिखारी को सबेरे से शाम हो गयी पर उसे एक पैसा भी नहीं मिला। उसने सोचा था कि त्योहार के दिन हैं, तो पहले वह मंदिर में घंटों बैठा रहा, फिर दोपहर में मस्जिद के दरवाजे पर आस लगाये रहा, वहां से निराश हो गुरुद्वारे फिर चर्च। पर कहीं भी उसको एक रुपया ना मिल पाया। अंत में वह थक हार कर एक बार के सामने बैठ गया। उसका बैठना था कि अंदर से एक शराबी झूमते-झामते निकला और भिखारी के बिना मांगे ही एक सौ का नोट उसकी झोली में डाल गया।
भिखारी आश्चर्यचकित हो बोला, "हे भगवान तू रहता कहां है और एड्रेस कहां का दिया हुआ है।"
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नेताजी परिवार नियोजन के सिलसिले में एक सुदूर देहात में पहुंचे तो पाया कि घरों के हिसाब से लोग बहुत ज्यादा हैं। उन्होंने मुखिया से पूछा कि गांव में घर इतने कम हैं पर आबादी इतनी ज्यादा क्यूं है? मुखिया ने जवाब दिया, मालिक यह सब रेलवे वालों का दोष है। नेताजी चकराए कि आबादी और जनसंख्या का क्या मेल। उन्होंने फिर पूछा, भाई ऐसा कैसे? मुखिया बोला, उन्होंने रेल लाईन बिल्कुल गांव के पास से निकाली है। नेताजी की समझ में कुछ नहीं आया, बोले तो?
मुखिया ने समझाया, जनाब, रात में दो बजे एक गाडी सीटी बजाते हुए यहां से निकलती है, जिससे सारे गांव वालों की नींद टूट जाती है।
भिखारी आश्चर्यचकित हो बोला, "हे भगवान तू रहता कहां है और एड्रेस कहां का दिया हुआ है।"
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नेताजी परिवार नियोजन के सिलसिले में एक सुदूर देहात में पहुंचे तो पाया कि घरों के हिसाब से लोग बहुत ज्यादा हैं। उन्होंने मुखिया से पूछा कि गांव में घर इतने कम हैं पर आबादी इतनी ज्यादा क्यूं है? मुखिया ने जवाब दिया, मालिक यह सब रेलवे वालों का दोष है। नेताजी चकराए कि आबादी और जनसंख्या का क्या मेल। उन्होंने फिर पूछा, भाई ऐसा कैसे? मुखिया बोला, उन्होंने रेल लाईन बिल्कुल गांव के पास से निकाली है। नेताजी की समझ में कुछ नहीं आया, बोले तो?
मुखिया ने समझाया, जनाब, रात में दो बजे एक गाडी सीटी बजाते हुए यहां से निकलती है, जिससे सारे गांव वालों की नींद टूट जाती है।
नवरात्र का दूसरा दिन
पहले एक बात कहना चाहता हूं। आम लोगों की तरह, वही कुछ रटे-रटाए श्लोकों को छोड़ (उन्हें भी लिखना पड़े तो शायद पसीना आ जाए) संस्कृत में मेरा हाथ तंग ही है। सो इन नौ दिनों के "संकलन" में यदि कोई गल्ती, गल्ती से हो जाए तो क्षमा करेंगे।
नवरात्र के दूसरे दिन "माँ ब्रह्मचारिणी" की आराधना की जाती है। पुराणों के अनुसार पर्वत राज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद नारद मुनी के उपदेश से इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। पहले कंद मूल फिर शाक और फिर सिर्फ़ जमीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को ग्रहण करते हुए अहर्निश भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने पत्रों का भी त्याग कर दिया, जिससे उनका एक नाम "अपर्णा" भी पड़ा। हजारों साल तक चली इस साधना के कारण तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। उनके इस कृत्य से चारों ओर उनकी सराहना होने लगी थी। इस पर ब्रह्माजी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इनका नाम तपकारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी पड़ा।
माँ दुर्गा का यह रूप भक्तों और सिद्धों को अनंतफल देने वाला है। जीवन के कठिन समय में भी हतोत्साहित ना होने देने वाली, वैराग्यवत साहस देने वाली, सदाचार से जीवन व्यतीत करने वालों का साथ देने वाली, अपने कर्तव्य पथ से विचलित ना होने देने वाली अति दयालु माता हैं।
इस दिन साधक का मन "स्वाधिष्ठान चक्र" में स्थित होता है। योगी उनकी कृपा तथा भक्ती पूर्ण रूप से प्राप्त करता है।
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दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
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नवरात्र के दूसरे दिन "माँ ब्रह्मचारिणी" की आराधना की जाती है। पुराणों के अनुसार पर्वत राज हिमालय के घर जन्म लेने के बाद नारद मुनी के उपदेश से इन्होंने भगवान शिव को पाने के लिए कठोर तपस्या की थी। पहले कंद मूल फिर शाक और फिर सिर्फ़ जमीन पर टूट कर गिरे बेलपत्रों को ग्रहण करते हुए अहर्निश भगवान शंकर की आराधना करती रहीं। इसके बाद उन्होंने पत्रों का भी त्याग कर दिया, जिससे उनका एक नाम "अपर्णा" भी पड़ा। हजारों साल तक चली इस साधना के कारण तीनों लोकों में हाहाकार मच गया था। उनके इस कृत्य से चारों ओर उनकी सराहना होने लगी थी। इस पर ब्रह्माजी ने उन्हें मनोकामना पूरी होने का वरदान दिया। इसी दुष्कर तपस्या के कारण इनका नाम तपकारिणी अर्थात ब्रह्मचारिणी पड़ा।
माँ दुर्गा का यह रूप भक्तों और सिद्धों को अनंतफल देने वाला है। जीवन के कठिन समय में भी हतोत्साहित ना होने देने वाली, वैराग्यवत साहस देने वाली, सदाचार से जीवन व्यतीत करने वालों का साथ देने वाली, अपने कर्तव्य पथ से विचलित ना होने देने वाली अति दयालु माता हैं।
इस दिन साधक का मन "स्वाधिष्ठान चक्र" में स्थित होता है। योगी उनकी कृपा तथा भक्ती पूर्ण रूप से प्राप्त करता है।
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दधाना कर पद्माभ्याम अक्षमाला कमण्डलू।
देवी प्रसीदतु मयि ब्रह्मचारिण्यनुत्तमा।।
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