बुधवार, 20 जुलाई 2011

किसी लेखक ने अपनी कलम को कभी कोई नाम नहीं दिया, ऐसा क्यों?

सृष्टि के आरंभ में आदि-मानव को अपनी सुरक्षा और जानवरों को मारने के लिए अपने बाहुबल के अलावा भी किसी अन्य साधन की जरूरत महसूस हुई होगी। क्योंकि प्रकृति ने अन्य जीव-जंतुओं की तरह उसे आत्मरक्षा हेतु कोई अतिरिक्त प्राकृतिक सुविधा नहीं दे रखी थी। उल्टा वह ताकत में उनसे कमजोर ही साबित होता था। शुरु में अपने बचाव और भोजन प्राप्ति के लिए उसने अनघड़ पत्थरों या किसी पेड़ की ड़ाली का उपयोग हथियार के रूप में किया होगा। धीरे-धीरे उन्हीं चीजों को तीक्ष्ण आकार दे और घातक बनाया होगा और जब उसे समझ में आया होगा कि दूर से फेंक कर मारने में खुद की ज्यादा सुरक्षा है तो तीर और धनुष का आविष्कार हुआ होगा। शास्त्रों में भी तीर-धनुष का विशेष उल्लेख मिलता है। यहां तक कि देवताओं द्वारा धारण किए गये इस अस्त्र के बाकायदा नाम भी हैं। जैसे शंकरजी का "पिनाक", विष्णुजी का "श्रृंग", इंद्र का "विजय", अर्जुन का "गांडिव" जो अत्यधिक प्रसिद्ध रहा है। धनुषों का निर्माण बांस या किसी लचीली धातु से किया जाता था। धनुर्धर इसे तरह-तरह से सजा कर रखते थे। इसकी मार करीब 300 फुट तक होती थी।

ऐसा माना जाता है कि तीर-धनुष के बाद तलवार अस्तित्व में आई। जिसका आविष्कार ब्रह्माजी ने असुरों के संहार के लिए देवताओं के लिए किया था। भारत में भी इसके होने के प्रमाण 2000 ईसा पूर्व से मिलते हैं। इसके कयी रूप-रंग होते थे तथा इसका निर्माण लोहे से किया जाता था। तलवार योद्धाओं का प्रिय शस्त्र रहा है। इसे वे अपने शरीर का ही एक अंग मानते थे। यह कितनी महत्वपूर्ण थी इसका अंदाजा इसी बात से लग जाता है कि युद्ध में रत योद्धा अपनी तलवार पर अपना नाम लिख अपने विवाह मंडप में भेज देता था और उसी के साथ फेरे ले विवाह सम्पन्न मान लिया जाता था। कुछ इतिहास प्रसिद्ध तलवारें हैं, रावण की "चंद्हास", शिवाजी महारज की "भवानी", शाहजहां की "पारादल", अकबर की "लक्खी"। मुगल काल में शमशीर का बोलबाला रहा।
इसी तलवार या शमशीर से बहुत बार किसी राजकुमारी का हाथ पाने के लिए प्रतियोगिताएं जीती गयीं। यूरोप में तो इस तरह के आयोजन होते ही रहते थे।

ये तो हुई प्राण लेने वाले हथियारों की बात जो योद्धाओं में इतने प्रिय थे कि उन्होंने बाकायदा इन्हें नाम दे रखा था।
यह सब देख-सुन एक सवाल उठता है मन में कि योद्धाओं की तरह लेखक का प्रिय हथियार तो कलम ही होती है। उस से किसी का खून तो नहीं बहता पर उसकी ताकत से बहुत बार साम्राज्यों की चूलें हिल गयीं, समाज का रवैय्या बदल गया, लोगों की सोच में आमूल-चूल परिवर्तन आ गये, पर आज तक किसी लेखक ने अपनी लेखनी को कोई नाम दिया हो यह बात सुनने में नहीं आई। जब कि कहावत है कि कलम तलवार से ज्यादा ताकतवर होती है।

ऐसा क्यूं ?

3 टिप्‍पणियां:

भारतीय नागरिक - Indian Citizen ने कहा…

वाकई सोचने वाली बात है..

प्रवीण पाण्डेय ने कहा…

आपने सुझाव दिया है अब लोग नाम रखेंगे।

Rahul Singh ने कहा…

नाम का सुझाव अब हो सकता है- लेनोवो की-बोर्ड.