शुक्रवार, 4 दिसंबर 2015

छींक, कुछ जाने-अनजाने तथ्य

आ..आक्..छींईंईं       

लो, कर लो बात, अभी पढ़ना शुरू किया ही नहीं कि छींक पड गयी :-)      

सर्दियां शुरू हो गयीं साथ ही छींकों का भी खाता भी खुल गया है। 

छींक, शरीर की एक स्वाभाविक क्रिया, जिसके कई कारण हो सकते हैं जैसे किसी अवांछित बाहरी पदार्थ के नाक में चले जाने से, एलर्जी, धूल, धुंआ, अचानक तेज रौशनी का पड़ना, तापमान में गिरावट, ठंडी हवा के झोंके, तेज गंध, वर्षा, पशुओं की महक, पराग कण इत्यादि। जैसे ही इनका प्रभाव पड़ता है वैसे ही शरीर उसे निकालने के लिए मुंह और नाक के रास्ते बहुत तेजी से हवा को बाहर फेंकता है जिसके साथ ही वह पदार्थ भी बाहर निकल जाता है। पर इस साधारण क्रिया के लिए हमारे पेट, छाती, फेफडों, गले और आंखों को भी योगदान देना पड़ता है। कभी-कभी एक छींक से काम नहीं चलता तो एक के बाद एक कई छींके आती हैं। 
सर्दियों और बरसात के मौसम में छींक एक सामान्य क्रिया है जिससे घबराने की कोई बात नहीं है। पर यदि इनका आना कुछ ज्यादा ही लग रहा हो तो अदरक या काली मिर्च का उपयोग किया जा सकता है। पर ज़ुकाम के कारण आने वाली छींकें कष्टदायी हैं। ये इसलिए आती हैं क्योंकि ज़ुकाम की वजह से हमारी नाक के भीतर की झिल्ली में सूजन आ जाती है और उससे ख़ुजलाहट होती रहती है और शरीर उसके लिए अपनी प्रतिक्रिया दोहराता रहता है। जिसमें बेचारी नाक की ऎसी की तैसी हो जाती है। इसके लिए डाक्टर की सलाह ले लेनी चाहिए।  

छींक शरीर की रोग प्रतिरोधक क्रिया का एक  हिस्सा है जो हमें स्वस्थ रखने की चेष्टा करता है। इंसान ही नहीं जानवरों, जैसे कुत्ता, बिल्ली, बंदर, मुर्गे यहां तक कि पानी में रहने वाली मछलियों को भी छींक आती है। इसके कुछ रोचक पहलू भी हैं -  
* यदि छींक आने की क्रिया शुरू हो जाए तो यह रुकती नहीं है। रोकना चाहिए भी नहीं क्योकि इसको रोकना खतरनाक हो सकता है। जिसका असर आँखों, कान और फेफड़े पर पड सकता है।
* छींक लाने में करीब-करीब सारा शरीर क्रियारत हो जाता है। जिसमें नाक, कान , आँख, मष्तिष्क, फेफड़े, पेट
सब का योगदान होता है।
* एक छींक में करीब 40000 तक जलकण हो सकते हैं।
* छींक के समय नाक -मुंह से निकलने वाली हवा की गति 30 से 35  की.मी. की होती है। जो पांच फीट के दायरे में 15 से 20 फुट दूर तक जा सकती है। इसीलिए इसके आने पर मुंह पर रुमाल या अपनी हथेली जरूर रख लेनी
चाहिए जिससे इसका असर दूसरों पर ना पड़े।
* सोते समय छींक नहीं आती क्यों की इसके कारक स्नायु भी सुप्तावस्ता में होते हैं।
* छींकते समय आँखें बंद हो जाती हैं। आँखें खुली रख कर छींका नहीं जा सकता।
* छींक के दौरान दिल की धड़कन रुकती नहीं है, जैसी की धारणा है, कुछ धीमी जरूर हो जाती है, जो शायद छींक के आने के पहले ली गयी गहरी सांस के कारण होता है।

* छींक को तो रोकना नहीं चाहिए पर इसके आने की क्रिया जब महसूस होने लगे तो नाक को मल कर या ऊपर के होंठ को नाक के नीचे वाली जगह पर दबा कर या गहरी सांस ले इसे रोका जा सकता है। 

जहां तक समझ आता है कि छींक वातावरण के बदलाव के कारण भी आती है, इसलिए घर के बाहर कदम रखने पर यदि छींक आती है तो अंदर और बाहर के वातावरण के अनुसार शरीर को ढलने तक कुछ देर रुक जाने की बात सुझाई गयी होगी। जिसका बाद में अर्थ ही बदल गया होगा और शरीर की इस स्वाभाविक और लाभदायक क्रिया को कार्य में विलंब पैदा करने के कारण या फिर इसकी तेज, चौंकाने वाली आवाज के कारण इसे अपशकुन-सूचक मान लिया गया होगा। जबकि खांसी, डकार और अपानवायु जैसी दोयम दर्जे की ध्वनियों पर कोई ख़ास प्रतिक्रिया नहीं की जाती। 

2 टिप्‍पणियां:

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक ने कहा…

आपकी इस प्रविष्टि् के लिंक की चर्चा कल शनिवार (05-12-2015) को "आईने बुरे लगते हैं" (चर्चा अंक- 2181) पर भी होगी।
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सूचना देने का उद्देश्य है कि यदि किसी रचनाकार की प्रविष्टि का लिंक किसी स्थान पर लगाया जाये तो उसकी सूचना देना व्यवस्थापक का नैतिक कर्तव्य होता है।
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चर्चा मंच पर पूरी पोस्ट नहीं दी जाती है बल्कि आपकी पोस्ट का लिंक या लिंक के साथ पोस्ट का महत्वपूर्ण अंश दिया जाता है।
जिससे कि पाठक उत्सुकता के साथ आपके ब्लॉग पर आपकी पूरी पोस्ट पढ़ने के लिए जाये।
हार्दिक शुभकामनाओं के साथ।
सादर...!
डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक'

गगन शर्मा, कुछ अलग सा ने कहा…

शास्त्री जी,
पोस्ट शामिल करने के लिए धन्यवाद।