उस्ताद बिसमिल्ला खां, संगीत की दुनिया का एक बेमिसाल फनकार, सुरों का बादशाह। जिन्होंने सिर्फ शादी-ब्याह के मौकों पर बजने वाली शहनाई को एक बुलंद ऊंचाई तक पहुंचा दिया। उन्हीं के जीवन से जुड़ी एक अनोखी और अलौकिक घटना उन्हीं की जुबानी :-
मेरा बचपन मेरे मामू के घर ही बीता था। वही मेरे प्रारंभिक गुरु भी थे। वे घंटों बालाजी के मंदिर में बैठ कर रियाज किया करते थे। जब मैं कुछ बड़ा हुआ तो उन्होंने मुझे भी वहीं बैठ कर सुर साधने का आदेश दिया। मैं भी मंदिर में बिना दिन रात की परवाह किये रियाज करने लगा। इसमें कभी-कभी आधी रात भी हो जाती थी। करीब ड़ेढ-दो साल बाद एक दिन मामू साहब ने मुझे अकेले में बुला कर कहा कि यदि मंदिर में तुम कुछ देखो तो उसका जिक्र किसी से भी नहीं करना। बात मेरी समझ में कुछ आयी कुछ नहीं आयी पर मैं तन-मन से शहनाई पर सुर साधने में लगा रहा। ऐसे ही एक दिन काफी रात हो गयी थी मैं एकाग्रचित हो गहरे ध्यान में डूबा शहनाई बजा रहा था कि अचानक मंदिर एक अलौकिक सुगंध से भर गया। मैं उस सुगंध का ब्यान नहीं कर सकता। मुझे लगा शायद किसी ने गंगा किनारे लोबान आदि जलाया होगा, पर धीरे-धीरे वह सुगंध तेज होती गयी। मेरी आंखें खुल गयीं। मैंने देखा मेरे सामने साक्षात बालाजी खड़े हैं। ठीक मंदिर में लगी तस्वीर के रूप में। मैं पसीने-पसीने हो गया। उन्होंने आशीर्वाद स्वरूप हाथ उठाया और बोले, बेटा बजाओ। मेरी तो घीघ्घी बंध गयी थी। फिर वे मुस्कुराये और अदृश्य हो गये। ड़र के मारे मेरा सारा बदन कांप रहा था। मैं वहीं सब कुछ छोड़-छाड़ कर घर की ओर भागा और मामू को जगा सारी बात बतानी शुरू की ही थी कि उन्होंने कस कर एक थप्पड़ मुझे जड़ दिया और कहा कि तुम्हें मना किया था ना कि कुछ भी घटित हो किसी को मत बताना। फिर उन्होंने मुझे पुचकारा और कभी भी ना घबड़ाने की हिदायत दी।
इसके बाद मैं वर्षों एकांत में शहनाई बजाता रहा और अपने ऊपर बालाजी का आशीर्वाद और मामू के प्यार का एहसास महसूस करता रहा।
आज यह महान आत्मा हमारे बीच नहीं हैं। पर क्या उनके अनुभवों से हम कुछ सीख सकते हैं ?
इस ब्लॉग में एक छोटी सी कोशिश की गई है कि अपने संस्मरणों के साथ-साथ समाज में चली आ रही मान्यताओं, कथा-कहानियों को, बगैर किसी पूर्वाग्रह के, एक अलग नजरिए से देखने, समझने और सामने लाने की ! इसके साथ ही यह कोशिश भी रहेगी कि कुछ अलग सी, रोचक, अविदित सी जानकारी मिलते ही उसे साझा कर ज्यादा से ज्यादा लोगों तक पहुंचाया जा सके ! अब इसमें इसको सफलता मिले, ना मिले, प्रयास तो सदा जारी रहेगा !
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17 टिप्पणियां:
खां साहब स्वयम ही अलोकिक थे. उनसे जुडी यह घटना बताने के लिये बहुत आभार आपका.
रामराम.
बहुत अच्छा लगा बिस्मिल्ला खां साहब के बारे में यह जानकर. आभार.
बहुत बढ़िया संस्मरण!
आप भाग्यशाली है जी!
बहुत सुंदर जानकारी दी आप ने
पढ् कर अच्छा लगा । धन्यवाद।
उस्ताद बिस्मिल्लाह खां साहब ने एक साक्षात्कार में अपने इस अनुभव का ज़िक्र किया था. अच्छा लगा पढ कर. आभार.
सुन्दर प्रविष्टि ! बिस्मिल्लाह खान गौरव पुरुष थे संगीत के क्षेत्र में । शहनाई के उस्ताद के बारे में जानकार अच्छा लगा । आभार ।
काश कि यहां के समस्त नागरिक विशेषत: मुस्लिम इन चीजों को आत्मसात कर सकें!
मुझे ऐसे अनुभवों पर सहज ही विश्वास रहा है. कहाँ गए हर अनुभव को महज तर्क से कसने वाले..?
यही है हमारे सांस्कृतिक विरासत और हम तो इस पर सहज ही विश्वास करते हैं।
ऐसा ही संगीतकार नौशाद साहब के बारे में भी सुना था कि अपने हर गाने को रचने के पहले वह मां सरस्वती की प्रार्थना कर आशिर्वाद लेते थे। उनके घर में मां वीणा वादिनी की मुर्ती स्थापित थी।
jankari deneke liye dhanyvaad aapko .
वास्तव में खां साहब बनारस की गंगा जमुनी तहज़ीब के प्रतीक थे। उन्होंने हम सभी कों सांप्रदायिक सौहार्दता का अमूल्य उदहारण दिया है। खां साहब कों गंगा मैय्या से भी एक लगाव सा था। वे जब भी किसी समारोह में शहनाई वादन करते तो हमेशा काशी विश्नाथ की दिशा की ओर मुंह कर के बैठा करते थे।
धन्यवाद नेहा, इस जानकारी के लिये।
बहुत सुन्दर प्रस्तुति!
आपको सूचित करते हुए हर्ष हो रहा है कि-
आपकी इस प्रविष्टी की चर्चा कल शनिवार (09-06-2012) के चर्चा मंच पर भी होगी!
यह प्रसंग सच में रोंगटे खड़े कर देता है। मैं इसे पढ़कर महसूस करता हूँ कि साधना जब सच्चे मन से होती है तो कलाकार खुद को किसी बड़ी शक्ति से जुड़ा पाता है। उस्ताद ने मेहनत, एकाग्रता और गुरु पर विश्वास रखा, इसलिए वे शहनाई को नई ऊंचाई तक ले गए।
Admin,
धन्यवाद
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